अर्द्धनारीश्वर - विष्णु प्रभाकर Arddhanarishwar - Hindi book by - Vishnu Prabhakar
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उपन्यास >> अर्द्धनारीश्वर

अर्द्धनारीश्वर

विष्णु प्रभाकर

प्रकाशक : किताबघर प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2010
पृष्ठ :421
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 7709
आईएसबीएन :9788189859503

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‘अर्द्धनारीश्वर’ व्यक्तिमन, समाजमन एवं अंतर्मन के विविध स्तरों पर नारी और नर थे इन्हीं के एकमएक सुर और स्वर-मिलन की प्राप्ति का प्रयास है यह उपन्यास...

Arddhanarishwar - A Hindi Book - by Vishnu Prabhakar

‘अर्द्धनारीश्वर’ व्यक्तिमन, समाजमन एवं अंतर्मन के विविध स्तरों पर नारी और नर थे इन्हीं के एकमएक सुर और स्वर-मिलन की प्राप्ति का प्रयास है यह उपन्यास। वही जाति-पाति और धर्म की समस्या, वही विवाह, तलाक, बलात्कार की समस्या, वही नारी-शोषण, उत्पीड़न, वही टूटते-बिखरते जीवन की कहानी, किंतु मुक्ति के लिए ‘कोई तो’ की प्रतीक्षा नहीं है। यहाँ लेखक ने समाधान के रूप में एक वृहत्तर रूपरेखा की सर्जना की है।

‘अर्द्धनारीश्वर’ का अभिप्रेत नारी और नर की समान सहभागिता को प्राप्त करना है। इसके लिए जरूरी है, एक-दूसरे को अपनी-अपनी दुर्बलताओं व सबलताओं के साथ स्वीकार करना तथा मान लेना कि रचना के लिए प्रकृति व पुरुष का मिलन भी जरूरी है।

मूल समस्या तो पुरुष की है, उसके पौरुषिक अहम् की, जो उसे ‘बेचारा’ बना देती है। सहज तो इसे ही बनाना है। इसी की असहजता से स्त्री बहुत-से बंधन तोड़कर आगे निकल आई है। लेकिन बंधनहीन होकर किसी उच्छृंखलता की रचना करना लेखक का अभिप्रेत नहीं है, बल्कि बंधनों की जकड़न को समाप्त कर प्रत्येक सुर को उसका यथोचित स्थान देकर जीवन-राग का निर्माण करना है। अजित के शब्दों में लेखक कहता है:

‘‘मैं सुमिता को अपनी दासता से मुक्त कर दूँगा। मैं उसकी दासता से मुक्त हो जाऊँगा। तभी हम सचमुच पति-पत्नी हो सकेंगे...।’’

इसी स्वयं की दासता से मुक्ति का नाम है, ‘अर्द्धनारीश्वर’।

खण्ड एक
व्यक्ति-मन
सुमिता

घण्टी पर घण्टी पर हाथ रखने से पूर्व मैं कई क्षण सोचती खड़ी रही। कितने बोझिल थे वे ठिठुरे क्षण कि मैं पसीने-पसीने हो आई।...तो क्या लौट जाऊँ यहीं से और फोन पर कोई बहाना बना दूँ ? जानती हूँ वह सब व्यर्थ होगा क्योंकि तब अन्तर में घुमड़ता धुआँ और कड़ुवा हो उठेगा। अन्तर में जो इतना तीव्र होकर घुमड़ता है उससे साँस घुट ही सकती है क्योंकि निकलने का मार्ग कहीं छोड़ा ही नहीं संस्कारों ने।...

नहीं, मैं नहीं लौटूँगी। अपने को पीड़ा देते-देते इतना थक गई हूँ कि मुक्ति चाहती हूँ और मुक्ति अपने को अनावृत करने में ही है। किये-अनकिये कर्मों के दण्ड से कब तक कोई भागता रहेगा ? शब्द अन्दर रहते हैं तो सालते हैं, मुक्त हो जाते हैं तो साहित्य बन जाते हैं। जो नहीं देखा उससे हम आक्रांत क्यों रहते हैं ? जो भोगा है उसे छिपाते क्यों हैं ?...

न जाने कितनी-कितनी बार ऐसे ही जूझी हूँ और टूटी हूँ, कितनी-कितनी बार अपने से बहस की है पाप-पुण्य की परिभाषा को लेकर, कितनी-कितनी बार, पर एक बात मैं कभी नहीं कर पाई-अपने को अनावृत नहीं कर पाई...
आज मैं वही करने का दृढ़ निश्चय करके यहाँ आई हूँ। अपने को खोल देना चाहती हूँ। उतार फेंकना चाहती हूँ, संस्कारों के धुएँ की चादर को। लेकिन अन्तर में उमड़ता तुमुलनाद हर क्षण मुझे कातर-से-कातर क्यों कर जाता है ? क्यों भरे रहते हैं हर रोज दैनिक पत्र बलात्कार की शर्मनाक घटनाओं से, क्यों बुद्धिजीवी हर क्षण बहस करते हैं, इस शब्द को लेकर ? देश की संसद में भी गूँजता रहता है यही एक शब्द बार-बार, पर कहीं कुछ होता क्यों नहीं ? शब्द, शब्द और शब्द। क्रिया के बिना शब्द का अस्तित्व सार्थक हुआ है क्या ?

