अथातो भक्ति जिज्ञासा भाग-1 - ओशो Athato Bhakti Jigyasa Bhag-1 - Hindi book by - Osho
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अथातो भक्ति जिज्ञासा भाग-1

ओशो

प्रकाशक : फ्यूजन बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2012
पृष्ठ :485
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 7281
आईएसबीएन :81-8419-329-7

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अथातो भक्ति जिज्ञासा भाग-1...

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Athato Bhakti Jigyasa Bhag-1 - A Hindi Book - by Osho

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

ये अपूर्व सूत्र हैं। शांडिल्य को सुन कर तुममें प्यास जगे, इसलिए इन सूत्रों की व्याख्या कर रहा हूं, ज्ञान न जमा लेना। ज्ञान जमा लिया, चूक गए। प्यास जगाना।
तुम्हारे भीतर गहन आकांक्षा उठे, अभीप्सा जगे, एक लपट बन जाए कि पाकर रहूं, कि इस अनुभव को जान कर रहूं, कि इस अनुभव को जाने बिना जीवन अकारथ है। ऐसी ज्वलंत आग तुम्हारे भीतर पैदा हो जाए तो दूर नहीं है गंतव्य।
उसी आग में अहंकार जल जाता है। उसी आग में बीज दग्ध हो जाता है और तुम्हारे भीतर जन्मों-जन्मों से छिपी हुई सुवास मुक्त आकाश में विलीन हो जाती है। उसे मोक्ष कहो, निर्वाण कहो, जो नाम देना चाहो दो–उसका कोई नाम नहीं है।

ॐ अथातोभक्तिजिज्ञासा !
नाद के स्वागत के साथ, संगीत के सत्कार के साथ, उत्सव की घोषणा के साथ, भक्ति की जिज्ञासा पर निकलते हैं। बजती हुई जगत की ध्वनि में, लोक और परलोक के बीच उठ रहे नाद में भगवान को खोजने निकलते हैं। यह यात्रा संगीत से पटी है। यह यात्रा रूखी-सूखी नहीं है। यहां गीत के झरने बहते हैं, क्योंकि यह यात्रा हृदय की यात्रा है। मस्तिष्क तो रूखा-सूखा मरुस्थल है, हृदय हरी-भरी बगिया है। यहां पक्षियों का गुंजन है, यहां जलप्रपातों का मर्मर है। इसलिए ओम से यात्रा शुरू करते हैं। और ओम पर ही यात्रा पूरी होनी है। क्योंकि जहां से हम आए हैं, वहीं पहुंच जाना है। हमारा स्रोत ही हमारा अंतिम गंतव्य भी है। बीज की यात्रा बीज तक। वृक्ष होगा, फल लगेंगे, फिर बीज लगेंगे। स्रोत अंत में फिर आ जाता है। जब तक स्रोत फिर न आ जाए, तब तक भटकाव है। इसलिए चाहे कहो अंतिम लक्ष्य खोजना है, चाहे कहो प्रथम स्रोत खोजना है, एक ही बात है। मूल को जिसने खोज लिया, उसने अंतिम को भी खोज लिया।

भक्ति परम है। उसके पार कुछ और नहीं, भगवान भी नहीं।
भक्ति है वह बिंदु जहां भक्त और भगवान का द्वैत समाप्त हो जाता है; जहां सब दुई मिट जाती है; जहां दो-पन एक-पन में लीन हो जाता है। ऐसे एक-पन में अगर उसे एक भी कहें तो ठीक नहीं। क्योंकि जहां दो ही न रहे, वहां एक का भी क्या अर्थ ? ऐसी शून्य-दशा हैं भक्ति, या ऐसी पूर्ण-दशा है भक्ति। नकार से कहो तो शून्य, विधेय से कहो तो पूर्ण, बात एक ही है। लेकिन भक्ति के पार और कुछ भी नहीं।

जैसे बीच होता, फिर बीज से अंकुर होता, फिर अंकुर से वृक्ष में फूल लगते और फिर फूल से गंध उड़ती–गंध है भक्ति। जीवन का अंतिम चरण, जहां जीवन परिपूर्ण होता, सुगंध, आखिरी घड़ी आ गई, इसके पार अब कुछ होने को नहीं, इसलिए सुगंध में संतोष है। न पार होने को कुछ है, न पार की आकांक्षा की जा सकती थी जिसकी वह भी समाप्त हुआ। ऐसी निष्कांक्षा, ऐसी वासनाशून्य, ऐसी रिक्त-दशा है भक्ति। रिक्त, अगर संसार की तरफ से देखें–तो सांरा संसार समाप्त हुआ। भरी-पूरी, लबालब, अगर उस तरफ से देखें, परमात्मा की तरफ से देखें–क्योंकि शून्य घट में ही परमात्मा का पूर्ण भर पाता है।

भक्त मिट जाए, तो भगवान हो जाए


मनुष्य का अस्तित्व तीन तलों में विभाजित है–शरीर, बुद्धि, हृदय। या दूसरी तरह से कहें तो कर्म, विचार और भाव। इन तीनों तलों से स्वयं की यात्रा हो सकती है। स्थूलतम यात्रा होगी कर्मवाद की। इसलिए धर्म के जगत में कर्मकांड स्थूलतम प्रक्रिया है। दूसरा द्वार होगा ज्ञान का, विचार का, चिंतन-मनन। दूसरा द्वार पहले से ज्यादा सूक्ष्म है। दूसरे द्वार का नाम है–ज्ञानयोग। तीसरा द्वार सूक्ष्मातिसूक्ष्म है–भाव का, प्रीति का, प्रार्थना का। उस तीसरे द्वार का नाम भक्तियोग है।
कर्म से भी लोग पहुंचते हैं। लेकिन बड़ी लंबी यात्रा है। ज्ञान से भी लोग पहुंचते हैं। पर यात्रा संक्षिप्त नहीं है। बहुत सीढ़ियां पार करनी पड़ती हैं। पहले से कम, लेकिन तीसरे की दृष्टि में बहुत ज्यादा। भक्ति छलांग है। सीढ़ियां भी नहीं हैं, दूरी भी नहीं है। भक्ति एक क्षण में घट सकती है ! भक्ति तत्क्षण घट सकती है। भक्ति केवल भाव की बात है। इधर भाव, उधर रूपांतरण। कर्म में तो कुछ करना होगा, विचार में कुछ सोचना होगा, भक्ति में न सोचना है, न करना है, होना है। इसलिए भक्ति को सर्वश्रेष्ठ कहा है।...

