इंग्लिश टीचर - आर. के. नारायण English Teacher - Hindi book by - R. K. Narayan
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इंग्लिश टीचर

आर. के. नारायण

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2012
पृष्ठ :192
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 7851
आईएसबीएन :9788170287964

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काल्पनिक मालगुडी पर आधारित यह उपन्यास...

English Teacher - A Hindi Book - by R. K. Narayan

काल्पनिक मालगुडी पर आधारित यह उपन्यास कहीं न कहीं लेखक आर. के. नारायण को अपनी ज़िंदगी से प्रेरित है। कृष्ण एक कॉलेज में अध्यापक है और उसकी पत्नी व बेटी थोड़ी दूरी पर उसके माता-पिता के साथ रहते हैं। फिर अवसर मिलता है सारे परिवार को साथ रहने का, लेकिन विवाहित जीवन का आनन्द कृष्ण कुछ ही दिन तक भोग पाता है और...

विश्वप्रसिद्ध भारतीय लेखक आर. के. नारायण की यह विशेषता रही है कि वह ज़िन्दगी की छोटी से छोटी बात को बहुत जीवंत और मनोरंजक बना देते हैं। ‘गाइड’ और ‘मालगुड़ी की कहानियाँ’ की तरह इस उपन्यास में भी जीवन के हर रस का आनन्द पाठक को मिलता है।

 

1

 

मेरा आज का दिन काफी अच्छा रहा—न ज्यादा फिक्र न परेशानियाँ, और सबसे बड़ी बात यह कि अपना किया भी ज्यादातर ठीक ही लगा। आज मैंने वे सब काम निबटा दिये जिन्हें मैं करना चाहता था, इसलिए मैं बहुत खुश और संतुष्ट महसूस कर रहा हूँ एकदम हीरो की तरह ! कई दिन से मैं परेशान था और सोच रहा था कि अब कुछ कर ही डालूं लेकिन मुझे यह हो क्या गया था ? मैं समझ नहीं पा रहा था, कुछ असंतोष, कुछ विद्रोह अपने ही प्रति...यही कह सकता हूँ। मेरे मन में बार-बार यह भावना आ रही थी कि, अब चूंकी मेरी उम्र तीस की हो रही है, मुझे गाय की तरह निरीह नहीं बने रहना चाहिए...हालांकि, सच कहूँ कि गाय को यह तुलना सुनकर अच्छा नहीं लगेगा...सिर्फ खाना, चलना-फिरना, बात करना, काम करना...यह सब ठीक तरह करते हुए भी हमेशा सोचते रहना कि कहीं कुछ रह गया है।

इसलिए मैंने अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का जायज़ा लिया। सवेरे आठ बजे उठना, पचासवीं दफ़ा मिल्टन, कारलायल और शेक्सपियर को पढ़ना, लड़कों की कापियाँ देखना, खाना पेट में डालना, कपड़े पहनना और कॉलेज की दूसरी घंटी बजने से ऐन पहले हॉस्टल से निकलकर वहाँ जा पहुँचना; फिर चार घंटे बाद अपने कमरे में वापस आ जाना। एलबर्ट मिशन कॉलेज के कई सौ लड़कों को शेक्सपियर और मिल्टन इस तरह जमकर पढ़ाना कि इम्तहानों में वे खूब अच्छे नंबर प्राप्त करें जिससे साल के अंत में मुझे अधिकारियों से ऊँचा-नीचा न सुनना पड़े...यह काम कुछ बहुत आसान नहीं होता था। इस सारी मेहनत के लिए मुझे हर महीने की पहली तारीख को सौ रुपये पकड़ाये जाते थे, और ‘लेक्चरर’ कहा जाता था। मुझे इससे संतुष्ट होना और उन्हें धन्यवाद देना चाहिए था। लेकन यह मेरे लिए संभव नहीं था, मेरा स्वभाव कुछ और ही था शायद इसलिए क्योंकि मैं कवि हूं और हमेशा मुझे यह भावना परेशान किये रहती है कि मैं गलत काम कर रहा हूँ। इसलिए मैं हमेशा अपनी आलोचना करता रहता हूं...और हर बात इस वृत्ति को बढ़ावा देती लगती है। मिसाल के लिए, उस दिन विभाग के प्रमुख मि. ब्राउन ने जो कहा, वह सही हो सकता था, लेकिन मुझे इससे चिढ़ ही पैदा हुई।