शायद ऐसा तो नहीं कि ये शर्मनाक घटनाएँ पढ़कर हमें दर्द के स्थान पर एक रोमांचक अनुभूति होती है, ‘काश हम न हुए की मुद्रा में...इसलिए और भी कि प्रमाण कि अभाव में अधिकांश अभियुक्त साफ छूट जाते हैं।....

और वह क्या औरत नहीं थी जिसने कहा था, ‘‘मेरे साथ कई बार बलात्कार हुआ है। इसमें बुरा क्या है, मज़ा ही आता है।...’’
लेकिन अपना नाम बताने का साहस उसमें भी नहीं था।

यही तो समस्या है। इसी से तो मुक्ति चाहती हूँ मैं। और तब सहसा मुक्ति की इसी चाह ने मुझे विवश कर दिया कि घण्टी को जोर से दबा दूँ। घण्टी पर आघात हुआ नहीं कि उधर वातावरण ‘किंग-किंग’ के अनवरत उठते शब्द से गूँज उठा।

दो क्षण बाद द्वार खोल कर एक सौम्य दर्शन प्रौढ़ा सामने आ गई। मुख पर स्वागत के लिए खिंची स्मिति की रेखाएँ। आँखों में अनुभूतिजन्य विश्वास, माँग में दीप्त सिन्दूर की रेखा, श्वेत होते सजे-सँवरे, लम्बे केश, चौड़ी पाड़ की हल्के गुलाबी रंग की साड़ी, बोलीं मृदु-मधुर स्वर में, ‘‘आप सुमिता जी हैं न ? आपकी ही राह देख रही थी मैं। घर में इस समय कोई नहीं है, केवल आप और मैं...’’

और स्मिति कुछ गहरी हो आई। मैं समझ गई व्यंग्य को, पर मुस्कराई नहीं। कहीं कुछ कसक गया, जाने-अनजाने। क्या कह गई यह। फिर भी अपने को यथा-शक्ति सुस्थिर कर मृदु-स्वर में मैं बोली, ‘‘किन शब्दों में धन्यवाद दूँ आपको कि आपने मुझसे मिलना स्वीकार किया !’’

‘‘आप किसी पत्रिका के साथ जुड़ी हैं शायद ?’’
‘‘बताया था न कि मैं दिल्ली स्कूल ऑफ सोशल वर्क में काम करती हूँ पर लिखने का शौक है। कहानियाँ लिखती हूँ। कभी-कभी नारी की समस्या को लेकर लेख भी लिख लेती हूँ। ‘नारी-मन’ के लिए आजकल...’’

‘‘जानती हूँ आजकल वातावरण में दो ही शब्द गूँजते हैं, बलात्कार और वधू-दहन...बैठो।’’
अभी तक हम दोनों चल रहे थे। अब सामने ड्राइंग रूम था, मैं सोफे पर बैठ गई।
सुरुचिपूर्ण, पर सादगी का प्रतीक। एक शैल्फ में पुस्तकें, दूसरे में दो-तीन कला-कृतियाँ। पूरे कमरे में दीवार पर हिमालय के शिवलिंग शिखर का एक बहुत ही भावपूर्ण चित्र। जितना अनगढ़, उतना गरिमामय। एक ओर दीवान, दूसरी ओर सोफा। बीच में काँच से आवृत एक गोलाकार मेज। उसके ऊपर और नीचे नई पत्रिकाएँ।

‘‘पढ़ने का शौक है आपको ?’’ अनायास ही मुँह से निकल गये ये शब्द।
‘‘जी हाँ, हम चारों ही पढ़ते हैं।’’
‘‘चारों ?’’ सप्रश्न मैंने देखा।
‘‘हम दो, हमारे दो,’’ वे सहसा हँस पड़ी। मैं भी खुल गई। कमरा भर उठा। छोटी-छोटी बातें कभी कितना उत्फुल्ल कर जाती हैं। उन्होंने बताया, ‘‘बेटी शादी करके कनाडा में है और बेटा कॉलिज में पढ़ाता है। अभी शादी की है, बहू रिज़र्व बैंक में है। दोनों हनीमून पर हैं।’’

