अकथ - रणविजय सिंह सत्यकेतु Akath - Hindi book by - Ranvijay Singh Satyaketu
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अकथ

रणविजय सिंह सत्यकेतु

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2008
पृष्ठ :138
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 7080
आईएसबीएन :978-81-263-1699

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युवा कहानीकार रणविजय सिंह सत्यकेतु की रचनाशीलता को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करता कहानी-संग्रह...

Akath - A Hindi Book - by Ranvijay Singh Satyaketu

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

दावत

दो साल पहले इलाके में यह खबर आग की तरह फैल गयी थी कि नूरमहल बिक गया। हर कहीं इसकी चर्चा होती रही। कहनेवाले दबी जबान से कहते। सुननेवाले दाँतों तले उँगली दबा लेते।
रियासतदारों ने चाहे जितने जुल्म ढाए हों, मगर रियासतवालों के लिए लोगों के मन में कहीं-न-कहीं आदर का भाव दबा-छिपा था जो एकदम से निकलकर बाहर तैरने लगा।
चाय-पान की दुकान हो या कोई बैठकखाना, जहां कहीं चार जने जमा होते, नूरमहल और फिर रियासतदारों की चर्चा शुरू हो जाती।
‘‘करीमनगर रियासत की नाक... नूरमहल... आखिर बिक गया। नहीं बचा सके दौलत अली। ऐशो-आराम में डूबकर पहले गिरवी रखा, अब बीबी की बातों में आकर बेच ही डाला।’’

‘‘करते भी क्या, बेटे भी तो नालायक ही निकले। लानत है लियाकत की जवानी और मर्दानगी पर। बेगम के कहे बगैर साँस तक नहीं छोड़ता। न लाज, न लिहाज।’’
‘‘यह छैल-छबीली बेगम भी खूब आयी सुसरी। जो चीज नजर की गयी, उसे ही बिकवा दिया।’’
‘‘भई जब औलाद ही इज्जत से खेल रही हो, तो पराये घर की नकचढ़ी को क्या पड़ी है खानदान की आबरू बचाने की। उसे तो बस अपना जलवा दिखाने के लिए अवसर चाहिए।’’
‘‘मगर ये भी तो देखो कि रियासत की डूबती नैया को किस खूबी के साथ सँवारा है उस छोटी जान ने ?’’

‘‘खूब कही मिर्जा साहब आपने भी, डूबती नैया को ऐसा सँवारा कि बाप-बेटे को आमने-सामने करवा दिया। उँगली पर नचा रही है रियासती कारोबार को।’’
‘‘सोचने-सोचने का फर्क है असलम। वरना तो देखो कि दौड़ते जमाने के हिसाब से रियासती कारोबार को नयी जिन्दगी दी है बेगम ने। अली मार्केट, जाकिर नृत्यशाला और मंसूर कैफे खोलने की बात तो दौलत अली सपने में भी नहीं सोचते। वह सब कुछ महज पाँच वर्षों में कर दिखाया उन्होंने।’’
‘‘इतना ही क्यों, लोगों की नजरों में निकम्मा हो गये लियाकत अली को देखते-देखते पक्का बिजनेसमैन बना दिया।’’
‘‘अरे वो सब कुछ अपनी खुशी और ऐशो-आराम के लिए किया उसने।’’

‘‘अच्छा, अगर लियाकत को कौंसिलर का चुनाव भी बेगम ने लड़वाया अपनी खुशी के लिए, तो वाइस चांसलर ने किस खुशी के लिए खुद बेगम को यूनिवर्सिटी सीनेट का मेम्बर मनोनीत किया ?’’
‘‘वह तो सभी जानते हैं कि वाइस चांसलर ने ऐसा क्यों किया ?’’
‘‘जी नहीं, लोग गलत जानते हैं। खबर होनी चाहिए कि बेगम जमीला को यूनिवर्सिटी में डांस की क्लास लेने के लिए बुलाया जाता है और जाकिर नृत्यशाला द्वारा जारी किये गये सर्टिफिकेट को सरकार पूरी मान्यता दे रही है।’’
‘‘बस-बस रहने दीजिए। मान लिया कि आप भी शामिल हुए बेगम के मुरीदों में।’’

