उत्तररामचरित - भवभूति UttarRamcharit - Hindi book by - Bhavbhuti
लोगों की राय

नाटक-एकाँकी >> उत्तररामचरित

उत्तररामचरित

भवभूति

प्रकाशक : राजपाल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2008
पृष्ठ :96
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 7017
आईएसबीएन :978817028779

Like this Hindi book 2 पाठकों को प्रिय

314 पाठक हैं

महाकवि भवभूति द्वारा रचित उत्तररामचरित का प्रो. इन्द्र द्वारा किया गया हिन्दी रूपान्तरण...

UttarRamcharit - A Hindi Book - by Bhavbhuti

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

संस्कृत साहित्य के सर्वप्रिय नाटककारों में भवभूति का सम्मानपूर्ण स्थान है। अपनी कृति ‘उत्तररामचरित’ के लिए ही उसकी ख्याति संसार में अनश्वर रूप से विद्यमान है।
आलोचनाशास्त्र के पण्डितों द्वारा उत्तररामचरित नाट्यकला की एक अद्वितीय रचना स्वीकार की गई है। इसमें सात अंक हैं, इसकी कथावस्तु रामायण के उत्तरकाण्ड पर आश्रित है।
लंका में रावण का संहार करके श्रीराम सीता-सहित अयोध्या में वापिस आते हैं और उनका राज्याभिषेक होता है। उसी समय प्रजा के लोग सीता के चरित्र के सम्बन्ध में चर्चा आरम्भ कर देते हैं। जब दुर्मुख गुप्तचर द्वारा श्रीराम को जनापवाद का यह समाचार प्राप्त होता है, वे लक्ष्मण द्वारा सीता को वन में निर्वासित कर देते हैं।

सीता उस समय गर्भवती थी। वन में उसके दो पुत्र-कुश तथा लव उत्पन्न होते हैं। माता पृथ्वी तथा भागीरथी इस अवस्था में सीता का पालन-पोषण करती हैं और बच्चों को वाल्मीकि मुनि को, शिक्षा-दीक्षा के लिए सुपुर्द कर के सीता को अपने साथ पाताल-लोक में ले जाती हैं।
बारह वर्ष बाद श्रीराम अश्वमेध यज्ञ आरम्भ करते हैं। इसी समय, यज्ञ प्रारम्भ करने से पूर्व, वे शूद्र तपस्वी शम्बूक की खोज में दण्डकारण्य में जाते हैं। वहाँ उनकी पुरानी स्मृतियाँ उद्बुद्ध हो जाती हैं। भागीरथी को यह ज्ञान था कि श्रीराम दण्डकारण्य आने वाले हैं और वे लौटते हुए पंचवटी से अवश्य गुजरेंगे। अतः वह सीता को साथ लेकर गोदावरी से मिलने के लिए पंचवटी में पहुँच गई थी। वहाँ उसने सीता को फूल चुनने के बहाने उस स्थान पर भेजा जहाँ श्रीराम आ चुके थे। भागीरथी ने वरदान द्वारा सीता को अदृश्य बना दिया–यद्यपि सीता स्वयं सबको देख सकती थी।

पंचवटी में श्रीराम ने सीता की उपस्थिति को ही नहीं, प्रत्युत उसके अंगस्पर्श को भी अनुभव किया, परन्तु उसके दिखाई न देने पर उसे भ्रान्तिमात्र जान कर अति क्षुब्ध तथा विषण्ण होते हैं। निराश होकर वे अयोध्या आ जाते हैं।
अश्वमेध यज्ञ को आरम्भ करने के लिए यज्ञिय अश्व को छोड़ा जाता है।
लक्ष्मण का पुत्र चन्द्रकेतु सेनासहित उस अश्व की रक्षा के लिए साथ जाता है। अश्व घूमता-फिरता वाल्मीकि-आश्रम के समीप पहुँचता है। वहाँ लव तथा अन्य आश्रम के बच्चे उसे उत्सुकतावश पकड़ लेते हैं।
चन्द्रकेतु अश्व को छुड़ाने के लिए युद्ध शुरू करते हैं। परन्तु लव को देख कर अकारण ही उसका हृदय उसके प्रति आकृष्ट हो जाता है। परस्पर स्नेह-सम्बन्ध की भावना जागृत होती है। भगवान् राम उसी समय पुष्पक विमान द्वारा युद्धस्थल पर पहुँचते हैं और दोनों बच्चों को युद्ध-विराम के लिए प्रेरित करते हैं।

