प्रवासी आवाज़ - अंजना संधीर Pravasi Awaz - Hindi book by - Anjana Sandhir
लोगों की राय

प्रवासी लेखक >> प्रवासी आवाज़

प्रवासी आवाज़

अंजना संधीर

प्रकाशक : पार्श्व पब्लिकेशन प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :292
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 6316
आईएसबीएन :81-902407-0-6

Like this Hindi book 5 पाठकों को प्रिय

237 पाठक हैं

दो संस्कृतियों के धरातल पर आधारित कहानियाँ

Pravasi Awaz A Hindi Book By Anjana Sandhir - प्रवासी आवाज़ - अंजना संधीर

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

‘‘ये दो संस्कृतियों के धरातल पर सृजित कहानियों का संग्रह है’’

‘‘अमेरिका स्थित अप्रवासी हिन्दी-कवयित्रियों की तरह, वहाँ के अप्रवासी हिन्दी-कहानीकारों को भी, पहली बार हिन्दी-संसार के समक्ष प्रस्तुत करने के इस महत्प्रयास के लिये मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार करें।

अपने इन ऐतिहासिक संकलनों के माध्यम से, अब तक प्रकाशित हिन्दी साहित्य की विभिन्न विधाओं के एकांगी एवं अपूर्ण इतिहासों को पूर्णता प्रदान करने की दिशा में, आप स्वयं इतिहास बनाती जा रही हैं।

परिवार और जीविका को प्राथमिकता देते हुए, अमेरिका के व्यस्त मशीनी जीवन में आप कैसे इतना कुछ कर लेती हैं। आपके अदम्य उत्साह, आप की कर्मठता एवं आपकी सक्रियता वास्तव में ईर्ष्य है। सम्पादन-कला में भी आप को जो महारत हासिल है, उसे देख कर प्रसन्नता होती है।
जहाँ तक मुझे मालूम है अमेरिका में काव्य-रचना की तरह कथा-लेखन के क्षेत्र में भी, महिलाएं ही अग्रणी रही हैं। और, यह आपके इस संकलन से भी स्पष्ट है। सबसे अच्छी बात यह है कि इस संकलन में आपने उन्हीं कहानियों का चयन किया है जो वहां के कहानीकारों द्वारा वहाँ रहते हुए लिखी गई हैं। कदाचित् यही कारण है कि इन कहानियों में, हृदय स्पर्श करनेवाली, मानव संवेदनाओं से समन्वित तथ्यों के अतिरिक्त, इनमें आत्मनिर्वासित अप्रवासियों की अर्न्तद्धंदजनित आंतरिक पीड़ा के साथ-साथ, अमेरिकी परिवेश तथा उनकी दैनन्दिनी समस्याओं का भी कुशल चित्रण देखने को मिलता है।

दो संस्कृतियों के धरातल पर सृजित इन कहानियों का निश्चय ही साहित्य-जगत में स्वागत होगा।
डॉ. बजरंग वर्मा

‘‘अपनी राष्ट्रभाषा हिन्दी तथा अमरीकी विश्वविद्यालयों में विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी पढ़ रहे तमाम छात्रों के नाम जो आज हिन्दी सीख रहे हैं, कल बोलेंगे और परसों भारत ज़रूर आयेंगे।’’
डॉ. अंजना संधीर

सम्पादकीय

‘‘प्रवासी आवाज़’’ अमरीका के विभिन्न राज्यों में बसे चवालीस हिन्दी लेखकों की कहानियों का गुलदस्ता आपके हाथों में सौंपते हुए मन आनंद-उल्लास से भरा हुआ है। आज पहली बार अमरीका से हिन्दी कहानियां एक संग्रह के रूप में हिन्दी साहित्य को सौंप रही हूँ, एक चिरकालीन सपने के साकार होने की अनुभूति से आनंदित हूँ। आज 15 जनवरी 2008 है और मैं इस देव भूमि भारत में हूँ जबकि ठीक आज ही के दिन सन् 1995 को मैं भारत के भरे पूरे आकाश को पतंगों से सजा छोड़ अमरीका के लिए रवाना हुई थी उत्तरायण की आधी रात को जब 12 बजे के बाद 15 तारीख हो जाती है। और पहुँची थी 15 तारीख को पूर्व से पश्चिमी देश अमरीका के मशहूर शहर न्यूयार्क में फ्लाइट लेट होने के कारण आधी रात को।

