खुशी का रहस्य - सरश्री Khushi Ka Rahasya - Hindi book by - Sirshree
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खुशी का रहस्य

सरश्री

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :116
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 7948
आईएसबीएन :9788170288862

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मैं शनि का दूसरा नाम लगता हूँ, पर हूँ नहीं क्योंकि मैं पंचामृत देने आता हूँ। ये पाँच अमृत मेरी पाँच अंगुलियाँ हैं। जैसे कि हल, फल, सीढ़ी, सीख और चुनौती...

Khushi Ka Rahasya - A Hindi Book - by Sir Shree

तेजगुरु सरश्री ने अपनी आध्यात्मिक यात्रा बचपन में शुरू की और जाना कि सत्य के सभी रास्तों का अंततः ‘समझ’ नामक बिंदु पर आकर लोप हो जाता है। इसी स्वअनुभूत ज्ञान को आज वे प्रवचनों और पुस्तकों के माध्यम से आम जन तक पहुंचा रहे हैं। उन्होंने पचास से अधिक पुस्तकें लिखी हैं जिनमें से बहुतों का अंग्रेजी अनुवाद भी हुआ है। साथ ही, उनके द्वारा स्थापित तेजज्ञान फाउंडेशन लोगों को नकारात्मकता से सकारात्मकता की ओर ले जाने का अनुपम कार्य कर रहा है।

खुशी का रहस्य में सरश्री ने मानव-मन में उठने वाले सवाल जैसे कहीं खुद हमने ही तो अपनी खुशियों पर पर्दा नहीं डाल रखा? या हमें अपने दुःखों को आतशी शीशे में देखने की आदत तो नहीं पड़ गई? के जवाब दिए हैं। हर दिन के लिए एक मूलमंत्र की तर्ज़ पर लिखी गई इस किताब में छोटी-छोटी प्रेरक कथाओं के माध्यम से खुशी का रहस्य बताया गया है। साथ ही मन को शांत रखने के लिए एक नवीन ध्यान-पद्धति भी दी गई है।

 

दिन 1

डरो नहीं, मैं केवल दुःख नहीं हूँ

दुःख आज खुश है



जब आप अपने आपको दुःखी होने दे सकते हैं
तब आप अपने आपको आनंदित भी होने दे सकते हैं।

 



प्यारे पाठको, अगर दुःख आपसे बात करना चाहता, जो एक परिकल्पना है, तो वह आपसे क्या कहता ?
‘‘मैं न देव हूँ, न देवदूत हूँ, फिर भी मेरे सम्यक दर्शन से इंसान सच्ची खुशी की शरण में पहुँच जाता है।

 

फिर मैं कौन हूँ?
मैं ईश्वर की पुकार हूँ।
मैं जागृति का जन्मदाता हूँ,
मैं विश्व में विकास को ऊँचाइयों
तक ले जाने के लिए निमित्त हूँ।
मैं विकास का मंत्र हूं,
मैं सुख का जुड़वाँ भाई कहलाया जाता हूँ।
मैं संसार की सर्कस का जोकर हूँ।’’

 

विश्व के हर सद्गुरु ने मेरे सम्यक दर्शन की महिमा गायी है। भगवान बुद्ध, मेरे नाम की माला क्यों जपते रहे, क्या कभी आपने सोचा है? क्योंकि भगवान बुद्ध जैसे महापुरुषों ने मेरा सम्यक दर्शन कर निर्वाण हासिल किया। अब मैं आपके सामने उपस्थित हूँ। मैं पृथ्वी पर आपसे पहले भेजा गया हूँ ताकि मैं आपका स्वागत कर सकूँ।

मैं इंसान को दुःख देने नहीं आता, हालाँकि मेरा नाम दुःख है। मैं इंसान को फीडबैक अथवा जवाबी संकेत देने आता हूँ ताकि इंसान अपने मनन की मोटर को चालू रख सके।
मैं शनि का दूसरा नाम लगता हूँ, पर हूँ नहीं क्योंकि मैं पंचामृत देने आता हूँ। ये पाँच अमृत मेरी पाँच अंगुलियाँ हैं। जैसे कि हल, फल, सीढ़ी, सीख और चुनौती।

मेरी उपस्थिति में ज्ञानी जन हर समस्या का हल देख पाते हैं और अज्ञानी लोग खून के आँसू रोते हैं। मेरे काँटों में ज्ञानी फल और फूल खोज निकालते हैं, जब कि अज्ञानी काँटे गिनते रह जाते हैं।
मेरी परछाईं को समझदार सीढ़ी बना देते हैं और नासमझ सीटी तक नहीं बजा पाते। मेरी उलझनभरी बातों से चतुर नयी सीख प्राप्त करते हैं लेकिन मूर्ख दया की भीख माँगते रह जाते हैं।

मेरे मोटे आकार को साहसी और धीरजवान चुनौती मानकर मोती (उपहार) पाते हैं लेकिन डरपोक मोतियों जितने मोटे आँसू बहाते हैं। इस तरह हल, फल, सीढ़ी, सीख और चुनौती पाकर ज्ञानियों के लिए अंत में मैं पूजनीय बन जाता हूँ।

