बूढ़ा चाँद - शर्मिला बोहरा Boodha Chand - Hindi book by - Sharmila Bohara
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बूढ़ा चाँद

शर्मिला बोहरा

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2008
पृष्ठ :135
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 6081
आईएसबीएन :978-81-263-1424

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सहज सरल शैली में लिखी गई कहानियाँ, जो कि आपसे बतियाती लगती हैं।

Boodha Chand a hindi book by Sharmila Bohra - बूढ़ा चाँद - शर्मिला बोहरा

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


‘शादी से पेशतर’ उपन्यास के बाद शर्मिला बोहरा जलाल का यह पहला कहानी-संग्रह है ‘बूढा चाँद’। इसमें एक दशक के बाद लिखी गयी कहानियाँ संग्रहीत हैं। लेखिका की इस कथा-यात्रा में न तो विशेष उतार-चढ़ाव है और न ही एक सीध में चलती यात्रा। पगडंडियों को पकड़ती और छोड़ती हुई ये कहानियाँ घर-बरामदे, बाजार-हाट और अन्तर्मन में मडराती छात्राओं के आसपास डोलती रहती हैं। तकनीकी कौशल तथा अनुंसन्धानी लटके-झटके वाली महत्त्वाकांक्षी कहानियों से इतर इनकी शैली बातचीत और संवाद की है, जिसमें पाठक भी साथ हो जाता है।

इन कहानियों की लेखिका की खास सिफ़त यह है कि आजकल की अनेक लेखिकाओं के बरक्स उसमें ‘मरदाना’ होने की जिद नहीं है और न ही खास सघड़ नज़रिये से दुनिया को नापने का इरादा। बल्कि उनमें एक बच्ची की-सी उत्सुकता और हैरानी है। कहानियों में लेखिका एक ही साथ बालिका, किशोरी, और युवती के रूप में मौजूद है। संग्रह की सबसे लम्बी कहानी ‘बूढा चांद’ एक ऐसी ही कहानी है जिसमें एक बालिका विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर को अपना मित्र बनाकर उनसे बतियाती रहती है। यह बातचीत एक बालिका के अन्तर्गत और बाह्य जगत के बीच एक पुल बनाने की कोशिश भरी अनूठी कहानी है।
शर्मिला की अधिकतर कहानियाँ छोटी-छोटी घटनाओं से बुनी गयी हैं। ‘मॉल मून’ और ‘कार्न सूप’ आज बड़े शहरों में पनप रही मॉल संस्कृति की ट्रैजी-कॉमिक तस्वीर पेश करती हैं।
आशा है इन कहानियों का वैविध्य पाठकों को रुचिकर लगेगा।

आश्रय


मैं एक बात को दो बार, तीन बार, कभी-कभी तो चार बार बोलता हूँ। चार बार ही क्यों शायद बार से ज्यादा। बार-बार बोलता हँ। बार-बार बोलता हूँ फिर भी लगता है एक बार और बोलूँ। मेरी पत्नी नेहा कहती है, ‘‘समझ गयी, बार-बार क्यों कहते हो।’’ वह झुँझला जाती है। वह बेचारी भी क्या करे। कितना सुने। मेरी माँ भी तो एक बात को अनेक बार बोलती थी। मैं नेहा को समझा नहीं पाता कि एक बात को बार-बार बोलकर मैं उस बात को बार-बार समझाता हूँ। बार-बार उसमें नयी बात नया रंग देखता हूँ, जैसे कोई गायक अपनी एक पंक्ति को कई बार कई ढंग से कई रंग में गाता है। वह खीजती है, उकता जाती है। मैं उसे समझा नहीं पाता और माँ को समझाने की जरूर नही पड़ती। तभी तो मैं और मां जब बात करने बैठते हैं, पता नहीं चलता समय कहाँ जा भागता है।

