कल्पतरु की उत्सवलीला - कृष्णबिहारी मिश्र Kalpataru ki Utsavlila - Hindi book by - Krishna Bihari Mishra
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कल्पतरु की उत्सवलीला

कृष्णबिहारी मिश्र

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :596
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 85
आईएसबीएन :81-263-1292-0

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श्री रामकृष्ण परमहंस के जीवन प्रसंग पर केन्द्रित, अब तक प्रकाशित साहित्य से सर्वथा भिन्न यह प्रस्तुति अपनी सहजता और लालित्य में विशिष्ट है।

Kalpataru ki Utsavlila

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

अनुशीलन और ललित निबन्ध के क्षेत्र में विशिष्ट अवदान के लिए प्रतिष्ठित डॉ. कृष्णबिहारी मिश्र की यह कृति उनके लेखन में नया प्रस्थान है, संवेदना और शिल्प की एक नयी मुद्रा। शोध लालित्य का एक अनुपम समन्वय। श्री रामकृष्ण परमहंस के जीवन–प्रसंग पर केन्द्रित, अब तक प्रकाशित साहित्य से सर्वथा भिन्न यह प्रस्तुति अपनी सहजता और लालित्य में विशिष्ट है। श्री रामकृष्ण नवजागरण के सांस्कृतिक नायकों के बीच अद्वितीय थे। उनके सहज आचरण और ग्राम्य बोली–बानी से जनमे प्रकाश का लोक-मानस पर जितना गहरा प्रभाव पड़ा है उतना बौद्धिक संस्कृति-नायकोंकी पण्डिताई का नहीं। पण्डितों की शक्ति और थी, पोथी-विद्या को अपर्याप्त माननेवाले श्री रामकृष्ण की शक्ति और। एक तरफ तर्क और वाद थाः दूसरी ओर वाद निषेध की आकर्षक साधना थी। सम्प्रदाय सहिष्णुता दैवी विभूति के रूप में श्री रामकृष्ण के व्यक्तित्व में मूर्त हुई थी, जिसे विश्व–मानव के लिए ‘विधायक विकल्प’ के रूप में, कृष्णबिहारी मिश्र ने ऐसी जीवन्तता के साथ रचा है कि उन्नीसवीं शती का पूरा परिदृश्य और परमहंस देव का प्रकाशपूर्ण रोचक व्यक्तित्व सजीव हो उठा है।

ज्ञानपीठ आश्वस्त है, नितान्त अभिनव शिल्प में रचित यह कृति, उपभोक्ता सभ्यता के आघात से कम्पित समय में, प्रासंगिक मानी जाएगी।

विधायक विकल्प

पोथी–विद्या को परमहंस श्री रामकृष्णदेव अपर्याप्त मानते थे। इसलिए पोथी पाठशाला में उनकी नैसर्गिक अरुचि थी। पर पोथी-विद्या के स्वामी में उनकी सहज रुचि थी। शास्त्रवेत्ता मनीषियों की कीर्ति उन्हें आकृष्ट करती थी। बतकही और प्रकाश-सन्धान की लिप्सा उन्हें पण्डितों के वास-स्थान खींच ले जाती थी। अपने नैसर्गिक विवेक के निकष पर वे विद्या-अविद्या का निर्णय बड़ी सहजता से कर लेते थे। और जहाँ विद्या का प्रकाश दिखाई पड़ता था, उसे अपेक्षित गुरुता और सम्मान के साथ प्रायः अन्तरंग गोष्ठी में स्मरण करते रहते थे। जो पण्डिताई जीवन के राग-छन्द में मूर्त नहीं होती, जो शास्त्र–ज्ञान तत्वज्ञान की राह नहीं रचता; कूड़ा कुण्ठा और लघुता से मुक्त कर उदार नहीं बनाता, वह कैसी पण्डिताई और कैसा शास्त्र-बोध। परमहंस ऐसे बोध को ‘सुबोध पाखण्ड’ मानते थे। जो बन्धन को जटिल और बोझ को भारी बनाता है। रामकृष्णदेव की विवेक–कसौटी केवल उसे ही विद्या मानती थी, जो बन्धन–मुक्ति की सुगम राह रचती है, और परा विद्या की ज्योति की ओर अभिमुख करती है। उनके संवेदनशील विवेक को विद्या का प्रकाश कुछ ही चरित्रों में दिखाई पड़ता था। ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, नारायण शास्त्री और पद्मलोचन पण्डित की पण्डिताई की परमहंसदेव उच्छ्वसित श्लाघा के साथ पुनःपुनः चर्चा करते थे, तो उसके मूल में उनकी अन्तर्दृष्टि के अध्ययन का निष्कर्ष था। स्वामी दयानन्द सरस्वती की पण्डिताई की वे अपनी अन्तरंग गोष्ठी में चर्चा करते थे, पर स्वामीजी के वेद के प्रति आत्यन्तिक आग्रह और दूसरे धर्म-ग्रन्थों के प्रति आक्रामक मुद्रा से परमहंस रामकृष्ण का वैमत्य मुखर था।1

