पहला गिरमिटिया - गिरिराज किशोर Pahla girmitiya - Hindi book by - Giriraj Kishore
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पहला गिरमिटिया

गिरिराज किशोर

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :904
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 696
आईएसबीएन :81-263-0760-9

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प्रस्तुत है महात्मा गाँधी के जीवन पर आधारित उपन्यास...

Pahla girmitiya

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

इस बृहद् उपन्यास के नायक महात्मा गाँधी नहीं हैं, मोहनदास हैं - हमारे जैसा एक आदमी, वह भी ‘इकसाला’ गिरमिटिया, लेकिन रोजी-रोटी के लिए दक्षिण अफ्रीका गया था। वह पहला गिरिमिटिया था, जो बैरिस्टर भी था और कुली भी। उसने दक्षिण अफ्रीका के दूसरे पाँच-साला गिरिमिटियों को साथ लेकर उनकी मुक्ति का बिगुल बजाया था, जिसमें हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, पारसी-सब एशियाई शामिल थे।..उपन्यास लिखने के दौरान उन्होंने दक्षिण अफ्रीका, इंग्लैण्ड, मारीशम की यात्राएं कीं और तथ्यों घटनाओं, स्थलों और पात्रों से अपने को जोड़ा, सामग्री इकट्ठी की, और जो सार मिला उसे प्रामाणिकता के साथ संवेदना और अभिव्यक्ति के धागे में गूँथा। दक्षिण अफ्रीका में रहते हुए गाँधी जी ने संघर्ष और आत्मदान का एक सपना देखा था,उसी संघर्ष और स्वप्न को गिरिराज किशोर ने अपने उपन्यास का विषय बनाया है। अपने इस उपन्यास में उन्होंने दक्षिण अफ्रीका की गन्ध को बनाये रखा है और उन गिरमिटियों के पसीने की खुशबू को भी नहीं खोने दिया है जिन्होंने तमान यातनाओं के बीच जीवित रहने का संकल्प किया था। कहना न होगा कि मोहनदास कर्मचंद्र गाँधी के अन्तरंग मन और उनकी चेतना को भी इस उपन्यास में पकड़ने की कोशिश की गयी है और गाँधी के अन्तर्विरोधी के बारे में भी उपन्यास पूरी तरह मुखर है।

उपन्यास से पहले…

महात्मा गाँधी के जीवन के तीन पक्ष हैं-एक ‘मोहनिया पक्ष’, दूसरा ‘मोहनदास पक्ष’, तीसरा ‘महात्मा गाँधी पक्ष’। हर आदमी के जीवन में ऐसा विभाजन होता है। परन्तु किसी भी महान् व्यक्ति के जीवन के विकास के सन्दर्भ में ये पक्ष महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। कृष्ण के जीवन में भी इसी तरह कान्हा या गोपाल पक्ष, कृष्ण पक्ष, योगिराज कृष्ण पक्ष थे। बैरिस्टरी से लेकर दक्षिण अफ़्रीका से लौटने तक उनका मोहनदास पक्ष है या गाँधी भाई पक्ष। बीच-बीच में उनका मोहनिया पक्ष भी आता रहता है। कभी शेख़ मेहताब के माध्यम से, कभी कस्तूर के माध्यम से, कभी बा और बापू के माध्यम से और कभी उनकी याद के जरिये।

सवाल उठ सकता है, मैंने अपने उपन्यास के लिए ‘मोहनदास पक्ष’ ही क्यों चुना ? अप्रैल 1995 में गाँधी जी पर उपन्यास लिखने की दृष्टि से जब मैंने दक्षिण अफ़्रीका और मारीशस की यात्रा की तो मैं तब तक ‘मोहनिया पक्ष’ को लेकर लगभग दो सौ पृष्ठ लिख चुका था मेरा इरादा यही था कि मैं सम्पू्र्ण गाँधी पर उपन्यास लिखूँ। अगर मैं ऐसा करता तो शायद यह संसार के समस्त सागरों को तैरकर पार करने जैसा होता। मोहनदास पक्ष को लेकर उपन्यास लिखने में ही मुझे लगा कि मैं हिन्द महासागर को तैरकर पार करने की गुस्ताखी और जुर्रत कर रहा हूँ। जरूर डूब जाऊँगा। चूँकि सम्पूर्ण गाँधी पर उपन्यास लिखने का मन था इसलिए वर्धा और पोरबन्दर आदि जगहों की यात्रा कर चुका था। बाकी जगहों की यात्रा करने का जुगाड़ बैठा रहा था। लेकिन दक्षिण अफ़्रीका की यात्रा करने के बाद मैंने तय किया कि मोहनदास पक्ष और उसमें भी दक्षिण अफ़्रीकी गाँधी पर ही उपन्यास लिखना ठीक होगा। दक्षिण अफ़्रीका मुझे गाँधी की स्मृतियों से भरपूर लगा। इसमें कोई शक नहीं कि गाँधी हमारी आजादी के संघर्ष-पुरूष हैं लेकिन मोहनदास एक आम आदमी की संवेदना और अनुभवों के ज्यादा नजदीक है। आगे आने वाली पीढ़ी को मोहनदास की ज्यादा जरूरत है जिससे वह जान सके मोहनदास महात्मा गाँधी कैसे बने ? गाँधी कैसे बना ? गाँधी एक नौतिक पुरूष होने का साथ समाज-पुरूष भी है जो अपनी कमजोरियों को कभी नहीं छुपाता। अपनी कमजोरियों का अहसास ही महानता का द्वार खोलता है। दक्षिण अफ़्रीका जाकर उन स्थलों, सड़कों, शहरों, और सन्दर्भों को देखना और उनसे मानसिक रूप से जुड़ना मेरेलिए मोहनदास को अपने अन्दर जीने की तरह था। अब तक मेरे उपन्यास और कहानियों और मेरे अपने परिवेश का हिस्सा थे। जगह, मुहल्ले सड़कें, दफ्तर और अनुभव सबमें मैं था और मुझसे सब थे। दक्षिण अफ़्रीका जाकर मुझे लगा कि मैं अपने-आप से पहली बार बाहर आ रहा हूँ। मेरे अपने अनुभव से बाहर भी एक बहुत बड़ी दुनिया है और उसमें भी मैं हजारों, लाखों प्रवासी भारतीयों और मोहनदास के माध्यम से मौजूद हूँ। इस यात्रा से मुझे महसूस हुआ कि किसी रचना के लिए उसमें जागते और जीते स्थलों, नगरों, सड़कों आदि को देखना कितना जरूरी होता है।