उन्होंने हम सबको शाम के समय अपने कमरे में बुलाया। परिस्थितियाँ सामान्य होतीं तो वे मुस्कराकर हमारा स्वागत करते, एकाध हँसी-मज़ाक करते और शुरू के दो-चार मिनट इधर-उधर की बातें करके फिर मुख्य विषय की चर्चा करते। लेकिन आज वे चुप और गंभीर थे। सबको बैठ जाने का इशारा करके कहने लगे, ‘‘आज मुझे एक बात से गहरा धक्का लगा। इंगलिश ऑनर्स के एक छात्र को अब तक यह नहीं पता कि ‘ऑनर्स’ (honours) शब्द में ‘यू’ (u) का प्रयोग होता है।’’

यह देखकर वे मुँह टेढ़ा कर हँसे। हम सबने एक-दूसरे को परेशानी से देखा और सोचने लगे कि इसके जवाब में क्या कहा जाय। असिस्टेंट प्रोफेसर गणपति ने हमको इस तरह घूरकर देखा जैसे इसके लिए हम ही ज़िम्मेदार हों। ब्राउन ने कुछ और कहने के लिए गला साफ किया और हम उनके होंठों की तरफ देखने लगे। अब उन्होंने अंग्रेज़ी भाषा के महत्व पर बोलना शुरू किया और कहा कि भाषा की शुद्धता बनाये रखना बहुत ज़रूरी है। वे तीस साल से भारत में हैं और चाहते हैं कि यहाँ के लोगों को सही अंग्रेज़ी लिखना और बोलना सिखा सकें। इसके लिए अंग्रेज़ी विभाग की बड़ी ज़िम्मेदारी है। यह सुनते ही गणपति ने फिर हम सब पर एक खूँख्वार नज़र डाली। हमारे अध्यक्ष पूरे पैंतालीस मिनट इस विषय पर बोलते रहे; फिर समाप्त करते हुए उन्होंने एक मज़ाक जैसी बात कहकर वातावरण को हलका बनाने की कोशिश की : ‘गणित ऑनर्स वालों के लिए भी यह गलती बहुत गंभीर है।’

सब बाहर निकले तो मैं गणपति के पीछे था। वे इतने चिंतित दीख रहे थे कि मेरा मन हुआ कि उनको ऐसा धक्का दूँ कि वे वहाँ से बुलबुले की तरह फूटकर गायब हो जायँ। लेकिन मैंने अपने पर काबू किया। यह ठीक नहीं होगा, वे मेरे सीनियर हैं और मुझे हर रोज़ घंटा भर ज़्यादा काम करने को कह सकते हैं, या मुझे भाषा का इतिहास पढ़ाने के लिए, जिसके बारे में मैं रत्ती-भर नहीं जानता, ज़ोर डाल सकते हैं। हॉस्टल के फाटक तक मुझे उनके साथ शांतिपूर्वक चलना होगा। वे अपना महत्व महसूस करते हुए इधर-उधर देखते चल रहे थे। कहते जा रहे थे, शर्म की बात है...मुझे पता ही नहीं था कि लड़के इतने खराब हैं...हमारा काम अच्छा नहीं है, यह साफ है... मैं चिढ़ उठा और बोला, ‘‘मिं. गणपति, दुनिया में एक अक्षर न लिखने से कहीं ज्यादा बड़ी बुराइयाँ हैं।’ यह सुनते ही वे चलते-चलते रुक गये और मेरी तरफ घूरकर देखने लगे। लेकिन मैंने परवाह नहीं की। आगे बढ़कर कहा, हमें साफ़ बात करनी चाहिए। मि. ब्राउन से पूछिये, हिन्दुस्तान में उन्होंने तीस साल बिताये हैं। यहाँ की दो सौ भाषाओं में से किसी भी भाषा में वो यह कह सकते हैं—‘बिल्ली चूहे का पीछा कर रही है ?’

‘इसका उस बात से क्या संबंध है ?’ गणपति ने कहा।
‘वे यह क्यों सोचते हैं कि सीखने की सारी ज़िम्मेदारी हमारी है, उनकी कुछ भी नहीं। उन्हें अपनी बातें इतनी महत्वपूर्ण क्यों लगती हैं ?’

‘‘गुडनाइट’’, कहकर गणपति चलते बने। इससे मुझे क्रोध आ गया और मैं अपमानित महसूस करने लगा, इसलिए मैं काफी देर तक ब्राउन और गणपति की बातों पर सोचता रहा। लेकिन अचानक मुझे समझ आ गई और मैं चुप हो गया। मुझे साफ लगा कि अपने ऊपर नियंत्रण कमज़ोर है और मैं अपने को रोक पाने में कामयाब नहीं होता। अब मैं निर्दय होकर अपनी आलोचना करने लगा। सोचने लगा कि मैं अपने विचारों पर लगाम क्यों नहीं लगा पाता। लेकिन मेरे इस सोच-विचार का कोई नजीता नहीं निकला, बल्कि शाम होते-होते मैं और ज्यादा थककर चूर हो गया। मुझे अफसोस होने लगा कि इस फिज़ूल के काम में मैंने अपनी शाम बरबाद कर दी। फिर अचानक एक बहुत अच्छी बात मुझे सूझ गई। मेरी यह स्थिति इसलिए है कि मैं रोज़ाना कसरत नहीं करता और मेरी आदतें अनियमित हैं। इसलिए मैंने फैसला किया कि मैं कल सवेरे जल्दी ऊठूँगा, नदी के किनारे लंबी सैर को जाऊंगा, कुछ दूर दौड़ूंगा, नदी में नहाऊँगा। और इस तरह अपनी आदतें बदलूँगा।

