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सूर्यास्त के बाद

पुष्पा सक्सेना

प्रकाशक : यात्री प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 1994
पृष्ठ :125
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 7191
आईएसबीएन :0

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पुष्पा सक्सेना की कलम से कुछ और रोचक कहानियां...

Suryast Ke Baad - A Hindi Book - by Pushpa Saxena

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

संग्रह की कहानियां

१. सूर्यास्त के बाद
२. परिष्कार
३. सिस्टर रोजी
४. कर्ज
५. उमा दी
६. फूलों का अभियोगी
७. अपनों जैसा
८. फाँस

सूर्यास्त के बाद


सब कुछ स्वप्नवत् सम्पन्न हुआ लगा था। श्रृंगार करती सखियों का परिहास, चारों ओर बिखरा उल्लास उसे छू भी न सका था। शायद पंडित जी ने उसकी पुकार लगाई थी...
‘‘कन्या को विवाह मंडप में लाइए यजमान...’’
निर्वाक् बैठी अमृता को अमिता ने चैतन्य किया था–‘‘चलिए राजकुमारी जी, राजकुँवर प्रतीक्षा कर रहे हैं...’’
अमृता को निश्चेष्ट बैठी देख स्मिता ने परिहास किया था–‘‘क्या बात है यार, ये नक्शे किसको इम्प्रेस करने के लिए दिखाये जा रहे हैं ? तुम दोनों तो एक-दूसरे से अच्छी तरह परिचित हो, फिर ये परम्परागत लाज का नाटक क्यों सखि ?’’
अमृता का पूरा शरीर मानों कंटकित हो उठा था... परिचित...? सिर्फ परिचित क्यों... अभिन्न कहना ठीक होता, पर आज वही परिचित, सर्वथा अपरिचित क्यों लग रहा था।

‘‘चलो भाई बहुत झेल लिया तुम्हारा नाटक... कहो तो देवी जी को मंडप तक हम दोनों गोद में उठाकर ले चलें। क्यों स्मिता ठीक कहा न ?’’
सखियाँ हँस पड़ी थीं। यंत्रचालित-सी अमृता उठ खड़ी हुई थी। दायें-बायें अमिता और स्मिता के मध्य चलकर अमृता मंडप की वेदी पर जा बैठी थी। पंडित जी ने मंत्रोच्चार शुरू कर दिये थे। पास बैठे अनिन्द्य ने शायद एक पल को उस पर दृष्टि भी डाली थी।
‘‘हाँ अब कन्या का दायाँ हाथ, वर के हाथ पर धरें...’
पंडित जी के निर्देश पर पीछे बैठी उषा भाभी ने अमृता की दायीं हथेली, अनिन्द्य की फैली हथेली पर धर दी थी। अनिन्द्य के हाथ की गर्माहट पर अमृता सिहर उठी थी। जी चाहा था हाथ झटक, उठ खड़ी हो, पर वह कर पाना क्या अब संभव था।

अनिन्द्य के साथ कार में बैठ, उस घर तक पहुँचना मानों जागते हुए स्वप्न-सा देखा था। कितनी बार रजनी के साथ बतियाते, मिनटों में जिस मार्ग को पार किया था, आज कितना लम्बा हो उठा था। अनिन्द्य के रिश्ते की बुआ ने सामने आ, आरती उतारते हुए रुँधे कंठ से कहा था–‘‘अब की बार मेरे बेटे की गृहस्थी जमा दो भगवान। आओ बहू...’’
पाँव पर झुकती अमृता को बुआ-सास ने आशीष दे उठा लिया था।
‘‘इस घर में जूही-सी महको, फूलो-फलो बहू।’’
दिन भर पास-पडो़सियों का आना-जाना लगा रहा। कुछ फुसफुसाहटें, दबी-ढँकी आवाजें अमृता के कानों तक पहुँच ही रही थीं–‘‘चलो एक सहेली की खाली जगह दूसरी ने भर दी...’’
‘‘विचारी रजनी के भाग्य में सुख नहीं था, इसके लिए सब छोड़ गयी।’’