वे सब भी बृहद रचना-संसार के महत्त्वपूर्ण रचना बिन्दु होते हैं। एक नया संसार निर्मित करने में मदद करते हैं। मोहनदास का पूरा संघर्ष एक बेगानी धरती पर एक अनजाने और आम आदमी का संघर्ष था। हर विस्थापित आदमी को, चाहे वह अपने देश में हो या विदेश में, संघर्ष करना पड़ता है भले ही देश काल की दृष्टि से परिणाम या गुणात्मकता में अन्तर हो। हर कोई अपने जीवन में एक निर्धारित, अनिर्धारित या अल्प निर्धारित उद्देश्य की तरफ बढ़ने में उद्यम करता है। उसके लिए त्याग करता है, पीड़ाएँ सहता है, आकांक्षाएँ पालता है। जो भी सम्भव है, जरूरी, गैर-जरूर सब कुछ करता है। मोहनदास, का उद्देश्य स्पष्ट रुप से निर्धारित संघर्ष नहीं था। मैं कहूँगा, कारवाँ बढ़ता गया मंजिल का परिदृश्य निखरता गया। उसके महात्मा बनाने का रास्ता इन्हीं अनिश्चितता त्याग, संघर्ष पीड़ा, अपमान आदि सँकरी गलियों में से गुजरा था। महात्मापन मनुष्य के आन्तरिक विकास की पराकाष्ठा है। यह बात हर क्षेत्र पर लागू होती है। एक महात्मा जहाँ एक खुली किताब हो सकता है वहीं वह गुह्यतम पोथी भी है। दरअसल, प्रयत्न और संघर्ष ही कथा बनाते हैं। उपलब्धि तो शिखर होता है जो दूर से नजर आता है। कथा हमेशा संघर्ष की ही होती है।

इस उपन्यास का मुख्य पात्र मोहनदास उतना ही सामान्य व्यक्ति है जितना कोई भी हो सकता है। वह न चाँदी का जूता पहन कर पैदा हुआ था और न सोने का मुकुट। पत्नी के जेवर बेचकर लन्दन बार-एट-लॉ करने गया था। पिता मर चुके थे, चाचा ने बहाना बनाकर अगूँठा दिखा दिया था, बड़े भाई की सीमित सामर्थ्य थी। जब बैरिस्टर बनकर लौटा तो बेरोजगारी का आलम। बड़े भाई पर निर्भरता। कचहरी की अनैतिकताओं और व्यक्तिगत नैतिक मूल्यों के बीच टकराव। बोल न पाने के कारण मुकदमों में हार। जो भी मिलता था वह बड़े भाई के वकील दोस्त के मुवक्किलों की मसौदा-नवीसी से। उसका भी एक हिस्सा वकील ले लेता था। शोषण का यह ढंग मोहनदास को बैचैन रखता था। नतीजा, देश के हजारों गरीब, अनपढ़, बेरोजगार मजदूरों की तरह उस बैरिस्टर को भी रोजी-रोटी कमाने के लिए एक साल के गिरमिट (एग्रीमेण्ट) पर दक्षिण अफ़्रीका के लिए कूच करना पड़ा था।

बस फर्क इतना ही था कि उसकी पगार बैरिस्टरी के कारण गिरमिटियों से दस गुना थी। वहाँ गया तो ऊपर से पूरा अँग्रेज, अन्दर से भारतीय। माँ का सत्य और सहिष्णुता, पिता की सदाशयता और आत्म-सम्मान। पहले दिन ही अपने ‘मेण्टर’ दादा अब्दुल्ला के साथ डरबन के ‘कोर्ट रूम’ में हिन्दुस्तानी पहचान बनाये रखने के लिए गुजराती फेंटा यानी पगड़ी बाँधकर दाखिल हुआ तो बहुक्म अदालत पगड़ी उतारने से दरवाजा देखना बेहतर समझा। प्रिटोरिया जाते हुए मेरिट्जबर्ग के स्टेशन पर फर्स्ट क्लास के डिब्बे से बण्डल की तरह बाहर फेंक दिया गया, स्टेट कोच, में कोचवान द्वारा पीटा गया, यह सब उसकी नियति का हिस्सा बनता गया था। वहाँ वह कितना पिटा, कितना दुत्कारा गया इसका कोई हिसाब नहीं। जितनी बार ऐसा हुआ उसकी क्षमा का ताल उतना ही गहरा होता गया, सहिष्णुता और सदाशयता परवान चढ़ती गयी, सत्य निकट आता गया। संवेदना कुशाग्र होती गयी। इन्सान के अन्दर झाँकने की दृष्टि गहरी होती गयी। सत्य का साक्षात्कार और उसके साथ प्रयोग बढ़ते गये। सामान्य के महान् और महान् से सामान्य बनने का संघर्ष गहरा होता गया।
दक्षिण अफ़्रीका के गांधी-साहित्य और जीवन के गहन अध्येता श्री हासिम-सीदात ने मुझसे वहाँ एक बात कही थी, ‘‘किशोर भाई, मुझे इस बात का गर्व है कि संसार का सबसे बड़ा हीरा हमारी खानों से निकला लेकिन हमने उससे भी बेसुमार कीमती और पानीदार हीरा गाँधी के रूप में आप लोगों को वापस किया।’’