मैं बात का छोरअ पने हाथ में ले पाती कि वे फिर बोल उठीं, ‘‘चाय अभी लेना पसन्द करेंगी या बाद में ?’’
‘‘बाद में,’’ मैं कहना तो नहीं चाहती थी पर न जाने क्यों कह गई। कभी हम अपने से इतने अनभिज्ञ होते हैं कि लगता है हमारे भीतर हमारा अपना ‘मैं’ न होकर किसी और का ‘मैं’ आ बैठा है।

उन्हें मेरी बात अच्छी लगी। द्वार बन्द करके मेरे पास ही बैठ गईं, बोलीं, ‘‘हाँ, बाद में ही पीना अच्छा होगा। अब मैं आपके सामने हूँ, लेकिन एक बात कह दूँ साफ-साफ। तभी कुछ बता सकूँगी जब मुझे विश्वास दोगी कि कहीं भी मेरा या मेरे पति का नाम प्रगट नहीं करोगी। नारी हो तुम भी....’’
एक बार तो मैं हिल उठी, बार-बार सात परदों को भेद कर वही बात सामने क्यों उजागर हो जाती है ? क्यों अनावृत नहीं कर पाते हम अपने को क्यों...क्यों...क्यों...?’’

जैसे भूचाल आ गया हो, पर दूसरे ही क्षण किसी तरह अपने को सहेज लिया मैंने। बोली, ‘‘विश्वास कर सकती हैं तो सच मानिए कि किसी पत्र-पत्रिका में आपके लिए इस साक्षात्कार को प्रकाशित नहीं करूँगी।’’
‘तब ?’ सप्रश्न अपनी भेदक दृष्टि घुमा दी उन्होंने मेरी ओर।

‘‘सब कुछ बताऊँगी, पर पहले आपसे सुन लूँ...आपकी बेटी जितनी आयु है मेरी, पर साहस इतना कर बैठी कि आपके घाव कुरेदने चली आई। क्यों किया मैंने यह दुस्साहस, इसके पीछे मात्र एक शोधकर्ता की जिज्ञासा ही नहीं है। कुछ इतना गहरा है, कुछ इतना निजी है कि आपके साथ एक गहरी आत्मीयता से जुड़ गई हूँ...’’

प्रौढ़ा की मेरे रोम-रोम को चीर जाने वाली भेदक दृष्टि अभी भी मेरी आँखों में झाँक रही थी...पर अब वहाँ एक पहचाना-पहचाना दर्द तैर आया था। दर्द का दर्द से एक अव्याख्यायित रिश्ता होता है। उस दर्द को उन्होंने पहचान लिया। उनके नेत्र भीग आए। न जाने किस शून्य में दृष्टि गड़ाये रहीं कई क्षण। फिर वहीं से बोलने लगीं। वे शब्द नहीं थे, एक ऐसी ध्वनि थी जो शब्दों में रुपायित होकर भी अपने सम्पूर्ण में व्याप्त थी, ‘एक ऐसी स्मृति जो चीर-चीर देती है और हर चीरा हुआ क्षण ऐसा नुकीला हो उठता है कि अस्तित्व तक लहूलुहान हो उठे। पता नहीं वे क्या बोल रही थीं; पता नहीं मैं क्या सुन रही थी। इतना ही याद है, उन्होंने कहा था, ‘‘नई-नई शादी हुई थी हमारी। स्वप्नों में बहुरंगी संसार में जी रहे थे हम। वे और मैं, मैं और वे। उस महानगर में कार्यालय था उनका। घर में एक नौकर था, उनका पुराना नौकर। जी-जान से काम करता। मेरे आगे-पीछे घूमता रहता। एक दिन वे हँसकर बोले, ‘तुम्हें अपना बनाने को कैसी चाटुकारी करता है दुष्ट ! जानता है अब तो तुम ही स्वामिनी हो मेरी भी, उसकी भी।’

‘‘धत्,’ मैं प्यार से हँस आई थी। स्वप्न में भी नहीं सोच सकती थी कि विष मधुर भी हो सकता है।
‘‘और इस तरह दिन बीत रहे थे। उस दिन वे सदा की तरह मुझे प्यार से थपथपा कर दफ्तर गये। मैं आराम से गुसलखाने में घुसी। देर तक खेलती रही पानी से और अपने तन से। प्यार की मदिरा सब कुछ को मादक बना देती है। बहुत देर बाद गुनगुनाती हुई बाहर शयनागार में आई कि आपाद-मस्तक काँप उठी। मेरे शयनागार में मेरे सामने हमारा नौकर खड़ा था और उसके हाथ में छुरी थी। मैंने एकदम साड़ी लपेटते हुए उससे कहा, ‘तुम यहाँ क्या कर रहे हो ? रसोई में जाओ और...।’

