खोई हुई दिशाएँ - कमलेश्वर Khoi Hui Dishayein - Hindi book by - Kamleshwar
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खोई हुई दिशाएँ

कमलेश्वर

प्रकाशक : किताबघर प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2008
पृष्ठ :145
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 6485
आईएसबीएन :9788189859770

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कमलेश्वर की संग्रहीत कहानियाँ....

Khoyi Hui Deshayan

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

न केवल कमलेश्वर का बल्कि ‘नयी कहानी’ के दौर का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कहानी-संग्रह। नयी कहानी पूर्ववर्ती कहानियों से किस प्रकार अलग थी और वह रोमानियत से निकल कर व्यष्टि और समष्टि के स्तर पर किस प्रकार समाज और देश की स्थितियों और समस्याओं से जुड़ रही थी, इसका ज्वलन्त सबूत है ‘खोयी हुई दिशाएँ’ में संगृहीत कमलेश्वर की यह कहानियाँ। हिन्दी कहानी के संदर्भ में नयी कहानी के अध्येताओं के लिए महत्त्वपूर्ण कथा-संग्रह।

नयी कहानी’ की बात


इधर हाल ही में ‘नयी कहानी’ को लेकर काफ़ी चर्चाएँ हुई हैं। अवसर भी ऐसे ही थे। दो पीढ़ियों के दो कथाकार सम्पादकी के थान पर बाँधे गये और जैसी कि परम्परा है, उनके सम्मानादि भी हुए। उनमें से एक शहीद मैं भी था, इसलिए जश्न को देखने का अच्छा मौक़ा मिला।

‘नयी कहानी’ को लेकर कथाकारों की पुरानी पीढ़ी बेहद नाराज़ थी और दोनों ही समारोहों में काफ़ी सरगर्मी रही। अपनी घोषणा के मुताबिक़ पुराने कथाकारों ने इन मौक़ों को कुछ बातों की सफ़ाई और ‘आत्मज्ञान’ के लिए इस्तेमाल किया। यह अच्छा ही हुआ। कुछ भ्रम, अगर वे सचमुच थे, तो दूर हुए या नहीं, यह तो नहीं कहा जा सकता पर पुरानी पीढ़ी का असन्तोष और चिढ़ खुलकर व्यक्त हुई। उनमें एक अजीब तरह की बौखलाहट नज़र आयी जो कभी-कभी संयम की सीमा भी लाँघ जाती थी। एक समारोह में पुरानी पीढ़ी के वे दोनों वर्ग मौजूद थे जो पहले आपस में साहित्यिक मूल्यों को लेकर एक-दूसरे का विरोध करते रहे हैं, पर ‘नयी कहानी’ पर विचार-विमर्श करते हुए दोनों ही वर्ग एक थे और उनकी शिकायतें भी एक-सी थीं, यही कि-नयी कहानी क्या है ? उसमें नयापन क्या है ? नयी कहानी में क्या बदला है ? क्या दुर्बोधता ही नयापन है ? आदि-आदि....

जो दो वर्ग आपस में मूल्यों को लेकर विरोधी धरातलों पर खड़े रहे हैं, उनका यहाँ पर मिलना और बिलकुल एक-से सवाल करना यह स्पष्ट कर देता है कि उनकी चेतना में साहित्यिक विकास की गति को समझने-समझाने का गम्भीर प्रयास कम, पर इस बात की चिन्ता ज्यादा थी कि कहानी के क्षेत्र में नये व्यक्तित्व क्यों और कैसे प्रतिष्ठित हो गये ! अगर हुए तो उनसे पूछकर क्यों नहीं हुए या कम-से-कम उन्हें खबर देकर होते !
हम बात को इस स्तर से नहीं उठाना चाहेंगे। इस बात को सिर्फ़ इतना कहकर समाप्त करेंगे कि लेखक-व्यक्ति पहले प्रतिष्ठित नहीं हुए थे-उनकी कहानियों ने पाठक वर्ग से जीवन्त सम्बन्ध बनाया था और उन्हें सामने लायी थीं-पहले वे कहानियाँ प्रतिष्ठित हुई थीं, जिन्होंने नये पाठकों की जिज्ञासाओं को तृप्त किया था और सर्वथा नये कथा-क्षेत्रों और बदली हुई स्थितियों को चित्रित किया था। यह सूक्ष्म संक्रमण बहुतों को नहीं दिखाई पड़ा, उन्हें सिर्फ़ यह लगा कि कहानियाँ गाँव, क़स्बे और शहर में बँट गयी हैं और परिवेश की नवीनता को नयापन कहकर चलाया जा रहा है। बात इतनी ही नहीं थी।
अगर ग़ौर से देखा जाये तो यह संक्रमण सभी स्तरों पर हो रहा था। नयी कहानी ने भौगोलिक परिधि को ही नहीं तोड़ा उसकी आन्तरिक दृष्टि में आमूल परिवर्तन हुआ-

