कबीर जीवन और दर्शन - उर्वशी सूरती Kabir Jivan Aur Darshan - Hindi book by - Urvashi Surti
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कबीर जीवन और दर्शन

उर्वशी सूरती

प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :241
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 6894
आईएसबीएन :978-81-8031-240

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सरल और ग्राह्य भाषा-शैली में कबीर जीवन और दर्शन

Kabir Jivan Aur Darshan - A Hindi Book - by Urvashi Soorti

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

अपनी बात

संतों के प्रति श्रद्धा भक्ति केवल भारतीय विशेषता नहीं है, संपूर्ण विश्वसंस्कृति का प्राण है। संत के जीवन-दर्शन से शून्य संस्कृति में कभी उदारता, पवित्रता, विराटता और विशालता, हार्दिक एकता और निश्छल प्रेम, समता और उन्नति, परिष्कार और समर्पण, त्याग और सेवा आदि उदात्त गुणों के दर्शन संभव नहीं। कहीं-न-कहीं उसके जीवन-दर्शन का प्रभाव अवश्य लक्षित होगा। भौतिकतावादी जीवन में भी इसकी कोई विरल रेखि मिल जायगी, जो संतों की एक पुष्ट और समृद्ध परंपरा का परिणाम है, अध्यात्म-दर्शन जिसका आधार है, वह यदि समय-समय पर अवतरित संतों के आशीर्वाद से नित्य नवीन, फिर भी चिर-पुरातन अपने स्वरूप को सुरक्षित रख पाई है तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है।
अध्ययन-अनुसंधान में पूर्ववर्ती व्यक्ति का परवर्ती व्यक्ति पर प्रभाव की व्याख्या करने की एक प्रवृत्ति उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही है। संत कबीर का इस दृष्टि से इतना विशद अध्ययन किया गया है कि ज्ञानेश्वर, तुकाराम, तुलसीदास, गांधाजी आदि अनेकानेक महापुरुषों के जीवन-दर्शन के प्रकाश में कबीर के व्यक्तित्व की व्याख्या हुई है और आगे भी होती रहेगी।
वास्तव में प्रभाव का मूल्यांकन कभी ‘वर्तमान-काल’ की सही प्रवृत्ति नहीं हो सकता। तत्कालीन प्रभाव की प्राणशक्ति की कसौटी भविष्य है। जब संस्कृति के साथ घुलमिल के वह एक हो जाती है, तब वह भावी पीढ़ी को भी अनिवार्य रूप से प्रभावित करती है। कबीर की प्रतिभा में भारतीय संस्कृति से अभिन्न ऐसे अनेक तत्त्व थे जिन्होंने उसके परिष्कार-परकिवर्धन और परिपुष्टि में अपनी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। इसी से वे काल की सीमा से ऊपर उठ जाते हैं और प्रभाव की परिभाषा में नित्य और आधुनिक बने रहते हैं। सनातन मूल्यों के पहरेदार ये संत इस धरती को छोड़ के एक क्षण के लिए भी कहीं जाना पसन्द नहीं करते, सेवा ही उनका जीवन होता है।
मोहनदास करमचंद गांधी को कबीर का अवतार प्रमाणित करने का प्रयत्न हुआ है। उसका उल्लेख कबीर के जीवन-प्रसंगों के संदर्भ में इस ग्रंथ में भी किया गया है। ‘गांधीजी पर कबीर का प्रभाव’ खोजने वाले लेखक ने लिखा है—‘‘इन दोनों ही संतों ने अपनी क्रांतिकारी भावनाओं से भारतीय समाज को ऐसी दिशा दी जिससे वह विश्व-समाज का एक स्वस्थ अंग बन गया। इन महापुरुषों का मानस-क्षेत्र इतना विस्तृत था कि न केवल उसमें एक देश, वरन् उसकी परिधि में संपूर्ण जगत् समाया हुआ लगता था, क्योंकि वे संपूर्ण जगत् को, सृष्टि के प्रत्येक अणु को उस ईश्वर का प्रतिरूप मानते थे जो निराकार होकर भी अनेक आकारों में दिखायी देता है तथा जो सबसे परे होते हुए भी चराचर में व्याप्त है।’’1