मोहनदास यानी गाँधी के बारे में सामान्यतः धारणा है कि वह व्यवसायियों का दर्दी और दोस्त था जबकि वह मूलतः गिरमिटिया था। उनके दर्द उसके दिल में पैवस्त थे। तीन पौण्डिया टैक्स गिरमिटियों पर भारी था, बीवियों की यानी भारतीय शादियों की वैधता के बारे में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सर्ल का फैसला सबसे ज्यादा उन्हीं लोगों को प्रभावित करता था क्योंकि संख्या में भी वे लोग ज्यादा थे और भाग कर कहीं जा भी नहीं सकते थे। व्यवसायियों के लिए ये दोनों बातें अपेक्षाकृत आसान थीं। अन्त में यही दो मुद्दे लड़ाई के एजेण्डा पर रह गये थे। इस पूरी लड़ाई में गिरमिटिये ही उनके साथ थे। व्यवसायी पर्दे के पीछे थे। हालाँकि वहाँ के गोरों की नजर में सब कुली थे। कुलियों में से ही वह भी एक कुली था-गाँधी–द-कुली बैरिस्टर।

मैंने हासिम-सीदात साहब का जिक्र किया । वे डरबन के वरिष्ठ अटर्नी हैं और वहाँ की लॉ सोसायटी के पहले अफ़्रीकन भारतीय पदाधिकारी थे। वे गाँधियन इतिहास के अधिकारी विद्वान माने जाते हैं। गाँधी पर उनकी व्यक्तिगत लाइब्रेरी इतनी बड़ी है जो भारत में किसी की नहीं। संसार-भर के सब जर्नल्स, गाँधी पर प्रकाशित पुस्तकें, अखबारों की फाइलें वहाँ मौजूद हैं। उन्हीं के द्वारा और उन्हीं की लाइब्रेरी में इस ‘मोहनदास’ से मेरा अन्तरंग परिचय हुआ था। श्री हासिम सीदात से मेरा परिचय एक दूसरे अटर्नी श्री आनन्द जयराज ने कराया था। श्री हासिम सीदात ने मुझे दो पुस्तकें भी भेंट-स्वरूप दी थीं-मिली पोलक द्वारा लिखी जीवनी की फोटोकापी और दक्षिण अफ़्रीका में प्रकाशित मैरिन वान की शोध पुस्तक ‘गाँधी द साउथ अफ़्रीकन एक्सपीरियंस’। फ़ातिमा मीर द्वारा सम्पादित ‘द साउथ अफ़्रीकन गाँधी’ 1995 में नदीब पब्लिशर्स एवं गाँधी मेमोरियल, डरबन के संयुक्त तत्त्वाधान में प्रकाशित हुई थी। यह पुस्तक, जब 1996 में वे मेरे निमन्त्रण पर भारत आये थे तो लेकर आये थे। गाँधी पर काम करने वाले हर व्यक्ति का उनके यहाँ स्वागत है। उनकी पत्नी फ़रीदा बेन तो मुझे हर जगह ड्राइव करके भी ले गयीं और मेरे लिए शाकाहारी भोजन भी बनाया। फ़रीदा बेन जैसा स्वभाव कम ही लोगों का होता है। दूसरे को अपना लेना।

मैंने यह अनुभव किया कि दक्षिण अफ़्रीका में गाँधी- प्रसंग के गम्भीर अध्येता ज्यादा हैं जैसे श्रीमती फ़ातिमा मीर, आर्कबिशप डेनिस हर्ले, निक्की पदायची, सीता धूपलिया, सुश्री जी बर्निंग (कुछ वर्ष पूर्व उन्होंने कैलनबेक और गाँधी के पत्रों का संकलन डरबन लोकल सिटी म्यूज़ियम से प्रकाशित किया था।) और स्वयं नेल्शन मण्डेला ! ‘द साउथ अफ़्रीकन गाँधी’ पुस्तक में हासिम सीदात समेत इन सब लोगों के लेख हैं।
आनन्द जयराज से मेरा सम्पर्क उ.प्र. संगीत नाटक अकादमी से पूर्व सचिव और संगीतज्ञ श्री विश्वनाथ श्रीखण्डे के माध्यम से हुआ था। श्रीमती शर्ले जयराज भी अपने पति की तरह भारतीयों के प्रति सम्मान का भाव रखती हैं। जयराज ने ही मेरे लिए होटल में ठहरने की व्यवस्था कराई थी। अशोक होटल भारतीय मूल के एक सज्जन मि. हेरी का है। जयराज ने ही मुझे डरबन एयरपोर्ट पर रिसीव किया था। फ़ीनिक्स सेटिलमेण्ट ट्रस्ट के अध्यक्ष श्री राम गोविन मेवा से, जो गाँधी जी की पौत्री इला गाँधी के पुर्व पति हैं, परिचय कराया था। श्री मेवा ही मुझे फ़ीनिक्स ले गये थे। इला गाँधी की तरह ही श्री मेवा भी संसद सदस्य हैं।

