आसपास से गुजरते हुए - जयंती Aaspas Se Gujarte Huye - Hindi book by - Jayanti
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आसपास से गुजरते हुए

जयंती

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2001
पृष्ठ :159
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 6988
आईएसबीएन :81-267-0288-5

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आसपास से गुजरते हुए

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

‘अनु...सर्दियों की एक खुशनुमा ढलती साँझ में मेरे जेहन में आई थी। शाम से लेकर पूरी रात वह मेरे साथ रही। अगले ही दिन मैंने तय कर लिया कि अनु को आकार देना चाहिए। अनु जैसी किसी से मैं आज तक मुखातिब नहीं हुई हूँ। पर टुकड़ों में उसकी छवियाँ मेरे आसपास से गुजरती रही हैं। आज के दौर की एक सामान्य सी युवती है अनु, जो कुछ परवरिश के तौर तरीके के चलते, तो कुछ परिस्थितिवश और बहुत कुछ अपने स्वभावगत गुण-अवगुण की वजह से लीक से हटकर चलने की कोशिश में लगी हैं।’
इस उपन्यास की नायिका के बारे में लेखिका का यह वक्तव्य, अगर बहुत ज्यादा नहीं तो इतना तो बताता ही है वह एक ‘लीक से हटकर’ चलने वाली युवती है, उसके खाके को पूरा करने के लिए  इतना-भर और जोड़ लेना काफी होगा कि वह हमारे दरवाजे के बाहर खड़े, ‘इन्स्टैंट’ वर्तमान से उठी हुई नायिका है।... अपनी टुकड़ा-टुकड़ा छवियों में ही आकार लेती हुई।

 

गलियाँ अनजानी

 

मुझे पता चल गया था कि मैं प्रेग्नेंट हूँ। मैं शारीरिक रूप से पूरी तरह सामान्य थी। ना शरीर में कोई हलचल हो रही थी, ना मन में। मैं अपनी लम्बी कोचीन यात्रा के लिए सामान बाँध रही थी। बहुत दिनों बाद मैंने अटारी में से अपना सबसे बड़ा सूटकेस निकाला। झाड़-झूड़कर बैठी, तो चाय पीने की तलब हो आई। मैंने लिस्ट बना रखी है कि मुझे क्या-क्या लेकर जाना है वरना पता नहीं कितनी चीजें मिस कर दूँगी। चाय का पानी गैस पर खौलाने रखा और मैं लिस्ट पर नजर दौड़ाने लगी। दूसरे ही नम्बर पर था सेनेटरी....। फरवरी की ठण्डी दोपहरी में भी मेरी नसों मे पसीना दौड़ गया। पिछले बीस-पच्चीस दिनों से रोज तैयारी करके बाहर जा रही हूँ। यानी, यानी....मैं एकदम से उठकर खड़ी हो गई। शर्ली भाभी दो-तीन घण्टे में कलकत्ता से दिल्ली मेरे घर पहुँचती ही होगी, यानी मेरे पास तो डॉक्टर के पास जाने तक का समय नहीं है।
पता नहीं कितने दिन रहना पड़ेगा कोचीन में। हो सकता है, अप्पा खुद हमें वहाँ ठहरने ना दें। कोचीन जाने की योजना भी अचानक ही बनी थी। कभी सोचा नहीं था कि अप्पा ऐसा करेंगे। पिछले हफ्ते देर रात को सुरेश भैया का फोन आया था, उनकी आवाज बैठी हुई थी। वे पूछ रहे थे, ‘‘तुझे निमन्त्रण-पत्र मिला ?’’
‘‘कैसा निमन्त्रण ?’’ मैं अचकचा गई। मैंने चार दिनों से अपनी डाक नहीं देखी थी, हो सकता है, आया पड़ा हो।
‘‘अप्पा शादी कर रहे हैं !’’ सुरेश भैया ने रुककर कहा।
मैं सन्न रह गई। अट्ठावन साल की उम्र में अप्पा शादी कर रहे हैं ? लेकिन उन्होंने आई से तलाक कहाँ लिया है ? क्या आई को पता भी है ?