स्वयं को ईश्वर रूप अनुभव किये बिना सबमें ईश्वर-दर्शन नहीं हो सकता, यह मात्र मनोवैज्ञानिक सत्य नहीं है, शुद्ध आध्यात्मिक सत्य भी है। मनोवैज्ञानिक सत्य सीमित और खंडित होने से व्यक्तिगत और एकांगी तथा काल्पनिक और तात्कालिक हो सकता है, आध्यात्मिक सत्य असीम, समग्र, सर्वात्मक, परिपूर्ण, ठोस यथार्थ और सार्वकालिक है। इस दृष्टि से कबीर के व्यक्तित्व पर विचार करने से स्पष्ट हो जाता है कि उनका अहं एक घेरे में बन्द और विश्रृंखलित न था, परिपूर्ण परब्रह्म परमात्मा से एक और अखंड था। इस पूर्णता की प्राप्ति का प्रथम सोपान है, ‘व्यक्ति-अहं’ का विलय और उसके लिए सद्गुरु की शरण में अपने अहं को समर्पित करने के प्रतीक-स्वरूप नमस्कार।

नमस्कार का रहस्य बताते हुए लिखा गया है2—‘‘अनादिकालीन वासनाओं से भिन्न-भिन्न प्रकार के व्यवहारिक ज्ञानों का उदय हुआ करता है। उनके दृढ़ संस्कार से चित्त में अपनी स्वतंत्रता और स्वत्व का भाव जम जाता है। ‘सब कुछ भगवान का ही है’ इस प्रकार उस व्यावहारिक ज्ञान का विरोधी पारमार्थिक ज्ञान होता है। इसके द्वारा नमस्कर्ता अपने पूर्वोक्त दोनों भावों को निकाल फेंकता है। तब नमस्कार का अर्थ क्या है ? अहंकार और ममता को निकाल फेंकना। इनके निकलते ही भगवद्भाव की अनुभूति होने लगती है। वह अनुभूति केवल बौद्धिक अथवा मानसिक नहीं रहती, समस्त इन्द्रियों और रोम-रोम से उसका अनुभव होने लगता है। तब अपनी अंतःकरण शरीर और सारा जगत् भगवान का भवन्मय दीखता है। यह ‘नमः’ पद की स्थिति है और यही उसका परम अर्थ है।’’

यह व्याख्या भी ब्रह्मानुभवी संत की वाणी है। संत इसे चरितार्थ करते हैं और उनके संस्पर्श से दूसरे भी प्रेरणा पाते हैं। तब ब्रह्मानंद की मस्ती का अर्थ मालूम होता है। कबीर ब्रह्मानंद-सागर में निश्चित रूप से झूल चुके थे। उन्होंने इसके वर्णन में जो पद गया है, इसका एक-एक शब्द कबीर के प्रभुमय जीवन को तादृश्य कर देता है—


करत कल्लौल दरियाव के बीच में,
ब्रह्म की छौल में हंस झूलै।
अर्थ औ’ ऊर्ध्व की पेंग बाढ़ी तहाँ,
पलट मन पवन को कँवल फूलै।।
गगन गरजै तहाँ सदा पावस झरै,
होत झनकार नित बजत तूरा।
वेद कत्तेब की गम्म नाहीं तहाँ,
कहैं कबीर कोई रमै सूरा।।
गगन की गुफा तहँ गैब का चाँदवा,
उदय और अस्त का नान नाहीं।।
दिवस औ रैन तहँ नेक नहिं पाइये,
प्रेम-परकास के सिन्धु माहीं।।
सदा आनन्द दुख-दन्द व्यापै नहीं,
पूरानन्द भरपूर देखा।
भर्म और भ्रांति तहँ नेक आवै हीं,
कहै कबीर रस एक पेखा।।1

पदों और गीतों में कवि-हृदय एक खुली पुस्तक के रूप में व्यक्त होता है। कबीर का वास्तविक परिचय भी उनके पदों में मिल जाता है।’
एक अनुसंधाता ऐतिहासिक तथ्यों की खोज करता है और एक व्यक्ति के जीवन की स्थूल रूप रेखा प्रस्तुत करता है। कोई सूक्ष्मदर्शी सहृदय उसके साहित्य के अंतरंग पक्ष को ग्रहण कर उसका व्यक्तित्व भी निरूपित कर सकता है, परंतु आत्मकथा-लेख की तरह कवि गीतों में अपनी मर्मकथा गाता है तब कहीं अनुमान आदि प्रमाणों की आवश्यकता नहीं रह जाती, उसे ज्यों-का-त्यों हम सीधे ही ग्रहण कर सकते हैं। इस दृष्टि से कबीर ने आत्म-परिचय की शैली में जो कुछ कहा है, उसकी एक झलक-भर वहाँ देना सुसंगत होगा।
कबीर—‘‘मैंने अपनी जाति और कुल दोनों को बिसार दिया है एवं उलट दिया है। अर्थात् शूद्रता छूट गई, मैं वरेण्य-ब्राह्मण की कोटि में आ गया, क्योंकि
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1.शब्दावली—कबीर की बेल्वेडियर प्रेस—पृ. 104 ।
2. ‘कबीर’ में डा. हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा संपादित ‘पदावली’।
देखिए—पद 116,117,133,135,136,142,173,175,199,200,206,215,216,226,239, 240।