श्रीमती इला गाँधी एक सभ्य और सज्जन महिला हैं। वे ज्यादातर केपटाउन में रहती हैं। उन दिनों वे वहीं थीं। पूरे दिन वे मुझे अपनी कार में डरबन घूमाती रहीं। लेकिन मैंने यह अनुभव किया कि गाँधी परिवार गाँधी के बारे में कुछ कहना पसन्द नहीं करता। वैसे उन्होंने ही जोहान्सबर्ग में ठहरने का प्रबन्ध किया था, जब मैं मेवा जी के साथ सेटिलमेण्ट गया तो फ़ीनिक्स को देखकर मुझे अत्यधिक दुःख हुआ। वहाँ अब कुछ नहीं बचा। रास्ते में मुझे श्री मेवा ने फ़ीनिक्स के बारे में काफी कुछ बताया था। वहाँ जाकर मैंने सब-कुछ अपनी आँखों से देखा। सब खँडहर हो गया। इण्डियन ओपीनियन छापनेवाले प्रेस की बस दीवारें भर खड़ी हैं। गाँधी जी के घर का चबूतरा बचा है। पूरे घर तोड़ डाला गया। फ़ीनिक्स पर वतनी लोगों का कब्जा है। सरकार कुछ नहीं कर रही है। अण्डरवर्ल्ड से सम्बन्धित वहाँ सब-कुछ होता है। बस स्कूल की इमारत है। उस दिन स्कूल में ट्रस्ट की मीटिंग थी। इला जी भी आयी हुई थीं। कई वतनी भी ट्रस्ट में हैं। सेटिलमेण्ट की स्थापना करते हुए जब नामकरण किया गया था तो गाँधी जी ने कहा था-इसका नाम फ़ीनिक्स रखा जाना चाहिए। फ़ीनिक्स मरता नहीं। अपनी राख से पुनः-पुनः पैदा होता है। आज फ़ीनिक्स केवल राख है। शायद मोहनदास करमचन्द्र गाँधी का वचन कभी पूरा हो जाय और फ़ीनिक्स फिर चहचहा उठे।

डरबन, पीटरमेरिट्जबर्ग और जोहान्सबर्ग में कई स्थल ऐसे देखने को मिले जिन्हें देखकर मन भर आया। डरबन में सबसे पहले हासिम भाई पैदल चलाकर बीचग्रोव स्ट्रीट ले गये। उसी के पास वेस्ट स्ट्रीट पर दादा अब्दुल्ला की पेढ़ी थी। वहाँ अब नयी इमारतें खड़ी हैं। अन्दर जाकर स्ट्रीट पर एक कार पार्किंग था। उसे दिखाकर बोले, ‘किशोर भाई’ जहाँ यह कार पार्किंग है वहीं बीचग्रोव विला था। ‘बीच’ की तरफ एक बालकनी थी। कचहरी से लौटकर गाँधी कुछ देर बालकनी में बैठते थे। पोरबन्दरी होने के कारण समुद्री हवाएँ उन्हें बहुत पसन्द थीं।’
उस मकान का नामों निशान तक मिट चुका था।

ग्रे स्ट्रीट वहाँ से कुछ दूर पर थी। वहाँ काँग्रेस हाल था। उसमें अब एक बाजार था। हाल को दुकानों में बाँट दिया गया था। काँग्रेस का वहाँ कहीं पता नहीं था। फील्ड स्ट्रीट पर जहाँ रूस्तम जी पारसी का मकान था वहाँ अब चमकदार बहुमंजिली इमारत खड़ी थी। वहीं तथाकथित प्लेग के छूतक के कारण बन्दी जहाज कुरलैण्ड से उतरकर गाँधी आये थे और गोरों ने उन पर हमला किया था, वह जगह पुराने कस्टम ऑफिस से कुछ दूर वेस्ट स्ट्रीट पर थी। वहीं उन्हें धर लिया गया था। जहाँ पुलिस कप्तान अलेक्ज़ेण्डर का दफ्तर यानी ‘बरो थाना’ था और मोहनदास को रूस्तम जी के घर से ले जाकर रखा गया था। अब वहाँ मेडबुड गार्डन है। वह कोर्ट रूम भी देखा जहाँ पहले दिन मोहनदास फेटा बाँधकर गये थे और मजिस्ट्रेट ने फेटा उतारने का आदेश दिया था। वहीं अब लोकल हिस्ट्री म्यूज़ियम है। डरबन की जेल, जिसमें गाँधी और कस्तूरबा बन्द रह चुके थे, तोड़ दी गई थी। नयी बिल्डिंग की नीव खुद रही थी। उसका फोटो देखा तो लगा लोहा-लाठ जेल थी।

