1216 प्रमुख देवियाँ - गीताप्रेस 1216 Pramukh Deviyan - Hindi book by - Gitapress
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1216 प्रमुख देवियाँ

गीताप्रेस

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :19
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 848
आईएसबीएन :81-293-0483-x

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प्रमुख देवियों का वर्णन..

Pramukh Deviyan a hindi book by Gitapress - प्रमुख देवियाँ - गीताप्रेस

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

।।श्रीहरि:।।

भगवती श्रीदुर्गा

अनन्त कोटि ब्राह्मण्डों की अधीश्वरी भगवती श्रीदुर्गा ही सम्पूर्ण विश्व को सत्ता और स्फूर्ति प्रदान करती हैं। इन्हीं की शक्ति से ब्रह्मादि देवता उत्पन्न होते हैं, जिनसे विश्व की उत्पत्ति होती है। इन्हीं की शक्ति से विष्णु और शिव प्रकट होकर विश्व का पालन और संहार करते हैं। ये ही गोलोक में श्रीराधा, साकेत में श्रीसीता, क्षीरसागर में लक्ष्मी, दक्षकन्या सती तथा दुर्गतिनाशिनी दुर्गा हैं।

शिवपुराण के अनुसार भगवती श्रीदुर्गा के आविर्भाव की कथा इस प्रकार है- प्राचीन काल में दुर्गम नामक एक महाबली दैत्य उत्पन्न हुआ। उसने ब्रह्माजी के वरदान से चारों वेदों को लुप्त कर दिया। वेदों के अदृश्य हो जाने से सारी वैदिक क्रिया बन्द हो गयी। उस समय ब्राह्मण और देवता भी दुराचारी हो गये। न कहीं दान होता था, न तप किया जाता था। न यज्ञ होता था, न होम ही किया जाता था। इसका परिणाम यह हुआ कि पृथ्वी पर सौ वर्षों तक वर्षा बन्द हो गयी। तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। सब लोग अत्यन्त दु:खी हो गये। कुआँ, बावड़ी, सरोवर, सरिता और समुद्र सभी सूख गये। सभी लोग भूख-प्यास से संतप्त होकर मरने लगे। प्रजा के महान् दु:ख को देखकर सभी देवता महेश्वरी योगमाया की शरण में गये।

देवताओं ने भगवती से कहा- ‘महामाये ! अपनी सारी प्रजा की रक्षा करो। सभी लोग अकाल पड़ने से भोजन और पानी के अभाव में चेतनाहीन हो रहे हैं। तीनों लोकों में त्राहि-त्राहि मची है। माँ ! जैसे आपने शुम्भ-निशुम्भ, चण्ड-मुण्ड, रक्तबीज, मधु-कैटभ तथा महिष आदि असुरों का वध करके हमारी रक्षा की थी, वैसे ही दुर्गमासुर के अत्याचार से हमारी रक्षा कीजिये।’

देवताओं की प्रार्थना सुनकर कृपामयी देवी ने उन्हें अपने अनन्त नेत्रों से युक्त स्वरूप का दर्शन कराया ! तदनन्तर पराम्बा भगवती ने अपने अनन्त नेत्रों से अश्रुजलकी सहस्रों धाराएँ प्रवाहित कीं। उन धाराओं से सब लोग तृप्त हो गये और समस्त औषधियाँ भी सिंच गयीं। सरिताओं और समुद्रों में अगाध जल भर गया। पृथ्वी पर शाक और फल-मूल के अंकुर उत्पन्न होने लगे। देवी की इस कृपा से देवता और मनुष्यों सहित सभी प्राणी तृप्त हो गये। उसके बाद देवी ने देवताओं से पूछा- ‘अब मैं तुम लोगों का और कौन-सा कार्य सिद्ध करूँ ?’ देवताओं ने कहा- ‘माँ ! जैसे आपने समस्त विश्व पर आये अनावृष्टि के संकट को हटाकर सबके प्राणों की रक्षा की है; वैसे ही दुष्ट दुर्गामासुर को मारकर और उसके द्वारा अपहृत वेदों को लाकर धर्म की रक्षा कीजिये।’ देवी ने ‘एवमस्तु’ कहकर देवताओं को संतुष्ट कर दिया। देवता उन्हें प्रणाम करके अपने स्थान को लौट गये। तीनों लोकों में आनन्द छा गया। जब दुर्गामासुर को इस रहस्य का ज्ञान हुआ, तब उसने अपनी आसुरी सेना को लेकर देवलोक को घेर लिया। करुणाममयी माँ ने देवताओं को बचाने के लिये देवलोक के चारों ओर अपने तेजोमण्डल की एक चहारदीवारी खड़ी कर दी और स्वयं घेरे के बाहर आ डटीं।