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1. यद्यपि आर्यसमाजी पण्डितों द्वारा लिये गये स्वामी दयानन्द और आर्य समाजविषयक अवदान पर केन्द्रित ग्रन्थों में स्वामीजी और परमहंसदेव की भेंट का कहीं उल्लेख नहीं है, पर परमहंसदेव के दो अन्तरंग भक्तों –श्री ‘म’ (महेन्द्रनाथ गुप्त) और स्वामी शारदानन्द- द्वारा रचित परमहंस के लीला–प्रसंग में दोनों महापुरूषों की भेंट का वृतान्त है, जिसे आधार बनाकर रोमा रोलाँ ने भी अपनी प्रसिद्ध पुस्तक में मुलाकात का उल्लेख किया है।

ब्राह्मसमाज के ज्येष्ठ नायक देवन्द्रनाथ ठाकुर के प्रसंग में श्री रामकृष्ण परमहंस की ललित टिप्पणी, द्रष्टव्य; ‘श्री म’-प्रणीत’ ‘श्रीरामकृष्ण वचनामृत’, द्वितीय भाग, पष्ठ संस्करण, पृ, 282-283



पोथी–विद्या के भार से मुक्त श्री रामकृष्ण परमहंस के कण्ठ से उच्चरित प्रत्येक शब्द में विद्या बोलती थी और उनके गँवई आचरण में शास्त्र मुखर था। इस सत्य को लक्ष्य कर शास्त्रवेत्ता को अपनी पण्डिताई की लघुता का बोध होता था। और इतिहास का साक्ष्य है कि रामकृष्णदेव की गँवई बोली-बानी के सामने उस काल की मनीषा विनत थी।

सच्चे मनीषियों के प्रति सहज सम्मानशील परमहंसदेव प्रख्यात पण्डितों पर भी तीखा कटाक्ष करते सकुचाते नहीं थे। शशधर पण्डित जैसे विशिष्ट पण्डित को श्री रामकृष्ण के एक सरल प्रश्न ने कम्पित कर दिया था, और वे परमहंसदेव की आध्यात्मिक विभूति ने स्पर्श किया, उनके प्रज्ञा-चक्षु तत्क्षण खुल गये, और विद्या का सटीक बोध जगते ही, कठोर साधना से अर्जित अपनी सम्पदा –विरल वैदुष्य-भ्रम का असह्य भार लगने लगी। परहंसदेव की गँवई-टुटही भाषा ने जिस राह का संकेत दिया था महत् सोपान से जुड़ने के लिए, पोथी–भार को उतारकर प्रख्यात शास्त्रवेत्ता मनीषी पं. नारायण शास्त्री उसी राह पर गैरिक वस्त्र धारण कर धावन करने लगे। असाधाण पण्डिताई ने आस्था की निर्मल ज्योति के सामने घुटना टेक दिया; वैदुष्य–भित्तिक जीवन–चर्या का आयाम प्रकाश के स्पर्श मात्र से रूपान्तरित हो गया।

आगे....


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