इस परिवर्तन के मानसिक-ऐतिहासिक कारण थे।


जन और उसके समाज के सन्दर्भ में उस वक़्त सिर्फ़ एक पीढ़ी ही नहीं बदल रही थी, सिर्फ़ उम्र के तक़ाजे ही नहीं थे बल्कि यह एक सम्पूर्ण-चेतना का संक्रमणकाल था। ऐसा नहीं था कि पिता लोग पुराने पड़ रहे थे और पुत्र लोग नये हो गये थे-यह तो हर वर्ष होता है, कुछ नवयुवक सहसा जिम्मेदारियाँ उठाते हैं और उनका एक नया समूह दिखाई देने लगता है, साथ ही कुछ लोग बूढ़े होकर अलग-अलग हो जाते हैं। लेकिन जब हम सम्पूर्ण चेतना के संक्रमण की बात करते हैं तो स्पष्ट ही हमारा इंगित उन परिवर्तनों की ओर है जो सामाजिक, आर्थिक और मानसिक धरातलों पर पड़ रहे दबाव के कारण हो रहे थे। यह दबाव उस मिले-जुले समाज को प्रभावित कर रहे थे, जिसमें दो ही नहीं तीन, और चार-चार पीढ़ियाँ अपने शारीरिक अस्तित्व और बीस-बीस पीढ़ियाँ अपने वैचारिक अस्तित्व के साथ रह रही थीं और अब भी रह रही हैं। जिन साधन-सम्पन्न लोगों की सन्तानों ने उन दबावों को अभी भी प्राप्त सुविधाओं के कारण महसूस नहीं किया वे आज भी नये मूल्यों के सन्दर्भ में उसी पुरानी चेतना को लेकर चल रहे हैं, जिसमें औरत एक जिन्स है, ज़िन्दगी महज़ ऐयाशी है और जो आज भी समाज के गतिशील सवालों से उतने ही अलग-थलग हैं, जितने कि उनके पुरखे थे। नये परिवर्तनों का विरोध करना उनकी आज भी मजबूरी है क्योंकि इससे उनके निहित स्वार्थों और सुविधाओं की चूलें हिल जाने का ख़तरा है और अजगर को चाकरी का मसला सता सकने की स्थिति है। यह समुदाय सीमित है, पर उसकी चेतना निश्चय ही वही है जो उनके पिताश्रीओं की रही है।

इसी के साथ मध्यवर्ग और निम्न मध्यवर्ग के नौजवानों का भी एक बहुत बड़ा तबक़ा ऐसा है जो सोचने-विचारने और ज़िन्दगी जीने के मूल्यों को लेकर वैचारिक और व्यावहारिक रूप से उतना ही पुरानपन्थी है, जितने कि उनके जीवित अग्रज हैं।
कहने का मतलब यह है कि नये विचारों को वहन करनेवाले सिर्फ़ नयी उम्र के लोग ही नहीं हैं, उनमें अधिक वय के लोग भी हैं और उनका विरोध करने वाले सिर्फ़ पिछली पीढ़ी के लोग ही नहीं हैं, उनके साथ नयी पीढ़ी के लोग भी हैं। यह टकराव उम्र में बँटी हुई पीढ़ियों का नहीं, वैचारिक धरातल पर दो तरह से सोचनेवाली पीढ़ियों का है।
इस बात को नकारने के लिए दलील यह दी जायेगी कि ‘‘यह भी हमेशा होता रहा है !’’ ज़रूर होता रहा है-पर आज यह टकराव जितना तेज़ और सघन है और जिस अबाध गति से प्रवहमान है, वही इसे संक्रमणकाल की संज्ञा देता है...क्योंकि इस वक़्त कुछ धीरे-धीरे नहीं बदल रहा है, बल्कि टूट-टूटकर गिर रहा है...मानव मन और चेतना मात्र आन्दोलित नहीं आक्रान्त है !

