कौस्तुभ भरा कोटर - मोहन थानवी Kaustubh Bhara Kotar - Hindi book by - Mohan Thanvi
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कौस्तुभ भरा कोटर

मोहन थानवी

प्रकाशक : विश्वास प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :39
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 7563
आईएसबीएन :00000000

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यूं भी, चिंता हुई तभी तो समुद्र मंथन से दैत्यों और देवताओं को ऐसा कुछ मिला, जो अमृत और जहर की प्रकृति एवं संज्ञा से विभूषित हुआ

Kaustubh Bhara Kotar - A Hindi Book - by Mohan Thanvi

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

दादा पोते के जमाने

तपती दुपहरी हो या छतों पर गुजरती रातें
दादे पोते को नींद नहीं आती
दादा बताता है अपने जमाने की बातें
पोता सुनाता है आज के हालात
कितने ही सालों का फर्क
गिनते हैं दोनों
नहीं मिलता सुखी दिनों का इतिहास
दोनों दुखियारों को
बहता रहता है लोगों की आंखों से नीर रक्तवर्णी
जैसे पहती है आंखें मां की
भाइयों का बिछड़ना देख कर
त्रस्त होती हैं कुशासन के अधीन जमीनी प्रजा रानी
तपती दुपहरी हो या छतों पर गुजरती रातें
दादे पोते को नींद नहीं आती
दादा बताता है अपने जमाने की बातें
पोता सुनाता है आज के हालात

कोटर के आंसू


पेड़ पर शाखाहीन होने लगा है
पत्ते तेज हवाओं से झड़ गए हैं
नभचरों ने बुन लिया है
फिर दूर कहीं एक नींड़
किसी हरेभरे बरगद की
घनी कौपलों के बीच
चील-कौओं से बचने के लिए
ठूंठ बनते जा रहे पेड़ के पास
तने से निकलते आंसुओं के सिवाय
कुछ नहीं बचा
आंसू भी निर्दयी लक़ड़हारा
गोंद समझकर ले जा रहा है

सूरज को हंसने दो


सूरज जब हंसता है
लगता है
फिर कोई बादल बरसने को है
रहमत का फरिश्ता आने को है
जो निजात दिलाएगा
चांद के टेढ़ेपन से
निजवाद और
आतंकवाद से
फिर जरूर कोई चिड़िया
चहकेगी
मेरे आंगन में
जो सूरज के कुपित होने पर
सूना हो गया था

प्यासा स्वार्थ


जगत पर कुएं की
प्यासा बैठा है
उसे डोलची की जरूरत है
जो नायक के पास रह गई
वह अश्वमेघ के लिए उसकी प्रतीक्षा किए बिना
अपने क्षेत्र में चला गया
जहां इन दिनों चुनावी समर जोरों पर है
जिसे उन दोनों ने अश्वमेघ नाम दिया
सूखे प्यासे होंठों पर जीभ फिराता
प्यासा कुएं में झांक रहा है
उसे भीतर दिखाई दे रहा है
स्वार्थी
अपना ही अक्स
जो नेता को वोट देने के बाद पछता रहा है
कुआं उसे सूखा लग रहा है
लोमड़ी की तरह
निराश है वह
चालाक प्यासा वोटर

तपने के बाद


पास बैठकर बता
देखता है इतनी दूर
सूरज बादलों में
हंसकर कह रहा है
तपता रह
मेरी तरह
एक दिन
फिर
छंट जाएंगे
दुखों के बादल

आधा चांद


आधा चांद चांदनी बिखेरता
वह बच्चा उसे देखता
बच्चा युवा हो गया
चांद अब भी आधा रहा
उसकी चांदनी वैसी शीतल
उतनी ही चंचल
मगर बच्चे की चंचलता
उसकी आभा
उसका उल्लास
न जाने कहां खो गया
वह उसे ढूंढ़ने में दिन गुजार देता
फिर किराये के मकान की छत पर
देखता चांद को
वह मुस्करा रहा होता
वैसे ही, जैसे उसके बचपन में मुस्कुराता था
वह अपनी डिग्रियां उठाए
छत के कोने में बैठ जाता
ट्रांजिस्टर पर खबरे सुनता
दूसरे दिन फिर नौकरी की तलाश में निकलता
अपने चांद-से मुन्ने को चूमता
उसे कहता
बेटा आधा चांद पूर्णिमा को पूरा दिखेगा
हमारी अमावस बस अब पूर्णिमा में बदलेगी
अबोध मुन्ना मुस्कुरा देता, बिना कुछ समझे
क्रम चलता रहा
मुन्ना अपने मुन्ने को
वही कह रहा है
जो कभी मैंने उसे कहा था


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