1443 रामायण के प्रमुख पात्र - गीताप्रेस 1443 Ramayan ke Pramukh Patra - Hindi book by - Gitapress
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1443 रामायण के प्रमुख पात्र

गीताप्रेस

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :35
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 852
आईएसबीएन :81-293-0495-3

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रामायण के प्रमुख पात्रों का वर्णन...

Ramayan Ke Pramukh Patra a hindi book by Gitapress - रामायण के प्रमुख पात्र - गीताप्रेस

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

भगवान् श्रीराम

असंख्य सद्गुणीरूपी रत्नों के महान् निधि भगवान् श्रीराम धर्मपरायण भारतीयों के परमाराध्य हैं। श्रीराम ही धर्म के रक्षक, चराचर विश्व की सृष्टि करनेवाले, पालन करनेवाले संहार करनेवाले परब्रह्म के पूर्णावतार हैं। रामायण में यथार्थ ही कहा गया है- ‘रक्षिता जीवलोकस्य धर्मस्य परिरक्षिता।’ भगवान् श्रीराम धर्म के क्षीण हो जाने पर साधुओं की रक्षा, दुष्टों का विनाश और भूतल पर शान्ति एवं धर्म की स्थापना करने के लिये अवतार लेते हैं। उन्होंने त्रेतायुग में देवताओं की प्रार्थना सुनकर पृथ्वी का हरण करने के लिये अयोध्यापति महाराज दशरथ के यहाँ चैत्र शुक्ल नवमी के दिन अवतार लिया और राक्षसों का संहार करके त्रिलोकी में अपनी अविचल कीर्ति स्थापित की। पृथ्वी का धारण-पोषण, समाज का संरक्षण और सुधारों का परित्राण करने के कारण भगवान् श्रीराम मूर्तिमान् धर्म ही है।

भगवान् श्रीराम जीवमात्र के कल्याण के लिये अवतरित हुए थे। विविध रामायणों, अठारह महापुराणों, रघुवंशादि महाकाव्यों, हनुमदादि नाटकों, अनेक चप्पू-काव्यों ताथ महाभारतादि में इनके विस्तृत चरित्र का ललित वर्ण किया गया है। श्रीराम के विषय में जितने ग्रन्थ लिखे गये, उतने किसी अन्य अवतार के चरित्र पर नहीं लिखे गये। गुरुगृह से अल्पकाल में शिक्षा प्राप्त करके लौटने के बाद इनका चरित्र विश्वामित्र यज्ञरक्षा, जनकपुर में शिव-धनुष-भंग, सीता-विवाह, पशुराम का गर्वभंग आदि के रूप में विख्यात है। यज्ञ रक्षा के लिये जाते समय इन्होंने ताड़का वध, महर्षि विश्वामित्र के आश्रम पर सुबाहु आदि दैत्यों का संहार तथा गौतम की पत्नी अहल्या का-उद्धार किया। कैकेयी के वरदान स्वरूप पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये ये चौदह वर्षों के लिये वन में गये। चित्रकूटादि अनेक स्थानों में रहकर इन्होंने ऋषियों को कृतार्थ किया। पंचवटी में शूर्पणखा की नाक-कान काटकर और खर-दूषण, त्रिशिरा आदि का वधकर इन्होंने रावण को युद्ध के लिये चुनौती दी। रावण ने मारीच की सहायता से सीता का अपहरण किया। सीता की खोज करते हुए इन्होंने सुतीक्ष्ण, शरभंग, जटायु, शबरी आदि को सद्गति प्रदान की तथा ऋष्यमूक पर्वतपर पहुँचकर सुग्रीव से मैत्री की और बालि का वध किया। फिर श्रीहनुमान जी के द्वारा सीता का पता लगवाकर इन्होंने समुद्रपर सेतु बँधवाया और वानरी सेना-की सहायता से रावण-कुम्भकर्णादि का वध किया तथा विभीषण को राज्य देकर सीताजी का उद्धार किया। श्रीराम ने लगभग ग्यारह हजार वर्षों तक राज्य करके त्रेता में सत्ययुग की स्थापना की। अपने राज्यकाल में रामराज्य को चिरस्मरणीय बनाकर पुराणपुरुष श्रीराम सपरिकर अपने दिव्यधाम साकेत पधारे।

