1488 श्रीमद्धभागवत के प्रमुख पात्र - गीताप्रेस 1488 Srimadbhagwat ke Pramukh Patra - Hindi book by - Gitapress
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गीता प्रेस, गोरखपुर >> 1488 श्रीमद्धभागवत के प्रमुख पात्र

1488 श्रीमद्धभागवत के प्रमुख पात्र

गीताप्रेस

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :35
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 846
आईएसबीएन :81-293-0499-6

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श्रीमद्धभागवत के पुमुख पात्रों का वर्णन...

Srimadbhagvadgeeta Ke Pramukh Patra a hindi book by Gitapress - श्रीमद्धभागवत के प्रमुख पात्र - गीताप्रेस

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

भगवान् श्रीकृष्ण

भाद्रपद कृष्णपक्ष-अष्टमी की अर्धरात्रि में परम भागवत वसुदेव और माता देवकी के माध्यम से कंस के कारागार में चन्द्रोदय के साथ ही भगवान् श्रीकृष्ण का प्राकट्य हुआ था। उनके जन्म के पूर्व से ही वसुदेव- देवकी के छ: सद्योजात शिशु कंस की क्रूरता की भेंट चढ़ गये। भगवान् श्रीकृष्ण के चतुर्भुज रूप का साक्षात्कार करके वसुदेव-देवकी के नेत्र धन्य हो गये। देखते-देखते पूर्ण ब्रह्म शिशु बना तथा दम्पत्ति की हथकड़ी-बेड़ी स्वत: खुल गयी। कारागार का द्वार अपने-आप खुल गया और वसुदेव जी अपने हृदय-धनको नन्दभवन रख आये। कंस को योगमायारूपी कन्या मिली। जब कंस उसे शिलातलपर पटकना चाहता था, तब वह उसके हाथ से छूट गयी और आकाश में अष्टभुजा रूप में प्रकट हो गयी। उसके शत्रु को कहीं और प्रकट होने की सूचना देकर वह अन्तर्धान हो गयी।

गोकुल की गलियों में आनन्द थिरक उठा और नन्दरानी यशोदा की गोद धन्य हो गयी। कंस के द्वारा भेजे हुए पूतना, शकटासुर, वात्याचक्र आदि दैत्य विकल होकर कन्हैया के करों से सद्गति पा गये। मोहन अब कुछ बड़े होकर चलने लगे। गोपियों के आनन्द का ठिकाना न रहा। नवनीत-चोरी की लीला अपने घर का माखन लुटाकर समाप्त हुई। मैया ने श्रीकृष्ण को ऊखल में बाँधकर दामोदर बना दिया, जिससे यमलार्जुन का उद्धार हुआ। महावृक्षों के गिरने से गोप शंकित हो गये और गोकुल से वृन्दावन की यात्रा हुई। श्रीकृष्ण अब वत्सचारक बने। भगवान् श्रीकृष्ण व्रज में कुल ग्यारह वर्ष, तीन मासतक रहे। वकासुर, वत्सासुर, अघासुर, व्योमसुर आदि दैत्यों का वध, कालिया के फणोंपर नृत्य, ब्रह्माजी का मोहभंग, गोवर्धनधारण आदि लीलाएँ भगवान् श्रीकृष्ण के अतुलित ऐश्वर्य तथा चीर-हरण, महारास आदि की लीलाएँ उनकी माधुर्य-लीला की सुन्दर साक्षी हैं।

अक्रूर के माध्यम से कंस के आमंत्रण पर श्रीकृष्ण-बलराम मथुरा पधारे। सुदामा माली पर कृपा एवं कब्जा का कूबर दूर करके उन्होंने कंस के धनुष को उसके गर्व की भाँति तोड़ डाला। दूसरे दिन कुवलयापीड को मारकर उन्होंने कंस के कूटनीति-यज्ञ का श्रीगणेश किया। अखाड़े में भगवान् श्रीकृष्ण-बलराम के सुकुमार करों से चाणूर, मुष्टिक, शल और तोशल-जैसे पहलवान चूर्ण हो गये तथा कंस के प्राणान्त में यज्ञ की पूर्णहुति हुई। वसुदेव-देवकी को पुत्रसुख और महाराज उग्रसेन को पुन: सिंहासन प्राप्त हुआ। अवन्ती में श्रीकृष्ण-बलराम गुरु-सन्दीपनी के विद्यार्थी बने और गुरु-दक्षिणा में उन्हें उनका मृतपुत्र पुन: प्रदान किये।

