शोधयात्रा - अरुण साधू Shodh Yatra - Hindi book by - Arun Sadhu
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शोधयात्रा

अरुण साधू

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 1995
पृष्ठ :420
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 738
आईएसबीएन :00000

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इस उपन्यास में वर्तमान में जी रहे भारतीय समाज के विभिन्न रूपों का चित्रांकन है...

Shodhyatra

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

मराठी के प्रसिद्ध उपन्यासकार अरूण साधू के इस उपन्यास में वर्तमान में जी रहे भारतीय समाज के विभिन्न रूपों का चित्रांकन है। कथाकार ने उन तथ्यों को उजागर करने का सुन्दर प्रयास किया है जो किसी समाज को विकृत करने में सीधे उत्तरदायी होते हैं। जीवन का आखिर लक्ष्य क्या है-धनोपार्जन ? प्रतिष्ठा और यशोलाभ ? सांसारिक भोग ?...या फिर समाज-सेवा अथवा तथाकथित आध्यात्मिक क्रियाओं द्वारा अदृष्ट का साक्षात्कार इन्हीं सम्भ्रावस्थाओं में उलझा उपन्यास का नायक जीवन के जिस किसी पक्ष को अपनाता है, बाद में वही अव्यावहारिक लगने लगता है। ऐसा क्यों...शायद शुद्ध चारित्रिकता का अभाव, संस्कारहीनता और असावधानता-ये ही अथवा ऐसे ही कुछ कारण हैं जिनसे व्यक्ति की यह जीवन-यात्रा सार्थक नहीं बन पाती। अपने शिल्प और कथा-संवेदना के कारण हिन्दी पाठकों को यह कृति अत्यन्त रोचक तो लगेगी ही, इसके माध्यम से वह उक्त चिन्तन की मनोभूमि में अपना भी कुछ जोड़ देना चाहेंगे।

शोधयात्रा

एक

मन की सम्भ्रमावस्था में उलझा हुआ व्यक्ति अनिश्चितता की चरम सीमा पर पहुँचने पर कभी-कभी जाने-अनजाने झट से कुछ महत्त्वपूर्ण निर्णय कर लेता है। अपने दफ़्तर के वातानुकूलित कक्ष में बेचैनी से चहलक़दमी करते हुए श्रीधर ने भी अचानक एक निर्णय ले लिया- शायद यह जाने बगैर कि वह क्या कर रहा था। क्षण-भर के लिए वह दरवाज़े पर रुक गया और पीछे मुड़कर उसने अपने कमरे को एक बार अच्छी तरह देख लिया। उसके वैभव की, तेज़ और सफल कैरियर की सम्पन्नता और संयतता की साफ़-साफ़ झलक उसमें दिखाई पड़ रही थी। विशाल पॉलिश्ड टेबल, साथ में चार फ़ोन, पिछली तरफ़ बारहवीं सदी के यक्षिणी का बहुमूल्य शिल्प, दीवार पर आरा का कैनवास, ज़मीन पर बिछाया हुआ क़ीमती क़ालीन, साथ में रखा मोटे फोमवाला नर्म सोफ़ा और कमरे के दूसरे छोर पर रखे टेबल और कुर्सियाँ और कमरे के एक सिरे से दूसरे सिरे तक की काँच की खिड़की से नज़र आता समुन्दर, मैरीन ड्राइव की यातायत और मलबार हिल पर बड़ी शान से से खड़ी ऊँची-ऊँची इमारतें। वह कमरा देश के औद्योगिक और आर्थिक स्पर्धा में वरिष्ठ अधिकारी का कमरा था। सफलता, सम्पन्नता और सत्ता की छाप उस कमरे पर थी और उज्ज्वल भविष्य के बारे में पूरा आत्मविश्वास भी।
क्षण-भर के लिए श्रीधर अपने कमरे को देखता रहा।

 उसकी निजी सचिव लोर्ना ने उसके टेबल के बीचोंबीच एक छोटी-सी फाइल रखी थी। वह फाइल उसकी विशाल कम्पनी के सर्वोच्च पद की कुँजी थी। खुद के बारे में शंका-कुशंकाओं से भरी टिप्पणियों के उसके लिखे और बाद में फाड़कर टोकरी में डाले हुए कागज़ वहाँ थे। वह सब श्रीधर ने क्षण-भर में अपनी आँखों में भर लिया और कमरे का दरवाज़ा झटके से खोलकर वह बाहर निकला, वापस कभी न लौटने के लिए।