जयराज, मैं और हासिम भाई डरबन से पीटरमेरिट्जबर्ग गये। मेरिट्जबर्ग वह स्थल है जहाँ रेलगाड़ी से फेंके जाने पर मोहनदास की कुण्डलिनी जाग्रत हुई थी। अब मोहन दास के माहत्मा बनने का रास्ता खुल चुका था। मेरिट्जबर्ग का स्टेशन गौथिक कला का अच्छा नमूना है। ऊपर एक घण्टाघर है। अन्दर प्रवेश करते ही एक हाल है उस पूरे हाल में वुडवर्ग है। छोटे-छोटे फानूस लटके हैं। एक लकड़ी का जीना है जो ऊपर जाता है। वहाँ शायद दफ्तर है। उसका एक हिस्सा तब जला हुआ था। शायद आग लग गयी थी। जहाँ मोहनदास गिरे थे उस स्थान का अभी तक पूरी तरह निर्धारण नहीं हुआ। हाल के बाद प्लेटफार्म है। सामने ही बीचों बीच एक बेंच पड़ी है। यह बेंच तभी की है। उस बेंच के सामने ही फर्स्ट क्लास का डिब्बा आकर रूकता था। उसी के पास कहीं मोहनदास गिरे थे। पीटरमेरिट्जबर्ग नेटाल की राजधानी भी थी, वहीं सुप्रीम कोर्ट था जिसमें मोहनदास को बावजूद लॉ सोसायटी के विरोध के, चीफ जस्टिस ने अटर्नी नाम जद किया था। अब उस भवन में एक म्यूज़िम है। सड़क के पार ‘सिटी हाल’ है जो नेटाल के खूबसूरत भवनों में माना जाता है।

जोहान्सबर्ग में इला जी के सौजन्य से छिब्बू भाई के घर लेनेसिया में ठहरा था। छिज्जू भाई गुजरती हैं। सभ्य परिवार है। उन्होंने ही मेरा परिचय मि.एन.जी. पटेल ने कराया। मि. पटेल वहाँ के प्रमुख अटर्नी हैं और टालस्टाय ट्रस्ट की सेण्टनरी सेलीब्रेशन कमेटी के अध्यक्ष भी हैं। छिब्बू भाई सबसे पहले मुझे लॉली स्टेशन ले गये। वहाँ से टालस्टाय फार्म करीब एक मील दूर है। टालस्टाय फार्म की सारी जमीन अब ईंटें बनाने वाली एक डच फर्म के पास है। जमीन खरीदने के बाद जब उन्होंने उसका सर्वे किया तो उन्हें पता चला कि वहाँ टालस्टाय फार्म था। उस फर्म ने प्रमुख भारतीयों को बुलाया और उस जमीन में बना वह बँगला और कुछ जमीन उन्हें दे दी जिससे वह टालस्टाय फार्म की स्मृति को जीवित रख सकें। जिस हालत में वह बँगला मिला था, अब वह और भी बदतर हालत में है लायबेरी थी वह भी बरबाद हो गयी। उस बँगले के पत्थर और लकड़ी (वुडवर्क) आदि लोग निकाल ले गये। भारत के बड़े-बड़े नेता वहाँ जाते हैं, माथा टेकते हैं और लम्बे चौड़े वायदे करते चले आते हैं। फिर मुड़कर नहीं देखते। जब भारत सरकार को गाँधी के स्थलों से कुछ नहीं लेना-देना तो दक्षिण अफ़्रीका की सरकार का टालस्टाय फार्म से क्या मतलब ? हालाँकि अफ़्रीकन भारतीय इतने समृद्ध हैं कि वे कुछ भी कर सकते हैं परन्तु जैसे कि भारतीयों की मनोवृति है वहँ भी गुटबाजी है। मि.एच.के. भसीन वहाँ के डायरेक्चर कल्चर थे। वे काफी चाहते थे सब मिलकर काम करें। जब मैं उनसे मिलने गया तो मेरे साथ मि. पटेल और छिब्बू भाई भी थे। उनसे भी मि. भसीन ने इस मुद्दे पर बात की थी। लगता है अफ़्रीकन गाँधी भी भारतीय गाँधी की तरह राजनीति का मुद्दा बनता जा रहा है। मुझे हासिम भाई ने बताया कि बाद में भारत के उच्चायुक्त गोपाल गाँधी ने भी इस क्षेत्र में पहल की थी।

प्रिटोरिया में क्रूगर का महल है। महल क्या कोठी। कोठी के बाहर पत्थर के इतने ही दो शान्त शेर बैठे हैं जितने क्रूगर उग्र थे। उनके महल के सामने ही फुटपाथ पर चलने के फलस्वरूप गार्डों ने गाँधी की पिटाई की थी। लेकिन पूछने पर पता चला कि अब वहाँ इस घटना का किसी को मालूम नहीं। जोहान्सबर्ग में मोहनदास का पहला घर 14 एल्बमेरी स्ट्रीट था। एल्बमेरी स्ट्रीट गोरों की बस्ती थी। उसे भी छिब्बू भाई के साथ देखने गये। 1995 में जब मैं वहाँ था तो दक्षिण अफ़्रीका की एक पत्रिका ‘हाउस एण्ड लेजर्स’ (अक्टूबर 1994) का अंक देखने को मिला था। उसमें 14 एल्बमेरी स्ट्रीटवाले घर की अनेक तस्वीरें थीं। वह घर अब माइकेल हर्ष के पास है। हर्स एक आर्किटेक्ट हैं। वे चाहते हैं कि उसे एक टूरिस्ट प्लेस बनाया जाय। जहाँ अम्पायर थियेटर था। वहाँ अब एक भव्य भवन बना है। जहाँ मीर आलम ने मोहनदास पर हामला किया वह स्थान भी देखा। वह मस्जिद बरकरार है जहाँ सत्याग्रहियों की बैठकें होती थीं। कैदी के रूप में जनरल स्मट्स से मिलकर मोहनदास ने वहीं जाकर मीटिंग की थी।

