अधूरी दास्तान - कीर्तिकुमार सिंह Adhuri Dastan - Hindi book by - Kirti Kumar Singh
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अधूरी दास्तान

कीर्तिकुमार सिंह

प्रकाशक : राका पब्लिकेशन प्रकाशित वर्ष : 2010
पृष्ठ :111
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 7891
आईएसबीएन :81-88216-91-7

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युवा कवि तथा कथाकार कीर्तिकुमार सिंह की लघुकथाएँ...

Adhuri Dastan - A Hindi Book - by Kirti Kumar Singh

लधुकथा हिन्दी साहित्य की अपेक्षाकृत नवीन विधा है और हिन्दी में अभी तक बहुत की कम लघुकथा-संग्रह प्रकाशित हुए हैं। लघुकथा में काल के लघु अंतराल में समाज की विद्रूपताएँ, यथार्थ तथा कौतूहल भरी घटित घटनाएँ एक साथ उपस्थित होती हैं और इस अर्थ में पाठक को रोमांचित करने में यह कथा शैली अपना जवाब नहीं रखती। युवा कवि तथा कथाकार कीर्तिकुमार सिंह की ये लघुकथाएँ समय, समाज तथा भोगे जाते हुए वर्तमान यथार्थ तीनों की दूरी तोड़कर पाठक मन से तीव्रता के साथ जुड़ती हैं। लोक यथार्थ के फैलाव के बीच छोटे-छोटे अन्तरालों की ये कथाएँ पाठकों को निश्चित ही बार-बार ताज़गी देंगी।

ईश्वर का विधान

एक व्यक्ति के कोई संतान नहीं थी। इस बात को लेकर वह बहुत दुःखी रहता था एक बार उसके गाँव में एक सिद्घ महात्मा आये। व्यक्ति अपना दुखड़ा लेकर महात्मा जी के पास पहुँचा।

महात्मा ने उस पर एक करुणा भरी दृष्टि डाली। फिर बोले, ‘‘वत्स, तुम इस संसार की माया में बुरी तरह जकड़े हुए हो। संसार के मायामोह से ऊपर उठकर देखो। फिर तुम्हें पता चलेगा कि संतान का होना या न होना, अन्य किसी सगे-सम्बन्धी का होना न होना कोई अर्थ नहीं रखता।

फिर क्या तुम्हें पता है कि तुम्हारे कोई संतान क्यों नहीं है ? अपने पूर्व-जन्मों में किये गये कर्मों के फल के कारण इस जन्म में तुम संतान से वंचित हो। एक बात का ध्यान रखो। व्यक्ति द्वारा आसक्ति पूर्वक किये गये किसी भी कर्म के फल का नाश नहीं होता।

कृतप्रणाश और अकृताभ्युपगम कभी नहीं होता। कृतप्रणाश का अर्थ है–किये हुए कर्म के फल का नष्ट हो जाना और अकृताभ्युपगम का अर्थ है किसी ऐसे कर्म का फल प्राप्त होना जो कर्म व्यक्ति ने न किया हो। इसी तरह किये हुये कर्म के फल को भोग कर ही नष्ट किया जा सकता है।

तपस्या और योग-साधना द्वारा अधिक से अधिक संचित कर्मों के फल को नष्ट किया जा सकता है, प्रारब्ध कर्म अर्थात् जो कर्म अपना फल देना प्रारम्भ कर चुके हैं, उन्हें योगी और साधक भी नष्ट नहीं कर सकते।

मुझे देखो ! साधना द्वारा मैं मुक्ति प्राप्त कर चुका हूँ, परन्तु दुःखो का भोग कराने वाले अपने इस शरीर को मैं चाह कर भी नहीं छोड़ सकता। अपने प्रारब्ध कर्मों को भोग कर नष्ट करने के लिये यह शरीर धारण किये हुए हूँ। अगर मैं यह शरीर त्याग दूँ तो इस कर्मफल भोग के लिए मुझे फिर अगला जन्म लेना पड़ेगा। अतः इस शरीर को धारणा करने के लिए मैं विवश हूँ।

मैं अपनी साधना के बल पर तुम्हें संतान की प्राप्ति करा सकता हूँ, परन्तु एक बात याद रखो। कोई व्यक्ति जब एक टोकरी मिट्टी लाता है तो कहीं न कहीं वह एक टोकरी मिट्टी के बराबर गढ्ड़ा अवश्य कर देता है। एक टोकरी मिट्टी हवा में नहीं पैदा हो जाती।

तुम्हें संतान अवश्य प्राप्त हो जायेगी, परन्तु इस कर्मफलभोग को तुम्हें अन्यत्र स्थानान्तरित करना होगा। संतान प्राप्ति के एवज में तुम्हें जीवन भर रोगी बनकर बिस्तर पर पड़े रहना होगा। तुम चलने-फिरने में भी लाचार रहोंगे। क्या यह तुम्हें स्वीकार हैं ?’’