मैं मां से सब बात करता हूँ। मुझे उससे बात करना अच्छा लगता है। वह मेरी बहुत सारी बातें बिना बोले ही समझ जाती है। नेहा कहती है, ‘‘माँ से भी क्या कोई बहुत बात कर सकता है। माँ बहुत बोर करती है।’’ उसका इशारा मेरी माँ की तरफ न होकर दुनिया भर की उन माँओ की तरफ होता है। जो विषय पर बात नहीं कर सकतीं। वैसे नेहा भी अपनी माँ से खूब बात करती है, फिर भी कहती है, ‘‘उफ, माएँ कुछ नहीं समझतीं।’’ उसका यह भी कहना है कि जितनी मां समझती है उतना कोई और इनसान नहीं समझता, पर वह बिन्दु भी आता है जब माँ का बातों को समझाना खत्म हो जाता है। यह नेहा की सोच है। यह समझ उसे अपनी माँ को देखकर है। पर मेरी मां मेरी मां है। माँ एक ऐसा वृक्ष है, जिसके नीचे बैठकर मेरी सारी थकान दूर हो जाती है। वह एक नदी है, जिसका जल पीकर मैं तृप्त हो जाता हूँ। यह बात मेरी नहीं है, किसी लेखिका ने अपनी मां के लिए कही है। पर यह बात मुझे अपनी बात लगती है।
मैं और मेरी माँ एक बात को बार-बार दोहराते हैं। दुहराना जाप है। निरन्तर समान गति से चलता हुआ मां का बार-बार कहना, ‘खा ले’ मेरा जवाब देना ‘भूख नहीं है।’ यह जबर्दस्ती नहीं है। मनुहार है, जिसे नेहा एक बार पूछकर यह मान कर छोड़ देती है कि भूख लगेगी तो खा लूँगा।

मेरी मां बीमार है। वह कई दिनों से बीमार है। वह तो वर्षों से बीमार है। मैं कहता हूं, ‘‘माँ !’’
वह कहती है, ‘‘हां बेटा’’
मैं फिर कहता हूँ, ‘‘माँ !’’
वह फिर कहती है, ‘‘बेटा।’’ ना ही मैं ‘माँ’ के आगे कुछ कहता हूँ ना ही वह ‘हाँ बेटा’ के बाद कुछ बोलती है।
हमारा यह खेल चलता रहता है। नहीं, यह खेल नहीं है। यह माँ को पुकारना है, टोहना है, जाँचना है। यह देखना है कि माँ ठीक तो है न ! मां सुन तो रही है ना ! इतनी बड़ी बीमारी के बाद माँ में कुछ बचा हुआ तो है ना ! पर वह माँ है। उसमें सबकुछ बचा हुआ है। कैंसर ने शरीर को क्षत-विक्षत किया है। घायल तो मन भी हुआ है, पर वह मन जो बेटे की आवाज सुनता है, जो बेटे को देखता है, एकदम स्वस्थ है। पहले से ज्यादा सजग और बलवान।
मैं माँ से कहता हूँ, ‘‘ये नेहा जब देखों उकताई रहती है।’’

मां हँसती है। कहती है, ‘‘अभी माँ नहीं बनी ना !’’
मैं कहता हूँ, ‘‘क्या बात करती हो ! नौ महीने का हो चला मुन्ना और यह मां नहीं बनी ?’’
मां कहती है, ‘‘मुन्ने ने माँ बोलना कहाँ शुरू किया !’’
मैं कहता हूँ, ‘‘माँ तुम भी ...।’’
माँ मेरी बात सुने बिना कहती है, ‘धीरे-धीरे समझेगी।’’
मैं जोश में आ जाता हूँ। कहता हूँ, ‘‘उस मेहतर को देख लो। वही जो रोज हमारे घरो का पाखाना साफ करता है। कूड़ा उठाता है। कितना दुर्गन्ध भरा काम करता है। पर जब देखों तप प्रसन्न रहता है क्या गला पाया है उसने कितना अच्छा गाता है। हर वक्त गाता रहता है, एक से बढ़कर एक पुराने सदाबहार गाने।’’

माँ हँसने लगती है। कहती है, ‘‘नेहा गाती नहीं ना’’
मैं कहता हूँ माँ उसे छेड़ूँ ? ’’देखो अभी तक कहता हूँ, ‘‘नेहा तुम्हारी माँ ने तुम्हें गाना नहीं सिखाया ?’’ वह समझ जाएगी, ‘‘सिखाया तो खूब है, पर गाने लगूँ तो काम कौन करेगा ? आपके यहाँ काम भी तो कम नहीं।’’ कहेगी, ‘‘मुझसे भला मेहतर लगने लगा !’’ मैं और माँ दोनों हँसने लगते है।

मैं मां से दूसरी बात करने लगता हूँ। कहता हूँ, ‘‘जानती हो मां कल जब मैं मैट्रों स्टेशन में खड़ा था मुझे विजया राय दिखीं। वहीं जो हमें स्कूल में हिन्दी पढ़ाती थी। सोलह सत्रह वर्ष पुरानी है या उससे और ज्यादा। मां वह अब अजीब लगने लगी हैं। बूढ़ी और कुछ-कुछ डरावनी। उनकी बड़ी-बड़ी आँखें बाहर की तरफ इस तरह लटक गयी हैं कि लगता है अभी गिर पड़ेगी। शायद कक्षा ग्यारह मे मैं उनसे पड़ा हूँ। उन दिनों वह सुन्दर लगती थीं। दमकता था उनका चेहरा। इन सालो में कितना बदल गया है ! कितनी बूँढ़ी हो गयी है ! मैंने एक और टीचर को भी देखा था। इतिहास पढ़ाने वाली इला सिंह को। इनका अच्छा लगना इतिहास बन गया था। वह भी बदसूरत लगने लगी है। मां, क्या पूरा का पूरा स्टाफ रूम बूढ़ा हो गया है ! मैं अचानक माँ को देखता हूं कहता हूँ, ‘‘माँ तुम एकदम बूढ़ी नहीं लगतीं।’’
‘‘तुम्हें नहीं लगती पर हो गई हूँ।’’
‘‘नहीं माँ तुम कभी भी ऐसे मत कहना ।’’
‘‘ठीक है जवान बेटे की जवान मां। हाँ।’’