‘‘मैं अपना वाक्य पूरा कर पाती कि उसने मुझे जोर से धक्का दिया। साड़ी समेटने की प्रक्रिया में तब मेरे दोनों हाथ घिरे थे, उस पर घटना की आकस्मिकता, मैं तेज़ी से फर्श पर गिर पड़ी। मेरा सर पलंग की पट्टी से टकराया। दूसरे ही क्षण हाथ में छुरी लिये वह मेरी छाती पर था। उसका वह रौद्र रूप, आँखों से टपकती वहशत, मेरी आँखों में धुआँ भर गया, जमा हुआ कड़वा धुआँ...मेरी चीखें उसी धुएँ में जम गईं...।’’

उनके मस्तक पर बूँदें चमक आई थीं। आँखें न जाने कहाँ देख रही थीं, जैसे वहाँ कोई नहीं था, बस पाशविक प्रक्रिया की भयावह गूँज थी जिसे हम दोनों समान रूप से जी रहे थे। वह जीना भी कैसी यातना थी ! कई क्षण बाद वह फिर बोलीं। तब कैसा दर्द था उनकी वाणी में, ‘‘इतना ही याद है कि हाथ में गहरा जख्म खाकर भी मैं अपने को न बचा पाई। मैं अब भी ठीक-ठीक नहीं जानती, वह कैसे हुआ ? मैं तो गिरते ही संज्ञा खो चुकी थी। जो कुछ संघर्ष मैंने किया होगा, हतप्रभता में ही किया होगा...।’’

वे फिर मौन हो गईं। वह धुआँ जैसे उनके नासिका रन्ध्रों में भर गया था। मैं अदालत में बहस करने वाली वकील तो थी नहीं कि परेशान करने वाले प्रश्न पूछती, ‘आपने जानबूझ कर संघर्ष नहीं किया तो आपकी कहीं-न-कहीं किसी-न-किसी स्तर पर सहमति रही होगी।’ मैं केवल नारी थी और कमोबेश उसी प्रक्रिया में से गुजर चुकी थी। कई क्षण बाद इतना ही पूछा, ‘‘आपकी चीख सुनकर पड़ोस में हलचल नहीं हुई ?’’

‘‘बड़े नगरों में पड़ोस की इतनी चिन्ता किसे होती है ? और हम जो नये-नये थे। फिर भी एक बहन ने मेरी चीख सुनी, लेकिन जब तक वे कुछ करने का निर्णय ले पातीं दरिन्दा अपना काम कर चुका था। उनके पति के आने से इतना ही हुआ कि मेरे प्राण बच गए। क्या अर्थ था उनके बचने या न बच सकने का ?’’
‘‘ऐसा कहेंगी अब भी ?’’ मैं फिर विचलित होकर बोल उठी।

उन्होंने तड़प कर मेरी ओर देखा। तीव्रता से कुछ कहना चाहा, पर उतनी ही तीव्रता से चुप भी हो गईं। देख रही थी कि कितना परिश्रम करना पड़ा था उन्हें उस अयाचित मौन के लिए। मैंने मर्म पर चोट कर दी थी उनके। वही प्रश्न तो मुझे कुरेद रहा था। वही प्रश्न मुझे उन तक खींच लाया था, फिर भी मैंने धीरे से कहा, ‘‘क्षमा कर दीजिये। आपको पीड़ा पहुँचाई मैंने।’’

अपने को सहेज-समेट चुकी थीं वे। चेहरे पर पहले की-सी सौम्यता लौट आई। बोलीं धीरे-धीरे, ‘‘नहीं बेटी, तुमने कोई पीड़ा नहीं पहुँचाई मुझे। पीड़ा तो हम अपने को स्वयं देते हैं, स्वयं से यही प्रश्न पूछ-पूछ कर। क्यों पूछती हैं हम यह प्रश्न ? क्यों हमें चिन्ता रहती है कि कोई हमें हिकारत की निगाह से तो नहीं देख रहा ? मैं अपनी बात कहती हूँ। बहन के पति ने तुरन्त मेरे पति को फोन किया। जब तक वे पहुँचे मुझे होश आ चुका था। मैं आत्म-ग्लानि से सिसक रही थी। मैंने उन्हें देखा तो मेरा बाँध टूट गया। पता नहीं, भरोसा पाने की आशा में या खोने के डर से। वे एक शब्द नहीं बोले। बहुत देर तक अपने से सटा कर सहलाते रहे। मैंने साहस करके करुण-कातर दृष्टि से उनकी आँखों में झाँका। टटोल कर उनका हाथ पकड़ा कि होंठों तक ले आऊँ कि फिर बाँध टूट गया। मैं फिर सिसक उठी। वे मेरे ऊपर झुक आए, अपने ओठ मेरे जलते ओठों पर रख दिए, यह कहते हुए, ‘पम्मि ! तुम जरा भी परेशान मत होओ। तुम्हारा कोई अपराध नहीं है। मैं उस दरिन्दे को...’

