पैंसठ लाख की डकैती - सुरेन्द्र मोहन पाठक Painsath Lakh Ki Dakaiti - Hindi book by - Surendra Mohan Pathak
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पैंसठ लाख की डकैती

सुरेन्द्र मोहन पाठक

प्रकाशक : राजा पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2010
पृष्ठ :283
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 7820
आईएसबीएन :81-7604-992-1

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भारत बैंक का वाल्ट खोलना तो दूर, उसके पास भी फटकना असम्भव कृत्य था। वाल्ट का बख्तरबंद दरवाजा खुद उसे बंद करने वाला नहीं खोल सकता था। फिर भी वाल्ट लुट गया...

Painsath Lakh Ki Dakaiti - A Hindi Book - by Surendra Mohan Pathak

भारत बैंक का वाल्ट खोलना तो दूर, उसके पास भी फटकना असम्भव कृत्य था।
वाल्ट का बख्तरबंद दरवाजा खुद उसे बंद करने वाला नहीं खोल सकता था।
फिर भी वाल्ट लुट गया

मायाराम ने एक नया सिग्रेट सुलगाया और अपनी कलाई पर बंधी घड़ी पर निगाह डाली।
वक्त हो गया था।
वह यह बात पहले ही मालूम करके आया था कि करनैल सिंह की मेहता हाउस से किस वक्त छुट्टी होती थी।

मेहता हाउस लारेंस रोड पर स्थित एक विशाल चारमंजिला इमारत थी और उसमें वह बैंक स्थित था जिसके वाल्ट पर डाका डालने के असम्भव कृत्य को सफल बनाने के सपने मायाराम देख रहा था। वह उसकी जिंदगी का आखिरी दांव था। उसमें असफल होने का मतलब था कि उसकी मौत जेल में एड़ियां घिसघिसकर ही होने वाली थी।

मायाराम-मायाराम बावा–एक बड़ा प्रसिद्ध तिजोरीतोड़ था। किसी भी प्रकार की तिजोरी खोल लेने की उसकी अद्भुत क्षमता की वजह से अपने हमपेशा लोगों में और पुलिस वालों में वह उस्ताद के नाम से जाना जाता था। अब तक वह पांच बार जेल की हवा खा चुका था। उसकी पिछली सजा, जिसे भुगतकर वह कोई साढ़े तीन साल पहले जेल से निकला था, सात साल की थी और वह उसका जेल में गुजरा सबसे लम्बा बक्त था। उस सजा ने काफी हद तक उसके कसबल ढीले कर दिए थे। पैंतालीस साल उसकी उम्र हो चुकी थी और वह खूब जानता था कि अगल वह फिर पुलिस की गिरफ्त में आ गया तो वह उसका आखिरी जेल यात्रा होगी; अगली बार जेल से वह नहीं, उसकी लाश बाहर आएगी।

इस खयाल से ही मायाराम के शरीर में झुरझुरी दौड़ जाती थी।
पिछले साढ़े तीन सालों में वह हर क्षण एक ही बात सोचता रहा था कि किसी प्रकार वह कोई तगड़ा हाथ मारने में कामयाब हो जाये और फिर ज़िंदगीभर चैन की बंसी बजाये। सीढ़े तीन साल के लम्बे इंतजार के बाद अब वह उस योजना पर काम करने की स्थित में आ गया था जो उसके दिमाग में जेल से छूटने से भी पहले सन बन रही थी, लेकिन पुलिस की उस पर कड़ी निगरानी की वजह से जिस पर अमल करना आज से पहले सम्भव नहीं था। उस योजना की सफलता असफलता पर उसकी आने वाली पूरी ज़िंदगी का दारोमदार था।

नहीं, इस बार वह कोई गड़बड़ नहीं होने देगा। इस बार वह अनाड़ी और गैरजिम्मेदार लोगों से वास्ता नहीं रखेगा। इस बार वह ऐसी नौबत नहीं आने देगा जिसकी वजह से उसे जेल यात्रा करनी पड़े। इस बार वह एक-एक कदम फूंक-फूंक कर रखेगा। इस बार वह किसी के अधीन काम नहीं करेगा। इस बार किसी अन्य अक्ल के अंधे की गलती का खामियाजा वह नहीं भुगतेगा। अपनी वर्तमान योजना की सारी रूपरेखा उसने तैयार की थी और वह खुद अपनी निगरानी में उसे अंजाम देने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ था।

मायाराम की जिंदगी की ट्रेजडी यह थी कि अगर वह पांच बार पुलिस की गिरफ्त में आया था तो पांचों ही बार ऐसा उसके किसी अन्य मूर्ख, गैरजिम्मेदार साथी की वजह से हुआ था। अपने हिस्से के काम को उसने हर बार बड़ी दक्षता से अंजाम दिया था लेकिन योजना बनाने वाले उसके साथ कोई ऐसी हिमाकत कर चुके होते थे कि अभी माल हाथ भी न आया होता था कि पुलिस उसके सिर पर होती थी। उसकी पिछली सात साल की सजा की भी यही कहानी थी। उसने बड़ी दक्षता से बारूद लगाकर वाल्ट का दरवाजा उड़ाने का इंतजाम कर लिया था लेकिन योजना बनाने वालों में से किसी हरामजादे ने इस बात की ओर ध्यान ही नहीं दिया था कि दरवाजे से किसी अलार्म बैल का भी सम्बंध हो सकता था। परिणाम वही हुआ जो चार बार पहले भी हो चुका था। जब तक वह संभलता, तब तक वह जेल में पहुंच चुका था। वह उसकी अब तक की सबसे लम्बी सजा थी।

