शिगाफ़ - मनीषा कुलश्रेष्ठ Shigaf - Hindi book by - Manisha Kulshreshtha
लोगों की राय

सांस्कृतिक >> शिगाफ़

शिगाफ़

मनीषा कुलश्रेष्ठ

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :256
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 8222
आईएसबीएन :9788126718528

Like this Hindi book 10 पाठकों को प्रिय

126 पाठक हैं

कश्मीर और कश्मीरियत की विदीर्ण व्यथा को अलग कोण तथा ताज़गी भरी भाषा के साथ प्रस्तुत करता उपन्यास ‘शिगाफ़’

Shigaf by Manisha Kulshreshtha

विस्थापन का दर्द महज एक सांस्कृतिक, सामाजिक विरासत से कट जाने का दर्द नहीं है बल्कि अपनी खुली जड़े लिए भटकने और कहीं जम न पाने की भीषण विवशता है, जिसे अपने निर्वासन के दौरान सैनसबेस्टियन (स्पेन) में रह रही अमिता, लगातार अपने ब्लॉग में लिखती रही है।

डॉन किहोते की ‘रोड टू ला मांचा’ से कश्मीर वादी में लौटने की, अमिता की भटकावों तथा असमंजस भरी इस यात्रा को अद्भुत तरीके से समेटता हुआ यह उपन्यास विस्थापन और आतंकवाद की कोई व्याख्या या समाधान नहीं प्रस्तुत करता वरन् आस्था-अनास्था की बर्बर लड़ाइयों के बीच, कुचले जाने से रह गए कुछ जीवट पलों को जिलाता है और ज़मीन में गिर पड़े उस दिशा संकेतक बोर्ड को उठाकर फिर-फिर गाड़ता है जिस पर लिखा है - भाई मेरे, अमन का एक रास्ता इधर से भी होकर गुज़रता है।

शिगाफ़ यानि एक दरार जो कश्मीरियत की रूह में स्थायी तौर पर पड़ गई है, जिसमें से धर्मनिरपेक्षता एक हद तक रिस चुकी है, शिगाफ़ को भरने के लिए प्रयासरत है उपन्यास का पात्र नायक ज़मान। अमिता और ज़मान जिनका लक्ष्य तो एक है मगर फिर भी दो विपरीत न विषम अतीत से उपजे जीवन मूल्यों को सहेजते हुए वे कई बार प्रक्रिया तथा प्रतिक्रिया से उलझते हुए आपस में टकराते रहते हैं।

अमिता के ब्लॉग, यास्मीन की डायरी, मानव बम जुलेखा का मिथकीय कोलाज, अलगाववादी नेता वसीम के एकालाप के जरिये कश्मीर और कश्मीरियत की विदीर्ण व्यथा को अलग कोण, नए शैलीगत प्रयोगों तथा ताज़गी भरी भाषा के साथ अपने उपन्यास ‘शिगाफ़’ में अनूठे ढंग से प्रस्तुत कर रही हैं - मनीषा कुलश्रेष्ठ।



अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book