‘‘इस बार मैं सचमुच उनकी बांहों में बेहोश हो चुकी थी। भरोसे का आश्वासन भी कम पीड़ा नहीं देता, बिटिया ! उस भरोसे के कारण ही मैं वह हूँ जो तुम देख रही हो। नहीं तो क्या होता...’’
‘‘मैं जानती हूँ कि क्या होता। आप भाग्यशाली हैं नहीं तो...’’

‘वे बोलीं, ‘मैं तो उनका साहस देखकर हतप्रभ होती जा रही थी। आज सोचती हूँ, उन्हें वही करना चाहिए था जो उन्होंने किया। पुलिस आई। उस दरिन्दे को गिरफ्तार किया उसने...’’
मैंने सहसा टोक दिया उन्हें, ‘‘तब तो आपको अदालत में जाना पड़ा होगा और...’’

‘‘नहीं,’’ उन्होंने कहा, ‘‘वह सब नहीं सहना पड़ा मुझे। पुलिस ने भारी रिश्वत लेकर उसे छोड़ दिया। मेरे पति से थानेदार ने कहा, कोई प्रत्यक्षदर्शी गवाह नहीं है। वह दोषी है यह प्रमाणित करने के लिए आपकी पत्नी को जिस यातना में से गुजारना होगा उसको सह पायेंगी वह...?’’
‘‘तो बात यहाँ आकर समाप्त हो गई। यही हो सकता था।’’

‘‘सोचती हूँ, यह न होता तो क्या मैं वकील की जिरह को सहपाती ? मेरे पति ने मेरी इस यातना की कल्पना की और मौन हो गए। मुझे याद है वे बहुत तड़पे थे लेकिन जैसा हमारा समाज है, हमारे संस्कार हैं, उसमें और हो भी क्या सकता था ? उन्होंने कई दिन बाद कहा था, कैसी है हमारी नैतिकता ! इन्सानियत के प्रति इतना बड़ा जघन्य अपराध केवल इसी छद्म नैतिकता के कारण दण्डित हुए बिना रह गया। कौन तोड़ेगा नैतिकता के इस आत्मघाती चक्रव्यूह को....?’’

‘‘आपके पति क्या बाद में भी इस प्रसंग की चर्चा करते रहे हैं ?’’
‘‘नहीं, कभी नहीं ! उन्होंने मुझे उसी रात विश्वास दिलाया था, ‘पम्पि ! तुम निर्दोष हो, पवित्र हो। तुम मेरे लिए वही हो जो सवेरे थीं और सदा वही रहोगी।’ मैं जानती हूँ, वे अपवाद हैं आज के पुरुष-प्रधान समाज में। पर उन्होंने आज तक अपने उस आश्वासन को कभी न नहीं झुठलाया।’’
‘‘और आपने ?’’

प्रश्न सुनकर मेरी ओर देखती रह गईं वे। जैसे उसी से बचना चाह रही हों, पर, जैसे पैरों के नीचे से रेत खिसक जाती है वैसे ही बचने का क्षण खिसक गया। मेरी आँखों में झाँकती वे बोलीं, ‘‘सच सुमिता ! सब कुछ के बावजूद मैं वह नहीं रही थी जो स्नानघर से निकलते समय थी। समाज की नीति-नैतिकता, शास्त्र में पाप-पुण्य की व्याख्या, नर-नारी के सम्बन्ध सबने मिलकर मेरे अन्तःकरण में यह भावना पैबस्त कर दी थी कुछ अघटित घट गया है और जो कुछ घटित हुआ है वह पाप है। ऐसा पाप जिसका प्रतिकार नहीं हो सकता। मुझे अपराधिनी उस दरिन्दे ने नहीं बनाया बल्कि मेरे समाज ने बनाया। भीतर से मैं जिसे स्वीकार नहीं कर सकी थी, वही मुझ पर थोप दिया गया। जिसके प्रति अपराध किया गया, सजा भी उसी को मिली। आहत, अपमानित मैं किसी की करुणा की अपराधिनी भी नहीं रह गई...’’

वे रुकीं जैसे कहीं दर्द कसक उठा था और वह कसक चेहरे को विवर्ण कर गई थी। आहत स्वर में बोलीं, ‘‘कितना बड़ा संसार है मेरे भीतर दर्द से सना ! किसी को दिखा भी नहीं सकती, किसी की सहानुभूति भी नहीं चाह सकती। इसीलिए पति-परिवार का मुक्त स्नेह-सत्कार पाकर भी मुझे आज भी लगता है कि जैसे हर कोई मुझे हिकारत की निगाह से देख रहा है। उस आत्मग्लानि से मैं काँप-काँप उठती हूँ, इसलिए नहीं कि कोई मुझे दोषी समझता है बल्कि इसलिए कि मैं स्वयं अपने को इस दोष से मुक्त क्यों नहीं कर पा रही, समाज को झटक क्यों नहीं देती ?’’