‘‘काबिलियत का मुरीद भला कौन नहीं होगा। राजे-रजवाड़े और नवाबों की आज क्या हालत है, कौन नहीं जानता। लेकिन देखिए कि आपके-हमारे घर की बेटियों की उम्र की एक लड़की कितनी सयानी निकली कि करीमनगर रियासत को गुमनामी के गर्त से निकालकर एक नया चेहरा दे दिया। दौलत अली की नाकामी को पाटते हुए लियाकत अली को नये जमाने का पूँजीपति बना दिया।’’
‘‘अब चुप भी रहिए। नहीं सुनना हमें।’’
‘‘जोर-जोर से बोल सकते हैं तो हौले से सुनने की भी कूव्वत रखिए।’’
चर्चा अक्सर बहस और झड़प की शक्ल ले लेती।

इससे कहीं ज्यादा मुबारकबाद इमरोज को मिली थी। थोक में आ-आकर लोगों ने इमरोज को शाबाशी दी। हालाँकि मतीन अंसारी को यह नागवार गुजरा था, लेकिन एक बार वह भी इमरोज से मिलने गये। शायद यह देखने कि जिस नूरमहल को वह इतने वर्षों से गिरवी के तौर पर रखे रहे, उसे एक झटके में किसने ले लिया। उन्हें इस बात का मलाल नहीं था कि गिरवी में होने के बावजूद वह नूरमहल का उपभोग नहीं कर पा रहे थे, बल्कि उन्हें आश्चर्य हो रहा था कि इस मरी हुई मान ली गयी जगह में चूल्हा जलाने की हिम्मत करनेवाला शैतान भी है इस जहान में।

सरकारी विभाग के लोगों ने अपने-अपने हिसाब से मिठाइयाँ कबूल कीं इमरोज से। पुलिसवाले हफ्ते में अपनी खीसें निपोड़ते आने लगे।
नूरमहल का मालिक बन जाने के बाद एकाएक इमरोज शहर की नामी-गिरामी हस्तियों में शामिल हो गया था। एक तरह की शान्ति और सुकून की जिन्दगी महसूस कर रहा था वह। उसकी बीवी जरीना को जैसे मनचाहा मिल गया, वह बेहद खिली-खिली रहने लगी थी।
इमरोज है तो माइनिंग विभाग में क्लर्क ही, लेकिन कमाई इतनी कि ओवरसियर और इंजीनियर भी शरमा जाए।
मकान खरीदकर घरवास तो वह पहले ही कर चुका, लेकिन जल्दबाजी में सगे-बिरादरी को दावत नहीं दे पाया। इधर हाथ कुछ हल्का हुआ तो दावत रख ली और लगे हाथ खंडहर में बदल गये मकान की मरम्मत करवाकर करीने से उस पर रंग-रोगन करवा दिया। अब तो मकान की रंगत ही बदल गयी है।

शहर में नूरमहल के नाम से मशहूर इस मकान में लोगों का रहना तकरीबन चालीस-पचास सालों से बन्द था। लियाकत अली के दादा नवाब अकबर अली इलाके की कुछ गिनी-चुनी हस्तियों में थे। वह अंग्रेज रेजीडेंट के खास आदमियों में गिने जाते। काफी रुतबा था उनका। शराब, शिकार और चौपड़ जैसे नवाबी शौक से दूर नहीं थे, इसलिए मातहतों पर नजर नहीं रख पाये। सन् ’42 में खजांची ने ही आजादपरस्तों से मिलकर खजाना लुटवा दिया। इस सदमें को नवाब बर्दाश्त नहीं कर पाये। वह दुनिया छोड़ गये।