दुःख आज खुश है क्योंकि दुःख आज इस पुस्तक के आइने में आपके सामने बेनकाब होने जा रहा है। इस पुस्तक के लेखक ने मेरे सभी चेहरों को आपके सामने उजागर किया है। मेरा संपूर्ण दर्शन निडर होकर करने से आप मेरे भाई, सुख से भी मुक्त हो जायेंगे। मेरा भाई दिखने में सुंदर और हँसमुख है लेकिन अंदर से वह सुस्त और धूर्त है। वह अमृत के भेस में मीठा ज़हर है।

जब भी आप देखें कि आप किसी वस्तु, स्थान या रिश्ते के छूटने पर परेशान हो रहे हैं तब यह समझ जायें कि आप मेरे भाई सुख की कैद में पहुँच चुके हैं।

मेरा दावा है कि यदि कोई मेरी अवहेलना न करते हुए, मुझ पर गौर करे तो मैं उसे खुद से आज़ादी जरूर दिलाऊँगा क्योंकि दुःख ही दवा है। लेकिन मेरा दुःख यह है कि बहुत कम लोगों ने मेरे दावे को स्वीकार किया है। आपसे, जो यह पुस्तक पढ़ रहे हैं, मेरी गुजारिश है कि आप मेरे दुःख को समझें। हालाँकि यह बात अजीब सी लगती है कि दुःख को दुःख है लेकिन आप मेरे इस दुःख को दूर करें क्योंकि मैं आपका शुभचिंतक हूँ। कैसे ? मेरे दावे को स्वीकार कर, उसे दवा बना लें और उस दवा से अज्ञान के रोग को जड़ से नष्ट कर दें।

बहुत सालों से मुझे आपसे अपने बारे में बात करनी थी पर कभी अवसर ही नहीं मिला। मेरे बारे में बनी और फैली गलत धारणाओं के कारण मुझे हमेशा नफरत की निगाहों से देखा गया है। मेरा असली चेहरा देख न पाने की वजह से लोगों ने कभी मुझे समझा नहीं। नासमझी और अज्ञान की वजह से सारे मुझसे दूर भागते रहे। लोग हमेशा यही प्रयास करते रहे कि मैं उन्हें याद न आऊँ लेकिन यह भला कभी हो सकता है!

मैं जीवन की जरूरत हूँ मगर इंसान मुझ पर मनन करना अपनी जरूरत नहीं समझता। मैं विश्व में प्रेम बनाये रखने के लिए टेढ़ी खीर हूँ मगर इंसान मुझ पर ध्यान न देते हुए नफरत भरा जीवन जी रहा है।

अब समय आ चुका है कि मेरा नाम बदला जाय, मेरी तथा मेरी माता मृत्यु की सच्चाई विश्व में सभी के सामने आये और सीधे, सरल शब्दों में हमारा सत्य प्रकट हो जाय। यही महान कार्य तेजगुरु सरश्री तेजपारखी कर रहे हैं। इस पुस्तक से उन्होंने यह कार्य शुरू किया है। मेरी माता मृत्यु का महासत्य वे ‘पृथ्वी लक्ष्य’ पुस्तक में बता चुके हैं, अब मेरी बारी इस पुस्तक से शुरू हो रही है।

इस पुस्तक द्वारा आप मेरे रहस्य जानने वाले हैं। आप यह समझने वाले हैं कि ‘मैं संदेह नहीं बल्कि मनन संदेश हूँ’। इस संदेश पर अमल कर आप संपूर्ण जीवन जीकर, हरदम वर्तमान जीवन का आनंद ले पायेंगे। जब आप मेरे बारे में पूरा सत्य जान जायेंगे तब आप मुझसे दूर नहीं भागेंगे, ना ही मेरे भाई से रिश्ता बढ़ायेंगे बल्कि आप खुश होंगे क्योंकि मेरा रहस्य जानकर आप वह कार्य करेंगे, जो करने आप पृथ्वी पर आये हैं।

इस पुस्तक के रचयिता तेजगुरु सरश्री को मैं तहेदिल से धन्यवाद देता हूँ क्योंकि उन्होंने मेरा संपूर्ण दर्शन आपके सामने उजागर किया है। इसे बार-बार पढ़कर दुःख-सुख के खेल में निपुण हो जायें ताकि आप खेल-खेल में संपूर्ण खुल, खिल जायें। यही मेरी दवा, दुआ और दावा है।

 

सदा आपकी सेवा में
आपके विकास का इच्छुक दुःख...

 

दिन 2

दुःख का दूर दर्शन नहीं, पास दर्शन करें

प्रस्तावना



आनंद पास है, दुःख फेल है।
आनंद तीर्थस्थान है, दुःख जेल है।
आनंद ज्ञान का तेल है, दुःख मान्यताओं का खेल है।

 



आध्यात्मिक खोज के दौरान हम तीनों अनेक गुरुओं से मिले, अनेक सत्संगों में हमने प्रवचन सुने। हर जगह हमने सत्य की खोज की परंतु वह खोज पूरी नहीं हुई। सरश्री से मिलने के पूर्व हम में से एक ने ओशो, एक ने इस्कॉन, एक ने विपश्यना-साधना में सत्य की खोज की। कुल मिलाकर हमने अनेक ध्यान विधियों का अभ्यास किया। अनेक आध्यात्मिक पुस्तकें पढ़ीं लेकिन हर जगह खालीपन का अहसास हुआ।

तेजगुरु सरश्री के साथ हम में से हर एक ने महसूस किया कि हमारी आध्यात्मिक खोज पूरी हुई। सरश्री ने बाकी गुरुओं से अलग क्या बताया ?


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