कुश भी तब वहाँ आ जाता है। इन दोनों–लव, कुश–को देख-देख कर श्रीराम विस्मित तथा चिन्तित होने लगते हैं और उन्हें, उन दोनों बच्चों में अपना तथा सीता का निकट सादृश्य दृष्टिगोचर होने लगता है।
तभी वाल्मीकि मुनि वहाँ उपस्थित हो जाते हैं और आश्चर्यचकित श्रीराम को अप्सराओं द्वारा किए गए अभिनय के लिए आमन्त्रित करते हैं। सहस्त्रों अन्य नर-नारी भी इस अभिनय को देखने के लिए उपस्थित होते हैं। नाट्यकला के जन्मदाता स्वयं भरत मुनि द्वारा वाल्मीकि-कृत कथावस्तु का अभिनय आरम्भ होता है। स्वर्ग से उतरी हुई उन अप्सराओं ने अपनी उत्कृष्ट कला का प्रदर्शन प्रस्तुत किया। द्रष्टा जन मन्त्रमुग्ध होकर उस अभिनय के करुण रसपूर्ण दृश्यों का अवलोकन करने लगे। सर्वप्रथम घोर वन में गर्भवती सीता का भागीरथी-तट पर लक्ष्मण द्वारा निर्वासन दिखाया गया। तदनन्तर भागीरथी माता की गोद में सीता के दो पुत्रों के जन्म तथा उसके पाताल में विलय का मर्मस्पर्शी दृश्य उपस्थित किया गया। पुनः बच्चों के वाल्मीकि-आश्रम में भरण-पोषण तथा शिक्षा-दीक्षा का चित्र भी प्रस्तुत किया गया।

इस समय रंगमंच पर से अप्सराएँ चली जाती हैं और स्वयं वाल्मीकि मुनि उपस्थिति होते हैं। माता पृथ्वी तथा भागीरथी सीता को साथ लेकर पाताल-लोक से प्रकट होती हैं। वसिष्ठ-पत्नी अरुन्धती प्रजाजनों की, सीता के चरित्र पर मिथ्या लांछन लगाने के लिए, भर्त्सना करती है और राम को अपनी निर्दोष-निष्कलंक पत्नी को स्वीकार करने के लिए प्रार्थना करती हैं। समस्त प्रजा इस प्रार्थना में सम्मिलित होती है और अपने किए दुष्कर्म पर लज्जित होती है। तब राम और सीता का पुनर्मिलन होता है और आनन्द-विभोर प्रजाजनों के जय-जयकार के साथ अभिनय की समाप्ति होती है।
इस सुन्दर कथावस्तु के ग्रथन में भवभूति को अद्भुत सफलता प्राप्त हुई है। लेखक की सम्मति में यह सफलता कालिदास को अभिज्ञान शाकुन्तल की कथावस्तु के ग्रथन में प्राप्त सफलता से किसी अंश से कम नहीं है।

