जूते का जोड़ गोभी का तोड़ - मृदुला गर्ग Joote Ka Jor Gobhi Ka Tor - Hindi book by - Mridula Garg
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जूते का जोड़ गोभी का तोड़

मृदुला गर्ग

प्रकाशक : पेंग्इन बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :259
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 7404
आईएसबीएन :0-14-310021-1

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इंसान की कमज़ोरी उसका अपना मन है, वही उसे लाचार बनाता है...

Joote Ka Jod Gobhi Ka Tod - A Hindi Book - by Mridula Garg

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

जूते का जोड़, गोभी का तोड़ में संकलित कहानियां पुरुष मन को समझने का एक प्रयास हैं। मृदुला गर्ग ने पुरुषों को आम ज़िंदगी से एक इंसान की तरह जूझते देखा है, न कि एक फ़ेमिनिस्ट के चश्मे से उन्हें सही-ग़लत के पैमाने पर तोलने की कोशिश की है। इंसान की कमज़ोरी उसका अपना मन है, वही उसे लाचार बनाता है। इन कहानियों में रोज़मर्रा की परेशानियों से जूझते, अपनी ही बनाई उलझनों में उलझते, हक़ीक़त से टकरा कर सपनों को टूटते हुए देखते ऐसे ही समाज की तस्वीरें हैं। कोमल मानवीय संवेदनाओं पर मृदुला गर्ग की गहरी पकड़ इस कहानी-संग्रह में परिलक्षित है। इन कहानियों की विशेषता यही है कि इन्हें पढ़ते हुए कभी अनायास होंठों पर मुस्कान खिंच जाती है, कभी मन सोच में डूब जाता है, तो कभी उदासी से घिर जाता है, मगर एक पल को भी पाठक को ये अपने मोहपाश से मुक्त नहीं होने देतीं।

क्षुधा-पूर्ति


उसका नाम होना चाहिए था भीम, पर था कन्हाई। वैसे ही उसे बड़ के पेड़ जैसे भारी-भरकम शरीर वाला होना चाहिए था, पर था वह ताड़ जैसा दुबला-पतला। बदन में जगह-जगह हड्डियां निकली हुई थीं, पसलियां उसकी गिनी जा सकती थीं, गाल अंदर धंसे हुए थे और पिचके चेहरे पर चिपकी आंखें बड़ी और भूखी दिखाई देती थीं। उसे देख कर लोग आसानी से कह सकते थे, इस आदमी ने दो दिन से भरपेट खाना नहीं खाया। वे ग़लत नहीं कहते। उसके लिए भरपेट खा पाना असंभव था, क्योंकि चाहे वह जितना खा ले, उसका पेट नहीं भरता था।
उसका नाम चाहे जो रहा हो, बचपन से उसे पेटू कह कर पुकारा जाता था। मां-बाप, भाई-बहन, यार-दोस्त सब उसे इसी नाम से जानते थे।

अपने छह भाई-बहनों के लिए वह एक ख़ौफ़ानाक जानवर की तरह था। उनके मन में हमेशा यह डर बना रहता था कि कहीं पेटू के लिए पहले खाना न परोस दिया जाए, वरना उन्हें भूखा रहना पड़ेगा। उसकी मां भी इस बात को अच्छी तरह समझती थी और इसीलिए सबके खा चुकने पर उसके लिए खाना परोसा करती थी। और तब तक... जब वह औरों को खाते हुए देखता... उसके बदन का रेशा-रेशा खाने के लिए तरसता रहता। उसकी खुली आंखों में सपने आने लगते।