आज के पुराने लेखक अपने समय में नये थे-एक सीमित रूप में, क्योंकि वे अपने समय के ‘धीरे-धीरे’ बदलते हुए मूल्यों को वाणी दे रहे थे, पर आज इस समय का लेखक उन स्थितियों की उपज है जो ‘एकाएक’ बदली हैं। दूसरे महायुद्ध का निर्णय होने से पहले तक मानवता की चिन्ताएँ दूसरी थीं, जीवित रहने की शर्तें इतनी क्रूर नहीं थीं जितनी कि अब एकाएक हो गयी हैं, निर्णय लेने की उतनी जल्दी तब नहीं थी जितनी कि अब है ! जन-मानस तब आन्दोलित था, आज आकुल-आक्रान्त है ! और इसी के साथ वे सब बातें भी जुड़ी हुई हैं जो इस परिप्रेक्ष्य में अपना तत्काल उपचार माँगती हैं। तब लेखक को किनारे खड़े होकर बहाव को देखने की सुविधा थी और मन्तव्य प्रकट करना ही उसका लेखकीय धर्म था, तब वह द्रष्टा भी था, पर आज का लेखक मात्र द्रष्टा नहीं है, वह भोक्ता भी है...किनारे खड़े रहने की सुविधा भी उसे नहीं है....बहाव में बहना उसकी मजबूरी है।

होता यह है कि समय विशेष में कार्यरत लेखक अपने मूल्यों और आस्थाओं को घोषित तथा स्थापित कर चुका होता है..वह नये का साथ भी देता है पर संक्रमणकाल में उस वक़्त का नया भी बहुत जल्दी पुराना पड़ जाता है या अपनी महत्ता खो देता है। उड़ता तो ‘डैकोटा’ भी है, पर युग ‘जेट’ के नाम से ही जाना जाता है ?
तो बात दृष्टि में आमूल परिवर्तन की थी-यह परिवर्तन ‘नयी कहानी’ में सभी स्तरों पर आया। मूलतः कथ्य के स्तर पर ! बदलती हुई विचार-परम्परा और आकुल जन की संकुलता को जितनी सघनता से इधर की ‘नयी कहानी’ ने पेश किया, वह पहले नहीं था। पुरानी कहानी का व्यक्ति-चरित्र इकहरा था, मात्र शारीरिक अस्तित्व का स्वामी था। वह अपना विश्लेषण माँगने वाला व्यक्ति नहीं, कहानियों के कथानकों को वहन करने वाला साधन था जो साहित्य के शाश्वत मूल्यों के नाम पर शाश्वत कार्य करने के लिए मजबूर था। एक डॉक्टर व्यक्ति को मानव मूल्यों के नाम पर अपने रक़ीब को बचाना ही था, चाहे उसके रक़ीब का रोग नितान्त असाध्य ही क्यों न रहा हो, क्योंकि तब कहानी में वही होता था जो कहानीकार चाहता था। गणित की तरह उनके उत्तर-अन्त निश्चित थे...‘नयी कहानी’ में यह उत्तर-अन्त नहीं हैं। कहानी की आन्तरिक प्रकृति और सम्प्रेषित कथ्य में इससे बहुत बड़ा अन्तर आया है। ‘नयी कहानी’ में कथ्य के स्तर पर हर उस बात को उठाया गया जो नयी चेतना को सोचने के लिए बाध्य करती थी, वह पहले चाहे जितना भी वर्जित रही हो...पुरानी कहानी में व्यक्ति शारीरिक रूप से आता था और वैचारिक रूप से कथाकार-‘नयी कहानी’ में यह विचार उसी शरीर में अवस्थित बुद्धि से उपजता है जिसे प्रस्तुत किया जाता है...तब विचारों को हाड़-मांस प्रदान किया जाता था, अब हाड़-मांस के इनसान के विचारों को भी प्रस्तुत किया जाता है। यह भेद इसलिए है कि तब लेखक अपने को समाज का नियामक, पथप्रदर्शक और भविष्य-द्रष्टा मानकर चलता था, अब वह अपने को सहभोक्ता, पथ का जीवन्त साथी और स्थितियों का विश्लेषक व प्रस्तुतकर्ता मानता है।