‘‘सुन रही है अनु ? हमें कुछ करना होगा, आई के लिए। अप्पा को शादी से रोकना होगा।’’
‘‘लेकिन अप्पा क्यों कर रहे हैं शादी ?’’ मैं पूछे बिना नहीं रह सकी।
‘‘ये मैं कैसे बताऊँ ? फिलहाल तो मैं सोच रहा हूँ कि हमें जल्द-से-जल्द कोचीन पहुँचकर अप्पा को मना लिया...’’‘
‘‘जरूर अप्पा की बड़ी बहनों ने उन्हें उकसाया होगा !’’
‘‘अनु, मैंने कल आई से बात की। उन्हें तो पता भी नहीं। अप्पा ने हम तीनों भाई-बहनों की अपनी शादी पर बुलाया है। विद्या दीदी भी आ रही है दुबई से। मुझे लगता है, अगर हम वहाँ पहले पहुँच जाएँ, तो शादी रोक सकते हैं। तू अपने आँफिस से छुट्टी ले ले। मैं और शर्ली कल या परसों की ट्रेन से दिल्ली पहुँच जाएँगे। फिर हम सब साथ में कोचीन चलेंगे।’’ सुरेश भैया की आवाज काँप रही थी।

मैं बहुत ज्यादा डिस्टर्ब हो गई। अप्पा को क्या हो गया ? मन के कोने में यह बात भी आई कि करने दो उनको शादी, वैसे भी आई और अप्पा सालों पहले दिल से अलग हो चुके हैं। अप्पा की दूसरी शादी से आई को क्या फर्क पड़ जाएगा ? यही ना कि वे अब किसी के नाम का सिन्दूर नहीं लगा पाएँगी, गले में पड़ा मंगलसुत्र मतलब खो देगा ? पर शायद फिर पापा पुणे का घर भी आई से छीन लेंगे। वही तो एकमात्र सम्बल है आई का। अपने घर के  बल पर वे ना जाने कितनी लड़ाइयाँ लड़ जाती है, कभी अपना आँगन नहीं छोड़ती। आई के लिए दिल पिघलने-सा लगा। क्या मिला उनको अप्पा से शादी करके ? बस तीन बच्चे और जिन्दगी-भर का दुःख !

मैंने दफ्तर से दस दिन की छुट्टी ले ली। वैसे भी पिछले दो सालों से मैंने बहुत कम छुट्टी ली थी, सिवाय पिछले महीने के वो दिन। पिछले दिनों मैं लगातार काम कर रही थी, तन-मन थक चुका था। मुझे भी एक ब्रेक की सख्त जरूरत थी। मैंने अपने ही दिन मंगलम एक्सप्रेस से दिल्ली से कोचीन जाने के लिए तीन टिकट बुक करा लिये। फरवरी का महीना था, मुझे आराम से टिकट मिल गया।
कल रात सुरेश भैया का फोन आ गया कि वे शर्ली के साथ दिल्ली नहीं आ पाएँगे। उन्हें कुछ जरूरी काम आ गया है। वे कलकत्ता से भोपाल हवाई जहाज से आ जाएँगे और वहाँ से मंगलम एक्सप्रेस ले लेंगे। कल सबेरे लगभग नौ बजे की ट्रेन है, शर्मी भाभी के घर पहुँचने से पहले अगर मैं डॉक्टर के पास हो आऊँ ? अगर डॉक्टर ने कह दिया कि मैं प्रेग्नेंट हूँ, तो.....! मेरे अन्दर तक सिहरन दौड़ गई।

