अफरीन - आलोक श्रीवास्तव Afreen - Hindi book by - Alok Shrivastav
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अफरीन

आलोक श्रीवास्तव

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :88
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 7961
आईएसबीएन :9788126723478

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इन कहानियों में इंसानी रिश्तों का वहीं दर्द है जिन्हें आलोक ने जिया, भोगा और फिर अपनी रचनाओं में सहेजा।

Afreen by Alok Shrivastav

"आमीन" के बाद "अफरीन"। ग़ज़ल के बाद अफसाना। ये आलोक श्रीवास्तव की ग़ज़लों का विस्तार है। "अफरीन" "आमीन" की उत्तरकथा है। इन कहानियों में भी इंसानी रिश्तों का वहीं दर्द है जिन्हें आलोक ने जिया, भोगा और फिर अपनी रचनाओं में सहेजा। इस दर्द को भोगने में पाठक लेखक का सहयात्री बनता है। ये कहानियां आलोक के जीवन का अक्स हैं। उसके अपने अनुभव। "फ़ल्सफ़ा", "तिलिस्म" और "अम्मा" में तो आलोक सहज ही मिल जाते हैं। पढ़िए तो लगता है कि हम भी इन कहानियों का किरदार हैं। हमें "टैक्स्ट" को डि-कंस्टक्ट करना पड़ता है।

ग़ज़ल हो या कहानी, आलोक की भाषा ताज़ा हवा के झोंके जैसी है। बोलती बतियाती ये कहानियाँ बोरियत और मनहूसियत से बहुत दूर हैं। खांटी, सपाट, किस्सागोई। जैसे आलोक को पढ़ना और सुनना। सहज और लयबद्ध।

ग़ज़ल के बाद कहानी! ख़तरा है। सम्प्रेषण के स्तर पर, कहानी मुश्किल है। शेर पर तुरंत दाद मिलती है, लेकिन कहानी के पूरे होने तक इंतजार करना होगा। धीरज के साथ। लम्बे समय तक पाठक को बांधे रखना, कहानी की और मुश्किल है। आलोक इस मुश्किल पर खरे उतरे हैं। "अम्मा" और "तृप्ति" बड़ी बात कहती, छोटी-छोटी "पत्र-कथाएँ" हैं। आलोक ने "पत्र-कथा" के रूप में अनूठा शिल्प रचा है। नई पीढ़ी में वे इस शिल्प के जनक हैं और लीक से हटकर चलने का प्रमाण भी।

इस तरह, इस छोटी सी किताब में बड़ा ख़ज़ाना है। "अफरीन" में सिर्फ सात कहानियाँ हैं। एक कवि के गद्य को छोटा लेकिन सतरंगी आका। इसे आलोक की कुल जमा पूंजी से मैंने चुना है। दुष्यंत के बाद आलोक ने हिन्दी में ग़ज़ल के पाठकों की नई जमात तैयार की है। अब कहानियों की बारी है। इन्हें भी पढ़ ही डालिए।
हेमंत शर्मा



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