श्रीधर जो कह रहा था उइसके बारे में सोचना नहीं चाहता था। ऐसा भी नहीं कि वह सम्भ्रमित था। केवल आठ-दस वर्षो की छोटी-सी अवधि में अपने व्यवसाय के सर्वोच्च बिन्दु की तरफ़ बढ़नेवाले श्रीधर की जो प्रतिमा थी वह एक आत्मविश्वास से परिपूर्ण, पल-भर में महत्त्वपूर्ण निर्णय करने की क्षमता रखनेवाले युवा, धैर्यवान और कठोर अधिकारी की थी। उसी दफ़्तर में किसी ने श्रीधर को आशंकित और दुविधाग्रस्त इनसान के रूप में भी नहीं देखा था। लेकिन पिछला आधा घण्टा....मात्र आधा घण्टा। उन तीस मिनटों में जैसे उसके पूरे-जीवन-भर की समान्तर बेचैनी एकाएक तीव्रता से उफन कर ऊपर उठ आयी थी। मन में दबाकर रखी हुई अस्वस्थता का जैसे विस्फोट हुआ था।
दरअसल, सवेरे जब अपनी कम्पनी से मिल आलीशान फ्लैट में उनकी आँख खुली थी तब उसके मानस-पटल पर इस बेचैनी का नामोनिशान नहीं था। नौकर ने जब उसका नाश्ता खाने की मेज़ पर लगाया था तो उसी वक़्त श्रीधर की अपेक्षानुसार उसकी कम्पनी के चेयरमैन का दिल्ली से फ़ोन आया था।
‘‘श्रीधर ?’’

‘‘गुड मॉर्निंग सर !’’
‘‘वेल डन श्रीधर। तुम्हारी ब्रीफ की वजह से हमारा काम हो गया समझ लो। कल रात ही वित्तमंत्री से बात हो गयी।’’
‘‘कौन-सा काम, सर ? वित्त मंत्री के साथ हमारे तीन काम हैं........’’
सारी दुनिया जानती थी कि श्रीधर जिस स्वर में उसकी निजी सचिव लोर्ना से बात करता है, उसी स्वर में चेयरमैन से भी बोलता है। और शायद वित्तमंत्री के साथ भी श्रीधर उसी लहजे में बोलेगा, इस आशंका ने उसके चेयरमैन की कई रातों की नींद उड़ायी थी। लेकिन अपनी ईमानदारी और कठोरता के लिए मशहूर मंत्री महोदय को शायद श्रीधर का साफ़-सीधा अन्दाज़ भा गया था।
‘‘तीनों काम.....’’ चेयरमैन के आवाज़ में खुशी टपक रही थी।
‘‘जापानी सहकार्य भी ?’’
‘‘ऑफकोर्स।’’
‘‘बधाई हो !’’

‘‘नहीं श्रीधर। बधाई तो मुझे देनी चाहिए तुमको। यह सब तुम्हारे ब्रीफ का कमाल है !’’
‘‘धन्यवाद !’’
श्रीधर के सहज खुलेपन से चेयरमैन क्षण-भर के लिए दंग रह गये। लेकिन उसी समय उनका मन प्रशंसा से भर गया। इसी खुली निडरता ने श्रीधर को इतनी कामयाबी दी थी।
‘‘अच्छा। अब सुनो श्रीधर, हमारा लाइसेन्स लगभग साढ़े तीन सौ करोड़ का है। तुम जानते हो ह्लाट इट इन्व्हाल्वज। फार्च्युनेटली, यह वित्तमंत्री कुछ अलग तरह का बन्दा है। इसीलिए कुछ खास प्रॉब्लम तो होगी ही नहीं। लेकिन मुझे तुम्हें बताने की आवश्यकता नहीं है......अन्य अफसर हैं। उसके अलावा इण्डस्ट्रीज़ और कॉमर्स मिनिस्ट्री के लोग हैं....।’’
‘‘आइ नो सर....आज मैं रात की फ़्लाइट से वहाँ पहुँच जाता हूँ। हम बैठकर सब तय कर डालते हैं.....’’
‘‘ठीक है, साथ में खन्ना वाली फाइल भी ले आना।’’
‘‘क्यों सर ?’’