तभी मैं देखता हूँ- मां नाक का काँटा जो हमेशा पहने रहती थी घुमा रही है। मुझे पता है काँटे को घुमाते-घुमाते व उसे खोल लेंगी, उसमें अपनी जीभ लगाएँगी और फिर उसे पहन लेंगी। ऐसा माँ तब से करती आ रही है जब से मैंने माँ को देखना शुरू किया है। मुझे उनका ऐसा करना अच्छा नहीं लगता।

उबकाई आती है कई बार मैंने टोका भी। वह हँस देती है और फिर करने लगती है। नेहा कह रही थी, ‘‘मां उसे हर समय अपने पाखाने का हिसाब-किताब देती रहती है।’’ बताती है कि उसे कब किस रंग की हुआ और कड़ा हुआ या पतला। नेहा मुँह बनाकर कहती है, ‘‘मां यह सब मुझे क्यों कहती है। मैं उनकी डाक्टर हूँ क्या ? मुझे मितली आती नहीं, ‘बाकी कुछ बचता नहीं। मैं नेहा से कहता हूँ तुम भी तो ऐसा ही करती हो, जब सर्दी हो जाती है खँखार कर थूकती हो। थूक को ध्यान से देखती हो और विस्तार से मुझे उसके रंग और गाढ़ेपन के बारे में बताती हो। नेहा कहती है, ‘‘मैं सिर्फ थूक के बारे में बताती हूं नेहा यह भी कहती कि आजकल माँ को कुछ भी खाने के लिये दो। मां एकदम बच्चों की तरह करती हैं। कभी कहेंगी- गरम है, कभी कच्चा तो कभी जला हुआ। ऐसा कहने के तुरन्त बाद नेहा यह भी कहती है, ‘‘जब मुझे मलेरिया हुआ था, मैंने तो खाना ही छोड़ दिया था।’’ माँ तो खा लेती हैं।

नेहा समझती है कि माँ बीमार है। मां को पूरे-पूरे दिन दूध, फल, सब्जियों का सूप वगैरह देना जरूरी है। माँ नहीं पीएगी यह भी एक दिक्कत है। नेहा कहती है, ‘‘जानते हो मां की तबीयत खराब क्यों हुई ?’’ मैं जानता हूँ नेहा क्या कहने वाली है। मैं उसकी बात अनसुनी कर देता हूँ। मैं उसकी बात कई बार सुन चुका हूँ। हमारी लम्बी बहस हो चुकी है। ऐसी बहस जो अनन्त है, जो हमेशा उद्वेलित कर देती है। मैं व्याकुल हो जाता हूँ। वह एक ही बात को कई तरह से बताती है। वह कहती है कि मां ने कभी भी अपनी परवाह नहीं की। घर की परवाह करती रही। जिसने सबकी परवाह की उस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। धीरे-धीरे बीमारी शरीर में पलने लगी। पकने लगी, मां उसे टालती गयी। समय टलता गया। नेहा का चेहरा बदल जाता है। वह जोर-जोर से कहने लगती है, ‘‘यह जो व्यवस्था है न जिसमें पुरुषों की चलती जोर-जोर से कहने लगती है, ‘‘माँओं की यही दशा होती है। क्या कभी किसी ने माँ से पूछा कि माँ तुम्हारा मन भी करता होगा घर से बाहर निकलने का। कोई काम न हो तो भी सड़क पर चलते हुए लोगों को देखने का। कुछ खरीदना न हो तो भी चीजों के भाव पूछने का।’’ मैं नेहा की ये बातें सुन नहीं पाता। मैं उसे कहता हूँ- इतना कड़ा मत बोला करो। मैं घर से निकल जाता हूँ मैं उसकी बातें भूलने की कोशिश करता हूँ। मैं उसका कहा भूल जाता हूँ।