रात को खाने के बाद हॉस्टल में पड़ोसी कमरों में मेरे दोस्त हमेशा की तरह गपशप के लिए इकट्ठे होने लगे। हम सब साथी थे। एक था रंगप्पा जो लड़कों को दर्शन पढ़ाता था, दूसरा था गोपाल, गणित का लेक्चरर...लेकिन दुनियावी मामलों में यह बिलकुल कोरा था। सच बात तो यह है कि वह किसी और बात की तरफ ध्यान ही नहीं देता था। लेकिन उसकी प्रतिभा के कारण हम उसे बहुत चाहते थे और सोचते रहते थे कि अपने गणित के क्षेत्र में यह जरूर कुछ महत्वपूर्ण काम कर रहा होगा। उसे भी उम्मीद थी कि किसी न किसी दिन वह गणित के विषय में कोई ऐसी नई खोज प्रकाशित करा देगा जिससे दुनिया की सोच एकदम बदल जायेगी। लेकिन यह खोज क्या होगा, इसे ईश्वर ही जानता होगा। मुझे वह इसलिए बहुत पसंद था क्योंकि वह दोस्त अच्छा था। किसी बात का विरोध नहीं करता था, और घंटों दूसरे की बात, बिना यह समझे कि दूसरा कह क्या रहा है, सुनता रह सकता था।

आज की रात अंग्रेज़ी की स्पेलिंग और ब्राउन की मीटिंग के बारे में ही बात होती रही। मैं हमेशा की तरह उत्तेजित था, लेकिन रंगप्पा मेरी बात समझ नहीं पा रहा था। वह बोला, ‘‘पर, प्यारे भाई, तुम यह क्यों नहीं समझते ‘i’ के ऊपर बिंदी और ‘t’ के ऊपर कट्टा लगाने के लिए ही तो तुम्हें तनखाहें दी जाती हैं। गोपाल अब तक चुपचाप सब कुछ सुन रहा था, लेकिन यह सुनकर एकदम बोल पड़ा, ‘मेरी समझ में तुम्हारी बात नहीं आई।’

मैंने कहा कि ‘i’ पर बिंदी और ‘t’ पर कट्टा लगाने के लिए ही अंग्रेज़ी विभाग बनाया गया है।
‘अच्छा’, उसने आँखें फाड़ते हुए कहा। ‘मैं तो यह नहीं जानता था। लेकिन आप लोग यह करते क्यों हैं ?’ तथ्यों और आँकड़ों के बिना काम न करने वाला उसका दिमाग़ कथ्य पर आकर अटक गया था। प्रतीक उसके दिमाग़ में घुस नहीं पाते थे, और वे भी तभी घुसते थे जब वे गणित के प्रतीक हों।

रंगप्पा ने उत्तर दिया, ‘सुनो, गोपाल तुमने अंग्रेज़ी का यह मुहावरा सुना है, ‘Raining cats and dog’ (रेनिंग कैट्स एण्ड डॉग्स) ?’
‘हाँ, सुना है।’

‘तो तुमने कभी आसमान से बिल्लियाँ और कुत्ते बरसते देखे हैं ?’
‘नहीं, कभी नहीं देखे। लेकिन क्यों ?’

रंगप्पा इस बहस को आगे और भी खींचता, लेकिन तभी कालेज का दस का घंटा बजा और (मैंने ‘गुड बाय’) कहकर सबसे विदा लेनी चाही। गोपाल तो तुरंत ‘गुड बाय’ कहकर उठने लगा, लेकिन रंगप्पा जमा बैठा ही रहा और दार्शनिक होने के कारण, जो सवाल किये बिना कुछ भी नहीं स्वीकारते, तुरंत बोला, ‘आज यह जल्दी क्यों ?’
‘मैं नई आदतें डालना चाहता हूँ...’