कर्तव्यज्ञान की शिक्षा देना रामावतार की विशेषता है। इनका दृष्टान्त भगवान् श्रीराम ने स्वयं अपने आचरणों के द्वारा कर्म करके दिखाया। वे एक आदर्श पुत्र, आदर्श भ्राता, आदर्श पति, आदर्श मित्र, आदर्श स्वामी, आदर्श वीर, आदर्श देशसेवक और सर्वश्रेष्ठ महामानव होने के साथ साक्षात् परमात्मा थे। भगवान् श्रीराम का चरित्र अनन्त है, उनकी कथा अनन्त है। उसका वर्णन करने का सामर्थ्य किसी में नहीं है। भक्तगण अपनी भावना के अनुसार उनका गुणगान करते हैं।

महर्षि वसिष्ठ


महर्षि वसिष्ठ की उत्पत्ति का वर्णन पुराणों में विभिन्न रूपों में प्राप्त होता है। कहीं ये ब्रह्मा के मानस पुत्र, कहीं मित्रावरुण के पुत्र और कहीं अग्निपुत्र कहे गये हैं। इनकी पत्नी का नाम अरुन्धती देवी था। जब इनके पिता ब्रह्माजी ने इन्हें मृत्युलोक में जाकर सृष्टि का विस्तार करने तथा सूर्यवंश का पौरोहित्य कर्म करने की आज्ञा दी, तब इन्होंने पौरोहित्य कर्म को अत्यन्त निन्दित मानकर उसे करने में अपनी असमर्थता व्यक्त की। ब्रह्माजी ने इनसे कहा- ‘इसी वंश से आगे चलकर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम अवतार ग्रहण करेंगे और यह पौरोहित्य कर्म ही तुम्हारी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करेगा।’ फिर उन्होंने इस धराधामपर मानव-शरीर में आना स्वीकार किया।

महर्षि वसिष्ठ ने सूर्य वंश का पौरोहित्य करते हुए अनेक लोक-कल्याणकारी कार्यों को सम्पन्न किया। इन्हीं के उपदेश बल पर भागीरथ ने प्रयत्न करके गंगा-जैसी लोककल्याणकारिणी नदी को हम लोगों के लिये सुलभ कराया। दिलीप को नन्दिनी की सेवा की शिक्षा देकर रघु-जैसे पुत्र प्रदान करने वाले तथा महाराज दशरथ की निराशा में आशा का संचार करनेवाले महर्षि वसिष्ठ ही थे। इन्हीं की सम्मति से महाराज दशरथ ने पुत्रेष्टि-यज्ञ सम्पन्न किया और भगवान् श्रीराम का अवतार हुआ। भगवान् श्रीराम को शिष्य के रूप में प्राप्तकर महर्षि वसिष्ठ का पुरोहित-जीवन सफल हो गया। भगवान् श्रीराम के वनगमन से लौटने के बाद इन्हीं के द्वारा उनका राज्याभिषेक हुआ। गुरु वसिष्ठ ने श्रीराम के राज्यकार्य में सहयोग के साथ उनसे अनेक यज्ञ करवाये।

महर्षि वसिष्ठ क्षमा की प्रतिमूर्ति थे। एक बार श्रीविश्वामित्र उनके अतिथि हुए। महर्षि वसिष्ठ ने कामधेनु के सहयोग से उनका राजोचित् सत्कार किया। कामधेनु की आलौकिक क्षमताओं को देखकर विश्वामित्र के मन में लाभ उत्पन्न हो गया। उन्होंने इस गौको वसिष्ठ से लेने की इच्छी प्रकट की। कामधेनु वसिष्ठ जी के लिये आवश्यक आवश्यकताओं की पूर्तिहेतु महत्त्वपूर्ण साधन थी, अत: इन्होंने उसे देने में असमर्थता व्यक्त की। विश्वामित्र ने कामधेनु को बल पूर्वक ले जाना चाहा। वसिष्ठ जी के संकेत पर कामधेनु ने अपार सेना की सृष्टि कर दी। विश्वामित्र को अपनी सेना के साथ भाग जाने पर विवश होना पड़ा। द्वेष-भावना से प्रेरित होकर विश्वामित्र ने भगवान् शंकर की तपस्या की और उनसे दिव्यास्त्र प्राप्त करके उन्होंने महर्षि वसिष्ठ पर पुन: आक्रमण कर दिया, किन्तु महर्षि वसिष्ठ के ब्रह्मदण्ड के सामने उनके सारे दिव्यास्त्र विफल हो गये और उन्हें क्षत्रिय बल को धिक्कार कर ब्राह्मणत्व लाभ के लिये तपस्या हेतु वन जाना पड़ा।