आँखों में ठहरे हुए समंदर की भरी-भरी लहरें लिये हुए अपने वतन को छोड़ पराये देश में जाना कितना मुश्किल होता है। आज चाहे तरक्की कितनी भी हो गई है, टेलीफोन, ई-मेल, स्पीडपोस्ट, कुरियर ने संसार को छोटा कर दिया हो लेकिन सहर्ष विदेश जाने को लालायित लोगों की भी जब जाने की घड़ी आती है तो मानों या न मानों हृदय द्रवित हुए बिना, आँखें भरे बिना नहीं रहती हैं। एयरपोर्ट पर साथियों, रिश्तेदारों के साथ चाहे हंसी मजाक चलता हो, सब खुश भी लगते हों लेकिन शीशे के पार जाते ही भर जाता है आदमी जब आखरी बार हाथ हिलाता है—क्या पता फिर यहाँ आना हो या न आना हो—
इसीलिए—

‘भैया को दीनों महलो—दो महले
हम को दियो परदेश
बाबुल मोरा नैहर छूटो जाय’’
बराबर कानों में गूंज रहा था।
एक अच्छा खासा साहित्यिक, सामाजिक जीवन जीते हुए अंजान देश में विवाहोपरांत गई थी जहाँ मेरे पति के अलावा कोई मुझे जानता न था। भारत से अमरीका गए व्यक्ति को सब से पहले जो आघात लगता है वह है कलचरल शॉक। यहाँ सब कुछ उल्टा है, ताले की चाबी उल्टी लगती है, बत्तियों के स्वीच उलटे जलते हैं, गाड़ी बाएँ तरफ़ से चलाई जाती है यानी वो सब जो पूर्व में सीधा-सीधा होता है यहाँ उल्टा रूप देख मन में उलझन होती है। चारों तरफ़ शांति ही शांति न सड़कों पर शोर न कोई हार्न बजाता है, कभी-कभी पुलिस की गाड़ियों या एम्बुलेंस की आवाज़ आती है, लम्बी गाड़ियों की कतारें पर कोई आवाज़ नहीं। घरों में भी शांति ही छाई रहती है आती है आवाज़ तो वैक्युम क्लीनर, डिस वाशर, टी.वी., टेलीफोन, माइक्रोवेव के टाइमर की, वाशर या ड्रायर की....बिना फोन किये कोई आता नहीं है घर में, आता भी है तो वीकेंड में....एक मशीनरी सिस्टम में फिट हो पाना आसान नहीं होता। ऐसी शांति में सुबह नौ बजे मेरे पति काम पर चले जाते और शाम को साढ़े छः बजे वापस आते। सारा दिन.....बिना किसी से बोले रहना....घबराहट होती थी मुझे। बाहर खिड़की से देखती रहती दूर-दूर तक बर्फ़ ही बर्फ़ दिखाई पड़ती। ऐसी परिस्थिति में मुझ जैसे कवि हृदय की क्या दशा थी अनुमान लगा कर देखिए.....बड़ी परेशान सी रहती थी, सब को याद करते रहती थी ऐसे ही हालात में पहली ग़ज़ल लिखी थी—

‘‘निकले गुलशन से तो गुलशन को बहुत याद किया,
धूप को छाँव को आंगन को बहुत याद किया।
घर जो छोड़ा तो हर इक चीज़ निगाहों में रही,
दर को दीवार को दरपन को बहुत याद किया।
ज़िक्र छेड़ा कभी सखियों ने जो झूलों का यहाँ,
मैंने परदेश में सावन को बहुत याद किया।
तुझको भी याद सताती है मेरी क्या मालूम,
मैंने भाई तेरी दुल्हन को बहुत याद किया।
जिसके साये में मुझे चैन से नींद आती थी,
मैंने अय माँ तेरे दामन को बहुत याद किया।’’