‘‘जानते हो श्रीधर, तुम हमारी इतनी बड़ी कम्पनी के यंग मैनजिंग डायरेक्टर बनानेवाले हो।’’
‘‘लेकिन सर, वह तो बाद में देखा जा सकता है.....’’
‘‘नहीं, वह भी अभी होगा। आज तुम वह फाइल लेकर ही आना। सब तुम पर निर्भर करता है। खन्ना को जल्दी से जल्दी निकालना है। बहुत परेशान किया है उसने।’’
‘‘ओ के....ओ के....’’ क्षण-भर के लिए रुककर श्रीधर  ने पूछा, ‘‘वित्तमंत्रालय से कुछ और खबर ?’’
चेयरमैन हँस पड़े। ‘‘बदल रहा है। सब कुछ बदल रहा है....छापे आदि दुबारा शुरू होने की गुंजाइश नहीं है। पूरे देश की राजनीति में परिवर्तन आ रहा है.........’’

चेयरमैन बहुत खुश लग रहे थे। राजनीति में उनका सक्रिय सहभाग था इसीलिए वह खन्ना से पीछा छुड़ाना चाहते थे। श्रीधर के दिन की शुरूआत इस खुशखबरी से हुई थी। पिछले सात-आठ सालों से सफलता का भूत उसके सिर पर सवार था। सफलता......सफलता.......और सफलता ! सत्ता, सामर्थ्य, सम्पत्ति, महत्त्वाकांक्षा उसे खींचकर आगे ले जा रहे थे। आठ वर्ष पहले उसने अपने कैरियर की शुरूआत ‘आर्थिक सलाहकार’ की हैसियत से की थी अब उसकी बुद्धिमत्ता, कल्पनाशक्ति और कार्य-प्रवणता ने उसे उस बड़ी कम्पनी के सर्वोच्च स्थान के क़रीब पहुँचा दिया था। कामयाबी के इस एहसास ने ही शायद उस बेचैनी का छोटा-सा बीज उसके मन में डाल दिया था और फिर वही हुआ जो क्षितिज पर दाखिल हुए बादल के एक छोटे-से टुकड़े के घनघोर घटा का रूप धारण करने पर होता है। जब वह सफलता के नये चौखट पर खड़ा था, उसके मन-मस्तिष्क में छिपे सभी सनातन प्रश्न उमड़-घुमड़ कर उसे सताने लगे।

फ़ोन नीचे रखकर श्रीधर ने बायीं तरफ रखें अखबारों के प्रमुख समाचार देखे। पंजाब में कल के दिन और आठ हत्याएं हुई थीं। देश न जाने किस तरफ़ जा रहा था ! हरियाणा में कम्पनी का एक और कारखाना लगाने की बात लगभग निश्चित हो रही थी। उसके बारे में पुनर्विचार करने के सन्दर्भ में एक बात श्रीधर ने मन-ही-मन सोच ली और वह उठ खड़ा हुआ। बाथरूम से जब वह बाहर निकला, तो हमेशा की तरह लोर्ना का फो़न आ गया।
‘‘गुड मॉर्निंग लोर्ना, रात की दिल्ली की फ़्लाइट बुक कर लेना।’’
‘‘यस सर.....एक या दो ?’’
‘‘एक ही।’’ उसे महसूस हुआ कि उस तरफ़ ज्यादा लोर्ना नाराज़ हो गयी है। अनायास उसने कह दिया, ‘‘ज़्यादा वक़्त नहीं है। कल ही वापस लौटना है।’’
‘‘यस सर.....डायरी बता दूँ ?’’

‘‘हाँ ।’’
लोर्ना डायरी की एक कापी घर ले जाया करती थी। ‘‘साढ़े नौ बजे प्रोडक्शन टीम, दस बजे एकाउण्ट्स मैनेज़र, दस-पचास पर मार्केटिंग मैनेज़र, सवा ग्यारह बजे नायजेरीयन टीम और एक बजे ओबेराय में  इकोलॉजी प्रोटेक्शन वाले श्री ग्रोवर।’’
‘‘हे भगवान्, यह ‘इकोनट’ आज कहाँ से आ टपका ?’’
‘‘सर, उन्होंने हमारे साधुगढ़ स्कीम के विरोध में हाईकोर्ट में अपील करने की धमकी दी है।’’
‘‘बास्टर्ड....पैरासाइट....लोर्ना, अगर तुम्हारे पास थोड़ा जहर हो तो लेती आना, उसे घोलकर पिला दूँगा।’’
लोर्ना हँस दी और उसने दोपहर की गतिविधियाँ पढ़कर सुनायीं। श्रीधर का आधे से ज़्यादा काम वह ही किया करती थी। वैसे उसके फ़ोन से ज़्यादातर खुश होनेवाला श्रीधर आज कुछ बेचैन-सा हो गया था। बूँद-बूँद से उसकी अस्वस्थता बढ़ती जा रही थी।