मैं घर लौट आता हूँ। माँ के पास जा बैठता हूँ। देखता हूं मां अपने गद्दे पर नहीं है। माँ। मां, कहां गई ! माँ चली गई ! माँ घूमने चली गयी। मैं माँ को आवाज देता हूँ और जोर-जोर से माँ को पुकारने लगता हूँ। मैं प्रलाप करने लगता हूँ। माँ, मेरी माँ घर पर नहीं है। व आज घर से निकली है। घूमने निकली है। उनका भी तो मन है। वह भी तो बेरोक-टोक घूमना-फिरना चाहती है, तभी मां स्नानघर से निकल कर समाने प्रकट होती है। मुझे ध्यान से देखती है। धीरे से कहती है। ‘‘क्या हुआ ? ये क्या बोले जा रहा है। जानता तो है कि घर से कितना कम निकलती हूँ और अब तो यह बीमारी आ गयी। कहाँ जाउंगी ?’’ नहीं मां, तुम जाओ। तुम जाना चाहती हो जाओं। बोलो, कहाँ जाने का मन है। मैं ले जाऊँगा।’’ मुझे कहीं नहीं जाना। बस तू मेरे साथ बैठा रह।’’ तो क्या माँ तुम्हारे मन में कोई इच्छा नहीं है ? इच्छा थी ही नहीं या मर गयी ?’’ माँ मुझे एकदम बच्चों की तरह पुचकारते हुए पूछती है, ‘‘नेहा से बहस हो गयी ?’’ मैं माँ के और करीब आ जाता हूँ। कहता हूँ, ‘‘माँ।’’ माँ हंस देती है और कहती है, ‘‘पढ़ी-लिखी है नेहा। आजकल के बच्चे सब चीजों के कारण खोजने में लगे रहते हैं। यह है तो इसलिये है। व्यवस्था में दोष निकालना।’’ ‘‘पर माँ सब लोग खूब बाहर आते-जाते थे, तुम घर से सबसे कम निकलती थी क्यों ?’’ ‘‘तेरे पिताजी को पसन्द नहीं था। फिर तेरी दादी को क्या पसन्द आता ?’’ मैं माँ का हाथ अपने हाथ में ले लेता हूँ। तू खुश है ना ! मां मेरे गाल पर हलके से चपत लगाती है, कहती है, ‘‘ये क्या पूछ रहा है। तुम्हे लगता है मैं खुश नहीं हूँ। ठाकुर जी ने जैसे रखा है वैसे रही। जितनी उम्र लिखवाकर लाई हूँ, उतनी ही तो जुऊँगी ना !’’ मैं माँ को टोकता हूँ कि तुम ऐसा क्यों कहती हो, तुम बहुत जिओगी। मुन्ने की शादी देखोगी। मां इस बात पर मुस्करा देती है। मैं माँ को फिर देखने लगता हूँ।

मैं माँ से पूछता हूँ, ‘‘माँ मैं बदल रहा हूँ ?’’ माँ कहती है, ‘‘बिल्कुल नहीं। किसने कहा ?’’ ‘‘नेहा कह रही थी।, मैं सबमें बुराई खोज लेता हूँ। मुझे कोई अच्छा नहीं लगता।’’ माँ मुझसे पूछती है, ‘‘तू ऐसा करता है क्या ?’’ ‘‘मुझे नहीं मालूम। पर माँ सब अच्छे नहीं है और हमेशा अच्छे बने रहेगे, यह सच तो नहीं है। लोग बुरे भी तो हैं। अब मुझे वे बुरे लगने लगे जो पहले अच्छे लगते थे तो मैं क्या करूँ ?’’ मां चुप रहती है माँ जानती है कि मैं ऐसा कैसे हो गया। माँ के बीमार होने से मैं बदलने लगा। नेहा यह सब नहीं समझेगी। मैं नेहा से कहता हूँ सब ऐसे ही हैं। ऐसे ही से मेरा मतलब ‘मतलबी’ होता है। मैं फिर कहता हूँ, सब ऐसे ही हैं। नेहा कहती है, ‘‘समझ तो गयी, बार-बार क्यों कहते हो ?’’ उफ तुम कुछ नहीं समझती। तुम नहीं समझोगी। मैं गुस्से से नेहा के पास से उठकर माँ के पास चला जाता हूँ। क्या मैं मानसिक रोगी होता जा रहा हूँ। माँ के अलावा किसी के पास जाना बैठना, बात करना अच्छा नहीं लगता। मुझे माँ के पास बैठना भी अच्छा नहीं लगता। मुझे कुछ भी अच्छा क्यों नहीं लगता ? मेरा मन कहीं नहीं लगता। यह सब पहले नहीं था। मैं कैसे ठीक होऊँगा ? मैं ऐसा क्यों सोच रहा हूँ कि मैं सही नहीं हूँ। माँ भी ठीक हो जाएगी।


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