 मथुरा लौटने पर पुन: उन्हें जरासन्ध के साथ युद्ध में उलझना पड़ा जरासन्ध को सत्रह बार युद्ध में पराजित करने के बाद अठारहवीं बार श्रीकृष्ण रणछोड़ बने। समुद्र में द्वारकापुरकी का निर्माण हुआ और कालयवन को मुचुकुन्दकी दृष्टि से भस्म होना पड़ा। रुक्मणी-हरण, जाम्बवती-परिणय, सत्यभामा से विवाह, भौमासुर-वध, सत्या, भद्रा तथा लक्ष्मणा से विवाह, सोलह हजार कन्याओं का उद्धार, वाणासुर की भुजाओं का छेदन, युधिष्ठिर के राजसूयज्ञ में अग्रपूजन, शिशुपाल-वध, सुदामापर-कृपा, कौरव-सभा में विराट रूप-दर्शन, द्रौपदी की लज्जा-रक्षा, अर्जुन का सारथ्य और महाभारत के युद्ध में गीतोपदेश आदि अनेक लीलाएँ आज भी उस चिरपुरातन पुराणपुरुष भगवान् श्रीकृष्ण को नित्य नवीन बनायी हुई हैं। अन्त में बलोन्मत्त और उदण्ड बने यदुवंश का भी पारस्परिक संघर्ष में सर्वनाश कराकर उन्होंने अपनी लीला का संवरण किया।


भगवान् बलराम



जब कंस ने देवकी-वसुदेव के छ: पुत्रों को मार डाला, तब देवकी के गर्भ में भगवान् बलराम पधारे। योगमायाने उन्हें आकर्षित करके नन्दबाबा के यहाँ निवास कर रही श्रीरोहिणीजी के गर्भ में पहुँचा दिया। इसीलिये उनका एक नाम संकर्षण पड़ा। बलवानों में श्रेष्ठ होने के कारण उन्हें बलभद्र भी कहा जाता है।

श्रीकृष्ण-बलराम परस्पर अभिन्न हैं। उनकी चरित्र-चर्चा भी एक-दूसरे से संयुक्त है। श्रीमद्भावत में बहुत कम लीलाएँ ऐसी हैं, जहाँ श्रीकृष्ण के साथ उनके अग्रज श्रीबलराम नहीं रहे हैं। गोकुल और वृन्दावन की लीलाओं में भी प्राय: श्रीकृष्ण-बलराम साथ-साथ ही रहे हैं। एक दिन जब बलराम और श्रीकृष्ण ग्वाल बालों के साथ वन में गौएँ चरा रहे थे, तब ग्वाल के वेष में प्रलम्ब नामक एक असुर आया। उसकी इच्छा श्रीकृष्ण और बलराम का अपहरण करने की थी। भगवान् श्रीकृष्ण उसे देखते ही पहचान गये। फिर भी वे उसकी मित्रता का प्रस्ताव स्वीकार करके उसे खेल में सम्मिलित कर लिये। प्रलम्बासुर ने देखा कि श्रीकृष्ण को हराना कठिन है। इसलिये वह बलराम जी को अपनी पीठ पर बैठाकर भाग चला।

बलरामजी साक्षात् शेषावतार थे। उन्होंने देखा कि यह असुर आकाश-मार्ग से लिये जा रहा है। फिर उन्होंने उसके सिर पर एक घूँसा कसकर जमाया। बलरामजी के वज्र के समान प्रहार से प्रलम्बासुर का सिर चूर-चूर हो वह अत्यन्त भयंकर शब्द करता हुआ प्राणहीन पृथ्वी पर गिर पड़ा। प्रलम्बासुर मूर्तिमान पाप था। उसकी मृत्यु से देवता प्रसन्न हो गये। वे बलराम जी को साधुवाद देते हुए उन पर आकाश से पुष्प वृष्टि करने लगे। यह घटना बलरामजी के अतुलित शौर्य की साक्षी है।

बलरामजी बचपन से ही अत्यन्त गंभीर और शान्त थे। श्रीकृष्ण उनका विशेष सम्मान करते थे। बलरामजी भी श्रीकृष्ण की इच्छा का सदैव ध्यान रखते थे। व्रजलीला में शंखचूड़ का वध करके श्रीकृष्ण ने उसका शिरोरत्न बलराम भैया को उपहारस्वरूप प्रदान किया। कंस की मल्लशाला में श्रीकृष्ण ने चाणूर को पछाड़ा तो मुष्टिक बलरामजी के मुष्टिक प्रहार से स्वर्ग सिधारा। जरासन्ध को बलरामजी ही अपने योग्य प्रतिद्वन्द्वी जान पड़े। यदि श्रीकृष्ण मना न किए होते तो बलरामजी प्रथम आक्रमण में ही उसे यमलोक भेज देते। बलराम जी का विवाह रेवती से हुआ था।

