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ओशो साहित्य >> संभोग से समाधि की ओर

संभोग से समाधि की ओर

ओशो

प्रकाशक : डायमंड पब्लिकेशन्स प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :440
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 7286
आईएसबीएन :9788171822126

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संभोग से समाधि की ओर...


छोटे बच्चे से लेकर मरते हुए बूढ़े तक की सेक्स से लड़ाई चल रही है। और जिससे हम लड़ते हैं वही हमारे भीतर घाव की तरह हो जाता है।
कोरिया में दो फकीर हुए हैं, मैंने उनके जीवन के बारे में पढ़ा था। दो भिक्षु एक दिन शाम अपने आश्रम वापस लौट रहे हैं। उनमें एक बूढ़ा भिक्षु है, एक युवा भिक्षु है। आश्रम के पहले ही एक छोटी-सी पहाड़ी नदी पड़ती है। सांझ हो गयी है, सूरज ढल रहा है। एक युवती खड़ी है उसी नदी के किनारे। उसे भी नदी पार होना है। लेकिन वह डरती हे, क्योंकि नदी अनजान है, परिचित नहीं है; पता नहीं, कितनी गहरी हो? इसलिए भयभीत है।
वह बूढ़ा भिक्षु आगे-आगे जा रहा है। उसको भी समझ मे पड़ गया है कि वह स्त्री पार होने के लिए शायद किसी का सहारा चाहती है। बूढे भिक्षु का मन हुआ है कि हाथ से सहारा देकर उसे नदी पार करवा दे। लेकिन हाथ का सहारा देने का खयाल भर ही उसे आया है कि भीतर वर्षों से दबी हुई वासना, एकदम खड़ी हो गयी है। युवती के हाथ को छूने की कल्पना से उसके भीतर, जैसे उसकी नस-नस में, रग-रग में बिजली दौड़ गयी है। तीस वर्ष से स्त्री को नहीं छुआ है उसने। और अभी तो सिर्फ छूने का खयाल ही आया है उसे, कि युवती को हाथ का सहारा दे दे, लेकिन सारे प्राण कंप गए हैं उसके। एक तरफ के बुखार ने उसके सारे व्यक्तित्व को घेर लिया है। तत्काल अपने मन को समझाया उसने कि, ''यह कैसी गंदी बात सोची, कैसे पाप की बात सोची! मुझे क्या मतलब है? कोई नदी पार हो या न हो, मुझे क्या प्रयोजन है? मैं अपना जीवन क्यों बिगाडूं, अपनी साधना क्यों बिगाडूं? इतनी कीमती साधना, तीस वर्ष की साधना, इस लड़की पर लगा दूं...।''
बड़ी बहुमूल्य साधना चल रही थी; और ऐसी ही बहुमूल्य साधना के सहारे मोक्ष तक पहुंचना चाहते हैं!
ऐसी ही कीमती और मजबूत साधना के पुण्य पर चढ़कर लोग परमात्मा की यात्रा करना चाहते हैं!
...आंख बंद कर ली थी उसने, लेकिन वह स्त्री तो आंख बंद करने पर भी दिखायी पड़ने लगी; बहुत जोर से दिखाई पड़ने लगी। क्योंकि मन जाग गया था; सोयी हुई वासना जाग गयी थी। आंख बंद करके ही वह नदी में उतरा...।
अब यह आपको पता होगा कि जिस चीज से आंख बंद कर ली जाए वह उतनी सुंदर कभी नहीं होती, जितनी आंख बंद होने पर होती है। आंख बंद करने से वह ज्यादा सुंदर प्रतीत होती है।
आंख बंद की उसने और वह स्त्री अप्सरा हो गयी...! 

अप्सराएं इसी तरह पैदा होती हैं। बंद आंख से वे पैदा हो जाती हैं।
दुनिया में सिर्फ स्त्रियां हैं, आंख बंद करो कि वे ही अप्सराएं हो जाती हैं। अप्सराएं कहीं भी नहीं हैं; लेकिन आंख बंद होते ही स्त्री अप्सरा हो जाता है। मन में एकदम से कामुकता पैदा हो जाती है; फूल खिल जाते हैं; चांदनी फैल जाती है। एक ऐसी सुगंध फैल जाती है मन में, जो स्त्री में कहीं भी नहीं है; जो सिर्फ आदमी की काम-वासना के सपने में होती है। आंख बंद करते ही सपना शुरू हो जाता है।