‘इन आदतों में क्या खराबी है ?’ यह कहकर वह जवाब का इन्तज़ार करने लगा। लेकिन मेरी कहानी लंबी थी, और इस समय बताई नहीं जा सकती थी। पर रंगप्पा अपनी जगह से हिला नहीं और जवाब के लिए आग्रह करने लगा।
‘मैं कल जल्दी उठ जाना चाहता हूँ, ‘मैंने कहा।
‘किस वक्त ?’
‘पाँच बजे से पहले।’
‘लेकिन क्यों ?’

‘मैं चाहता हूँ कि उगता हुआ सूरज देखूँ और काम पर जाने से पहले कुछ कसरत वगैरह करूँ।’
‘अरे वाह ! यह तो बहुत अच्छी बात है। मुझे भी उठा लेना, मैं भी तुम्हारे साथ चलूँगा...’, रंगप्पा उठते हुए बोला। मैं सबको दरवाजे तक छोड़ आया।

मेरे पास एक अलार्म घड़ी थी जिस पर कभी-कभी मैं लगाये गये वक्त पर जब जाने के लिए भरोसा कर सकता था। इसे मैंने कई साल पहले मद्रास में एक कबाड़ी के ढेर से खरीदा था। इसके चेहरा लाल रंग का था और बीसियों दफा इसमें तेल डाला जा चुका था और मरम्मत भी हो चुकी थी। वक्त तो यह घड़ी सही देती थी लेकिन अलार्म का पुर्ज़ा कुछ खराब था। इसमें बहुत घर-घर की आवाज़ निकलती थी, और कभी-कभी यह अपने आप ही बज उठता था, और चल रही बातचीत में दखल देने लगता था, और अक्सर जब मैं दरवाज़ा बंद करके बाहर निकलने लगता तो यह एकदम अचानक बज उठता था और तब तक घरघराता रहता था जब तक इसकी चाबी पूरी खत्म न हो जाय। तब कोई भी बटन दबाओ, यह बंद ही नहीं होता था। मुझे यह भी पता नहीं था कि इसमें बंद करने का कोई इन्तज़ाम है भी या नहीं इसलिए इसे कैसे बंद किया जाय, यह मैं समझ ही नहीं पाता था... तब इसे ज़मीन पर फेंक कर ही चुप कराया जा सकता था। लेकिन प्रयोग करते रहकर एक दिन मैंने यह खोज लिया कि किसी बहुत भारी चीज़, जैसे टाइन की ‘हिस्ट्री ऑफ इंगलिश लिटरेचर’, को अगर इसके ऊपर जोर से जमा दिया जाय, जो यह फौरन चीखना बंद कर देता था। मैंने घड़ी उठाई और बिस्तर पर बैठकर उसे देखने लगा। मन में उससे कहा, ‘अब आप पर ही निर्भर हूँ, जनाब !’ और साढ़े चार का अलार्म लगाकर सो गया।

साढ़े चार बजे चीखें मारकर इसने मुझे जगा दिया। मैंने बत्ती जलाई, जल्दी से टाइन की किताब उठाई और दबाकर उसे बंद कर दिया। फिर रंगप्पा के कमरे पर गया, खिड़की से एक दर्जन दफ़ा आवाज़ें लगाईं, लेकिन कोई जवाब नहीं आया। मैं बाहर खड़ा बिस्तर पर लुढ़का उसका शरीर देखता चिढ़ रहा था, कि वह ज़रा-सा हिला और बोला, ‘कौन है ?’

‘पाँच बज रहे हैं। तुमने कहा था, मुझे भी जगा देना...’
‘लेकिन क्यों ?’
‘तुमने कहा था कि तुम भी घूमने चलोगे।’

‘क्या कहा था ?’
‘घूमने के लिए...’
‘मुझे तो अभी आधी रात लग रही है। तुम भी जाकर सो जाओ। जाओ, इस तरह दूसरों को परेशान मत करो...’, यह कहकर वह फिर लुढ़ुक गया।

मैं हॉस्टल के फाटक से बाहर निकला। कॉलेज और हॉस्टल दोनों नदी से सौ-दो-सौ गज़ से ज्यादा दूर नहीं थे। एक पतली-सी गली पार करके हम नदी की रेत पर पहुँच जाते थे। गली में गुज़रते हुए मैंने देखा कि म्युनिसिपैलटी के एक-दो लैंप अभी भी जल रहे हैं, लेकिन वे बुझने ही वाले हैं...? पूरब का आसमान लाल होने लगा था। यह देखकर मैं फड़क उठा। सोचने लगा कि इतना शानदार नज़ारा सामने है लेकिन लोग सो ही रहे हैं, उठकर इसे देखते क्यों नहीं ? मुझे रंगप्पा की याद आई। बिलकुल खुश्क दार्शनिक है...उस पर इस खूबसूरती का क्या असर होगा ! बेकार आदमी...जो हो, मुझे क्या लेना-देना...’


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