17 रानडे रोड - रवीन्द्र कालिया 17 Ranade Road - Hindi book by - Ravindra Kaliya
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17 रानडे रोड

रवीन्द्र कालिया

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2010
पृष्ठ :304
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 7710
आईएसबीएन :978-81-263-1873

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कथाकार-सम्पादक रवीन्द्र कालिया का एक अद्वितीय उपन्यास ‘17 रानाडे रोड’...

17 Ranade Road by Ravindra Kaliya

‘17 रानाडे रोड’ कथाकार-सम्पादक रवीन्द्र कालिया का ‘ख़ुदा सही सलामत है’ और ‘एबीसीडी’ के बाद तीसरा उपन्यास है। यह उपन्यास पाठकों को बम्बई (अब मुम्बई) के ग्लौमर वर्ल्ड के उस नये इलाक़े में ले जाता है, जिसे अब तक ऊपर-ऊपर से छुआ तो बहुतों ने, लेकिन उसके सातवें ताले की चाबी जैसे रवीन्द्र कालिया के पास ही थी। पढ़ते हुए इसमें कई जाने-सुने चेहरे मिलेंगे - जिन्हें पाठकों ने सेवंटी एमएम स्क्रीन पर देखा और पेज थ्री के रंगीन पन्नों पर पढ़ा होगा। यहाँ लेखक उन चेहरों पर अपना कैमरा ज़ूम-इन करता है जहाँ चिकने फेशियल की परतें उतरती हैं और (बकौल लेखक ही) एक ‘दाग़-दाग़ उजाला’ दिखने लगता है।

‘ग़ालिब छुटी शराब’ की रवानगी यहाँ अपने उरूज़ पर है। भाषा में विट का बेहतरीन प्रयोग रवीन्द्र कालिया की विशिष्टता है। कई बार एक अदद जुमले के सहारे वे ऐसी बात कह जाते हैं जिन्हें गम्भार क़लम तीन-चार पन्नों में नहीं आँक पाती। लेकिन इस बिना पर रवीन्द्र कालिया को समझना उसी प्रकार कठिन है जैसे ‘ग़ालिब छुटी शराब’ के मूड को चीज़ों के सरलीकरण के अभ्यस्त लोग नहीं समझ पाते। मेरे तईं ‘ग़ालिब....’ रवीन्द्र कालिया की अब तक की सबसे ट्रैजिक रचना थी।

17 रानडे रोड


उपन्यास के नायक सम्पूरन उर्फ एस. के. ओबेराय उर्फ ओबी जैसे चरित्र हिन्दी कथा-साहित्य में दुर्लभ हैं। वे लिखे नहीं जाते, ‘अवतार’ लेते हैं। ओबी ने जिस जीवन शैली को, अपने लिए जिस डिक्शन को और यहाँ तक कि अपनी रहनवारी के लिए जिस भुतहे मकान को चुना है, वह आज की धुर पूँजीवादी व उपभोक्तावादी दुनिया में एक एंटीडोट का काम करता है। ओबी की दुनिया अपने इर्द-गिर्द इतनी ज्यादा चमकीली और भड़काऊ है कि अपने अतिरेक में वह एक प्रतिसंसार उपस्थित कर देती है।

सम्पूरन इसलिए भी अद्वितीय पात्र बन पड़ा है कि जब दुनिया धुर पूँजीवादी हो चली है, वह पूँजी की न्यूनतम महिमा को भी ध्वस्त कर देता है। वह पैसे का दुश्मन है - कर्ज, सूद, उधार, अमीरी, ग़रीबी, दान, दक्षिणा आदि जो धन केन्द्रित तमाम जागतिक क्रियाशीलताएँ हैं, वह ओबी के जीवन से पूरी तरह अनुपस्थित हैं। वह हर तरह के दुनियावी बैलेंस शीट, बही-खाते, गिनती-हिसाब से परे एक विशुद्ध फक्कड़ और फकीर है। एक तरह यदि सम्भव यह है कि वह रात में फ़िल्म इंडस्ट्री के नामी-गिरामी हस्तियों को शराब पिला रहा है, तो दूसरी तरफ यह भी असम्भव नहीं कि अगले दिन उसके पास टैक्सी का किराया भी न हो। वह कुलियों की तरह धनार्जन करता है ताकि राजकुमारों की तरह खर्च कर सके।

सम्पूरन एक कभी न थकने वाला जुझारू चरित्र भी है। वह कभी हार नहीं मानता, फीनिक्स की तरह अपनी ही राख से फिर-फिर जी उठता है। बम्बई में जब कभी उसकी जेब पूरी तरह ख़ाली हो जाती है और उम्मीद की कोई किरण नहीं दिखाई पड़ती, वह अपना पोर्टफोलियो उठाकर लोगों को पत्रिकाओं का सदस्य बनाना शुरु कर देता है... एक अद्वितीय उपन्यास...



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