निःसन्देह भवभूति की अन्य दो कृतियाँ–महावीरचरित तथा मालतीमाधव–इतनी उच्चकोटि की नहीं हैं, जितनी उत्तररामचरित्र है। सम्भवतः इसका कारण यही है कि प्रथम दोनों रचनाएँ भवभूति की प्रारम्भिक अवस्था की हैं। तथा अन्तिम रचना पूर्णावस्था की है। यही स्थिति कालिदास की अभिज्ञान शाकुन्तल के सम्बन्ध में मानी जा सकती है, जो निस्संशय अन्य दो कृतियों–मालविकाग्निमित्र तथा विक्रमोर्वशीय–से अधिक उत्कृष्ट रचना है और अवश्यमेव परिपक्वावस्था में ग्रथित हुई प्रतीत होती है।
कई विद्वानों ने उत्तररामचरित के कर्ता के नाम के बारे में संशय प्रकट किया है। नाटक की प्रस्तावना में प्रणेता ने अपना परिचय इस तरह दिया है-

अस्ति खलु तत्रभवान्, काश्यपः श्रीकण्ठपदलाञ्छनः पद
वाक्यप्रमाणज्ञो भवभूतिर्नाम जतुकर्णीपुत्रः।

–यह कवि कश्यप-गोत्र में उत्पन्न ‘श्रीकण्ठ’ पदवी से भूषित, व्याकरण, मीमांसा तथा न्यायशास्त्र का ज्ञाता, जतुकर्णी का पुत्र भवभूति नाम का है।
इस परिचय में निर्दिष्ट ‘श्रीकण्ठ’ शब्द को कुछ विद्वान् नाम रूप में स्वीकार करते हैं और ‘भवभूति’ को उसका विशेषण (भवाद्भूतिर्यस्य–जिसे भव अर्थात् महादेव जी से भूति–ज्ञान-सम्पत्ति प्राप्त हुई हो) बतलाते हैं। परन्तु यह धारणा युक्तिसंगत प्रतीत नहीं होती, क्योंकि ‘श्रीकण्ठ’ शब्द के साथ पदलांछन का प्रयोग यह स्पष्ट करता है कि वास्तव में ‘श्रीकण्ठ’ कवि का कोई भूषित करने वाला विरुद था, जिसका अर्थ है ‘श्रीः सरस्वती कण्ठे यस्य’ (जिसके कण्ठ में सरस्वती का निवास हो।)। ‘भवभूति’ शब्द के समीप ‘नाम’ शब्द का प्रयोग होना यही सूचित करता है कि कवि का नाम भवभूति था–जिससे वह संसार मे प्रसिद्घ है।

महावीरचरित की प्रस्तावना में भवभूति के पिता का नाम नीलकण्ठ तथा पितामह का नाम भटट्गोपाल कहा गया है। पिता के नाम में ‘कण्ठ’ शब्द का विन्यास देख कर यह भ्रम हुआ प्रतीत होता है कि कवि का नाम श्रीकण्ठ था। परन्तु यह परम्परा स्वीकार कर ली जाए तो पितामह के नाम में भी ‘कण्ठ’ पद का प्रयोग होना आवश्यक था।
राजशेखर (दशम शती) ने बालचरित में, कल्हण (द्वादश शती) ने राजतरंगिणी में तथा गोवर्धनाचार्य (चतुर्दश शती) ने आर्यासप्तशती में यशोवर्मा के समकालीन सुविख्यात कवि भवभूति का वर्णन किया है। मालतीमाधव में तो ‘भवभूति नामा’ लिखकर कवि ने सन्देह को सर्वथा मिटा दिया है कि उसका नाम ‘भवभूति’ ही था, ‘श्रीकण्ठ’ कोई उसका विभूषक पद था।