...अब वह भिक्षु उस स्त्री को देख रहा है। अब एक ड्रीम, एक सपना शुरू हो गया है। अब वह स्त्री उसे बुला रही है। उसका मन कभी कहता है कि यह तो बड़ी बुरी बात है कि किसी असहाय स्त्री को सहारा न दो। फिर तत्काल उसका दूसरा मन कहता है कि यह सब बेईमानी है, अपने को धोखा देने की तरकीब कर रहे हो। यह सेवा वगैरह नहीं है, तुम स्त्री को छूना चाहते हो...।
बड़ी मुश्किल है स्त्री। साधुओं की बड़ी मुश्किल होती है। काम है भीतर, तनाव है भीतर। सारा प्राण पीछे लौट जाना चाहता है, और वह दमन करने वाला मन आगे चले आना चाहता है।
नदी के छोटे-से घाट पर वह आदमी भीतर दो हिस्सों में बंट गया है; एक हिस्सा आगे जा रहा है, एक हिस्सा पीछे जा रहा है। उसकी अशांति, उसकी टेंशन, उसकी तकलीफ, भारी हो गयी है। आधा हिस्सा इस तरफ जा रहा है, आधा हिस्सा उस तरफ जा रहा है। किसी तरह खीच-तान कर वह पार हुआ है। आंख खोलकर देखना चाहता है, लेकिन बहुत डरा हुआ है। भगवान का नाम लेता है, जोर-जोर से भगवान का नाम लेता है-नमो बुद्धाय नमो बुद्धाय...।
भगवान का नाम आदमी जब भी जोर-जोर से ले, तब समझ लेना कि भीतर कुछ गड़बड़ है। भीतर की गड़बड़ को दबाने के लिए आदमी जोर-जोर से भगवान का नाम लेता है।
आदमी को ठंड लग रही है, नदी में नहाते वक्त तो 'सीता-राम सीता-राम' का जाप करने लगता है। बेचारे सीता-राम को क्यों तकलीफ दे रहे हो! पर वह ठंड जो लग रही है। सीता-राम उस ठंड को भुलाने की तरकीब है।
अंधेरी गली में आदमी जाता है और कहता है, 'अल्लाह ईश्वर तेरे नाम'! वह अंधेरे की घबड़ाहट से बचने की कोशिश है।
जो आदमी परमात्मा के निकट जाता है, वह चिल्ल-पों नहीं करता है भगवान के नाम की; वह चुप हो जाता है। जितने भी चिल्ल-पों और शोरगुल मचाने वाले लोग हैं समझ लेना कि उनके भीतर कुछ और चल रहा है; भीतर काम चल रहा
है, और ऊपर राम का नाम चल रहा है।
...भीतर उसे औरत खींच रही है और वह किसी तरह भगवान का सहारा लेकर बढ़ा जा रहा है-कि कहीं ऐसा न हो कि औरत मजबूत हो जाए और उसे नीचे खींच ले।
और उस बेचारी को पता भी नहीं कि साधु किस मुसीबत में पड़ गया है। वह अपने रास्ते पर खड़ी है।
तभी उस साधु को खयाल आया कि पीछे उसका जवान साधु कहां है। लौटकर उसने देखा, कि उसको सचेत कर दे, कि वह कहीं उस पर दया करने की भूल में न पड़ जाए। लेकिन लौटकर उसने देखा तो भूल हो चुकी थी। वह जवान भिक्षु उस औरत को कंधे पर लिए नदी पार कर रहा था। वह देखकर आग लग गयी उस बूढ़े साधु को!
न-मालूम कैसा-कैसा मन होने लगा उसका। कई बार उसके मन में होने लगा कि कितना अच्छा होता अगर मैं भी उसे कंधा लगाए होता! फिर उसने स्वयं को झिड़का, 'यह क्या पागलपन की बात, मैं और उस औरत को कंधे पर ले सकता हूं? तीस साल की साधना नष्ट करूंगा'? गंदगी का ढेर है औरत का शरीर, तो उसको कंधे पर लूंगा?
नरक का द्वार है खी, और उसको कंधे पर लिया है?'
लेकिन वह दूसरा भिक्षु लिए आ रहा है। आग लग गयी उसे! आज जाकर गुरु को कहूंगा कि यह युवक भ्रष्ट हो गया, पतित हो गया; इसे निकालो आश्रम के बाहर।'
उस भिक्षु ने उस युवती को किनारे पर छोड़ दिया और अपने रास्ते चल पड़ा। फिर वे दोनों चलते रहे, लेकिन बूढ़े ने कोई बात न की। जब वे आश्रम के द्वार की ओर बढ़ रहे थे तो उस के भिक्षु ने सीढ़ियों पर खड़े होकर कहा, ''याद रखो, मैं चलकर गुरु को कहूंगा कि तुम पतित हो चुके हो। तुमने उस स्त्री को कंधे पर क्यो उठाया?''
वह भिक्षु एकदम चौंका। उसने कहा, ''स्त्री! उसे मैंने उठाया था और नदी पार छोड़ भी दिया। लेकिन ऐसा मालूम होता है कि आप उसे अभी भी कंधे पर लिए हुए हैं'' ''यू आर स्टिल कैरिंग हर आन योर शोल्डर। आप अभी भी ढो रहे हैं उसे कंधे पर! मैं तो उतार उसे भी आया। और आपने तो उसे कंधे पर कभी लिया भी नहीं था; आप अभी तक ढो रहे हैं? मैं तो घंटे भर से सोचता था कि आप किसी ध्यान में लीन हैं। मुझे यह खबर भी न थी कि आप ध्यान कर रहे हैं उस युवती का-कि उस सी को नदी के पार करा रहे हैं अब तक!''

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Bakesh  Namdev

mujhe sambhog se samadhi ki or pustak kharidna hai kya karna hoga