‘‘वैसे भी पहली के मुकाबले दूसरी का पति ज्यादा लाड़ करता है, रजनी का तो घर वापिस लौटना भी न हो सका।’’
‘‘इसकी माँ तो तर गयी, इत्ता अच्छा घर-बार बैठे-बिठाये मिल गया।’
वो सब बातें सुनती अमृता को दिन काटना कितना कठिन लगा था। रात में रजनीगंधा और गुलाब की लड़ियों से सुवासित कक्ष में बाहर की ओर खुलती खिड़की के पास पहुँच अमृता ठिठक गयी थी। बाहर का सितारों जड़ा आकाश उसके मानस में उतर आया था।
उस दिन रजनी के साथ गहरा बैजनी रंग घोले, वह भी अलका की प्रतीक्षा कर रही थी। रजनी ने अलका को बहाने से घर बुलवाया था।

‘‘आज अलका को मजा चखाना है अमृता। याद है पिछले साल इस अलका की बच्ची ने हमें कैसा रंगा था। चार दिनों तक पक्का फीरोजी रंग चेहरे से नहीं उतरा था।
इस बार होली के एक दिन पहले ही उन्होंने उसे छकाने की ठानी थी। दोनों साँस रोके इसी खिड़की के पास खड़ी थीं। खिड़की के नीचे पदचाप सुनते ही रजनी और अमृता ने रंग-भरी बालटी उठाकर नीचे उँडेल दी थी।
‘‘ये क्या शरारत है, कौन है ऊपर ?’’ एक कठोर मर्दानी आवाज सुनाई पड़ी थी।
‘‘हे भगवान, भाग मीतू, ये तो अनिन्द्य दा हैं। मारे गये... चल जल्दी...’’

अपने घर के नक्शे से परिचित रजनी मिनटों में न जाने कहाँ तिड़ी हो गयी थी। सीढ़ियाँ उतरती अमृता का मार्ग, नीचे से आ रहे एक सबल हाथ ने रोक दिया था।
मुँह उठाते ही अमृता हँस पड़ी थी। गहरे बैजनी रंग ने अपना कमाल कर दिखाया था। ऊपर से नीचे बैजनी हुए अनिन्द्य को देख उन भय के क्षणों में भी अमृता के मुख से अचानक निकल गया था... बैगन...’’
‘‘हूँ, तो ये आपकी मेहरबानी है। वैसे इस रंग का अकेला मैं ही उपभोग क्यों करूँ, चार लोगों के लिए काफी होगा इतना रंग...’’ कहते हुए उसने जबरन अमृता को अपने समीप खींच अपने रंगे कपोलों से उसके कपोल रंग दिये थे।
पीड़ा और आक्रोश से अमृता के नयन छलछला आये थे। उस सबल भुजापाश में छटपटाती, बंधन-मुक्त होने का व्यर्थ उपक्रम मात्र ही, वह कर सकी थी। सम्भवतः अमृता के अश्रुकणों की स्निग्धता ने अनिन्द्य को चैतन्य किया था। क्रोधावेश नमी में बह-सा गया था।

‘‘आई एम सॉरी, मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था, पर देख रही हैं न एकदम नयी शर्ट-पैंट आपकी कृपा से व्यर्थ हो गयी है।’’
क्षमा-याचना के अन्त में आक्रोश फिर स्वर में उभर आया था।
प्रत्युत्तर में बन्धन-मुक्त अमृता, सीधे घर की राह दौड़ गई थी। साबुन से रगड़-रगड़ उसने मुँह छील डाला था, पर वह क्षणिक स्पर्श बार-बार मुँह चिढा़ता, उसे खिजाता रहा था। अम्मा भुनभुना रही थीं–
‘‘होली के चार दिन पहले ये हाल है–सयानी हो गयी, अक्ल नहीं आयी। गली-मुहल्ले वाले क्या कहेंगे।’’
दूसरे दिन रजनी के आते ही अमृता उस पर बरस पड़ी थी...

‘‘नहीं बोलना है तुझसे। अपनी जान छुड़ाकर भाग गयी, हमें अकेला मरने छोड़ दिया।’’
‘‘सच बता मीतू, क्या अनिन्द्य दा बहुत नाराज थे ? असल में तू उनका गुस्सा नहीं जानती, तुझे पराई समझ कम डाँटा होगा, मेरा तो न जाने क्या हाल बनाते। हाय, तेरे मुँह पर ये बैजनी रंग कैसे लग गया ?’’
अमृता का हाथ अपने कपोलों को सहला गया था–‘‘कुछ नहीं, बाल्टी उठाते हाथ में रंग लग गया था, वही चढ़ गया होगा।’’ अमृता साफ झूठ बोल गयी थी।
‘‘अच्छा अब माफ नहीं करेगी सखी ? चल जो सजा देगी स्वीकार कर लूँगी। कहे तो कान पकड़ उट्ठक-बैठक भी कर सकती हूँ गुइंया।’’ अमृता हँस पड़ी थी। उसे हँसता देख रजनी का साहस बढ़ गया था।
‘‘वैसे सच कहूँ, अनिन्द्य दा परेशान दिख रहे थे। तेरे बारे में जाँच-पड़ताल कर रहे थे।’’