व्यक्ति ने संतान के बदले रोगी होना स्वीकार नहीं किया। महात्मा की बातों से वह पूर्णतया संतुष्ट हो गया और संतान न होने का उसका दुःख समाप्त हो गया। वह महात्मा को प्रणाम करके अपने घर लौट गया।

नियम


मैडम आकांक्षा उस राजकीय महाविद्यालय की प्राचार्या थीं। कार्यवाहक प्राचार्या ! कार्यवाहक इसलिए कि दो वर्षों में महाविद्यालय में कोई पूर्णकालिक प्राचार्य नहीं था। चूँकि महाविद्यालय के अध्यापकों में सबसे वरिष्ठ थीं, अतः ताज उनके सिर। कानूनची इतनी कि उनकी नाक पर मक्खी भी बैठने से घबराती थी। न तो शादी हुई थी और न माँ-बाप थे। यानी आगे नाथ न पीछे पगहा वाली स्थिति।

मैडम सुजाता ने कॉलेज में पैर रखा नहीं था कि उनके मायके से एक आदमी दौड़ा-दौड़ा आया। मैडम-मैडम आपके भाई की मौत हो गयी। मैडम सुजाता पछाड़खाकर गिर पड़ीं। पूरे महाविद्यालय में खबर फैल गयी। सभी दौड़े-दौड़े पहुँचे। कोई उन्हें सम्हालने लगा। कोई सान्त्वना देने लगा। तब तक मैडम आकांक्षा भी पहुँच गयीं, ‘‘क्यों यहाँ पर आप सब लोगों ने भीड़ लगा रखी है ?’’

‘‘जी, मैडम सुजाता के भाई का देहांत...’’
‘‘तो ?’’ मेडम आकांक्षा चिल्लायीं, ‘‘पता है मुझे भी। आप लोग अपनी-अपनी क्लास में जाइए। चलिए !’’

सभी अध्यापक चले गये। सुजाता जी ने मैडम आकांक्षा के आगे हाथ जोड़ दिये, ‘‘मैडम ! मुझे घर जाने दीजिए।’’
‘‘यू.जी.सी. के नियमों के तहत महाविद्यालय आने के बाद तुम्हें कम से कम साढ़े तीन घण्टे महाविद्यालय में रहना अनिवार्य है !’’आकांक्षा ने रूखे स्वर में कहा।
‘‘तो मैडम मैं छुट्टी ले लूँगी।’’ सुजाता जी बिलखते हुए बोलीं।

मैडम आकांक्षा गुर्रायीं, ‘‘कौन सी छुट्टी लेंगी आप ? राजकीय महाविद्यालय में सिर्फ सी. एल. मिलती है। वह भी साल में सिर्फ चौदह। सारी सी.एल.तो आप पहले ही ले चुकी हैं। मेडिकल तो आप ले नहीं सकतीं। कोई अस्वस्थ तो हैं नहीं आप।’’

मैडम आकांक्षा के पीछे-पीछे उनकी दूती रेखा मैडम भी पहुँच चुकी थीं। उन्होंने मैडम आकांक्षा का जोर से समर्थन किया, ‘‘और क्या मैडम, और क्या !’’ सुजाता जी ने दुःखी होकर किंचित् रोष से कहा, ‘‘मैडम ! नियम आदमी के लिए होते हैं या आदमी नियम के लिए ?’’ आकांक्षा ने अपना चश्मा नाक पर चढ़ाते हुए जोर से घूरा, ‘‘नियम नियम होता है, समझी।’’ सुजाता जी रोती-बिलखती अपनी क्लास में चली गयीं।