वे अब भी कहीं खोई-खोई-सी बोल रही थीं। मुझे लग रहा था कि जैसे वे हैं ही नहीं। यह तो मैं हूँ स्वयं अपने से प्रश्न करती हुई कि मैं अपने समाज को अपने से झटक क्यों नहीं दे रही ? पता नहीं कब उन्होंने फिर बोलना शुरू किया, कब मैं सुनने लगी। वे कह रही थीं, ‘‘मन की परतें जब खुलने ही लगी हैं तो कुछ न छिपाऊँगी। उनसे भी नहीं छिपा सकी थी। चाहा भी नहीं था। कई दिन उन्होंने मुझसे कुछ नहीं चाहा। मुझे आश्वस्त ही करते रहे। मेरा अपना मन तो जैसे पुरुष के प्रति अपार घृणा से उमड़-उमड़ पड़ता। आँखें बन्द होतीं तो उनको भी अपने से परे हटाने को व्याकुल हो उठती। चीख उठने को होती कि आँखें खुल जातीं और मैं आपाद-मस्तक काँप-काँप उठती। वे पूछते, ‘क्या हुआ, पम्मि ?’

‘‘मैं सज्ञांहीन-सी चीख उठती, ‘तुम पुरुष हो। मुझे पुरुष से घृणा है।’
‘‘वे मुझे अपने से और भी सटा लेते और मैं होश में आकर उनकी छाती में मुँह छिपा कर सुबक उठती, ‘मुझे माफ कर दो। साफ कर दो मुझे।’ ...............
‘‘पम्पि !’ एक दिन उन्होंने मुझ से कहा, ‘कब तक करती रहोगी अपने से नफरत ? कब तक देती रहोगी अपने को यातना ?’
‘‘क्या करूँ मैं, बताओ मैं क्या करूँ ?’

‘‘मेरे बारे में सोचो, सब समझ जाओगी।’
‘‘क्या कह दिया उन्होंने ? मेरे अन्तर का आकाश दीप्त हो उठा निमिष मात्र में। वे भी पुरुष थे। घृणा कर सकते थे मुझसे...
‘‘लेकिन वे तो और भी कुछ कह रहे थे, ‘बात अन्ततः तुम पर है, तुम्हारी अपनी शक्ति और तुम्हारी अपनी क्षमता पर है। तुम गिरोगी, समाज तुम्हें रौंदता चला जाएगा। तुम खड़ा होना चाहोगी, मैं तुम्हारे साथ रहूँगा। तुममें चलने का संकल्प होगा तो मेरी शक्ति तुम्हें अजेय कर देगी।’

‘‘सच कहती हूँ उस क्षण भर उठी थी मैं और मैंने पागलों की तरह उन्हें अपने आलिंगन में पीस डाला था। जैसे कुछ हुआ ही नहीं था। बस हम दो पागल थे, जुड़ने को पागल, आत्मा कभी एक थी, फिर दो में बँट गई, अब फिर एक होने को आकुल-व्याकुल हो जैसे। उस भावाकुल स्थिति में न जाने क्या-क्या कह गई उनसे। इतना ही याद रह गया है मैंने कहा था, ‘कितना डर रही थी मैं अब तक। जैसे अनगिनत हिंस्र पशु घेरे हुए हों मुझे, मेरी बोटी-बोटी नोच लेने के लिए, पर अब, अब मैं पूर्ण शान्त हूँ, निश्चिंत हूँ। मैं उन हिंसक पशुओं की आँखों में आँखें डालकर कह सकती हूँ, अब मुझे तुम्हारा डर नहीं। मैं पूरी तरह सुरक्षित हूँ। मुझे ऐसा संरक्षण प्राप्त है जो मुझे कभी न छोड़ेगा।’ ’’

उस क्षण उनका यातना से त्रस्त मुखड़ा एक उजास से उजला-उजला हो आया था, पर तभी अपने को चकित करते हुए मैंने पूछ लिया, ‘‘आपने यह संरक्षण उन्हीं से क्यों पाना चाहा, अपने अन्दर से क्यों नहीं खोजा ?’’

सुनकर वे स्तब्ध-सी मेरी ओर देखने लगीं। क्षण-भर पहले की वह उजास लुप्त हो गई। दर्द सहने की यातना से विकृत होता चेहरा फिर उभर आया मेरे सामने। कई क्षण समेटती रहीं अपने-आपको। युग बीत गये उन त्रासद क्षणों में। स्वस्थ हुईं तो बोलीं, ‘‘लाखों-लाखों बार यही प्रश्न मैंने भी पूछा है अपने से। पर बिटिया, मैं जिस पीढ़ी की हूँ उसमें स्त्री का स्वतन्त्र अस्तित्व था ही कहाँ ? हाँ, कभी-कभी कल्पना मस्तिष्क में कौंध उठती थी और यह सोचकर सन्तोष कर लेते थे हम लोग कि न सही हम, हमारे बाद की या उसके बाद की पीढ़ी की नारी उस संरक्षण को पाने के लिए बाहर नहीं भटकेगी। पति-पत्नी एक-दूसरे के पूरक और सहायक हैं। एक-दूसरे पर आश्रित नहीं।’’

