पुरइन-पात - अरुणेश नीरन, चितरंजन मिश्र Purain Paat - Hindi book by - Arunesh Niran, Chitranjan Mishra
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पुरइन-पात

अरुणेश नीरन, चितरंजन मिश्र

प्रकाशक : विश्वविद्यालय प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2002
पृष्ठ :197
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 7583
आईएसबीएन :81-7124-304-5

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भोजपुरी भाषा-साहित्य की बानगी ‘पुरइन पात’

Purain Pat - A Hindi Book - by Arunesh Niran, Chitranjan Mishra

अमवा के नाइँ बाबू बउरैं
महुअवा कुचलागैं
पुरइन-पात-अस पसरैं
कमल-अस बिहँसैं।

भोजपुरी साहित्य अपने ज्ञात इतिहास के शुरुआती दिनों से ही, गोरख-कबीर की बानी गवाह है कि अस्वीकार के साहस और प्रतिरोध की शक्ति से सम्पन्न रहा है। सबको साथ लेकर और सबके साथ होकर रहने-चलने के भोजपुरिया स्वभाव ने देश-भाषा के रूप में हिन्दी को आगे लाने के लिए निज भाषा भोजपुरी और उसके साहित्य को पीछे कर लेने में भी उसी साहस और शक्ति का परिचय दिया है।

खड़ी बोली हिन्दी को खड़ा करने में, भारतेन्दु से लेकर आज तक ‘पूरब के साकिनों’ की भूमिका बढ़ी और बढ़ी रही है, अनायास नहीं है कि आधुनिक युग के सबसे बड़े कवि-नाटककार प्रसाद, सबसे बड़े कथाकार प्रेमचंद और सबसे बड़े आलोचक रामचन्द्र शुक्ल भोजपुरी भाषा-भूगोल से आते हैं। तमाम जनपदीय भाषाओं की शक्ति ही हिन्दी की शक्ति बनी, लेकिन इस सिलसिले में उनकी अपनी पहचान कुछ इस कदर धुल-पुँछ भी गई कि जिसे ‘हिन्दी प्रदेश’ कहते हैं, हिन्दी ही उसकी एकमात्र भाषा मान ली गई। इस तरह भले ही वृहत्, लेकिन हिन्दी की एक प्रादेशिक छवि बन गई, उसकी राष्ट्रभाषिकता को तय करने में सबसे बड़ी बाधा बनकर। ऐसे में जरूरी हुआ कि प्रादेशिक भाषाएँ अपनी पहचान, अपनी साहित्य-शक्ति और संपन्नता को पुनः स्थापित करें ताकि हिन्दी की राष्ट्रीय छवि को अलग से न जताना पड़े, वह सहज ही प्रकट हो। इस जरूरत का अहसास भी भोजपुकी को सम्भवतः सबसे पहले और सबसे बढ़के हुआ। हिन्दी-हित में वह जिस उत्साह से मंच से बचने में लगी थी, हिन्दी-हित में उसी उत्साह से मंच को रचने में लगी है। इस उत्साह के अतिरेक के कुछ बहुत बउराह उदाहरण भी बेशक मिल सकते हैं, लेकिन वाचिक परम्परा के अपने समृद्ध साहित्य से लगकर और विलगकर भी, हिन्दी के जरिए विश्व साहित्य से जुड़कर और मुड़कर भी, और सबसे बढ़कर अपने अस्वीकार के साहस और प्रतिरोध की शक्ति से भोजपुरी भाषा-साहित्य ने इस दिशा में कुछ बहुत महत्त्वपूर्ण हासिल किया है, जिसकी बानगी के तौर पर यह ‘पुरइन पात’ प्रस्तुत है।

भोजपुरिया मन में पसरने की कल्पना ‘पुरइन पात’ की तरह है– जल में, जल पर, जल से परे, जल पर थल रचते हुए, ऐसा थल जिस पर जल की बूँदें आँसुओं की तरह ढुलक पड़ती हैं या नभ के तारे की तरह जगमगाती हैं।
सम्पादक-द्वय ने इस ऐसे पसरने के भोजपुरी मन को बड़े मन से सामने करने की कोशिश की है।