मालतीमाधव की एक पुरानी हस्तलिखित पुस्तक में ‘प्रकरणमिदं कुमारिल-शिष्यस्य उम्बेकाचार्यस्य’ (अर्थात् यह मालतीमाधव-प्रकरण कुमारिल के शिष्य उम्बेकाचार्य का लिखा हुआ है) ऐसा निर्देश प्राप्त होता है, जिससे भवभूति का एक अन्य नाम उम्बेकाचार्य भी प्रतीत होता है। उम्बेकाचार्य कुमारिल भट्ट-कृत ‘श्लोक वार्तिक’ के टीकाकार-रूप में भी प्रसिद्ध है। वेदान्त के विख्यात ग्रन्थ ‘तत्व प्रदीपिका’ में चित्सुखाचार्य ने जहाँ ‘उम्बेक’ नाम की चर्चा की है, वहाँ भी टीकाकार ने भवभूति तथा उम्बेक का तादात्म्य प्रतिपादित किया है। ‘श्लोक वार्तिक’ की तात्पर्य टीका के रचयिता का नाम ‘भट्ट उम्बेक’ रूप में प्रदर्शित किया गया है। भवभूति के पितामह का नाम भट्टगोपाल था। विद्वत्समाज में शास्त्र चतुष्टयवेत्ता को ‘भट्ट’ उपाधि से विभूषित करने की प्रथा थी। इसीलिए पितामह के समान भवभूति के ‘उम्बेक’ नाम से पूर्व ‘भट्ट’ पद का प्रयोग किया गया, ऐसा माना जा सकता है।

इस नाम के विषय में कुछ सन्देह का भी स्थान अवश्य है, क्योंकि मालतीमाधव के उपर्युक्त उद्धरण में तो उम्बेक को कुमारिल-शिष्य कहा गया है। परन्तु महावीरचरित की प्रस्तावना में भवभूति के गुरु का नाम ज्ञाननिधि लिखा गया है–

श्रेष्ठः परमहंसानां, महर्षीणामिवाऽङ्गिराः।
यथार्थनामा भगवान्, यस्य ज्ञाननिधिर्गुरुः।।

परन्तु इस सन्देह का निवारण इस तरह हो सकता है कि सम्भवतः ‘ज्ञाननिधि’ ही कुमारिल भट्ट का दूसरा नाम था। अथवा ज्ञाननिधि और कुमारिल भट्ट-दोनों ही भवभूति के गुरु थे। भवभूति ने सम्भवतः कुमारिल भट्ट से पूर्वमीमांसा का तथा ज्ञाननिधि से उत्तरमीमांसा का अध्ययन किया था। उत्तररामचरित की प्रस्तावना में भवभूति का ‘पदवाक्य प्रमाणज्ञ’ विशेषण एवं उसी नाटक के चतुर्थ अंक में दाण्डायन-सौधातकि संलाप में–

समांसो मधुपर्क इत्याम्नायं बहु मन्यमानाः श्रोत्रिया–
याभ्यागताय वत्सतरीं महोक्षं या पचन्ति गृहमेधिनः।
तं हि धर्मं धर्मसूत्रकाराः समामनन्ति।


ऐसा उल्लेख करना भवभूति की श्रौतकर्म-विज्ञता एवं मीमांसाशास्त्र-निपुणता को प्रकट करता है।
अतः ज्ञाननिधि तथा सुमारिल भट्ट के शिष्य भवभूति का एक अन्य नाम उम्बेकाचार्य अथवा भट्टउम्बेक स्वीकार करने में विशेष विप्रतिपत्ति अवशिष्ट नहीं रह जाती।
भवभूति का जन्मस्थान कौन-सा था–इस सम्बन्ध में महावीरचरित तथा मालतीमाधव से कुछ संकेत प्राप्त होता है। ‘अस्ति दक्षिणापथे पद्मपुरं नाम नगरम्’ तथा ‘दक्षिणापथे विदर्भेषु’ निर्देश क्रमशः दोनों नाटकों में उपलब्ध होते हैं। इनसे स्पष्ट है कि दक्षिणापथ में विदर्भ प्रान्त के पद्मपुर नामक नगर में कवि का जन्म हुआ। दक्षिणापथ भारत का कौन-सा भाग था, इसका परिचय महाभारत के निम्नलिखित उद्धरण से स्पष्ट होता है–