इस बार स्तब्ध होने की बारी मेरी थी। आश्चर्य, इस सीमा तक सोच सकती थी यह पीढ़ी ! फिर जैसे किसी ने चेताया हो-न सोच सकती तो तुम इतना आकुल-व्याकुल होकर क्यों संधान करने निकल पड़तीं ?
मैं न जाने कहाँ पहुँच गई थी। सहसा लौटी तो वे कह रही थीं, ‘‘उनका सहयोग पाकर मेरा प्रयत्न यही रहा कि वह स्मृति मेरे मानस से मिट जाए, पर भूकम्प से कोई कैसे भाग सकता है ? शुरू-शुरू में तो मुझे उनके प्रेम के प्रति भी सन्देह होने लगता था, पर जैसा कि उन्होंने सुझाया था, मैंने अपने से ही लड़ना शुरू कर दिया, चोट खाई, लड़खड़ाई भी पर समूह से टूट कर व्यक्ति बनने की मेरी चेष्टा में उनका भरपूर सहयोग मिला। वे कहते, ‘व्यक्ति में क्षमता व साहस होगा तभी तो समाज शक्ति पा सकेगा।’

‘‘एक और लाभ मिला इस संघर्ष का। मैं उनसे एकाकार होती चली गई। उनमें खो रहने की कामना फिर सहज हो आई। जब मैंने जाना कि मैं माँ बनने वाली हूँ तो मैं जैसे आश्वस्त हो गई कि मेरे पति का प्यार प्यार है, करुणा नहीं। बेटा गोद में आया तो परिवार की व्यस्तता में मेरा अन्तर एक नये अनिर्वचनीय सुख की अनुभूति से भर उठा। एक वर्ष बाद बेटी भी आ गई। तब समय ही नहीं मिलता था सोचने के लिए। कभी-कभी वे व्यंग्य करते, ‘अब तुम माँ हो, मेरी पत्नी नहीं। मेरी चिन्ता क्यों करोगी...?’

‘‘धत,’ मैं बेटी को उनकी गोद में डालकर उनके कन्धे दबा देती, पर न जाने कब और सुख के सात पर्दे चीर कर वह विकराल क्षण मेरे मस्तिष्क में कौंध-कौंध उठता और मैं...’’
वे एकाएक चुप हो गईं। वे मेरी ओर नहीं देख रही थीं। मैंने पाया, उनका सिर सोफे पर टिक गया है और वे कहीं बहुत दूर पहुँच गई हैं, जहाँ कोई किसी के अस्तित्व की चिन्ता नहीं करता। मैं भी तो उस क्षण महाशून्य में पहुँच गई थी क्योंकि मेरे भीतर भी वहीं तुमुलनाद छिड़ा था, पर मैं उसका आभास उनको नहीं होने देना चाह रही थी। इसलिए मैंने उन्हें अपने-आप से जूझने दिया और आँखें मूँद लीं। कोई तीसरा देखता तो पाता कि जैसे दर्द के प्रशान्त महासागर में डूबी दो पीड़ित आत्माएँ अपने पंख फड़फड़ाना भूल कर स्थिर हो गई हों...

लेकिन जिस आकस्मिकता से वे चुप हो गई थीं, उसी आकस्मिकता से मुझे स्तब्ध करती वे बोल उठीं, ‘‘मैं तुम्हें एक बात बताती हूँ, ...’’
वे फिर चुप हो गईं। मैंने पूछा, ‘‘आप कुछ कह रही थीं।’’

‘‘हाँ, अचानक एक दिन क्या हुआ ! मेरी बच्ची तब सत्तरह वर्ष की हो चुकी थी तब की बात है यह। उसने मुझसे पूछ लिया, ‘‘माँ, तुम्हें कभी अपने जीवन में ऐसा कुछ सहना पड़ा है जो कोई नारी नहीं सहना चाहती ?’

‘‘एक क्षण को लगा जैसे तीव्र भूकम्प का झटका हमसे टकरा कर निकल गया है, पर दूसरे ही क्षण मैं सँभल गई। मैंने अपने पति की ओर देखा। दृष्टि मिली। उसी क्षण हमने निर्णय कर लिया कि कुछ नहीं छिपाना है। मेरा बेटा भी वहीं था। मेरे पति ने धीरे-धीरे बड़े संयत स्वर में सब कुछ बता दिया। पूरी कहानी सुनने तक दोनों बच्चों ने दृष्टि नहीं उठाई। मेरे पति मौन हो गए तब भी एकाएक उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त की। कई क्षण लगे अपने को सहेजने में। वे स्तब्ध-ठहरे कुछ क्षण, मेरे लिए जैसे युगों की पीड़ा को साकार कर गए। कैसे हो जाते हैं वे क्षण जीवित, जो अतीत बन चुके हैं ! जीवन कभी उसी रूप में नहीं लौटता पर समय वैसे-का-वैसा आ खड़ा होता है सामने। समय मरता नहीं, बस बीतता है...