इसीलिए ‘नयी कहानी’ में क़िस्सागोई का परम्परावादी रूप नहीं है। अब आन्तरिक और बाह्य जीवन के अनुभव-खण्डों की लय और अन्विति की यथार्थ-प्रेरित कथात्मकता ही उसका लक्षण है। और जीवन के नवीनतम अनुभव-खण्डों को प्रेषित करने की उद्दाम इच्छा कहानीकार में है, इसीलिए वह अपने पूर्ववर्तियों से कहीं ज़्यादा गतिशील है।
अब इस संग्रह के बारे में। इस संग्रह की कहानियाँ एक बदली हुई मनःस्थिति की कहानियाँ हैं। तीन वर्ष पहले मुझे टेलीविज़न की नौकरी के सिलसिले में दिल्ली आना पड़ा। इलाहाबाद छोड़ते हुए बड़ी तकलीफ़ हुई, पर यहाँ आकर जब चारों तरफ़ देखना शुरू किया तो लगा कि एकाएक सब कुछ बदल गया है। यहाँ एक नयी ही ज़िन्दगी थी, एक ऐसी ज़िन्दगी जिसके किनारे खड़े होकर देखने से बहाव का पता ही नहीं चलता था...एक अजीब-सा परायापन और बेगानापन है यहाँ।

और सृजनात्मक प्रक्रिया तो कुछ ऐसे दौर से गुज़री कि हाथ-पैर ही फूल गये। यहाँ बैठकर अपने संचित अनुभवों के आधार पर जो भी लिखता वही बहुत सीमित और बेमानी-सा लगता। क़रीब तीन-चार महीने में घोर मानसिक संकट से गुज़रा। संकट दोनों तरफ़ था-ऊपरी ज़िन्दगी में भी और भीतरी में भी। ऊपरी संकट और शोर को किसी हद तक सुविधाओं से जीता जा सकता था, पर भीतर का संकट सालता था। भीतर एक ऐसा शून्य समा गया था कि उसमें उबरने का रास्ता ही नज़र नहीं आता था। लगा यही कि हमारे सोचने का ढंग, हमारी कहानियों का गठन, हमारी भाषा, हमारे प्रतीक-संकेत और शैली-सब कुछ अधूरे-अधूरे हैं। हर अवयव की नयी माँग है। जो भाषा हम लिखते आये हैं, वह यहाँ के संवेदनों और उलझे हुए अनुभव-खण्डों को व्यक्त करने में असमर्थ है। जो प्रतीक योजना और संकेत बड़े सशक्त लगते थे, वे यहाँ आकर बड़े अशक्त, श्लथ और सीमित लगते थे। यहाँ की ज़िन्दगी को प्रस्तुत करने के लिए जैसे हमें सब कुछ नया और दूसरा चाहिए था।

यह माँग सिर्फ़ इसी शहर की हो, यह बात नहीं है- यह तो समय की माँग है-इसी के अनुरूप ‘नयी कहानी’ को और भी विकसित होना है। यहाँ के ज़िन्दगी के सूत्र इतने उलझे हुए हैं, मान-मूल्य इतने बदले हुए हैं कि पिछला पहनावा और दृष्टि इस सन्दर्भ में उतने खरे नहीं उतरते, जितने कि वे थे। लेखन-प्रक्रिया में यही संकट आड़े आ रहा था।
दिल्ली सचमुच ही बडी संक्रामक है...लेकिन इसी दिल्ली में आखिर रास्ता तो मिलना ही था। लगा कि इस अवरोध को तोड़ने के लिए शायद शुरू-शुरू में प्रत्यक्ष या परोक्ष व्यंग्य का सहारा ही लिया जा सकता है। और काफ़ी दिनों की घुटन के बाद ‘जॉर्ज पंचम की नाक’ कहानी लिखी गयी। इस कहानी के प्रकाशित होने के बाद की कहानी और भी मज़ेदार है, क्योंकि इसे लिखने के समय मैं सरकारी टेलीविजन में नौकर भी था। यह एक अलग दास्तान है...
बहरहाल, इस कहानी के लिखे जाने के बाद रास्ता साफ़ हुआ और जो कहानियाँ मैंने लिखीं उसमें से अधिकांश इस संग्रह में संकलित हैं।