‘‘क्या वह पुलिस अफसर है, खबरदार जो तूने मेरे बारे में एक शब्द भी बताया तो...’’
‘‘लगता है कहीं कुछ ज्यादती कर गये हैं अनिन्द्य दा। चल मेरे साथ, अभी उनकी खबर लेती हूँ।’’
‘‘नहीं बात करनी है ऐसे जंगली से... तेरे अनिन्द्य दा होंगे, मेरा उनसे कुछ लेना-देना नहीं।’’
‘‘पर अनिन्द्य दा तो तुझसे मिले बिना नहीं रहेंगे सखी। वह तो मेरे साथ आज ही आ जाते, मैं टाल आयी हूँ। बड़े जिद्दी हैं अनिन्द्य दा। जो चाहेंगे पूरा किये बिना मानने वाले नहीं... ये बात गाँठ बाँधकर रख ले सखी।’’
‘‘मुझे क्या पड़ी है जो गाँठ बाँधकर रखूँ। भगवान करे आगे कभी उनसे बात भी न हो।’’ अमृता का स्वर तिक्त हो उठा था।
कॉलेज से रजनी और अमृता साथ ही लौटती थीं। उस दिन संध्या कॉलेज के सामने प्रतीक्षा करती फिएट कार देख रजनी चहक उठी थी।

‘‘हाय अमृता, ये तो अनिन्द्य दा हैं, आ, आज जल्दी घर पहुँच जाएँगे। जरूर उन्हें मुझसे कोई काम आ पड़ा है तभी लेने आये हैं वर्ना...’’
‘‘तू जा कार में, मुझे नहीं आना है तेरे साथ...’’ रजनी का पकड़ा हाथ जबरन छु़ड़ाती अमृता रुक गयी थी।
‘‘आज तक कभी ऐसा हुआ है, मैं तेरे बिना घर गयी हूँ ? ठीक है, मना कर आती हूँ उनसे, तू यहीं रुक...’’
रजनी के साथ अमृता के सामने मंद स्मित के साथ अनिन्द्य स्वयं आ खड़ा हुआ था...
‘‘मेरी कार में एक व्यक्ति के भार से कोई अन्तर नहीं आने वाला है अमृता जी। वैसे मेरे साथ न आने का कोई खास कारण तो नहीं है न ?’’ शरारती मुस्कराहट उसके अधरों पर खेल रही थी।
‘‘कार में व्यर्थ घूमने की आदत नहीं है मेरी–वह भी अपरिचितों के साथ... क्षमा करेंगे।...’’ तल्खी से उसने जवाब दिया था।

‘‘देखिए, आप मुझे पहले ही काफी महँगी पड़ चुकी हैं, एक पूरी नयी ड्रेस आपके नाम कर चुका हूँ। अब यहाँ व्यर्थ देर कर मेरा समय तो नष्ट न करें।’’
‘‘मैंने कहा है, आप मेरे लिए प्रतीक्षा करें... मिस्टर...?’’
‘‘अनिन्द्य ! वैसे शायद आपकी सम्मति में तो मैं सर्वथा निन्द्य ठहराया जाऊँ–क्यों ठीक कहा न मिस अमृता ?’’
‘‘मेरे लिए आप इतने महत्त्वपूर्ण नहीं जो आपके विषय में कोई सम्मति-असम्मति रखूँ।’’

‘‘ठीक है यही सही, पर यहाँ खड़ा होकर आपकी खुशामद करने का मेरा कोई इरादा नहीं है। सीधे से आकर कार में बैठ जाइए, वर्ना जबरदस्ती उठाकर भी आपको ले जा सकता हूँ, ये बात समझती हैं न मिस अमृता ?’’
अमृता के खिसियाए चेहरे पर भयभीत दृष्टि डालती रजनी ने उसका हाथ पकड़ जबरन खींचा था। कार में निःशब्द बैठी अमृता व्यर्थ ही बाहर झाँक रही थी। कोजी-कार्नर के सामने कार रोक अनिन्द्य ने उसे छोटे छोकरे से तीन ठंडे थम्स-अप लाने के निर्देश दिये थे।

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