कहानी संग्रह >> अगला यथार्थ अगला यथार्थहिमांशु जोशी
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हिमांशु जोशी की हृदयस्पर्शी कहानियों का संग्रह...
“पूजा का वक्त हो रहा है। पुजारी हमारी प्रतीक्षा में होगा...। शाम को हर हालत में लौटना भी है... !" मैं कह रहा था, पर तुम्हारा ध्यान कहीं और था।
खोई-खोई-सी तुम कह रही थीं, “यह पूजा अब हम नहीं करेंगे। मेरा वक्त आ गया है तो क्या तुम उसे टाल दोगे?"
"टालना तो किसी के वश में नहीं। परंतु, प्रयत्न तो करना ही चाहिए...! इसीलिए तो इतनी दूर आए हैं...."
तुमने एक गहरी सांस भरते हुए कहा, “सचमुच हम बहुत दूर आ गए हैं। तुमने देखा, इस प्यारी बच्ची को ! कितने प्यार से कल से खेल रही है। कल रात सर्दी लगी तो कूदकर मेरे बिस्तर पर आ गई। अभी सुबह मैं नहा रही थी, तो यह बाथरूम के बाहर बंद दरवाजे से टिकी बैठी मेरी प्रतीक्षा कर रही थी। जहां-जहां मैं जा रही हूं, वहां-वहां खोजकर आ जाती है। क्या हमारे अपने बच्चे होते तो हमें इससे अधिक प्यार करते?"
तुम कातर दृष्टि से मेरी ओर देख रही थीं, "किसी के प्राणों की बलि चढ़ाकर, क्या किसी को जीवन मिल सकता है?"
मेरी समझ में नहीं आ रहा था, तुम बहकी-बहकी-सी क्या बोले जा रही हो !
"इसे घर ले जाएंगे ! हमारे बगीचे में कितनी हरी-हरी मुलायम घास होती है। इसको जी भरकर खिलाएंगे...!"
तुम हंस रही थीं। तुम्हारी आंखें हंस रही थीं। तुम्हारा रोम-रोम हंस रहा था। कितना गहरा आत्मसंतोष का भाव था तुम्हारे चेहरे पर ! कौन कह सकता था, तुम बीमार हो ! अब कुछ ही घड़ी की मेहमान !
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