‘अच्छी कहानी’ और ‘बुरी कहानी’ के ग़लत सन्दर्भ में इस संग्रह की कहानियों के बारे में मुझे कुछ नहीं कहना है, क्योंकि अच्छी या बुरी होने का सवाल तब उठता है जबकि वे दिमाग़ी ऐयाशी के लिए लिखी गयी हों-ऐयाशी का वह वक़्त हमारे हिस्से में नहीं आया। मेरी दृष्टि में कहानी की क़ीमत इसमें नहीं है कि वह अच्छी है या बुरी, उसकी सार्थकता और निरर्थकता भी मेरी नज़र में बहुत माने रखती हैं।

-कमलेश्वर

एक अश्लील कहानी


नग्नता में भयानक आकर्षण होता है, उससे आदमी की सौन्दर्यवृत्ति की कितनी सन्तुष्टि होती है और कैसे होती है, यह बात बड़े दुःखद रूप में एक दिन स्पष्ट हो ही गयी। अनावृत शरीर से न जाने कैसी किरनें फूटती हैं, कैसा उल्लास और कैसी तृप्ति उसमें होती है ! एक-एक रेखा का बाँकपन नया-नया लगता है। खुला हुआ तन दूर ही सही, पर उसके रोम-रोम में बसी हज़ारों-लाखों आँखें बरबस अपनी ओर खींचती हैं। दिन-भर के थके-हारे क़दम और रात-भर अपनी विवशताओं के विचारों से टूटा हुआ मन एक ही जगह केन्द्रित हो जाता है। सब मजबूरियों के खयाल उस क्षण न जाने कहाँ दुबक जाते हैं। वैसा सम्मोहन, वैसी मुग्धता और प्यास कभी महसूस ही नहीं की। रूप की अनुभूति इस तरह घेर लेती है कि न आँखें मूँदते बनता है न खोलते ही।

मैंने उसे ऐसी ही विमुग्ध स्थिति में अनवरत खड़े देखा है। जब वह उस प्यास से जलता होता, तब न उसके चेहरे पर तमतमाहट होती, न पशुता। बस वह देखता खड़ा रहता। कुछ देर बाद वह अपनी आँखों को बड़े ज़ोर से मलता और वैसी ही उन पर गदेलियाँ रखे अपने बिस्तर पर आकर बैठ या लेट जाता। अपनी बरबादी और मुसीबतों की बातें वह सिर्फ़ शाम को ही करता है। सुबह आँख खुलने के बाद उसके मन की बेचैनी और छटपटाहट सिर्फ़ महसूस की जा सकती है। सुबह वह ज़्यादा बात भी नहीं करता। बात करता भी है तो चार-चार, पाँच-पाँच मिनिट बाद, जैसे उसे किसी की याद आती रहती है। उसकी सब बातें अधूरी रह जाती हैं, यहाँ तक कि नौकरी की भी। सुबह नौ बजे तक का समय बिलकुल उसका अपना नहीं होता। वह कमरे से बाहर नहीं जाता, कोई मिलने आ जाये तो मुझसे मना करवा देता है। एकाध बार मैंने कहा भी, ‘‘क्यों चन्द्रनाथ, मान लो वह तुम्हारी नौकरी के लिए कोई सन्देशा लेकर आया हो तब ?’’