‘‘हे भगवान् ! आज तो लगता है साँस तक लेने की फुर्सत नहीं मिलेगी,’’ डायरी सुन लेने के बाद श्रीधर  ने कहा।
‘‘फिर भी मैंने राज्य के वित्तमंत्री से मुलाक़ात के लिए समय बदलकर माँगा है’’
‘‘फ़ाइन ! थैंक्यू, एक बात और। तोक्यो से अगर टेलेक्स आता है तो मुझे फ़ौरन मशीनरूम में बुला लेना। चाहे मैं किसी भी मीटिंग में रहूँ। शायद ग्यारह से पहले ही आ सकता है।’’
‘‘यस सर !’’
‘‘कुछ और ?’’ उसकी आवाज़ से श्रीधर भँप गया था कि वह कुछ और भी कहना चाहती है। उसकी साँस के हर उतार-चढ़ाव को वह अच्छी तरह जानता था। लोर्ना कुछ क्षण चुप रही।
‘‘कहो ना ?’’

‘‘मुझे कुछ बात करनी थी।’’
‘‘कुछ खास ?’’
‘‘सिर्फ़ पन्द्रह मिनट......लेकिन आज की आपकी व्यस्तता देखकर लगता है कि शायद यह संभव नहीं होगा।’’
‘‘असम्भव कुछ भी नहीं होता....’’ श्रीधर ने कहा। लोर्ना के लिए आधा घण्टा निकालना उतना मुश्किल तो नहीं था। थोड़ा-सा सोचकर उसने कहा, ‘‘ऐसा करते हैं, शाम की मीटिंग के फौ़रन बाद तुम मेरे साथ चलना। एयरपोर्ट जाने से पहले बात कर लेते हैं, ठीक है ?’’
‘‘ठीक है सर !’’

श्रीधर ने फ़ोन रख दिया। फ़ोन रखने के बाद उसे लगा कि इस तरह अचानक उसे बात खत्म नहीं करनी चाहिए थी। उससे पूछ लेना चाहिए था कि वह किस विषय में बात करना चाहती है। हो सकता है, कुछ बहुत महत्त्वपूर्ण बात हो। ज़रूर कोई, बहुत बड़ी बात होगी, नहीं तो वह आज के दिन को देखकर उसका जि़क्र नहीं करती। क्या कहना चाहती होगी वह ? बेचैनी की एक और विषैली बूँद उसके मन पर गिरी। श्रीधर ने कपड़े निकाले। जूते पहने, ब्रीफ़केस बन्द किया और ड्राइवर को सौंप दिया।

ड्राइवर गाड़ी चला रहा था और श्रीधर अखबार पढ़ रहा था। देश के किसी दूर के कोने में अपने किसी उद्योग की पुनर्रचना करते हुए किसी ने अपने कर्माचारियों को बड़ी संख्या में नौकरी से हटा दिया था। उनमें से दो परिवारों ने आत्महत्या की थी और अन्य पाँच सौ कर्मचारी बंबई में मोर्चा साधने वाले थे। एक और कर्मचारी ने व्यवस्थापकीय संचालक के घर के सामने आत्मदहन करने की धमकी दी थी। इन सब मामले के लिए श्रीधर का अफसर जिम्मेवार बताया गया था।
यह पढ़कर श्रीधर हँस पड़ा। लेकिन अखबार के कोने में छपी खबर से उसके ठण्डे दिमाग़ को बेचैनी ने एक बार छू लिया। एक सुन्दर, युवा हवाईसुन्दरी ने उपनगर के किसी होटल की बारहवीं मंज़िल से कूदकर आत्महत्या की थी। श्रीधर ने अखबार बन्द किया।
जब वह दफ़्तर पहुँचा तो लोर्ना ने बताया कि शशी का अभी-अभी फ़ोन आया था। उसने श्रीधर को उसे फोन करने के लिए कहा था। यह तो चौंका देनेवाली बात थी। पिछले चार-पाँच सालों में शायद पहली बार शशी ने उसे अपनी तरफ से फ़ोन किया था।

     


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