‘‘मैं न जाने कहाँ पहुँच गई थी कि मैंने अनुभव किया मेरी बेटी की सुकोमल पर स्वस्थ भुजाएँ मुझे आलिंगन में बाँध कर जैसे अपने में समेट लेना चाहती हों। उसने अपना चेहरा मेरे चेहरे से सटा दिया। बोली माँ की प्यार से पगी वाणी में, ‘माँ ! तुम्हारा तो इसमें कोई अपराध नहीं है। तुम कभी अपने को दोषी मत मानना ।’

‘‘मेरा बेटा किंचित् आवेश में आ गया था, बोल उठा, ‘सब कुछ बदलना होगा; सारे समाज की मानसिकता को बदलना होगा।’
‘‘पति-सन्तान से घिरी मुझे उस दिन अपने नारी होने पर गर्व हुआ। पुलक-पुलक उठी उस क्षण मैं। पति की ओर देखकर मैंने आँखें पोंछ लीं। जो अपने थे वे मुझे हिकारत की निगाह से नहीं देखते, उस आश्वासन से बड़ा सुख और क्या हो सकता है ! उसके बाद फिर किसी ने उस घटना की चर्चा नहीं की। आज तक नहीं की।’’

‘‘लेकिन, आपके भीतर वह घटना आज भी जीवित है। भूलने में विश्वास नहीं है शायद ?’’
‘‘वह विश्वास हमारे करने या न करने का मोहताज नहीं है।’’
‘‘हाँ, होता तो आप अपने से हिकारत क्यों करती होतीं ?’’
मैं जानती थी कि मैं अनजाने में क्रूर हो उठी हूँ, पर शायद वह होना अनिवार्य था। इसलिए एक क्षण कहीं दूर देखा उन्होंने, फिर बोलीं, ‘‘जानती हूँ बेटी ! तुम क्या कहना चाहती हो। वह ठीक भी है...समाज की वैसी मानसिकता क्यों बनी, संस्कार है क्या ? क्या ये ही संस्कार हमें हमारी दृष्टि में दोषी नहीं बना देते ? लेकिन जैसा मैंने कहा था, मेरा बेटा या कहूँ मेरे बाद की पीढ़ी इन्हीं संस्कारों से मुक्ति की बात नहीं कहती क्या ?’’

‘‘पर क्या मुक्ति मिल सकी ? मैं हूँ उस पीढ़ी की।’’
वह कहना चाहती थीं कि चाह उठी है तो मुक्ति क्यों न मिलेगी, पर मेरी दूसरी बात सुनकर ठिठक गईं। बोली, ‘‘तुम...तुम क्या कहना चाहती हो ?’’

‘‘यही कि मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है। कुछ इससे अलग। ऐसा कुछ जिस पर आप भी विश्वास नहीं करना चाहेंगी।’’
अचानक वातावरण में फिर से शीत लहर दौड़ गई हो। जैसे समन्दर की अशान्त लहरों में डूबती-उतरती नाव किनारे का आभास पाकर फिर मझधार में भटक जाए। उनकी भयानक आँखें मेरी आँखों से मिलीं मानो पूछती हों, तुम...तुम...भी क्या...?

मैंने तुरन्त उधर से दृष्टि घुमा ली। मेरे भीतर जमा देने वाली ठण्डक मुझे आहत कर रही थी और मेरे आकाश में बड़ी तेज़ी से उल्कापात हो रहा था। मुझे अपने को सहेजने के लिए जी-तोड़ कोशिश करनी पड़ी। समय लेने के लिए मैंने एक व्यर्थ का प्रश्न पूछ लिया, ‘‘क्या तुम सोच सकती हो कि मैं अब उनसे छिपकर कुछ करूँगी ? वे सब कुछ जानते हैं।’’
मैं सहसा कुछ न कह सकी। उन्होंने एक क्षण रूककर पूछा, ‘‘तुम अपनी बात कह रही थीं न ?’’

मैंने धीरे-धीरे कहा, कहीं दूर देखते हुए, ‘‘हाँ, अपनी बात कहूँगी मैं। इसीलिए तो यह भूमिका बाँधी थी। आज्ञा देंगी तो कल आऊँगी।’’
उन्होंने घड़ी की ओर देखा, ‘‘हाँ, चार बज गए हैं। पता ही नहीं चला। मैं चाय लाती हूँ। पीकर जाना और कल अवश्य आना....।’’


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