देवी को देखते ही दैत्यों ने उन पर आक्रमण कर दिया। इसी बीच देवी के दिव्य शरीर से- काली, तारा, छिन्नमस्ता, श्रीविद्या, भुवनेश्वरी, भैरवी, बगलामुखी, धूमावती, त्रिपुरसुन्दरी और मातंगी- ये दस महाविद्याएँ अस्त्र-शस्त्र लिये निकलीं तथा असंख्य मातृकाएँ भी प्रकट हुईं। उन सबने अपने मस्तक पर चन्द्रमा का मुकुट धारण कर रखा था। इन शक्तियों ने देखते-ही-देखते दुर्गामासुर की सौ अक्षौहिणी सेना को काट डाला। इसके बाद देवी ने दुर्गामासुर का अपने तीखे त्रिशूल से वध कर डाला और वेदों का उद्धार कर उन्हें देवताओं को दे दिया। दुर्गामासुर को मारने के कारण उनका दुर्गा नाम प्रसिद्ध हुआ। शताक्षी और शाकम्भरी भी उन्हीं के नाम हैं। दुर्गतिनाशिनी होने के कारण भी वे दुर्गा कहलाती हैं।

भगवती श्रीकाली



परमात्मा की परमशक्ति भगवती निराकार होकर भी देवताओं का दु:ख दूर करने के लिये युग-युग में साकाररूप धारण करके अवतार लेती हैं। उनका शरीर ग्रहण उनकी इच्छा का वैभव कहा गया है। सनातन शक्ति जगदम्बा ही महामाया कही गयी हैं। वे ही सबके मन को खींचकर मोह में डाल देती हैं। उनकी माया से मोहित होने के कारण ब्रह्मादि समस्त देवता भी परम तत्त्व को नहीं जान पाते, फिर मनुष्यों की तो बात ही क्या है ? वे परमेश्वरी ही सत्त्व, रज और तम- इन तीनों गुणों का आश्रय लेकर समयानुसार सम्पूर्ण विश्व का सृजन, पालन संहार किया करती हैं। शिवपुराण के अनुसार उनके काली रूप में अवतार की कथा इस प्रकार है-

प्रलयकाल में सम्पूर्ण जगत् के जलमग्न होने पर भगवान् विष्णु योगिनिद्रा में शेषशय्या पर शयन कर रहे थे। उन्हीं दिनों भगवान् विष्णु के कानों के मल से दो असुर उत्पन्न हुए। वे भूतल पर मधु और कैटभके नाम से विख्यात हुए। वे दोनों विशालकाय असुर प्रलयकाल के सूर्य की भाँति तेजस्वी थे। उनके जबड़े बहुत बड़े थे। उनके मुख दाढ़ों के कारण ऐसे विकराल दिखायी देते थे, मानो वे सम्पूर्ण विश्व को खा डालने के लिए उद्यत हों। उन दोनों ने भगवान् विष्णु की नाभि से उत्पन्न हुए कमल के ऊपर विराजमान ब्रह्मा को देखकर पूछा- ‘अरे, तू कौन है और यहाँ पर कैसे आ गया है ?’ ऐसा कहते हुए वे दोनों ब्रह्माजी को मारने के लिए तैयार हो गये।