वे सत्ययुग की कन्या थीं और आकार में बलरामजी से काफी लम्बी थीं। छोटे भाई श्रीकृष्ण को परिहास करते देखकर उन्होंने रेवती जी को अपने अनुरूप कर लिया। रुक्मिणी-हरण में शिशुपाल तथा उसके साथी अपने सैन्यसमूह के साथ बलराम जी के द्वारा ही पराजित हुए। श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब ने जब दुर्योधन की कन्या लक्ष्मणा का हरण किया, तब छ: महारथियों ने एक साथ मिलकर उन्हें बन्दी बना लिया। उस समय बलराम जी अकेले ही हस्तिनापुर पहुँच गये। यदि दुर्धोधन लक्ष्मणा का साम्ब से विवाह करने के लिये तैयार न होता तो बलरामजी पूरे हस्तिनापुर को यमुनाजी में डुबा देते। नैमिष-क्षेत्र में बलरामजी इल्वल राक्षस के पुत्र बल्वल को मारकर ऋषियों को भयमुक्त किया। महाभारत युद्ध में बलरामजी तटस्थ होकर तीर्थयात्रा के लिये चले गये। यदुवंश के उपसंहार के बाद उन्होंने समुद्र तट पर आसन लगाकर अपनी लीला का संवरण किया। श्रीमद्भागवत की कथाएँ शेषावतार बलरामजी के शौर्य की सुन्दर साक्षी हैं।


श्रीवसुदेवजी


परम भागवत वसुदेवजी यदुवंश के परम प्रतापी वीर शूरसेन के पुत्र थे। इनका विवाह देवक की सात कन्याओं से हुआ था। रोहिणी भी इन्हीं की पत्नी थीं। देवकीजी देवक की सबसे छोटी कन्या थीं। जब देवकीजी का विवाह वसुदेवजी के साथ सम्पन्न हुआ, तब उग्रसेनजी का ज्येष्ठ पुत्र कंस अपनी चचेरी बहन देवकी को स्नेहवश स्वयं रथ से पहुँचाने जा रहा
था। मार्ग में आकाशवाणी हुई- ‘मूर्ख ! जिस बहन को तू इतने स्नेह के साथ पहुँचाने जा रहा है, उसी की आठवीं संतान के हाथों से तेरी मृत्यु होगी।’ मृत्यु का भय शरीरासक्त को कायर बना देता है।

कंस ने तलवार खींच ली और देवकी को मारने के लिये तैयार हो गया। वसुदेवजी ने उसे समझाते हुए कहा- ‘राजकुमार ! आप भोजवंश के होनहार वंशधर तथा अपने कुल की कीर्ति बढ़ानेवाले हैं। बड़े-बड़े शूरवीर आपके गुणों की सराहना करते हैं। एक तो यह स्त्री है, दूसरे आपकी छोटी बहन है। विवाह के शुभ अवसर पर इसकी हत्या आपको शोभा नहीं देती। जो जन्म लेते हैं, उनकी मृत्यु भी निश्चित होती है। आज हो या सौ वर्ष बाद- मृत्यु सृष्टि का निश्चित विधान है। इसे कोई भी टाल नहीं सकता। मनुष्य को ऐसा कार्य नहीं करना चाहिये, जिससे उसे अपयश का पात्र बनना पड़े। तुम्हें देवकी से कोई भय नहीं है, इसके पुत्रों से भय है। मैं तुम्हें इसकी प्रत्येक संतान देने का वचन देता हूँ।’ कंस को वासुदेवजी के वचनों पर विश्वास था। उसने देवकी को मारने का विचार छोड़ दिया।

समय आने पर देवकी ने अपने प्रथम पुत्र को जन्म दिया। वसुदेवजी के लिये कोई भी त्याग दुष्कर नहीं था। वे जन्म लेते ही अपने प्राणप्रिय पुत्र को कंस के पास ले गये। कंस ने उनकी सत्यनिष्ठा को देखकर पहले बालक को लौटा दिया, किन्तु नारदजी के समझाने पर उसने फिर बालक को मार डाला और वसुदेव-देवकी को कारागार में डाल दिया। धीरे-धीरे वासुदेवजी के छ: पुत्र कंस की क्रूरता के शिकार हो गये। सातवें गर्भ में बलराम जी आये और योगमायाने उन्हें रोहिणी के गर्भ में पहुँचा दिया। देवकी के आठवें गर्भ से जगत् के त्राणकर्ता भगवान् श्रीकृष्ण का प्रादुर्भाव हुआ। भगवान् के आदेश से वसुदेवजी उन्हें नन्दभवन पहुँचा आये और वहाँ से यशोदाजी की नवजात कन्या ले आये। कंस ने जब उसे मारना चाहा तो वह उसके हाथ से छूटकर आकाश में चली गयी और उसके शत्रु के कहीं और प्रकट होने की सूचना देकर अष्टभुजा रूप में अन्तर्धान हो गयी।




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