कविता-खण्ड

गोरखनाथ

1


अवधू जाप जपौं जपमाली चीन्हौं जाप जप्यां फल होई।
अजपा जाप जपीला गोरष, चीन्हत बिरला कोई।। टेक ।।
कँवल बदन काया करि कंचन, चेतनि करौ जपमाली।
अनेक जनम नां पातिंग छूटै, जपंत गोरष चवाली।।1।।
एक अषीरी एकंकार जपीला, सुंनि अस्थूल, दोइ वाणी।
प्यंड ब्रह्मांड समि तुलि व्यापीले, एक अषिरी हम गुरमुषि जाणी।।2।।
द्वै अषिरी दोई पष उधारीला, निराकार जापं जपियां।
जे जाप सकल सिष्टि उतपंनां, तेंजाप श्री गोरषनाथ कथियां।।3।।

2


पवनां रे तूँ जासी कौनैं बाटी।
जोगी अजपा जपै त्रिवेणी कै घाटी।। टेक ।।
चंदा गोटा टीका करिलै, सूरा करिलै पाटी।
गूंनी राजा लूगा धौवै, गंग जमुन की घाटी।।1।।
अरधैं उरधैं लाइलै कूँची, थिर होवै मन तहाँ थाकीले पवनां।
दसवां द्वार चीन्हिले, छूटै आवा गवनां।।2।।
भणत गोरषनाथ मछिंद्र ना पूता, जाति हमारी तेली।
पीड़ी गोटा काढ़ि लीया, पवन षलि दीयां ठैली।।3।।

3


गुर कीजै गहिला निगुरा न रहिला।
गुर बिन ग्यांन न पायला रै भाईला।।टेक।।
दूधैं धोया कोईला उजला न होईया।
कागा कंठै पहुप माल हंसला न भैला।।1।।
अभाजै सी रोटली कागा जाईला।
पूछौ म्हारा गुरु नै कहाँ सिषाईला।।2।।
उतर दिस आविला, पछिम दिस जाईला,
पूछौ म्हारा सतगुरु नै, तिहाँ बैसि षाइला।।3।।
चीटी केरा नेत्र मैं गज्येंद्र समाईला।
गावडी के मुष मै बाघला बिवाईला।।4।।
बाहें बरसैं बंझ ब्याई, हाथ पाव टूटा।
बदंत गोरखनाथ मछिंद्र ना पूता।।2।।

भरथरी

बारहमासा


चन्दन रगड़ो सोवासित हो, गूँथी फूल के हार।
इंगुर मँगियाँ भरइतों हो, सुभ के आसाढ़।।1।।
साँवन अति दुख पावन हो, दुःख सहलो नहिं जाय।
इहो दुख परे वोही कूबरी हो, जिन कन्त रखले लोभाय।।2।।

भादो रयनि भयावनि हो, गरजे मेह घहराय।
बिजुलि चमके जियरा ललचे हो, केकरा सरन उठ जाय।।3।।
कुआर कुसल नहिं पाओं हो, ना केऊ आवे ना जाय।
पतिया में लिख पठवों, दीन्हें कन्त के हाथ।।4।।

कातिक पूरनमासी हो सभ सखि गंगा नहायँ।
गंगा नहाय लट झूरवें हो, राधा मन पछतायँ।।5।।
अगहन ठाढ़ि अँगनवा हो, पहिरों तसरा का चीर।
इहो चीर भेजे मोर बलमुआ हो, जीए लाख बरीस।।6।।

पूसहिं पाला परि गैले हो, जाड़ा जोर बुझाय।
नव मन रुइया भरवलों हो, बिनु सैयाँ जाड़ न जाय।।7।।

माघहिं के सिव तेरस हो सिव बर होय तोहार।
फिरि-फिरि चितवों मंदिरवा हो बिन पिया भवन उदास।।8।।

फागुन पूरनमासी हो, सभ सखि खेलत फाग।
राधा के हाथ पिचकारी हो, भर-भर मारेली गुलाल।।9।।

चैत फूले बन टेसू हो, जब टुण्ड हहराय।
फूलत बेला गुलबवा हो, पिया बिनु मोहि न सोहाय।।10।।

बैसाखहि बसवाँ कटइतों हो, रच के बँगला छवाय।
ताहि में सोइतें बलमुआ हो, करितों अँचरवन बयार।।11।।

जेठ तपे मिरडहवा हो, बहे पवन हहाय।
‘भरथरी’ गावे ‘बारह-मासा’ हो, पूजे मन के आस।।12।।