ब्रह्माजी ने देखा कि ये दोनों मेरे ऊपर आक्रमण करना चाहते हैं और भगवान् विष्णु समुद्र जल में शेषशय्यापर सो रहे हैं, तब उन्होंने अपनी रक्षा के लिये महामाया परमेश्वरी की स्तुति की और उनसे प्रार्थना किया- ‘अम्बिके ! तुम इन दोनों असुरों को मोहित करके मेरी रक्षा करो और अजन्मा भगवान् नारायण को जगा दो।’
मधु और कैटभ के नाश के लिये ब्रह्माजी के प्रार्थना करने पर सम्पूर्ण विद्याओं की अधिदेवी जगज्जननी महाविद्या काली फाल्गुन शुक्ला द्वादशी को त्रैलौक्य-मोहिनी शक्ति के रूप में पहले आकाश में प्रकट हुईं। तदनन्तर आकाशवाणी हुई ‘कमलासन ब्रह्मा डरो मत। युद्ध में मधु-कैटभ का विनाश करके मैं तुम्हारे संकट दूर करूँगी।’ फिर वे महामाया भगवान् श्रीहरि के नेत्र, मुख, नासिका और बाहु आदि से निकलकर ब्रह्माजी के सामने आ खड़ी हुईं। उसी समय भगवान् विष्णु भी योगनिद्रा से जग गये। फिर देवाधिदेव भगवान् विष्णु ने अपने सामने मधु और कैटभ दोनों दैत्यों को देखा। उन दोनों महादैत्यों के साथ अतुल तेजस्वी भगवान् विष्णु का पाँच हजार वर्षों तक घोर युद्ध हुआ। अन्त में महामाया के प्रभाव से मोहित होकर उन असुरों ने भगवान् विष्णु से कहा कि ‘हम तुम्हारे युद्ध से अत्यन्त प्रभावित हुए। तुम हमसे अपनी इच्छानुसार वर माँग लो।’

भगवान् विष्णु ने कहा- ‘यदि तुम लोग मुझ पर प्रसन्न हो तो मुझे यह वर दो कि तुम्हारी मृत्यु मेरे हाथों से हो।’ उन असुरों ने देखा की सारी पृथ्वी एकार्णव जल में डूबी हुई है। यदि हम सूखी धरती पर अपने मृत्यु का वरदान इन्हें देते हैं, तब यह चाहकर भी हमकों नहीं मार पायेंगे और हमें वरदान देने का श्रेय भी प्राप्त हो जायगा। अत: दोनों ने भगवान् विष्णु से कहा कि ‘तुम हमको ऐसी जगह मार सकते हो, जहाँ जल से भीगी हुई धरती न हो।’ ‘बहुत अच्छा’ कहकर भगवान् विष्णु ने अपना परम तेजस्वी चक्र उठाया और अपनी जाँघपर उनके मस्तक को रखकर काट डाला। इस प्रकार भगवती महाकाली की कृपा से उन दैत्यों की बुद्धि भ्रमित हो जाने से उनका अन्त हुआ।


भगवती श्रीलक्ष्मी



देवी की जितनी भी शक्तियाँ मानी गयी हैं, उन सबकी मूल भगवती लक्ष्मी हैं। ये ही सर्वोत्कृष्ट पराशक्ति हैं। श्रीलक्ष्मीजी की अभिव्यक्ति दो रूपों में देखी जाती है- श्रीरूप में और लक्ष्मी रूप में। ये दो होकर भी एक हैं और एक होकर भी दो। दोनों ही रूपों में ये भगवान् विष्णु की पत्नी हैं। इनकी थोड़ी सी कृपा प्राप्त करके व्यक्ति वैभववान हो जाता है। भगवती लक्ष्मी कमलवन में निवास करती हैं, कमल पर बैठती हैं और हाथ में कमल ही धारण करती हैं। समस्त सम्पत्तियों की अधिष्ठात्री श्रीदेवी शुद्ध सत्त्वमयी हैं। विकार और दोषों का वहाँ प्रवेश भी नहीं है। भगवान् जब-जब अवतार लेते हैं, तब-तब भगवती महालक्ष्मी भी अवतीर्ण होकर उनकी प्रत्येक लीला में सहयोग देती हैं। इनके आविर्भाव का इतिहास इस प्रकार है-

