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कविता संग्रह >> जो नदी होती जो नदी होतीप्रज्ञा रावत
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प्रज्ञा की कविताओं में न तो स्त्री विमर्श का कोई अतिरंजित स्वर है, न ही कोई अन्य ग्रन्थि। जो है, जीवन का सहज स्वीकार और अभिव्यक्ति है, बहुत कुछ सुभद्राकुमारी चौहान की तरह।
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