इस बार उसने दृढ़ निश्चय किया था कि वह किसी अनाड़ी या नातजुर्बेकार आदमी के साथ काम नहीं करेगा। उसने बड़ी ही मेहनत से एक-एक पहलू पर गौर करके डकैती की एक फुलप्रूफ योजना बनाई थी और उसमें फिट बैठने वाले उसके मतलब के लोग उसकी निगाह में थे।

तभी उसे बैंक की सीढ़ियों पर करनैल सिंह दिखायी दिया। वह एक सफेद दाढ़ी वाला, अपनी उम्र के लिहाज से बड़ी अच्छी सेहत वाला, हट्टा-कट्टा सरदार था। वह उस समय भी सिक्योरियी गार्ड की वर्दी पहने था। कुछ क्षण वह सीढ़ियों पर खड़ा अपने कुछ साथियों से बातें करता रहा। फिर किसी दिलचस्प बात पर ठहाका लगाता वह उनसे अलग हुआ और सीढ़ियां उतरकर सड़क पर आ गया। उसने एक रिक्शावाले से बात की और उस पर सवार हो गया। रिक्शा आगे बढ़ा।

मायाराम ने सिग्रेट फेंक दिया। उसने अपनी साइकल संभाली। वह धीरे-धीरे साइकल चलाता अपने और रिक्शा के बीच में थोड़ा फासला रखे रिक्शा के पीछे पीछे चलने लगा।
करनैल सिंह का रिक्शा रामबाद के सुहावने वातावरण के बीच से गुजरा, उसने विक्टोरिया जुबली अस्पताल के समीप रेलवे क्रॉसिंग पार किया और आगे रामबाग गेट की भीड़ में शामिल हो गया।
रिक्शा मामूली रफ्तार से चल रहा था। मायाराम को उसके पीछे लगे रहने में कोई दिक्कत महसूस नहीं हो रही थी।

पशमवाला बाजार की भीड़ से गुजरकर रिक्शा कटड़ा जैमलसिंह पहुंचा और फिर एक स्थान पर रुका।
मायाराम साइकल से उतर गया।
करनैल सिंह ने रिक्शावाले को पैसे दिए और एक संकरी गली में घुस गया।
मायाराम भी साइकल ठेलता उसके पीछे गली में दाखिल हुआ।

करनैल सिंह गली के मध्य में स्थित एक दोमंजिले मकान के प्रवेशद्वार में घुसकर दृष्टि से ओझल हो गया।
मायाराम एक क्षण ठिठका रहा, फिर आगे बढ़ा। उस इमारत के पास आकर उसने उसकी चौखट पर लगा उसका नम्बर देखा :
428।

उसने साइकल को दीवार के साथ लगा कर खड़ा कर दिया और मकान के चबूतरे पर चढ़ा। चौखट पर घंटी नहीं थी। उसने सांकल खटखटायी।
पहली मंजिल की एक खड़की से सिर निकालकर करनैल सिंह ने गली में झांका।
‘‘कौन है ?’’–वह बोला।

‘‘करनैल सिंह ?’’–मायाराम सिर उठाकर बोला।
‘‘हां।’’
‘‘जरा नीचे आना।’’—मायाराम पंजाबी में बोला–‘‘तुमसे एक बात करनी है।’’
करनैल सिंह का सिह खिड़की से गायब हो गया।
दरवाजा खुला। चौखट पर करनैल सिंह प्रकट हुआ। उसने मायाराम को भीतर आने के लिए नहीं कहा।

‘‘कौन हो तुम ?’’—उसने रूखे स्वर में पूछा।
‘‘मेरा नाम मायाराम है।’’–मायाराम बोला—‘‘लोग मुझे उस्ताद के नाम से ज्यादा जानते हैं।’’
‘‘मैं नहीं जानता।’’
‘‘करतारे को तो जानते हो ?’’

‘‘कौन करतारा ?’’
‘‘करतार सिंह आहलूवालिया ?’’
करनैल सिंह संदिग्ध निगाहों से उसे देखने लगा।
‘‘मुझे भीतर तो आने दो !’’

करनैल सिंह हिचकिचाता हुआ चौखट से हटा। भीतर आने देने के नाम पर उसने इतना ही किया कि उसने मायाराम को चबूतर से हटकर ड्योढ़ी में आ जाने दिया।
‘‘करतारा मर चुका है।’’—मायाराम धीमे स्वर में बोला—‘‘कोई एक साल पहले जेल में उसका बोलो राम हो गया था। इसलिए मैं यहां आया हूं।’’

‘‘तुम जेल में उसके साथ थे ?’’
‘‘हां।’’
‘‘जो कहना है, जल्दी कहो। मैं जेल के पंछियों से वास्ता नहीं रखना चाहता।’’
‘‘यहीं कहूं ?’’
‘‘हां।’’
‘‘कम से कम दरवाजा तो बंद कर लो।’’

करनैल सिंह ने आगे बढ़कर दरवाजा भिड़का दिया।
‘‘करतारे से तुम्हारा एक सौदा हुआ था।’’—मायाराम बोला—‘‘मैं सिर्फ इतना जानना चाहता हूं कि क्या उस सौदे में तुम्हारी अभी भी दिलचस्पी है ?’’
‘‘मैं तुम्हें नहीं जानता।’’


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