...एक बहुत ऊंचा पहाड़ है–भात का। ऊंचा और सफ़ेद... आह, कैसे मोटे-मोटे दाने हैं चावलों के ! कैसी सोंधी बास उठ रही है हर तरफ़ से ! मुंह में पानी के बुलबुले उठ रहे हैं, कितना भीतर सुड़के... पानी है कि होठों से बाहर बहा जा रहा है। वह दबे पांव पहाड़ की तरफ बढ़ रहा है। चोर नज़रों से इधर-उधर देख लेता है। कोई देख तो नहीं रहा। नहीं, कहीं कोई नहीं है। भात का ऊंचा पहाड़ और दूर-दूर तक एक भी पहरेदार नहीं। कैसा वरदान है, किसी प्रतापी देवता के प्रसाद जैसा। फिर भी वह चौकन्ना हो कर आगे बढ़ रहा है। दौड़ता हुआ जाए तो कहीं कोई सोते से जग कर उसे पकड़ न ले। आख़िर वह पहुंच गया पहाड़ के पास। मुंह आगे बढ़ा कर भात खाना शुरू कर दिया और खाता गया, खाता गया पहाड़ में सुरंग बनाता हुआ, किसी चालाक घूस की तरह। कैसी शुभ घड़ी है यह ! वह जितना चाहे खा ले, कोई मना करने वाला नहीं है। भात का पहाड़ उसका है। अकेले उसका। किसी की साझेदारी नहीं है। जब तक वह चाहे खाता रहे.... जब तक... जब तक...। सपने में वह घड़ी कभी न आती थी जब वह खाना ख़त्म करके तृप्ति की डकार लेता। सपना जब भी टूटता, वह चाव से खा रहा होता। सपने में भी उसने कभी भरपेट नहीं खाया।

शुरु-शुरू में जब वह छोटा था, मां उसके पेटूपन पर तरस खा कर उसे और भाई-बहनों की निस्बत दो-एक रोटी ज्यादा दिया करती थी। बहुत जल्दी उसकी समझ में आ गया कि दो रोटी ज़्यादा खा कर भी वह उतनी ही भूखी नज़रों से उसे ताकता है जितना दो रोटी कम खाने पर। जब उसकी तसल्ली होना ही नहीं थी तो मां फ़िज़ूल रोटियाँ बर्बाद क्यों करती ? रोटियों का जुगाड़ उसके लिए इतना आसान नहीं था। उसने कड़ा हिसाब रखना शुरू कर दिया था। अब सबके हिस्से में बराबर रोटी आती थी। हां. इतना ज़रूर होता था कि सबके निबट जाने पर, उसे खिला कर जब मां ख़ुद खाने बैठती और उसे भूखी नज़रों से अपनी तरफ़ ताकता पाती तो झल्ला कर, कभी-कभी अपनी रोटी उसके हाथ पर दे मारती।

जिस दिन रोटी की जगह भात पकता उस दिन और मुसीबत हो जाती। उसका सपना टूटने में ही नहीं आता। वह आंखे खोलने से इंकार कर देता। आंखें मूंदे-मूंदे पके चावल की मीठी गंध से ललचा कर आगे बढ़ता और थाली हाथ में लेकर खड़े-खड़े कौर निगलने लगता। दरअसल वह भात के पहाड़ के अंदर होता, उसका मुंह तेज़ी से चल रहा होता और सुरंग के चौड़ा होते जाने पर भी सफ़ेद दानों का अटाटूट ढेर कम होने में नहीं आता। पर...बिजली का झटका खा कर वह आंखें खोल लेता। ख़ाली थाली उसके हाथ से छूट जाती। मां का सख़्त चेहरा सामने तन जाता... कहां गया भात का पहाड़ ?
‘थोड़ा भात और दे’, उसके मुंह से निकल पड़ता और मां एक ज़बरदस्त दोहत्थड़ उसके सिर पर जमा देती। ‘मर पेटू’ वह कोस उठती, ‘मर पेटू !’

भाई-बहन तालियां बजा कर उसके चारों तरफ नाच कर कहते, ‘मर पेटू ! मर पेटू !’
‘पेटू मांगे भात ! खाए दो लात !’
‘पेटू खाए दो लात ! फिर कभी न मांगे भात !’
पेटू बेचारा ज़ार-ज़ार रो देता। भाई-बहनों के चिढ़ाने की वजह से नहीं, पहाड़ के ग़ायब हो जाने के कारण।
काश, किसी दिन वह पूरा पहाड़ निगल कर एक ज़बरदस्त डकार ले सके। काश, एक दिन ऐसा आए कि वह महसूस कर सके कि उसने पेट भर कर खाया है। जब वह दिन आया... उसे अच्छी तरह याद है... यह वह दिन था, जब वह घर छोड़ कर भाग निकला था।