इस उपन्यास की सीमाओं के बारे में भी कह दूँ। कई ऐसे सन्दर्भ हैं। जिनके बारे में पूरी जानकारी नहीं मिल पायी है। वहाँ मैंने लेखकीय कल्पना मिश्रित संवेदना का सहारा लिया है। जिनके पास वह सूचना होगी उन्हें शायद यह मेरी ज्यादती लगे। दो-तीन उदाहरण देने जरूरी हैं। टालस्टाय फार्म पर गाँधी जी द्वारा दो लड़कियों के सिर के बाल काटने का सन्दर्भ है। मुझे न तो लड़कियों का प्रामाणिक रूप के नाम मिल पाया और न उस लड़के का जिसके कारण यह घटना घटी। हालाँकि एक गुजराती उपन्यास में मैंने उन लड़कियों के नाम देखे थे। मिली ने गाँधी की जीवनी में उन लड़कियों के नाम के पहले अक्षर का प्रयोग किया है। पर वह मुझे पर्याप्त नहीं लगा। मि. ब्रेकर ने प्रिटोरिया में मोहनदास को एक नानबाई महिला के घर में पेयिंग गेस्ट के रूप में ठहराया था। न तो उस महिला का नाम मुझे मिल सका और न उसके परिवार के बारे में ज्यादा जानकारी मिली। मैंने उस महिला का नाम मेटिल्डा रख दिया। परिवार के बारे में भी एक संवेदनापूर्ण कहानी बुन ली थी। इसी प्रकार एक-दो प्रसंग और होंगे। गिरमिटियों को ले जाने वाले कुछ जहाज टूटे थे। उन घटनाओं को मैंने उपन्यास में लिया है। सडरिंघम और फ्यूज्लियर जहाजों के नाम और घटनाओं का उल्लेख मिलता है। वहाँ भी कहीं-कहीं पर मैंने अपनी तरफ से कुछ विवरण जोड़ा है। मुझे लगा मैं वहाँ मौजूद था।

मार्सल लेड्यू एक फ्रेंच व्यवसायी था। उसने गाँधी की एक नाकारात्मक किस्म की जीवनी लिखी थी। उसका फ्रेंच नाम ‘गाँधी-टेल क्यू जे लाय कोन-38’ उसका अनुवाद रूमी मिण्टी ने किया है और सम्पादन डी. लाजर्स, न्यू केसल वाले (गाँधी के साथी) के बेटे के बेटे डॉ.ए.डी. लाजर्स ने किया है जो अमेरिका में है। लेड्डू अपने को मोहनदास का समकालीन बताता था। मैंने उसे उपन्यास में एक पात्र के रूप में रखा है। मुझे लगता है उसके होने से गाँधी के चरित्र को व्याख्यायित करने में ज्यादा मदद मिली है। उस जीवनी का अँग्रेजी अनुवाद मुझे प्रो.एस.एस. सिंह के पास डरबन में देखने को मिला था। पता नहीं अभी प्रकाशित हुआ या नहीं। उसने कुछ ऐसी बातें लिखी हैं जो विश्वसनीय नहीं हैं और अपमानजनक भी हैं।

उपन्यास कैसा बना कैसा नहीं, इस बारे में कुछ भी कहने का कोई औचित्य नहीं है। लेकिन यह जानता हूँ कि इस बारे में अनेक सवाल उठेंगे प्रामाणिकता का सवाल, ऐतिहासिकता का सवाल, पात्रों और चरित्रों की पहचान को लेकर, सड़कों और स्थलों को लेकर। जगहों, सड़कों, व्यक्तियों के नामों के उच्चारण और वर्तनी को लेकर भी जानकारी लोग टीका-टिप्पणी कर सकते हैं। कुछक लोग यह भी कह सकतें हैं कि यह उपन्यास ही नहीं है। आखिर लेखक मोहनदास, पर ही ऐतिहासिक उपन्यासों को लेकर सवाल उठता है कि साठ प्रतिशत जब इतिहास है तो चालीस प्रतिशत अपना जोड़कर लेखक क्या तीर मार देता है ? हालाँकि यह उपन्यास जिन्दगी ज्यादा इतिहास कम है। वैसे इतिहास भी जिन्दगी ही होता है। अगर तारीखों का संग्रह या राजाओं की झूठी-सच्ची कथा न हो। ये सब सवाल इसलिए उठेंगे क्योंकि यह औपन्यासिक रचना गाँधी के बारे में है। गाँधी होने की अपनी दिक्कतें हैं और अपनी उपलब्धियाँ भी हैं। चूँकि गाँधी को भारतीय सबसे ज्यादा जानने का दम्भ रखते हैं और जानते न्यूनतम हैं। किसी का अपने देश या घर का होना जानने के लिए काफी नहीं होता। जितना जानने की कोशिश करो उतना ही जानना बाकी रह जाता है। इन सब सवालों का जवाब देना लेखक का काम नहीं। आलोचना दें तो दें। आलोचक भी सवालों और उनके जवाब को खोजने की तवालत से बचते हैं।

