हाय ! हैंडसम - जयवर्धन Hi Handsome - Hindi book by - Jaywardhan
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हाय ! हैंडसम

जयवर्धन

प्रकाशक : किताबघर प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2010
पृष्ठ :79
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 7859
आईएसबीएन :978-93-80146-55

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एक आधुनिक नाटक...

Hi Handsome - A Hindi Book - by Jaywardhan

हाय हैंडसम

दृश्य 1


[सुबह का समय। बैठकनुमा एक बड़ा कमरा। टेपरिकॉर्डर पर कोई भक्ति-गीत बज रहा है। एक कोने में भगवान् की मूर्ति के सामने स्वामी बैठा है, जो पूजा में तल्लीन है। मुहल्ले के दो-चार बच्चे प्रसाद की प्रतीक्षा में बैठे हैं। बच्चे बीच-बीच में संगीत पर नाचने लगते हैं। गीत समाप्त होने पर स्वामी अपना माथा टेकता है, फिर प्रसाद की थाली लेकर दरवाज़े की ओर बढ़ता है। इस समय स्वामी के शरीर पर कपड़े के नाम पर मात्र लम्बा अण्डरवियर और कन्धे पर तौलिया है। स्वामी दरवाज़े की ओर बढ़ता ही है कि टेपरिकॉर्डर पर दूसरा बेतुका गाना बजने लगता है। स्वामी फ़ौरन जाकर टेपरिकॉर्डर बन्द करता है।]

स्वामी : छिः, कितना प्रदूषित गीत है।
लड़का : स्वामी अंकल, बजने दीजिए न !
लड़की : हमारी मम्मी इस गाने पर बहुत अच्छा डांस करती है।
स्वामी : इसके सिवा तुम्हारी मम्मी को और कुछ आता है...? चलो, प्रसाद लो और चलते बनो।
लड़का : स्वामी अंकल, आज लड्डू की जगह केले ?

स्वामी : क्या करें, दिल्ली बन्द है। ये तो कहो कि घर में केले पड़े थे।
लड़की : वरना आपके कन्हैया को भूख हड़ताल करनी पड़ती।
लड़का : भूख हड़ताल क्यों ? बटर की एक टिक्की खिला देते। जानती नहीं, कन्हैया को माखन बहुत पसंद था, तभी उन्हें माखनचोर कहते हैं।

लड़की : चोर ! अंकल, आप चोर की पूजा करते हैं ?
स्वामी : अंकल की बच्ची, चुप ! चल भाग यहाँ से !

[स्वामी बच्चों को भगाता है। उसी समय बाहर से स्वामी के पिता आते हैं। हाफ़ पैंट में चुस्त-दुरुस्त। एक हाथ में दूध की बाल्टी, दूसरे हाथ में छोटा-सा रूल। स्वामी बढ़कर पहले पैर छुता है, फिर दूध की बाल्टी ले लेता है। पिताजी जाकर कैप उतारते हैं और रूल रखते हैं।]

पिता : कितनी बार कहा है—मेरा पैर मत छुआ करो। दुनिया इक्कीसवीं सदी में जा रही है और मेरे पुत्र रामराज्य में जी रहे हैं। सुबह उठकर माता-पिता का पैर छूना। सुबह-सुबह किशन-कन्हैया की पूजा करना। एम०ए० पास दर्शनशास्त्र में। ग़लती हो गयी, तुम्हें किसी मॉडर्न स्कूल में पढ़ाना चाहिए था।...दर्शनशास्त्र की जगह कोई और शास्त्र पढ़ाना चाहिए था।...जाकर शेविंग सेट लाओ।

[स्वामी लाकर देता है।]

पिता : मिलिट्री ने मुझे रिटायर कर दिया, बूढ़ा मानकर। उनके मानने से क्या होता है, मैं अपने आप को बूढ़ा नहीं मानता। हाँ, ये पूजा-पाठ और बालों की सफ़ेदी देखकर तुम पर ज़रूर शक़ होने लगा है।
स्वामी : पिताजी, आपके बाल मेरे से ज़्यादा सफ़ेद हैं। दरअसल आप दिखाई देते ही उन पर कैंची चलाते रहते हैं, इसीलिए...।

पिता : तुम्हें किसने मना किया है ? तुम भी कुछ करो, मैं भी यही चाहता हूँ।...बहू क्या कर रही है ?
स्वामी : सो रही है। रात में देर से सोई थी।
पिता : तो जाओ, बेड-टी बनाकर ले जाओ और उसे जगाओ। इतने सालों से मैं यही देख रहा हूँ, तुम जागते रहे हो और वो सोती रही है। तुम दोनों को एक बच्चा पैदा करने की फुरसत नहीं है।

स्वामी : फुरसत की बात नहीं है पिताजी ! मंदा कहती है, किसी भी काम में जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए।
पिता : जल्दबाज़ी ! अपनी मंदा को ज़रा अपने बारे में भी बता देना। दो दिन बाक़ी थे नौ महीने में और तू आ टपका था। नालायक कहीं का ! तीस साल की उम्र में इसे जल्दबाज़ी नज़र आ रही है।...स्वामी, तूने मोहल्ले के बदमाश लड़कों से दोस्ती क्यों नहीं की ?