उच्च शिक्षा निदेशालय से महाविद्यालय में अगले महीने ही पत्र आया। डॉ. जयंत महाविद्यालय के पूर्णकालिक प्राचार्य बनाकर भेजे जा रहे हैं। डॉ. जयंत ने आकर महाविद्यालय के प्राचार्य का कार्यभार ग्रहण कर लिया। मैडम आकांक्षा फिर सिर्फ एक प्राध्यापक की हैसियत में पहुँच गयीं।

हफ्ते भर भी नहीं बीता था कि मैडम आकांक्षा के घर से तार आ गया। भाई की मौत ! मैडम आकांक्षा ने बिलख-बिलखकर सारा महाविद्यालय सिर पर उठा लिया। सभी प्राध्यापक पहुँच गये। डॉ. जयंत भी पहुँचे। मैडम आकांक्षा गिडगिड़ायीं, ‘‘सर ! घर जाना है।’’

डॉ. जयंत ने सख्ती से कहा, ‘‘नहीं ! साढ़े तीन घण्टे के पहले नहीं ! यू. जी. सी. का नियम है।’’
‘‘तो छुट्टी ही दे दीजिए सर !’’ मैडम आकांक्षा पुनः गिड़गिड़ायीं।
‘‘सारी सी.एल.तो आप पहले ही ले चुकी हैं। और आप बीमार तो दिख नहीं रही हैं। कौन सी छुट्टी दूँ ?’’ डॉ. जयंत ने उसी स्वर में जवाब दिया।

मैडम आकांक्षा कातर हो आयीं, ‘‘सर ! नियम आदमी के लिए होते हैं। आदमी नियम के लिए नहीं होता।’’
‘‘नियम नियम होता है मैडम...और अब आप अपनी क्लास में जाइए !’’ डॉ. जयंत ने रूखे स्वर में कहा और प्रिंसिपल चेम्बर की ओर चल दिये।

कहानी का पात्र


मेरा पहला कहानी-संग्रह प्रकाशित हुआ तो उसकी दो प्रतियाँ मैं अपने महाविद्यालय में ले आया। संग्रह में लम्बी-लम्बी पाँच कहानियाँ संग्रहीत थीं। महाविद्यालय के सभी साथी प्राध्यापकों ने पहला कहानी-संग्रह प्रकाशित होने पर मुझे बधाई दी।

संग्रह की दोनों प्रतियाँ महाविद्यालय में नाचने लगीं। एक-एक करके पहले सभी अध्यापकों ने पढ़ीं। इसके बाद बाबुओं का नम्बर लगा। बाबुओं से मुक्त होने पर चपरासियों के हाथ में वे टहलने लगीं। उनसे भी मुक्त होने पर उन्हें पुस्तकालय में रख दिया गया।

बात धीरे-धीरे छात्रों में भी फैल गयी। छात्रों को नहीं पता था कि सर कहानी भी लिखते हैं। पुस्तकालय से लेकर कुछ छात्र भी उन्हें पढ़ने लगे।

महाविद्यालय में छात्रसंघ नहीं था। फिर भी विमलेन्दु नाम का एक छात्र महाविद्यालय के समस्त छात्र-छात्राओं का स्वयंभू अध्यक्ष था। विमलेन्दु आधा नेता था और आधा फिल्मी हीरो। भाषण ठीक-ठाक दे लेता था और सभा-समारोहों के संचालन में उसे महारत हासिल थी। कुर्ता-पायजामा वह नहीं पहनता था। सम्भवतः लड़कियों में छवि खराब होने के डर से। एक से एक चमचमाती पैंट-शर्ट निकालता रहता था।

मेरा कहानी संग्रह उसने भी पढ़ा। इसके बाद वह अक्सर मेरे आस-पास घूमने लगा। जहाँ भी मुझे देखता लपककर मेरा पैर छूता और दाँत निकालते हुए कुछ दूर तक पीछे-पीछे चलता। साथी प्राध्यापकों ने मुझे चेताया, ‘‘आजकल वह बहुत आपके आगे-पीछे घूम रहा है। जरा दूर ही रहियेगा उससे। बड़ा दुष्ट लड़का है।’’

एक दिन उसने अपनी मंशा प्रकट कर दी, ‘‘सर, एक कहानी मेरे ऊपर भी लिख दीजिए। आप तो अच्छी कहानियाँ लिखते हैं। मुझे भी लोग थोड़ा सा जान जायेंगे। हें-हें-हें।’’ मैंने उसे आश्वासन देकर टरका दिया।

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