हाँ, मैं एक बात कह सकता हूँ कि प्रामाणिकता और पठनीयता को बनाये रखने रखने की यथासामर्थ्य कोशिश की गयी है। लेखकीय स्वतन्त्रता का भी जहाँ तक हो सका प्रामाणिकता के ढाँचे के अन्दर ही उपयोग करने की कोशिश है। हाँ, कहीं-कहीं पर जहाँ दस्तावेजों का इस्तेमाल करना पड़ा या पत्रों का उपयोग हुआ या कानूनी अध्यादेशों का उल्लेख हुआ, वहाँ हो सकता है रोचकता बाधित हुई हो परन्तु पठनीयता बनी रही है। कहीं-कहीं पर गाँधी के विकसित होते विचारों का भी समावेश हुआ। वह थोड़ा-बहुत दुरूह हो सकता है। बहुत से पाठकों को हो सकता है उनमें रूचि ही न हो। पर उनकी अनिवार्यता को नकारना लेखकीय दृष्टि से सम्भव नहीं था।

मारीशस का सन्दर्भ भी आया है। 1901 में नौशेरा जहाज मोहनदास को सपरिवार लेकर मारीशस में कुछ दिनों के लिए रूका था। इस प्रकरण को भी मैंने उपन्यास में लिखा है। हालाँकि बावजूद भाई अभिमन्यु अनत और उनके सहयोगी कवि पूजानन्द नेमहा की महती मदद से मारीशस गिरमिटिया मजदूरों का एक तरह से मक्का रहा है। दक्षिण अफ़्रीका में इण्डेंचर्ड लेबर से सम्बन्धित अध्यादेश मारीशस के आधार पर बनाया गया था। उसको छोड़ना सम्भव नहीं था। श्री प्रह्लाद रामसरन ने कुछ सामग्री दी थी। लेकिन वहाँ के विद्वानों के बीच प्रवास को लेकर कुछ अन्तर्विरोध है। मुझे उस विवाद में पड़े रहने की जरूरत नहीं पड़ी। मारीशस में गाँधी युग का अब तक कोई भी जीवित नहीं है। डरबन में गाँधी जी के सहायक लारेंस की अस्सी वर्षीय बेटी थी। पर वह बोल नहीं पाती थी। वह बचपन में गाँधी जी की उँगली पकड़कर टहलने जाती थी। रूस्तम जी पारसी के सम्बन्धी भी हैं। महात्मा गाँधी संस्थान ने आतिथ्य देकर मेरी कठिनाई काफी आसान कर दी थी। मैं उनका आभारी हूँ। इस ऐतिहासिक सन्दर्भ में शायद ही किसी भारतीय साहित्याकार ने मारीशस के साथ अपने को जोड़ने का प्रयत्न किया हो। वैसे मारीसश हो या अन्य कोई और देश, जहाँ गिरमिटिया भारत है, गाँधी और दक्षिण अफ़्रीका की प्रासंगिकता सबके लिए उतनी ही है जितनी दक्षिण अफ़्रीकी कुली समाज के लिए थी। अतीत भी सबका लगभग एक-सा ही है।

इस उपन्यास का अन्तिम आलेख आई. आई. टी परिसर छोड़ने के बाद वर्तमान किराये के मकान में आने पर 30 मई, 1998 को पूरा हुआ। पर यह बात आई. आई. टी परिसर के महत्व को कम नहीं करती ।वहीं पर इस उपन्यास की पूरी तैयारी हुई। पहले दो आलेख लिखे गये। तैयारी के सात-आठ वर्षों का समय तो वहीं गुजरा। बार-बार लिखना, काटना, फिर लिखना यात्राओं के लिए साधन जुटाना, सामग्री इकट्ठी करना सब कुछ वहीं हुआ। हाँ, 31 जुलाई, 1997 के बाद आई. आई टी. से सेवानिवृत हो गये तो रचनात्मक केन्द्र के अध्यक्ष के नाते मिलनेवाली सेक्टेरियल सहायता बन्द हो गयी थी। श्री कमलेश द्विवेदी ने किसी न किसी तरह अन्तिम आलेख टाइप करके इस काम को पूरा किया । उसमें श्री के.पी. गुप्ता का भी सहयोग रहा । दरअसल असली परेशानी अपने हस्तलेख के कारण होती है। खुद ही लिखो, खुद ही पढ़ो।

