जुनून - जेवियर मोरो Junoon - Hindi book by - Xavier Moro
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जुनून

जेवियर मोरो

प्रकाशक : फुल सर्किल पब्लिशिंग प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :474
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 7163
आईएसबीएन :81-7621-196-6

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मोहब्बत के जुनून की दास्तान... जुनून जो सर चढ़कर बोलता है और दीवाना बना देता है...

Junoon - A Hindi Book - by Xavier Moro

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

अनीता देलगादो स्पेन की 17 साल की बेहद खूबसूरत लड़की थी और नृत्य जिसका पेशा था। इसी परी-चेहरा पर फ़िदा हो गए पंजाब में कपूरथला महाराजा। बस, उससे ब्याह रचा लिया और ले आए अपने महलों में। वह महाराजा की चौथी पत्नी थी। पहले से चार बेटे थे, जो अनीता के हमउम्र थे। 20 साल उसने वहां विपरीत परिस्थितियों में बिता दिए। उस पर सौतेले बेटे के साथ संबंधों के आरोप भी लगाए। वह पिंजरे में क़ैद अजीब-सी घुटन, बेचैनी और मायूसी में जीती एक चिड़िया थी। यह सिलसिला आखिर एक दिन टूट गया और महाराजा ने उसकी अच्छी-खासी पेंशन बांधकर उसे स्पेन वापिस भेज दिया।

जेवियर मोरो ने आखिर एक उपन्यास लिखने की बात सोची। उनका कहना है कि ‘‘इसके लिए मैं कोई नई चीज़ नहीं खोजना चाहता था, बल्कि इसके विपरीत मैंने उस समय के माहौल के मद्देनजर भारत के रंगों और ख़ुशबुओं तथा आख़री महाराजाओं के और अनीता देलगादो के आकर्षक व्यक्तित्व को चित्रित करने का प्रयत्न किया है।’’ इसलिए इस कथन से स्पष्ट होता है कि एक सृजनात्मक उपन्यास लिखने के लिए इसके चरित्र वास्तविक हों या काल्पनिक और उनके नाम आदि सभी लेखक की कल्पना पर आधारित हैं। इस कहानी को लेकर जेवियर मोरो ने यूरोप और भारत में बड़ी खोज-पड़ताल की, इंटरव्यू लिए और अनीता देलगादो की डायरियों को खंगाल डाला। उन्होंने ऐसे-ऐसे रहस्यों से परदा हटाया, जिससे क्लाइमेक्स का पता चलता है।

भाग १
परियों का किस्सा है ज़िंदगी

[ १ ]


अट्ठाइस नवम्बर उन्नीस सौ सात। अरब सागर पर चुप्पी छाई हुई थी। समुद्र का पानी एकदम चिकना नजर आ रहा था जैसे अंधेरे में डूबे क्षितिज पर तेल की विशाल धारा पसरी हो। फ्रेंच शिपिंग कंपनी मेसैजरी मैरिटाइम्स का आठ हजार टन वजन वाला जहाज एस.एस.आरॅर भारतीय तट के करीब पहुँचते ही धीरे-धीरे लहरें फेंकने लगा, जिससे अरब सागर की सतह पर हलचल शुरू हो गई। नीली धारी वाली उसकी दो लंबी सफेद चिमनियां धुआं उगल रही थीं। उससे निकलकर धुआं तारों भरे आसमान में गुम हो जाता था। चालक यंत्र शोर करता हुआ तेजी से घूमने लगा था। जहाज चार हफ्ते पहले मार्सेल्ज़ से चला था। इस पर ज्यादातर औपनिवेशिक सिविल सेवा के अंग्रेज और फ्रेंच अफसर, उनके परिवार के लोग, पादरी और सैनिक सवार थे, जिन्हें पांडिचेरी या अंतिम पड़ाव सैगन जाना था। मार्सेल्ज़ में अक्टूबर के आखिरी दिनों में उन्हें भारी सर्दी ने परेशान किया, तो अब वे चिपचिपी गर्मी के कारण डेक पर सोने को मजबूर थे। हवा बोझिल और बोझिल होती जा रही थी। इस वक्त चांद ही था, जो थोड़ी राहत दे रहा था। ट्यूनिस और ऐलिग्जांड्रिया के शुरुआती पड़ावों का खुशनुमा तापमान अब पुरानी स्मृति का हिस्सा बन चुका था। फर्स्ट क्लास में सफर कर रहे कुछ यात्रियों ने दोपहर बाद समुद्री पक्षियों के शिकार में समय बिताया। यह उनके लिए निशानेबाजी का अच्छा अभ्यास साबित हुआ, जो भविष्य में बड़े शिकारों में उनके काम आ सकता था।

जहाज की ऊपरी डेक पर लगी कुर्सियों पर बैठी दो महिलाएं उन मछलियों से अपना दिल बहला रही थीं, जो रह-रहकर एक चमक के साथ समुद्र में उछलती थीं। कुछ तो जहाज के ठीक सामने आकर पानी में गायब हो जाती थीं और कुछ सागौन की लकड़ी से बने जहाज के फर्श पर बुरी तरह आ गिरती थीं जिन्हें केबिन में काम करने वाला एक लड़का बाल्टी में जमा करता जाता था और फिर बाद में जहाज के बाहर पलट आता था।