विश्वामित्र की अपूर्व तपस्या से सभी लोग चमत्कृत हो गये। सब लोगों ने उन्हें ब्रह्मर्षि मान लिया, किन्तु महर्षि वसिष्ठ के ब्रह्मर्षि कहे बिना वह ब्रह्मर्षि नहीं कहला सकते थे। अन्त में उन्होंने वसिष्ठ जी को मिटाने का निश्चय कर लिया और उनके आश्रम में एक पेड़पर छिपकर वसिष्ठजी को मारने के लिये उपयुक्त अवसर की प्रतीक्षा करने लगे। उसी समय अरुन्धती के प्रश्न करने पर वसिष्ठजी ने विश्वामित्र के अपूर्व तप की प्रशंसा की। क्षमा बल ने पशुबल पर विजय पायी और विश्वामित्र शस्त्र फेंककर श्रीवसिष्ठ जी के शरणागत हुए। वसिष्ठ जी ने उन्हें उठाकर गले से लगाया और ब्रह्मर्षि की उपाधि से विभूषित किया। इतिहास-पुराणों में महर्षि वसिष्ठ के चरित्र का विस्तृत वर्णन मिलता है। ये आज भी सप्तर्षियों में रहकर जगत् का कल्याण करते रहते हैं।

महर्षि विश्वामित्र


महर्षि विश्वामित्र महाराज गाधिके पुत्र थे। कुश वंश में पैदा होने के कारण इन्हें कौशिक भी कहते हैं। ये बड़े ही प्रजापालक तथा धर्मात्मा राजा थे। एक बार ये सेना को साथ लेकर जंगल में शिकार खेलने के लिये गये। वहाँ पर ये महर्षि वसिष्ठ के आश्रम पर पहुँचे। महर्षि वसिष्ठ ने इनसे इनकी तथा राज्य की कुशल-क्षेम पूछी और सेना सहित आतिथ्य-सत्कार स्वीकार करने की प्रार्थना की।
विश्वामित्र ने कहा- ‘भगवन् ! हमारे साथ लाखों सैनिक हैं। आपने जो फल-फूल दिये, उसी से हमारा सत्कार हो गया। अब हमें जाने की आज्ञा दें।’

महर्षि वसिष्ठ ने उनसे बार-बार पुन: आतिथ्य स्वीकार करने का आग्रह किया। उनके विनय को देखकर विश्वामित्र ने अपनी स्वीकृति दे दी। महर्षि ने अपने योगबल और कामधेनु की सहायता से विश्वामित्र को सैनिकों संहित भलीभाँति तृप्त कर दिया। कामधेनु के विलक्षण प्रभाव से विश्वामित्र चकित हो गये। उन्होंने कामधेनु को देने के लिये महर्षि वसिष्ठ से प्रार्थना की। वसिष्ठ जी के इनकार करने पर जबरन कामधेनु को अपने साथ ले जाने लगे। कामधेनु ने अपने प्रभाव से लाखों सैनिक पैदा किये। विश्वामित्र की सेना भाग गयी और वे पराजित हो गये। इससे विश्वामित्र को बड़ी ग्लानि हुई। उन्होंने अपना राजपाट छोड़ दिया। वे जंगल में जाकर ब्रह्मर्षि होने के लिये कठोर तपस्या करने लगे।

तपस्या करते हुए सबसे पहले मेनका अप्सरा के माध्यम से विश्वामित्र के जीवन में काम का विघ्न आया। ये सब कुछ छोड़कर मेनका के प्रेम में डूब गये। जब इन्हें होश आया तो इनके मन में पश्चात्ताप का उदय हुआ। ये पुन: कठोर तपस्या में लगे और सिद्ध हो गये। काम के बाद क्रोध ने भी विश्वामित्र को पराजित कर दिया। राजा त्रिशंकु सदेह स्वर्ग जाना चाहते थे। यह प्रकृति के नियमों के विरुद्ध होने के कारण वसिष्ठ जी ने उनका कामनात्मक यज्ञ कराना स्वीकार नहीं किया। विश्वामित्र के तप का तेज उस समय सर्वाधिक था। त्रिशंकु विश्वामित्र के पास गये। वसिष्ठ से पुराने वैर को स्मरण करके विश्वामित्र ने उनका यज्ञ कराना स्वीकार कर लिया। सभी ऋषि इस यज्ञ में आये, किन्तु वसिष्ठ के सौ पुत्र नहीं आये। इस पर क्रोध के वशीभूत होकर विश्वामित्र ने उन्हें मार डाला। अपनी भयंकर भूल का ज्ञान होने पर विश्वामित्र ने पुन: तप किया और क्रोध पर विजय करके ब्रह्मर्षि हुए। सच्ची लगन और सतत उद्योग से सब कुछ सम्भव है, विश्वामित्र ने इसे सिद्ध कर दिया।



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