एते गच्छन्ति बहवः, पन्थानो दक्षिणापथम्।
अवन्तिमृक्षवन्तञ्च, समतिक्रम्य पर्वतम्।।
एष पन्था विदर्भाणामसौ गच्छति कोशलान्।
अतः परञ्च देशोऽयं, दक्षिणे दक्षिणापथः।।

–ये अनेक मार्ग दक्षिणापथ को जा रहे हैं। यह ऋक्षवत् पर्वत को पार करके अवन्ति की तरफ जा रहा है। यह मार्ग विदर्भ को जा रहा है, और वह कोशल को। उस स्थान के दक्षिण में स्थित देश को दक्षिणापथ नाम से कहा जाता है।
इस कथन में सम्भवतः अशुद्धि न होगी कि दक्षिणापथ वर्तमान दक्कन है, जो दक्षिण का ही अपभ्रंश है। विदर्भ वर्तमान बरार रूप में विद्वानों द्वारा प्रायः स्वीकार किया जाता है। इसी बरार प्रान्त में पद्मपुर नाम के नगर में कवि का जन्म हुआ। यह पद्मपुर वर्तमान कौन-सा नगर है, यह अभी तक निश्चय नहीं किया जा सका।

यद्यपि भवभूति का जन्मस्थान बरार (पद्मपुर) था, तथापि उसने अपने जीवन का बड़ा भाग कान्यकुब्ज में व्यतीत किया जहाँ वह महाराज यशोवर्मा के दरबार में राजकवि-रूप में था। सुप्रसिद्ध इतिहासकार कल्हण ने राजतरंगिणी में महाराज मुक्तापीड ललितादित्य (कश्मीर-नरेश) द्वारा कान्यकुब्ज के राजा यशोवर्मा के पराजित होने का वर्णन किया है। ‘‘जिसने स्वयं कवि होने के कारण अपने विजेता का, कविता करके, यशोगान किया।’’ कल्हण ने यशोवर्मा के सम्बन्ध में यह भी लिखा है कि उसके दरबार में वाक्पति, राजश्री, भवभूति आदि कवि उसकी सेवा करते थे–

कविर्वाक्पति-राजश्री-भवभूत्यादिसेवितः।
जितो ययौ यशोवर्मा, तद्गुणस्तुतिवन्दिताम्।।

इतिहासकारों द्वारा यशोवर्मा का काल सप्तम शती का उत्तरार्ध माना जाता है। अतः भवभूति कवि का काल भी यही स्वीकार किया जाना उचित है।
ऐसा प्रतीत होता है कि भवभूति को अपने जीवन-काल में कीर्ति-लाभ नहीं हो सका। कालिदास, बाणभट्ट आदि ने जो ख्याति जीवित अवस्था में प्राप्त कर ली, वह भवभूति के भाग्य में न आ सकी। अतएव निराशा से क्षुब्ध होकर उसने मालतीमाधव नाटक में लिख दिया (निम्नलिखित श्लोक भट्टउम्बेक-कृत ‘श्लोकवार्तिक’ की तात्पर्य टीका में भी मिलता है–जो भवभूति तथा भट्टउम्बेक के तादात्म्य को प्रमाणित करता है)–

ये नाम केचिदिह न प्रथयन्त्यवज्ञां
जानन्ति ते किमपि तान् प्रति नैष यत्नः।
उत्पत्स्यते तु मम कोऽपि समानधर्मा
कालो ह्मयं निरवधिः विपुला च पृथ्वी।।

भवभूति ने निराशा में भी इस आशा को प्रकट किया कि अवश्य कोई ऐसा समय आएगा, जब उसकी कविता का संसार में आदर होगा। उसे विश्वास था की गुणग्राही लोग उत्पन्न होंगे और उसकी रचनाओं का उचित मू्ल्यांकन करेंगे।

लोगों की राय

No reviews for this book