नवाब अकबर अली के बेटे साहबजादा दौलत अली नाम के ही दौलत अली रहे। उन्हें न तो एकमुश्त बपौती दौलत मिली और न ही वह अपनी जागीर सँभाल सके। नासमझी और जिद में मुकदमों की बिसात पर एक-एक कर सारे ठौर-ठिकानों को गँवाते चले गये। उधार और कर्ज ले-लेकर खान-पान, रस्मो-रिवाज पर नवाबों की तरह धन लुटाते रहे, शादी-ब्याह रचाते रहे।
कहते हैं कि दौलत अली का बड़ा बेटा मंसूर अली अपने खराब चाल-चलन की वजह से रैयतों के हाथों मारा गया, हालाँकि आज तक इस बात का कोई पक्का सबूत नहीं मिल पाया है। छोटा बेटा लियाकत अली ऐशो-आराम में पला-बढ़ा और खानदानी ऐंठ में रह गया।

अपनी आदत से लाचार दौलत अली घर-आँगन की जिम्मेदारी ढंग से निभाने की जगह बाहर की अलमस्ती और माथापच्ची में खोए रहे। उन्होंने अक्ल का दामन तब भी नहीं पकड़ा जब सिसकियों ने दम तोड़ीं, पायलों की रुन-झुन दहलीज छोड़ गयी। तब भी नहीं जब रियासत का इकलौता वारिस लियाकत अली सचमुच अकेला रह गया।
प्रिवी पर्स समाप्त होने के बाद पहले से कमजोर हो चुकी रियासत की फैलीबिखरी जमीन पर रैयतों ने कहे-अनकहे क़ब्ज़ा कर लिया था। दौलत अली इन्हीं मुकदमों के सिलसिले में अक्सर लखनऊ के दौरे पर रहते थे, बल्कि लगभग वहीं रहने लगे थे।
लखनऊ हाईकोर्ट बेंच के धाकड़ वकील सैय्यद करमी लखनवी के यहाँ आते-जाते उनके माली जाकिर हुसैन से दौलत अली की पटरी बैठ गयी। लखनऊ आने-जाने और होटलों में ठहरने-खाने पर बहुत ज्यादा खर्च बैठता था। इसलिए भी दौलत अली को एक ठिकाने की जरूरत थी।

जाकिर हुसैन का घर अकबरी दरवाजा और बलरामपुर हॉस्पिटल के बीच के इलाके में मुर्तजा हुसैन रोड के पूर्वी हिस्से में है। जाकिर हुसैन का उसकी पहली बीवी से तलाक हो गया था। उसके कोई दस साल बाद उसने दूसरी शादी कर ली जिससे एक बेटी जमीला हुई। आगे उसे कोई औलाद नहीं हुई।
स्वभाव से शर्मीले और मिजाज से रंगीन दौलत अली की दोस्ती पक्की हो गयी, वह घरेलू हो गया।
जाकिर हुसैन को रात के नौ बजे लखनवी के यहाँ से छुट्टी मिलती और सुबह सात बजे ही हाजिर होना होता। जमीला दस से पाँच बजे तक स्कूल में होती। घर में होते दौलत अली और जाकिर की बीवी नादिरा। मुकदमा लड़कर अपनी जागीर बचाने निकले दौलत अली की जायदाद का एक बड़ा हिस्सा जाकिर की बीवी नादिरा की खुशियों पर भी कुर्बान हुआ।

वक्त अपनी रफ्तार में रहा, इन्सान अपनी धुन में। उम्र आ गयी थी, वकील लखनवी चल बसे। उनके तीनों लड़के वकालत कर रहे थे, पर किसी में बनाव नहीं था। सबने अपनी राह पकड़ ली। जाकिर हुसैन बेकार हो गया।
काफी तलाश करने के बाद भी जाकिर को दूसरी नौकरी नहीं मिली। वह घर बैठ गया। एक तरह से घर का सारा खर्च दौलत अली की मेहरबानी से चलने लगा। जाकिर हुसैन मन-ही-मन अपनी बेबसी पर कुढ़ता रहा। नादिरा दौलत अली की जिन्दादिली पर बलिहारी जाती रही।
जल्दी ही दौलत अली का गणित ब्याज चाहने लगा। जाकिर की बेटी जमीला अपने ही घर में भागी-भागी-सी रहने लगी।
बारहवीं जमात पास कर जमीला पंडित माँगेराम से कथक सीख रही थी। आगे पढ़ने की उसकी बड़ी ख्वाहिश थी, लेकिन बदले हालात में वह ऐसा कोई कदम नहीं उठाना चाहती थी जिससे दौलत अली के अहसानों से जाती तौर पर दब जाए।