महर्षि भृगु की पत्नी ख्याति के गर्भ से एक त्रिलोकसुन्दरी कन्या उत्पन्न हुई। वह समस्त शुभ लक्षणों से सुशोभित थी। इसलिए उसका नाम लक्ष्मी रखा गया। धीरे-धीरे बड़ी होने पर लक्ष्मी ने भगवान् नारायण के गुण-प्रभाव का वर्णन सुना। इससे उनका हृदय भगवान् में अनुरक्त हो गया। वे भगवान् नारायण को पति रूप में प्राप्त करने के लिये समुद्र तट पर घोर तपस्या करने लगीं। उन्हें तपस्या करते-करते एक हजार वर्ष बीत गये। उनकी परीक्षा लेने के लिये देवराज इन्द्र भगवान् विष्णु का रूप धारण करके लक्ष्मी देवी के पास आये और उनसे वर मांगने के लिए कहा- लक्ष्मीजी ने उनसे विश्वरूप का दर्शन कराने के लिए कहा। इन्द्र वहाँ से लज्जित होकर लौट आये। अन्त में भगवती लक्ष्मी को कृतार्थ करने के लिये स्वयं भगवान् विष्णु पधारे। भगवान् ने देवी से वर माँगने के लिये कहा। उनकी प्रार्थनापर भगवान् ने उन्हें विश्व रूप का दर्शन कराया। तदन्तर लक्ष्मीजी की इच्छानुसार भगवान् विष्णु ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया।

लक्ष्मीजी के प्रकट होने का दूसरा इतिहास इस प्रकार है- एक बार महर्षि दुर्वासा घूमते-घूमते एक मनोहर वन में गये। वहाँ एक विद्याधरी सुन्दरी ने उन्हें दिव्य पुष्पों की एक माला भेंट की। माला लेकर उन्मत्त वेशधारी मुनिने उसे अपने मस्तक पर डाल दिया और पुन: पृथ्वी पर भ्रमण करने लगे। इसी समय दुर्वासा जी को देवराज इन्द्र दिखायी दिये। वे ऐरावतपर चढ़कर आ रहे थे। उनके साथ अन्य देवता भी थे। देवर्षि दुर्वासा ने वह माला इन्द्र को दे दी। देवराज इन्द्र ने उसे लेकर ऐरावत के मस्तक पर डाल दिया। ऐरावत ने माला की तीव्र गन्ध से आकर्षित होकर उसे सूँड़ से उतार लिया और अपने पैरों तले रौंद डाला। माला की दुर्दशा देखकर महर्षि दुर्वासा क्रोध से जल उठे और उन्होंने इन्द्र को श्रीभ्रष्ट होने का शाप दे दिया। उस शाप के प्रभाव से इन्द्र श्रीभ्रष्ट हो गये और सम्पूर्ण देवलोक पर असुरों का शासन हो गया। समस्त देवता असुरों के संत्रस्त होकर इधर-उधर भटकने लगे। ब्रह्माजी की इस सलाह से सभी देवता भगवान् विष्णु की शरण में गये। भगवान् विष्णु ने उन लोगों के साथ मिलकर क्षीरसागर को मथने की सलाह दी। भगवान् की आज्ञा पाकर देवगुणों ने दैत्यों से सन्धि करके अमृत-प्राप्ति के लिये समुद्र-मंथन का कार्य आरम्भ किया। मन्दराचलकी मथानी और वासुकि नाग की रस्सी बनी। भगवान् विष्णु स्वयं कच्छपरूप धारण करके मन्दराचल के आधार बनें।



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