इस उपन्यास के प्रथम आलेख के कुछ पृष्ठ श्री नरेश सक्सेना ने तब पढ़े थे। जब वे आई. आई. टी में अतिथि लेखक थे। तब से वे मुझसे लगातार टोकते रहते थे, आप उपन्यास कब तक पूरा कर रहे हैं। वे नहीं चाहते थे कि मैं पहले वाला फार्मेट बदलूँ। दूसरा आलेख प्रियंवद ने पढ़ा था। कुछ सुझाव भी दिये थे। श्री नरेश चन्द्र चतुर्वेदी के साथ मुझे वर्धा जाने और गाँधी जी की कुटिया में कुछ समय गुजारने का मौका मिला था। श्री शैलेश मटियानी हालाँकि अस्वस्थ हैं परन्तु जब स्वस्थ थे तो कहा करते थे-गिरिराज जी, गाँधी जी की लाठी लगने की बात है, अगर छू गयी तो उपन्यास पूरा हो जाएगा। भाई राजेन्द्र यादव ने अपनी तरह से इस चुनौती को बनाये रखने में मदद की। मेरे घरवालों का सहयोग तो अद्वितीय है ही, खासतौर से मेरी पत्नी मीरा का। वे मेरी जबरदस्त क्रिटिक हैं। परन्तु मेरे कामों में भरपूर सहयोग देती हैं। सत्या जीजी आजकल अस्वस्थ हैं। मीरा और अनीश ने जिस प्रकार इस उपन्यास को रात दिन लगकर पढ़ा है, उससे मेरा उत्साह बढ़ा है। सामान्य पाठक के लिए इस तरह लगकर एक हजार पृष्ठ पढ़ना कोई कम महत्त्वपूर्ण बात नहीं है। व्यक्तिगत सम्बन्धों के बल पर सौ दो सौ पृष्ठ तो पढ़े जा सकते हैं परन्तु एक हजार पृष्ठ संलग्नता से पढ़ जाना लेखक का हौसला बढ़ाने में बहुत सहायक होता है।

दक्षिण अफ़्रीका, मारीशस और लन्दन की यात्रा के लिए आर्थिक साधनों का प्रबन्ध करने में मुझे कई साल लग गये। कभी-कभी लगता था कि गाँधी की प्रासंगिकता इस देश के लिए सिक्का भर रह गयी है। इस काम में पहले प्रो. इन्द्रनाथ चौधरी पूर्व सचिव साहित्य अकादमी ने आई. सी. सी. आर. से एक तरफ का यात्रा का टिकट दिलाकर की। बाकी पैसे का प्रबन्ध कहां से हो ? उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री तब मुलायम सिंह जी थे। मुझे भी जानते थे। लेकिन उनसे मेरे पुराने साथी एवं बड़े भाई जनेश्वर जी ने कहा। श्री बृजभूषण तिवारी को मेरे साथ भेजा। वे राजभवन में श्री घनश्याम पंकज कि एक पुस्तक के विमोचन में मिले। जब मैंने उनसे कहा तो उन्होंने तत्त्काल पचहत्तर हजार रूपये स्वीकृत कर दिये। बाद में लोगों ने उसे अखबारों में उछाला। मुझे उसका ‘जनसत्ता’ में प्रतिवाद देना पड़ा है। अगर श्री मुलायम सिंह सहायता न करते तो न यात्रा सम्भव होती और न शायद उपन्यास। बाद में जब लन्दन गया तो तत्कालीन राज्यपाल श्री मोती लाल बोरा ने तीस हजार रूपये की सहायता दी। वे साहित्यानुरागी व्यक्ति हैं। श्रीमती वीणा वर्मा का भी सहयोग मिला। उन्हीं के कारण श्री सलमान खुर्शीद (तत्कालीन विदेश राज्य मन्त्री) ने डरबन और जोहान्सबर्ग में आवश्यक सहायता उपलब्ध करायी। इन महानुभावों की सदाश्यता से मुझे जितनी मदद मिली, उतनी ही निराशा मुझे गाँधी प्रतिष्ठानों से और प्रधानमन्त्री कार्यालय के व्यवहार से हुई थी। लेकिन अब जब यह उपन्यास पूरा हो गया तो मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं है। लन्दन की यात्रा के दौरान डॉ. लक्ष्मीमल्ल सिघवीं तत्कालीन उच्चायुक्त, का भी आत्मीय व्यवहार था।
भारतीय ज्ञानपीठ का आभारी हूँ, कि उसने इस उपन्यास को तत्काल प्रकाशित करने में रूची दिखायी।

तीसरे संस्करण पर....

तीसरे संस्करण के प्रकाशन के अवसर पर मैं ‘पहला गिरमिटिया’ के सुधी पाठकों का हृदय से आभार प्रकट करना चाहता हूँ क्योंकि मैं जहाँ तक जानता हूँ इस उपन्यास की अधिकतर खरीद व्यक्तिगत स्तर पर हुई। इसका श्रेय ज्ञानपीठ को भी जाता है। उन्होंने इस उपन्यास के दाम व्यक्तिगत व्यय सीमा को ध्यान में रखकर निर्धारित किये। प्रकाशकों की भाँति हानि-लाभ के समीकरण को नहीं देखा।

दूसरे संस्करण में भी तिथियों की गलती रह गयी थी उन्हें इस संस्करण में सुधारने का प्रयत्न किया है। मैं जानता हूँ गाँधी अपने-आप में एक सख्त कसौटी होने के कारण लोगों को भयभीत करते हैं कि अगर गाँधी सर्वस्वीकार्य आदर्श बन गये तो उनका क्या होगा ? सी.पी.एम. के महामन्त्री श्री सुरजीत ने 24 अप्रैल, 2002 को धर्मान्धता की मार से क्षत-विक्षत गुजरात में गाँधी जी का नाम लेकर जनता की सद्बुद्धि का आह्वान किया था। जबकि साम्प्रदायिक मनोवृत्ति के लोगों और गाँधी के अनुयायियों तक के निर्दोष लोगों की हत्या और आगजनी को रोकने के लिए गाँधी की अहिंसा का नाम लेना भी पाप समझा। यह कैसी बिडम्बना है !
इस धर्मान्धता और कट्टरपन के वातावरण में शायद हाशिये पर धकेल दिये जाने के बावजूद गाँधी का सन्देश और बलिदान मरहम का काम कर सके।


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