दौलत अली ने अपनी जिन्दगी इन्हीं खेलों में गँवाई थी, एक मासूम गुड़िया से कैसे हार जाते। अपने हिसाब से जाल फैलाना शुरू किया।
अचानक नादिरा को अपनी इकलौती बेटी की अच्छी तालीम की फिक्र सताने लगी। जमीला के साफ तौर से मना करने के बाद और भी ज्यादा... रोने-धोने की हद तक।
आस-पड़ोस में उठ रहे शक-शुबहा के धुएँ से जाकिर का दम घुटने लगा था।
मौका देखकर दौलत अली ने साहूकार का रुख अपनाया। जाकिर से जमीला के साथ अपने निकाह की बात पर डाली।
सारा घर भौचक रह गया।

पूरे दिन गहरी खामोशी छाई रही। घर का कोना-कोना द्वन्द्व में फँसा रहा।
दिन ढला, शाम हुई। चूल्हे ने आँखें खोली, बर्तनों ने उपवास तोड़े।
एक-एक पैसे को मोहताज नादिरा जाकिर हुसैन की नामर्दी पर बिफर उठी, पर दौलत अली के समझाने पर फिर राजी हो गयी। उसे भी मौज-मस्ती का चस्का लग गया था, आसानी से दौलत अली को छोड़ भी नहीं सकती थी।
जमीला रोयी और खूब रोयी। दिनभर भागी-भागी रही। शाम को बेजान देह और उदास आँखों को लिये घर लौटी। तब तक उसके जन्मदाताओं ने उसकी तकदीर का फैसला कर दिया था।
एक अधखिली जिन्दगी को दरकते खँडहर में जिन्दा चुनवा देने का फैसला कर लिया गया था।

करीमनगर की सुनसान हवेली में जमीला की पहली मुलाकात उससे थोड़ी-सी बड़ी उम्र के एक खूबसूरत लड़के से हुई। दोनों के माथे पर बल पड़ गये। लगभग साथ-साथ उनकी नजरें दौलत अली पर टिकीं।
बड़ी दयनीय हँसी के साथ दौलत अली ने अपनी पाँचवीं बेगम जमीला का परिचय बेटे लियाकत अली से कराया।
लियाकत को यह कुछ अच्छा न लगा। उसके मुँह का जायका बिगड़ गया।
जमीला की आँखें भर आयीं। मन में एक बिजली-सी कौंधी और दौलत अली के देखते-देखते उसने लियाकत को अपने सीने से चिपका लिया, गोकि लियाकत के भीतर की चिंगारी को अपने भीतर समेट लिया।
दौलत अली की गुनहगार आँखें नीचे झुक गयीं। यहीं वह उस मासूम गुड़िया से मात खा गये।

दावत के दिन शोलागंज की महलवाली गली में अच्छी चहल-पहल रही। पूरी गली को शामियानों-कनातों से सजा दिया गया। गली-मोहल्ले के बच्चे सुबह से ही भागम-भाग करते रहे। मोहल्ले के वे लोग धीरे-धीरे आने लगे, जिनके यहाँ इमरोज का दोस्ताना आन-जान है। महलवाली गली के तो सारे लोग न्यौते गये। बाकी शहर के इने-गिने लोग, सरकारी अधिकारी और जरीना की ओर के मेहमान एक-एक करके पहुँचते रहे। इमरोज के चारों चाचा परिवार सहित सुबह ही आ गये थे। इसकी फूफी का तो घर बगल में है। उसकी मौसी रूबीना परवीन पिछली शाम की ट्रेन से भागलपुर से आ गयी थी। यूनिवर्सिटी में चल रहे इम्तहान की वजह से उसके मौसा प्रो. रजानूर नहीं आ सके। मेरठ से जरीना के मायके से कई सगे-सम्बन्धी पहुँचे हुए थे।

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