कबीरदास

1


झीनी झीनी बीनी चदरिया।।
काहे कै ताना काहे कै भरनी, कौने तार से बीनी चदरिया।
इंगला पिंगला ताना भरनी, सुषमन तार से बीनी चदरिया।।
आठ कँवल दल चरखा डोलै, पाँच तत्त गुन तीनी चदरिया।
साईं को सियत मास दस लागे, ठोक ठोक के बीनी चदरिया।।
सो चादर सुन नर मुनि ओढ़ी, ओढ़ी के मैली कीनी चदरिया।
दास कबीर जतन से ओढ़ी, ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया।।

2


दुलहिनी अँगिया काहे ना धोवाई।
बालपने की मैली अँगिया, विषय दाग परि जाई।।
बिन धोये पिय रीझत नाहीं, सेज से देत गिराई।
सुमिरन ध्यान कै साबुन करि ले, सत्तनाह दरियाई।।
दुबिधा के बंद खोल बहुरिया, मन कै मैल धोवाई।
चेत करो तीनों पन बीते, अब तो गवन-नगिचाई।।
चालनहार द्वार हैं ठाढ़े अब काहे पछिताई।
कहत कबीर सुनो री बहुरिया, चित अंजन दे आई।।

3


सूतल रहलौं मैं नींद भरि हो, गुरु दिहलहुँ जगाइ।।
चरन कवँल कइ अंजन हो, नयना लिहलहुँ लगाइ।
जासे निंदियों ने आवे हो, नाहि मन अलसाइ।।
गुरू के बचन जिन सागर हो, चलु चलीं जा नहाइ।
जनम जनम केरा पपवा हो, छिन डारबि धोआइ।।
यहि तन के जग दियरा बनवलों, सुत बतिया लगाई।
पाँच तत्त्व के तेलवा चुअवलों, ब्रह्म अगिनि जगाई।।
सुमति गहनवाँ पहिरलों हो, कुमति दिहलों उतारि।
निर्गुन मँगवा सँवरलों हो, निरभय-सेनुरा लाइ।।
प्रेम के पिआला पिआइ के हो, गुरु देलें बउराइ।
बिरहा अगिनि तन तलफइ हो, जिय कछु न सुहाइ।।
उँचकी अटरिया चढ़ि बइठली हो, जहाँ काल न खाइ।
कहले कबीर विचारि के हो, जम देखि डेराइ।।

4


अपना पिया के में होइबों सोहागिन–अहे सजनी।
भइया तेजि सइयाँ सँगे लागाबि–रे की।।
सइयाँ के दुअरिया अनहद बाजा बाजे–अहे सजनी।
नाँचे ले सुरति सोहागिन–रे की।।
गंग जमुन केरा अवघट घटिया हो–अहे सजनी।
देइहहुँ सतगुरु सुरति क नइया हो–अहे सजनी।।
जोगिया दरसे देखे जाइब–रे की।
दास कबीर यह गवलें लगनियाँ हो–अहे सजनी।।
सतगुरु अलख लखावय–रे की।।

5


सैंया बुलावे मैं जैहों ससुरे, जल्दी से कहरा डोलिया कस रे।।
नैहर के सब लोग छूटत रे, कहा करूँ अब कछु नहिं बस रे।
बीरन आवो गरे तोरे लागों, फेर मिलब है न जानों बस रे।।
चालनहार भई मैं अचानक, रहौ बाबुल नगरी सुबस रे।
सात सहेली ता पै अकेली, संग नहीं कोउ एक न दस रे।।
गवना चला तुराव लगो हे, जो कोउ रौवे वाको न हँस रे।
कहै कबीर सुनो भाई साधो, सैंया के महल में बसहू सुजस रे।।

6


मन ना रँगाये रँगाये जोगी कपड़ा।
आसन मारि मन्दिर में बैठे, नाम छाड़ि पूजन लागे पथरा।।
कनवा फड़ाय जोगी जटवा बढ़ौले, दाढ़ी बढ़ाय जोगी होई गैले बकरा।
जंगल जाइ जोगी धुनिया रमौले, काम जराय जोगी होई गैले हिजरा।।
मथवा मुड़ाय जोगी कपरा रंगौले, गीता बाँचि के होई गैले लबरा।
कहहिं कबीर सुनो भाई साधो, जम दरवजवा बाँधल जेबै पकरा।।

7


मन भावेला भगति मिलिनिए के।
पांड़े ओझा सुकूल तिवारी, घंटा बाजे डोमिनिए के।।
गंगा के जल में सभे नहाला, पूत तरे जोलहिनिए के।
कहे कबीर सुनो भाई साधो, अइले बिमान गनिकवे के।।

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