मैं धरती पर जीनेवाला जुलाहा नहीं हूँ, मैं सुन्न महल में सहज-समाधि की स्थिति में परमात्म-तत्त्व को बुनता हूँ।
‘‘मैंने पंडित और मुल्ला दोनों को छोड़ दिया है। किसी भी मज़हब या संप्रदाय के बंधन से मुक्त हूँ। इसलिए कोई सैद्धान्तिक द्वन्द्व मेरे मार्ग में नहीं है।
‘‘मैं तत्त्व के ताने-बाने से अपने लिए दिव्य परिधान तौयार कर उसे धारण करता हूँ।
‘‘आगे चल कर मैं वहाँ पहुँचा, जहाँ मेरा ‘मैं’ भी न रहा। उस परम पद पर स्थिति होकर ये पद गाता हूँ, इसलिए ये पद भी परम-पद का संकेत देते हैं।

‘‘पंडित और मुल्ला ने धर्म-शास्त्र में आज्ञा की है, उसे मैंने नहीं माना है। मैं शास्त्र-बंधन से, सर्वतंत्र-स्वतंत्र हूँ।
‘‘हे मीर ! तू भी अपने शुद्ध हृदय में आज ही खोज के अपनी आन्तरात्मा को देख ले तो वहाँ तुझे कबीर मिल जायगा।’’ इसमें कबीर का सर्वात्मभाव प्रकट होता है। उन्होंने गुरु का भी गुरु होकर मीर को परमात्म-दर्शन का सही मार्ग दिखाया—‘‘मैं एक शरीर में रहने वाला व्यक्ति नहीं हूँ। मैं परमात्मा से एक होने से जहाँ-जहाँ वह है, वहाँ-वहाँ मैं हूँ। संसारी अलख परमात्मा को न देख सकता हो तो वहाँ कबीर को देखे। कबीर को जान लेगा तो तू परमात्मा को भी जान लेगा।’’

ऐसे संत कबीर के ‘जीवन और दर्शन’ के विषय में लिखने का साहस मुझे कैसे हुआ ? आज भी इन रचनाओं में जीवित कबीर को हृदयंगम करने की उत्कंठा बचपन से ही थी, परंतु जब पढ़ती तब उलझन में पड़ जाती, कुछ उपलब्ध न होता। उनका निश्छल राम-प्रेम हृदय को भक्ति और उका दर्शन बुद्धि को तत्त्व-विचार के संस्कार अवश्य देता रहा। लोगों से सुना था, ‘‘कबीर को समझना बहुत कठिन है और उनका काव्य नीरस है।’’ परंतु मैंने उनकी रचनाओं में सरसता पाई और हृदय का एक अज्ञात प्ररेणा ने जिज्ञासा जागायी। यह जिज्ञासा-मात्र कबीर को जानने की न थी, परमात्मा के लिए थी।
सौभाग्यवश परम पूज्य सद्गुरुदेव स्वामी श्री अखण्डानन्द जी से 1962 ई. में प्रथम भेंट हुई। आपके प्रवचनों के श्रवण से मेरी उलझन मिट गई और मार्ग मिल गया। आपके प्रवचनों के संग्रह प्रसिद्ध हुए, उनके अध्ययन और मनन-चिंतन से भी अध्यात्म क्षेत्र में मुझे प्रकाश मिला। संत-चरित्र और संतवाणी को हृदयंगम करने की दृष्टि भी आपके सत्संग के फलस्वरूप प्राप्त हुई। मैंने गुजराती कवि ‘अखा’ और ‘कबीर’ दोनों की रचनाओं का अध्ययन प्रारंभ किया। इस कार्य में आठ-दस वर्ष बीत गये। अध्ययन में परमानंद तो मिला ही, जीवन का अर्थ भी स्वष्ट हुआ। प्रारंभ में पुस्तक-लेखन की योजना न थी, परंतु उसने भी एक आकार धारण कर किया। संक्षेप में, इस ग्रंथ का पूरा-पूरा श्रेय परम पूज्य श्री स्वामी जी को है; आपकी कृपा न होती तो इस गूढ़ विषय पर लिखना मेरे लिए कभी संभव न होता। यदि कहीं क्षति मिल जाय तो पाठक उसे मेरी सीमा मान लें और प्रकाश मिल जाय तो गुरु-प्रसादी।
उर्वशी सूरती

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