दिन ढल रहा था। शाम की रंगत चावलों के मांड जैसी हो रही थी। खोली के भीतर से भी वह खुशबू उठ रही थी। उस दिन घर में भात पका था। खाना मांगने से पहले, सबको काम पर गए बाप के लौट आने का इंतज़ार था, पर भात की ख़ुशबू किसी बंदिश को नहीं मान रही थी। मन मसोस कर वह बार-बार यही सोच रहा था कि उसकी बारी सबके खाने के बाद आएगी। तभी एक अनहोनी घट गई।

मां भात की ठसाठस भरी हांडी खोली में छोड़ कर बाहर निकल गई। उनकी खोली से दो खोली छोड़ कर रहने वाली औरत बच्चा जन रही थी। उन खोलियों में रहने वाली सभी औरतें मौक़ा आने पर बच्चा जनवाने का काम बखूबी कर लेती थीं। जो पहले पहुंच जाती, वही अठन्नी-रुपया झटक लेती। मां नहीं चाहती थी कि पड़ोसन किसी दूसरे के हाथों में पड़े, इसलिए दौड़ी चली गई थी। अगर खोली में पेटू अकेला रहा होता तो उस वक़्त भी मां उसे बाहर खदेड़ कर खोली बंद कर देती। पर उसकी दो बड़ी बहनें वहीं मौजूद थीं। संयोग कुछ ऐसा हुआ कि कुछ देर की कानाफूसी के बाद, वे दोनों बहनें खिड़की से झांक कर तमाशा देखने चली गईं। और वह खोली में अकेला रह गया। एक तरफ वह और दूसरी तरफ भात से ठसाठस भरी हांडी।

कुछ देर वह आंखें बंद किए बैठा रहा। ताज़े पके भात की ललचाती गंध को नथुनों के ज़रिए भीतर खींच कर ख़ुश होता रहा। फिर धीरे-धीरे... सच कहा जाए तो उसे पता भी नहीं चला... कब, वह उठा, खोली का दरवाज़ा ढुकाया, अंदर से खड़का गिराया और खेत में सेंध लगाने वाली घूस की तरह आहिस्ता-आहिस्ता सरकता हुआ हांडी के पास पहुंच गया। फिर वह था और भात के पहाड़ के बीचोंबीच खुदी सुरंग। आंखें बंद किए वह चारों तरफ़ मुंह मारने लगा। आंखें बंद रखो तो पहाड़ की ऊंचाई बढ़ जाया करती है। झटके के साथ उसकी आंखें खुलीं। उसने हांडी को इधर-उधर टटोला पर भात का और दाना उसका हाथ नहीं आया। भूचाल बिना पहाड़ नीचे धंस गया। उसने देखा और सुना... सामने चावल की हांडी ख़ाली पड़ी है, बाहर कई जोड़ी हाथ एक साथ खोली का दरवाज़ा पीट रहे हैं।
वह समझ गया, कुछ ही देर में वे हाथ उसकी पीठ पर पड़ने वाले हैं, फिर भी... वह तृप्त डकार के साथ उसने उठ कर दरवाज़ा खोल दिया।

मां भागती हुई भीतर घुसी और सीधी हांडी के पास जा पहुंची। ख़ाली हांडी देख कर वह हलाल होते बकरे की तरह चीख़ी और दूसरे क्षण, उसने चूल्हे से खींच कर लकड़ी बाहर निकाल ली। दोनों बड़े भाइयों ने उछल कर उसे आ दबोचा और औंधा करके ज़मीन पर बिछा दिया। फुफकारती हुई मां आगे बढ़ी और... छोटे भाई-बहन स्तब्ध खड़े देखते रहे... किसी ने आवाज़ नहीं की... ‘मर पेटू-मर पेटू’ कह कर कोई नहीं नाचा... मां ने मुंह से गाली नहीं निकाली... बड़े भाई चुप बने रहे... खोली में मौत का सन्नाटा छा गया। बस, मां की सांस ज़ोर-ज़ोर से चलती रही, और चूल्हे की लकड़ी उसके बदन को धुनती रही।



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