31 दिसम्बर की रात को जब मैं शेखर के साथ इक्कीसवीं सदी में कदम रख रही थी, तब शायद पल-भर को भी यह ख्याल दिमाग में नहीं आया था कि मुझे या उसे आगे की सोच लेनी चाहिए। कभी सोचा भी नहीं था कि शेखर इस तरह दफ्तर की पार्टी के बाद मुझे घर छोड़ने आएगा और हम दोनों ऐसे मोड़ पर आ खड़े होंगे, जहाँ और कुछ मुमकिन ना होगा। पार्टी में शेखर की मंगेतर माना हमारे साथ ही थी। उसका भाई कल सबेरे की फ्लाइट में न्यूयार्क जा रहा था। वह रात को किसी भी हालत में घर जाना चाहती थी। शेखर ने अपनी नई सान्त्रा में पहले उसे छोड़ा। माना चाहती थी कि शेखर कुछ देर उसके घरवालों के साथ बिताए। शेखर गाड़ी से नीचे उतर आया, ‘‘रहने दो। अनु को भी घर छोड़ना है।’’
माना ने कुछ जोर देकर कहा, ‘‘तुम भी जाओ न अनु ! आज तो घर में सभी हैं।’’
मैं बेमन से नीचे उतर आई। मुझे अपरिचित लोगों से मिलना कोई खास पसन्द नहीं है। माना मेरा परिचय शेखर के बॉस के रूप में करा रही थी। मैं असहज महसूस कर रही थी। शेखर उस घर का होनेवाला दामाद था। माना के पापा निखालिस दिल्लीवाले अन्दाज में अपने दामाद को इम्प्रेस करने में जुटे हुए थे। मैंने अपना चेहरा फेर लिया। भले मैं चाहे जो कर लूँ, दिल्ली की कभी नहीं हो पाऊँगी।

एक तरफ दिलेर मेहन्दी का नया एलबम बज रहा था, दूसरी तरफ राजस्थान के लोक गायक ढपली पर तान आलाप रहे थे। मैं लॉन में जाकर बैठ गई। कड़कती ठण्ड मेरी हड्डियों में जमने लगी। मैं बीच में अलाव में आँच तापने लगी। माना मेरे लिए जिन ले आई। और कोई दिन होता, तो मैं मना कर देती। आज तो लग रहा था जैसे कुछ गर्म या तेज ना पिया तो बस अगले क्षण मैं बर्फ बन जाऊँगी।
मैंने लगातार तीन-चार पैग जिन पी ली। शेखर मुझसे पूछ गया कि मैं कम्फर्टेबल तो हूँ। आधे घण्टे बाद लगने लगा जैसे गर्म हवा चलने लगी हो। मैं उठ खड़ी हुई। दरवाजे से बाहर आई, तो पीछे शेखर दौड़ता हुआ आया, ‘‘कहाँ जा रहीं हो अनु ?’’
मैंने मासूमियत के साथ कहा, ‘‘घर।’’
‘‘इस वक्त अकेली जाओगी ? रुको, मैं छोड़ देता हूँ।’’
रात के ग्यारह बज रहे थे। मैं नहीं चाहती थी कि माना मुझे लेकर कुछ गलत सोचे। शेखर ने जिद करते हुए कहा, ‘‘मेरी वजह से तुम अपनी कार लेकर नहीं आई। दिल्ली इन दिनों बिल्कुल सेफ नहीं है। या तो तुम यहीं रुक जाओ रात को।’’
‘‘नहीं, मुझे घर जाना है। अच्छा, तुम ड्रॉप कर दो।’’
शेखर बिना किसी से कहे अपनी गाड़ी निकाल लाया। मैंने पूछा भी, ‘‘माना से नहीं कहना ?’’
‘‘बस, तुम्हें छोड़कर मैंने वापस यहीं आना है।’’

शेखर ने फुर्ती से कार आगे बढ़ा ली। ग्रेटर कैलाश से मालवीय नगर की आधे घण्टे की दूरी उसने पन्द्रह मिनट में पूरी कर ली। और दिनों की अपेक्षा आज धुन्ध भी कम थी। मैं रास्ते भर नहीं बोली। कहीं यह महसूस कर रही थी कि आज रात जब पूरी दुनिया अगली सदी में प्रवेश कर रही होगी, मैं अपने दो कमरे के घर में बिल्कुल अकेली होऊँगी। शेखर ने घर के सामने गाड़ी रोक दी। मैं उतर गई। जिनका असर अब तक बरकरार था। मैं लड़खड़ाती हुई सीढ़ियाँ चढ़ने लगी। शेखर ने पीछे से आकर मुझे थाम लिया, ‘‘तुम ठीक तो हो ?’’
मैं जबर्दस्ती मुस्कुराई, ‘‘हाँ, अब तुम जाओ।’’