ज्ञान का मार्ग संकीर्ण है, भक्ति का मार्ग विराट है। अगर भक्तों से तुम्हारा जोड़ मिल जाए, तो फिर तुम किसी और की चिंता मत करना। न मिले दुर्भाग्यवश, तो फिर तुम कोई और मार्ग खोजना। प्रार्थना बन सकती हो, प्रेम बन सकता हो, तो चूकना मत, क्योंकि वह सुगमतम है, स्वाभाविक है। स्नेह तुम्हारे भीतर है, थोड़ा-बहुत प्रेम भी तुम्हारे भीतर है, थोड़ी-बहुत श्रद्धा भी तुम्हारे भीतर है, इन्हीं को थोड़ा निखार लेना है, फिर ये प्रीति बन जाएंगे। और प्रीति की ही अंतिम पराकाष्ठा भक्ति है।

भक्ति के मार्ग पर तुम्हारे पास संपत्ति पहले से कुछ है, तुम एकदम भिखारी नहीं हो। कुछ है तुम्हारे पास, थोड़ा निखारना है, थोड़ा साफ-सुथरा करना है जरूर, लेकिन कुछ तुम्हारे पास है। ज्ञान के मार्ग पर तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है। वहाँ तो तुम्हें अ ब स से शुरू करना पड़ेगा। ज्ञान का मार्ग आदमी की खोज है और भक्ति का मार्ग प्रभु का प्रसाद है। वह तुम्हें दिया ही हुआ है।...

तुम्हारे भीतर एक स्वाभाविक संपदा पड़ी है, जिसको तुम बढ़ाते ही नहीं। तुम्हारी हालत ऐसे है जैसे कोई बीज वृक्षों से भीख मांगता फिरता हो कि एक फूल मुझे दे दो, कि एक पत्ता मुझे दे दो, कि थोड़ी देर मैं भी तुम्हारे पत्ते से हरा हो लूं, कि तुम्हारे फूल के नीचे दब कर मैं भी खुश हो लूं। एक बीज, जो कि खुद जमीन में गिर जाए और टूट जाए तो बड़ा वृक्ष पैदा हो, और जिसमें हजारों-लाखों पत्ते लगें, बड़ी हरियाली हो और बड़े फूल खिलें–बीज भीख मांग रहा है। ऐसे तुम बीज हो और तुम भीख मांग रहे हो। तुम लक्ष्मीनारायण हो सकते हो, लेकिन दरिद्रनारायण बने हो। और जब तक तुमने अपने को दरिद्रनारायण मान रखा है और इसमें ही मजा ले रहे हो, तब तक तो बहुत मुश्किल है, तब तक तो बड़ी कठिनाई है।
तुम लक्ष्मीनारायण हो। सारी संपदा तुम्हारी है। सारे जगत का ऐश्वर्य तुम्हारा है। सारे फूल, सारे चांद-तारे तुम्हारे हैं।...
सब मिल सकता है–एक तुम खो जाओ। इतनी कीमत चुका दो। भक्ति का सारा सार इतनी छोटी सी बात में हैं–भक्त मिट जाए तो भगवान हो जाएं।...

शांडिल्य को खूब हृदयपूर्वक समझना। शांडिल्य बडा़ स्वाभाविक सहज-योग प्रस्तावित कर रहे हैं। जो सहज है, वही सत्य है। जो असहज हो, उससे सावधान रहना। असहज में उलझे, तो जटिलताएं पैदा कर लोगे। सहज से चले तो बिना अड़चन के पहुंच जाओगे।...
इन अपूर्व सूत्रों पर खूब ध्यान करना। इनके रस में डूबना। एक-एक सूत्र ऐसा बहुमूल्य है कि तुम पूरे जीवन से भी चुकाना चाहो तो उसकी कीमत नहीं चुकाई जा सकती।

अनुक्रम


१. भक्ति जीवन का परम स्वीकार है
२. प्रीति को कामना से मुक्त करो
३. भक्ति परमात्मा की किरण है
४. प्रीति-स्नेह-प्रेम-श्रद्धा-भक्ति
५. भक्ति यानी जीने का प्रारंभ
६. भक्त के मिटने में भगवान का उदय
७. स्वानुभव ही श्रद्धा
८. प्रीति की पराकाष्ठा भक्ति है
९. अनुराग है तुम्हारा अस्तित्व
१॰. संन्यास शिष्यत्व की पराकाष्ठा है
११. भक्ति आत्यंतिक क्रांति है
१२. भक्ति एक मात्र धर्म
१३. स्वभाव यानी परमात्मा
१४. परमात्मा परमनिर्धारणा का नाम
१५. भक्ति अंतिम सिद्धि है
१६. धर्म आमूल बगावत है
१७. भक्ति अति स्वाभाविक है
१८. विरह की परिपूर्णता ही परमात्मा से मिलन
१९. सब हो रहा है
२॰. अद्वैत प्रीति की परम दशा है



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