लेकिन मेरी परेशानी ऊपरवाले ने जल्दी हल कर दी। एक दिन भारतीय कौंसलावास के शिक्षा व सांस्कृतिक विभाग से फोन आया कि भारतीय कौंसलावास के न्यू इंडिया हाल में पहली बार होली उत्सव मनाया जा रहा है जिस में एक कवि सम्मेलन का आयोजन है, उसमें मुझे कविता पाठ का आमंत्रण है। 18 मार्च की शाम वतन से दूर अपने लोगों में, अमरीकी झण्डे के साथ अपने तिरंगे को देखकर मन बाग-बाग हो गया। न्यूयार्क के कौंसलावास में अपनी मिट्टी से दूर पहला कविसम्मेलन कभी न भूल सकने वाला अनुभव है जिसने मेरे फेफड़ों में इतनी हवा भर दी कि मुड़ कर देखने का फिर समय नहीं रहा। इस कार्यक्रम में मीडिया के प्रतिनिधियों से मुलाकात हुई, विभिन्न संस्थाओं के लोगों कवियों, लेखकों से मुलाकात हुई और लगा कलम का कारवाँ चल निकलेगा।
अपने आप को व्यस्त रखने के लिए मेरे खोजी मन ने अपनी सर्जनशक्ति को बरक़रार रखते हुए खोज शुरू की कि यहाँ कौन-कौन रचनाकार हैं, क्या लिखते हैं, क्या साहित्यिक गतिविधियाँ हैं। मेरी दो साल की खोज का परिणाम आया, ‘‘प्रवासी हस्ताक्षर’’ जिसमें पहलीबार परिचय, सहित 22 अमरीकी हिन्दी कवियों की कविताएँ मैंने सम्पादित व प्रकाशित कीं। इस पुस्तक का हिन्दी साहित्य में बहुत अच्छा स्वागत हुआ। इसके बाद सन् 2001 में ‘‘ये कश्मीर है’’ काव्य संग्रह का सम्पादन व प्रकाशन किया जिस में 23 रचनाकारों ने कविताएं लिखीं। भारत में भी हिन्दी साहित्य में सिर्फ़ कश्मीर पर कविताओं का एक भी संग्रह अब तक प्रकाशित नहीं हुआ था। इस संग्रह के प्रकाशन के दो वर्ष बाद भारत से भी कश्मीर पर काव्यसंग्रह प्रकाशित हुआ जिसमें प्रसिद्ध कवियों ने कविताएँ लिखी। ‘‘ये कश्मीर है’’ के प्रकाशन पर भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेई जी का शुभकामना संदेश प्राप्त हुआ। विश्व के विभिन्न हिस्सों से शुभ कामानाएँ बधाई पत्र आए। भारतीय अखबारों में छपी सराहना के कटिंग्स जो मित्रों ने भेजे उनको पढ़कर अच्छा लगा। हिन्दी के वरिष्ठ कहानीकार डॉ. महीपसिंह ने 15 सितंबर 2005 के दैनिक जागरण में ‘‘विदेश में साहित्य सृजन’’ लेख में विशेषरूप से इस संग्रह का जिक्र किया। उन्होंने लिखा।

‘‘अंजना संधीर द्वारा सम्पादित एक कविता संग्रह मुझे प्राप्त हुआ है, शीर्षक है ‘‘ये कश्मीर है’’। इस में 23 प्रवासी भारतीय कवियों की कश्मीर से संबंधित कविताओं का संकलन हुआ है। इस संग्रह की कविताएँ विस्मित करती हैं। दूर बैठे हुए भारतीय मूल के कवि कश्मीर को लेकर कितना गहरा सरोकार अनुभव करते हैं, यह बात इन कविताओं के पढ़कर जाना जा सकता है।’’ डॉ. कमल किशोर गोयनका ने एक लेख में लिखा था—‘‘ये कश्मीर है’’ काव्यसंग्रह कई दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। अमरीका में बसे प्रवासी भारतीय कवियों का इस विषय पर पहला कविता संकलन है। इस संकलन से इन कवियों की राष्ट्र भक्ति का परिचय मिलता है और उन संवेदनाओं का जो उनकी स्मृति में कश्मीर को लेकर बसी है।’’

दिल्ली-साहित्य
14 सितम्बर 2003
नई दिल्ली



अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book