शेखर ने मेरी बात नहीं सुनी, वह मेरी बाँह पकड़कर मुझे ऊपर ले आया। उसकी आवाज सपाट थी, ‘चाबी कहाँ रखती हो तुम ?’’ मैंने किसी तरह अपने जैकेट की जेब से चाबी निकालकर उसे दे दी। दरवाजा उसने ही खोला, जैसे वह इस घर में रहता हो और मैं मेहमान हूँ। मुझे सच में चढ़ गई थी। पूरा बदन हल्का हो गया था, दिमाग मेरे काबू में रहा ही नहीं। मैं पता नहीं क्या अनर्गल बोले जा रही थी। शेखर चुपचाप सेटी पर मेरे पास आकर बैठ गया।
फिर पता नहीं क्या हुआ, हो सकता है, मैंने ही उसे कुछ कहा हो, वह मेरे पास आ गया, उसने मेरी बाँह थाम ली और मुलायम स्वर में कहा, ‘‘तुम डर क्यों रही हो ? मैं हूँ न !’’
मैं भावुक हो गई, ‘‘मुझे कोई प्यार नहीं करता शेखर,’’ मैं रौ मैं बहकती चली गई, ‘‘देखो, आज रात भी मैं बिल्कुल अकेली हूँ। किसी को मेरी सुध लेने की फुर्सत नहीं।’’
शेखर ने बिल्कुल हेडमास्टर की तरह मेरे सिर पर हल्की चपत लगाई, ‘‘तुम्हें चले जाना था उनके पास। वैसे तुम तो पुणे जाने वाली थीं न माँ से मिलने ! क्या हुआ ?’’

‘‘आई अपनी दीदी के साथ कोल्हापुर गई हैं नया साल मनाने। मैं वहाँ क्या करती ?’’ मेरे स्वर में उदासी थी, ‘‘कहने को तो सब हैं शेखर अप्पा, आई, दीदी, भाई, पर सबकी अपनी जिन्दगी है। मैं जब भी उनके पास रहने जाती हूँ, दो ही दिन में वापस आने के लिए छटपटाने लगती हूँ।’’
शेखर ने हाथ पकड़कर मुझे बिस्तर पर बिठा दिया, उसने मेरे पास बैठते हुए सहजता से पूछा, ‘‘अनु, तुम शादी क्यों नहीं कर लेती ?’’
मैं क्षण-भर को चुप रही और हमेशा वाला उत्तर दोहरा दिया, ‘‘क्या करूँ, कोई मिलता ही नहीं !’’
‘‘मैं नहीं मानता। सच कहो...’’

‘‘सच...’’ मैं थम गई, मैंने ईमानदारी से बताना शुरू किया, ‘‘मैं अठारह साल की थी। सेकेण्ड इयर में पढ़ रही थी। मेरे कॉलेज का एक सीनियर था, मेरी दो-तीन साल उससे अफेयर रहा। फिर....उसने कहीं और शादी कर ली। मैं बुरी तरह हिल गई। कुछ सालों के लिए मर्दों से नफरत-सी हो गई। अब भी अन्दर एक डर-सा बना हुआ है कि अगर मैं किसी को बहुत पास आने दूँगी, तो वह मुझे दगा दे जाएगा। मैं एक बार फिर उस दौर से गुजरने को तैयार नहीं।’’
शेखर ने एक दोस्त की तरह मेरी बाँहें थामीं, हाथ दबाया। मैं शेखर को सिर्फ छह महीने से जानती थी। शायद मुझसे तीन-चार साल छोटा होगा। आँफिस में वह मुझे मैडम कहता था। धीरे-धीरे दूसरों की देखा-देखी अनु कहने लगा। मेरे नीचे चार सिस्टम अनालिस्ट काम करते थे। मैं प्रोजेक्ट मैनेजर की उन चारों मे शेखर सबसे शान्त रहता था। दूसरे हर वक्त चुटकुले सुनाते रहते, इंटरनेट पर ‘हॉट साइट’ की बात करते, शेखर बस दूर से मुस्करा-भर देता।


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