‘‘मैं दस बजे उससे जाकर ख़ुद मिल लूँगा।’’ चन्द्रनाथ सहज ही कह देता, ‘‘इतनी-सी देर में क्या बना-बिगड़ा जाता है ?’’
‘‘लेकिन तुम्हें....’’ मैं कुछ भी आगे बोलने को होता तो वह संकोच में पड़ जाता और बड़ी बोदी दलील पेश करता, ‘‘कुछ थोड़ा-सा वक़्त मेरा अपना भी होना चाहिए, दिन-दिन-भर ख़ाक छानता हूँ, रात-रात-भर दौड़ता रह जाता हूँ तो कुछ देर अकेले बैठने को मन करता है...तुम तो जानते हो कि मैं इस वक़्त...’’ कहते-कहते उसे अपनी बात झूठी लगने लगती पर जिस बात के लिए आदमी मन से बेबस होता है उसके लिए वह बेशरमी भी लाद लेता है। ऐसा नहीं कि उसे इस बात का अहसास न हो कि मैं उसकी हरकतें नहीं जानता। पहले वह तरह-तरह के बहाने बनाकर खिड़की के पास खड़ा होता था, अब खुलेआम खड़ा होने लगा है और इस तरह खड़ा होता है कि यह बात उसकी अपनी और नितान्त वैयक्तिक है। इसमें हस्तक्षेप करने का साहस किसी को नहीं होना चाहिए।

औरतों और अफ़सरों के सम्बन्ध में चन्द्रनाथ के एक-से विचार थे। पर जब वह कुन्ती को देखता...हाँ, सामने वाले मकान में रहने वाली उस सुन्दर-सी औरत का नाम कुन्ती ही है, लेकिन आपको उसके नाम से क्या मतलब ? आप सिर्फ़ इतना जान लीजिए कि कुन्ती की उम्र लगभग तीस वर्ष है, रंग गोरा ही नहीं, उसके गोरेपन में रेशम-सी आभा है। आँखों की पुतलियाँ बेहद काली हैं और बालों के सिरे भूरे।

उसके घर का जितना हिस्सा इस दोमंजिले पर बने कमरे से दिखाई पड़ता है, उसकी सजावट में बड़ी सुरुचि है। घर देखकर उसके जीवन के सुख से सहज ही किसी को ईर्ष्या हो सकती है। नीले परदों के पीछे सजे वे कमरे बड़े रहस्यमय लगते हैं, रात को जब उनमें रोशनी होती है और कुन्ती अपनी साड़ी का पल्ला कमर से लपेटे कभी उन परदों के पीछे से गुज़रती है तो उसकी समतल चाल से फ़र्श पर क़ालीन बिछे होने का बोध होता है। वह कभी सन्तप्त या व्याकुल नहीं दिखाई दी, उसने कभी नज़र उठाकर इधर-उधर वहशी निगाहों से किसी को देखा हो, ऐसा भी नहीं हुआ। उसके मन में कभी बादल घुमड़े हों और बरसने से पहले की उदासी ही छायी हो, यह भी नहीं दिखाई दिया।

इस खिड़की से उसके घर का नक़्शा ऐसा दिखाई देता है जैसे किसी सुरंग में बसे मकान के कटे हुए हिस्से दिखाई दे रहे हों। यहाँ से उन ऊपर वाले कमरों के अलावा नीचे का ग़ुस्लख़ाना, आँगन का थोड़ा-सा भाग, तीन-चौथाई बरामदा और बरामदे के भीतर वाले कमरे का वह हिस्सा दिखाई पड़ता है जिसमें श्रृंगार-मेज़ रखी है। सुबह वह यहीं दिखाई पड़ती है, लगभग एक डेढ़ घण्टे के लिए। उसके बाद वह भीतर वाले उन रहस्यमय कमरों में खो जाती है। घर में दो पुरुष दिखाई पड़ते हैं, जिनमें से एक उसका पति है और एक सौतेला लड़का, जिसकी उम्र लगभग बीस वर्ष की होगी। कुन्ती के पति छोटे-मोटे रईस हैं। उन्हें कपड़े पहनने और ढंग से रहने का शौक़ है। इस घर में कभी दंगा-लड़ाई या मनमुटाव की छाया तक नहीं दिखाई दी। छोटे-से गिरजे की तरह ईश्वरीय शान्ति यहाँ फैली थी और ये तीनों ही प्राणी मिशनरियों की तरह अपने-अपने कर्तव्य में लगे नज़र आते थे। इन कमरों से कभी ऊँची आवाज़ उन्मत्त क़हक़हे या विलासपूर्ण जीवन की गुनगुनाहट भी नहीं सुनाई दी ?



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