उन दो महिलाओं में एक स्पेनिश लड़की थी, जिसने कुछ दिनों पहले ही अपना सत्रहवां जन्मदिन मनाया था। उसका नाम था अनीता देलगादो ब्रियानेस। उसने अत्यंत सुरुचिपूर्ण तरीके से हरी रेशमी पोशाक पहन रखी थी। उसने अपने भूरे बालों का इस तरह जूड़ा बनाया था कि उसकी गर्दन और झुमकों की सुंदरता स्पष्ट झलक रही थी। चेहरा अंडाकार, सुडौल शरीर और बड़ी-बड़ी काली निस्तेज आंखें थीं उसकी। दूसरी महिला उसकी सहायिका मैडम डिजॉन थी। उसकी उम्र करीब चालीस साल थी। उसका चेरा लंबोतरा था और वह बेहद बातूनी थी। अगर उसने एक खास तरह की पोशाक नहीं पहनी होती, तो वह किसी स्कूल की प्रिंसिपल नजर आती। टखने तक की सफेद स्कर्ट और उससे मेल खाती मलमल की ब्लाउज और बड़े हैट में वह थोड़ी अलग नजर आ रही थी।

‘‘आज रात के खाने पर, कैप्टन की टेबल पर... श्... श्... श्...।’’ मैडम डिजॉन ने होंठों पर उंगली रखते हुए उसे चुप रहने का इशारा किया। लड़की ने सिर हिलाया। वे कैप्टन की टेबल पर डिनर के लिए आमंत्रित थीं, क्योंकि... आज आखिरी रात थी ! उस लड़की को विश्वास नहीं हो रहा था। असल में उसे अपना यह सफर अंतहीन-सा लगने लगा था। पहले दिन तो उसकी इच्छा हुई कि जान दे दे। उसे जहाजी मितली आने लगी थी। उसने अपनी साथी से अनुरोध किया कि वह पहले ही पड़ाव पर उसे उतर जाने दे।
‘‘बुरे समुद्र कभी खत्म नहीं होते।’’ मैडम डिजॉन ने उसे दिलासा देते हुए कहा।

मैलगा की उसकी नाटी और काली नौकरानी लोला का भी बुरा हाल था। वह भी मरना चाहती थी। जिंदादिल लोला थर्ड क्लास में सफर कर रही थी, जिसमें मक्का से लौट रहे हाजियों की भीड़ थी। लोला अपनी मालकिन के बुलाए जाने पर दौड़कर आती और उल्टियां करती हुई कहती, ‘‘ओह ! यह तो किसी काफिले से भी गया-गुजरा है।’’
लोला की जहाजी मितली तो समुद्र में ज्वार के शांत होते ही खत्म हो गई, लेकिन अनीता को रास्ते भर मितली और चक्कर आता रहा। वह जमीन पर कदम रखने को बेताब थी, समुद्र उसे रास नहीं आ रहा था। इसके अलावा वह करीब एक साल से अपने नये देश के सपने में खोयी थी। ‘‘आखिर भारत कैसा होगा ?’’ जब कोई मुसाफिर उसे बताता कि भारत वैसा नहीं है जैसा कोई यूरोपीय जानता-समझता या कल्पना करता है तब वह हैरत में पड़ जाती।

पूरे सफर में सारे यात्रियों के आकर्षण का केंद्र अनीता ही थी। मुसाफिरों में उसके बारे में खुसर-फुसर होती रहती थी, उसके सौंदर्य या उसके रहस्यपूर्ण व्यक्तित्व के कारण। उसके कीमती गहनों से यह जाहिर था कि वह काफी अमीर है, लेकिन उसकी भाषा प्रभावशाली नहीं थी। वह जिस तरह ऐंडलूसियन लहजे के साथ फ्रेंच बोल रही थी, उससे यह पता नहीं चल पा रहा था कि वह कहां की है। उसके बारे में लगाया जा रहा हर तरह का अनुमान गलत साबित हो रहा था। उसकी खूबसूरती और हाजिर जवाबी के कारण पुरुष उसकी ओर इस तरह आकर्षित हो रहे थे, जैसे मधुमक्खियां शहद की तरफ होती हैं। उस पर मुग्ध एक अंग्रेज यात्री ने उसे एक जड़ाऊ पिन, दो गुलाबों से जड़ित एक कीमती पत्थर और एक छोटा आईना भेंट किया। हालांकि दूसरों ने इतनी दरियादिली नहीं दिखायी। फ्रेंच औपनिवेशिक सेना के अफसर ने जब उसे सीढ़ियों पर देखा तो कहा, ‘‘पतली कमर वाली।’’ अनीता ने तिरछी नजरों के साथ मुस्कराकर यह तारीफ स्वीकार की। जब अनीता ने उसे अपने दाहिने हाथ की प्लैटिनम और हीरे की अंगूठी दिखाई, तो वह फ्रेंच अफसर ही नहीं, शोरगुल कर रहे तमाम मुसाफिर सहम गए जो यह समझ नहीं पा रहे थे कि यह अजनबी स्त्री आखिर कौन है ?

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