स्वामी : क्या ? आप अपने इकलौते बेटे को बदमाश बनाना चाहते हैं ?
पिता : मिट्टी का लोंदा होने से तो बदमाश होना बेहतर है। कम से कम दुनियादारी तो सीख जाते। बरखुरदार, जीने के लिए पहले जीना सीखो। मैं दावे से कह सकता हूँ कि जीना और मरना सिर्फ़ फ़ौजी जानते हैं, आम लोग इस दुनिया से कोसों दूर हैं।
स्वामी : मुझे भी कुछ सिखा दीजिए।

पिता : बाप ना होता तो ज़रूर सिखा देता। इतने सालों की ज़िंदगी यूँ ही न बरबाद करने देता।
स्वामी : जो हो गया सो हो गया। अब से ही कुछ बताइये।
पिता : मानोगे ?
स्वामी : मानेंगे ।
पिता : करोगे ?

स्वामी : करेंगे।
पिता : ज़रूर ?
स्वामी : ज़रूर।
पिता : क्यों ?
स्वामी : आप मेरे पिता हैं।

पिता : भूल जाओ।
स्वामी : फिर ?
पिता: शुभचिन्तक।
स्वामी : ठीक है, बताइये।
पिता : बहू के साथ हर सण्डे की सुबह किसी मल्टीप्लेक्स में जाओगे।
स्वामी : मल्टीप्लेक्स ? क्या करने ?

पिता : फ़िल्म देखने।
स्वामी : ये क्या होती है ?
पिता : सेहत के लिए बहुत अच्छी चीज़ होती है। एक-दो बार समझ में नहीं आएगी, लेकिन एक बार समझ में आ गई तो नासमझ से समझदार कहलाओगे। अंग्रेज़ी फ़िल्मों का ज़ायक़ा भला हिन्दी फ़िल्मों में कहाँ ? एक बार देखोगे, फिर कहोगे...।

स्वामी : क्या ?
पिता : वाह नया उस्ताद...। अरे भाई, वाह उस्ताद से याद आया, एक कप चाय मिलेगी ? मुझे दरअसल कहीं जाना है।
स्वामी : रोज़-रोज़ आप कहाँ जाते हैं ?
पिता : घर में बैठकर क्या करूँ ? दम घुटता है यहाँ। काश ! तू भी बाप के क़दमों पर चलता।
स्वामी : मगर आप जाते कहाँ हैं ?

पिता : बुद्घा गार्डेन।
स्वामी : गार्डेन ? एक ही गार्डेन में रोज़-रोज़ ! आपका मन नहीं ऊबता ?
पिता : नहीं,. बिलकुल नहीं। कहते हैं न, मन चंगा तो कठौती में गंगा। बरख़ुरदार, गार्डेन एक ज़रूर होता है, लेकिन ग्रीनरी रोज़ अलग-अलग। किसी दिन चाहे चलकर ख़ुद देख लो।

स्वामी : आपके साथ चलूँ ?
पिता : मुझे कोई एतराज़ नहीं। देखने वाले दोनों को भाई समझेंगे, सुनने वाले विश्वास ही नहीं करेंगे।...अच्छा स्वामी ! अपनी बीवी के अलावा तुमने कभी किसी को प्यार किया है ?
स्वामी : हाँ, किया है।
पिता : किससे ?

स्वामी : माँ से।
पिता : उफ़ ! माँ-बाप के अलावा किसी लड़की से ?
स्वामी : लड़की ! नहीं तो।
पिता : बस, हिन्दुस्तान यहीं मात खा गया। अरे भाई, तू जी कैसे रहा है ? आँय...। कॉलेज के ज़माने में लड़कियाँ तेरे बाप को जानते हो क्या कहती हैं ?...हाय ! हैंडसम ! यूँ हथेली पर दिल लेकर मेरे पास मँडराती रहती थी। मैं भी कम नहीं था। रेलवे स्टेशन की तरह शंटिंग किया करता था। दूसरी के आने के पहले, पहली को हरी झण्डी दिखाकर रवाना कर देता था, ताकि प्लेटफ़ॉर्म क्लीयर रहे। आख़िर एक दिन एक्सीडेंट हो ही गया, ज़बरदस्त एक्सीडेंट।

स्वामी : वो कैसे...?
पिता : बस, शंटिंग करने में चूक गया। हुआ ये कि अभी पटरी पर एक गाड़ी खड़ी ही थी कि दो गाड़ियाँ धड़धड़ाती हुई आ धमकीं। बस, हिन्दुस्तान मात खा गया। उस दिन से इस प्लेटफ़ार्म पर गाड़ियाँ कम रुकने लगीं। मुझे याद है, आख़िरी गाड़ी कब और कैसे रुकी थी। (हँसकर) हुँह, क्या संयोग था। आख़िरी गाड़ी ऐसी रुकी कि फिर प्लेटफ़ॉर्म से टस से मस नहीं हुई।...बरख़ुरदार, वो तुम्हारी माँ थी। साथ छोड़ा भी तो मरने के बाद।

[स्वामी को आवाज़ लगाते हुए अन्दर से मंदा आती है। इस समय मंदा नाइट गाउन में है। रख-रखाव अच्छा, आकर्षक रूप, चेहरे पर ताज़गी।]

मंदा : स्वामी...।
पिता : चलो बुलावा आया है।
स्वामी : माता ने बुलाया है।
मंदा : स्वामी...स्वामी डियर, प्लीज़, एक कप चाय पिला दो। गुड मॉर्निंग डैड !

[स्वामी अन्दर चला जाता है।]
पिता : मॉर्निंग ? गुड नून बोलो बहू !
मंदा : ओग डैड ! कितनी बार कहा कि मुझे बहू न कहा कीजिए। हाथ में चूड़ियाँ, माथे पर बिन्दिया और पल्लू...उफ़, क्या सज़ा है।


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