हलाहल - धीरेन्द्र अस्थाना Halahal - Hindi book by - Dhirendra Asthana
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स्त्री-पुरुष संबंध >> हलाहल

हलाहल

धीरेन्द्र अस्थाना

प्रकाशक : डॉल्फिन बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2008
पृष्ठ :128
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 6020
आईएसबीएन :978-81-88588-20

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प्रस्तुत है उपन्यास हलाहल....

Halahal

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

धीरेन्द्र अस्थाना ने अपने साथी रचनाकारों की तुलना में कम लिखा हैं; लेकिन जो भी लिखा है, उसका हिन्दी के व्यापक पाठक समाज में बेहद ममत्व और ललक के साथ स्वागत हुआ है। गहरी, मर्मस्पर्शी और अनेक आयामी भाषा के कुशल शिल्पी धीरेन्द्र अस्थाना का नाम उन रचनाकारों में लिया जाता है, जो लेखन को बेहद गंभीरता से लेते हैं और किसी प्रकार की जल्दबाजी में नहीं रहते। यही कारण है कि उनका लेखन उत्पादन नहीं, सृजन की श्रेणी में खड़ा मिलता है। लिखे जाने के क्रम में ‘हलाहल’ उनका दूसरा उपन्यास है।

पहली बार सन् 1988 में प्रकाशित इस उपन्यास को आज भी पढ़ना रचनात्मक की उस ताकत से हमारा साक्षात्कार कराता है, जिसे मुहावरे की भाषा में ‘पुनर्नवा’ कहते हैं। स्त्री-पुरुष संबंधों की एक बेहद पेचीदी स्थिति में उलझ गए इस उपन्यास के नायक की त्रासदी और वेदना इसका सतही सत्य है। अपने गहरे अर्थों में यह उपन्यास उन प्रतिकूलताओं को उजागर करता है, जिनमें फँसकर कोई भी संवेदनशील व्यक्ति ‘नारसिसस’ हो जाने के अभिशाप की तरफ फिसल जाता है, क्योंकि उसे सहेजने-सँवारने के लिए एक तिनका तक प्रकट नहीं हो पाता। हिन्दी के अत्यन्त चर्चित और बहुपठित लेखक उदय प्रकाश ने कभी लिखा था ‘धीरेन्द्र अस्थाना एक तटस्थ निर्ममता और निर्वेग संयम के साथ अपने भीतरी संसार के समूचे अंतर्द्वंद्वों के बखान के लिए बाहरी दुनिया में उसका समरूप प्रति संसार तलाशते हैं। ऐसे ‘कोरिलेटिव’ को अर्जित करना समकालीन लेखन में रचनात्मक उपलब्धि मानी जानी चाहिए।’


हलाहल



जैसे कोई असंभव हादसा घट जाए, ठीक वैसे ही गूँजा बत्तीस बरस की उस कुँआरी औरत अमृता का आर्तनाद, जो पिछले पाँच बरस से सिद्धार्थ के हित में अपनी यातना को मुस्कराते होठों के पीछे छुपाती आई थी।
यह एक डरा देनेवाला अनुभव था कि सिद्धार्थ उस अमृता को फूट-फूटकर रोते देखे, जो आज तक अपनी उपस्थिति या उस उपस्थिति की स्मृति-भर से सिद्धार्थ के रुदन को आकार लेने से रोकती आई हो।
यह छोटे शहर की रात के दस बजे का समय था, जब हलकी-सी सिसकी भी, एक तीखे विलाप की तरह सुनसान सड़कों और निस्तब्ध सन्नाटे को बेध सकती थी, जबकि अमृता का रोना तो सचमुच का हाहाकार था। ऐसा हाहाकार, जो चट्टान पर सर पटकती समुद्र की लहरों से उठता है, या फिर स्त्री के कंठ से फूटता है, जो एक निर्मम दुनिया में अकेली छोड़ दी गई हो।

सिद्धार्थ को समझ नहीं आ रहा था कि वह ऐसा क्या करे कि अमृता पहले जैसी स्थिति में लौट आए। अड़ोस-पड़ोस की खिड़कियाँ-दरवाजे खुलें और लोग मिसेज जोशी के घर का दरवाजा खटखटा दें, उससे पहले ही अमृता का चुप होना जरूरी था। सिद्धार्थ ने बड़ी बेचारगी स्थिति में भी मुस्करा रही थीं और दूसरा पैग सिप कर रही थीं।
अमृता अभी भी बिलख रही थी।

सिद्धार्थ ने अपने गले लगकर रोती अमृता का चेहरा पूरी तरह अपनी गोद में छुपा लिया कि उसके रोने की आवाज कुछ दब सके। अमृता का चेहरा अपनी गोद में छुपाने के बाद वह उसके लंबे बालों में हौले-हौले अपनी उँगलियाँ फिराने लगा। उसने अब तक तीन पैग हलक के नीचे उतार लिए थे लेकिन अमृता के इस तरह अचानक टूट जाने से उसका नशा भी दरक गया था। उसे अफसोस हुआ।

सिद्धार्थ जानता था कि होश में आने पर अफसोस अमृता को भी होगा। और वह इस बात के लिए हमेशा एक ऐसी यातना में जलेगी, जिसकी जिम्मेदारी अमृता पर नहीं जाती। सिद्धार्थ के बहुत जिद करने पर ही अमृता ने नाक बंद करके व्हिस्की का एक बड़ा पैग अपने हलक से नीचे उतारा था, और वह भी एक साँस में।

शराब के पेट में जाने के बाद थोड़ी देर तक तो अमृता उसके माथे को, उसकी आँखों को और उसकी उँगलियों को चूमती रही। फिर वह अचानक ही सिद्धार्थ के गले से चिमट गई। सिद्धार्थ ने उसके कान में फुसफुसाकर याद दिलाया कि सामने मिसेज जोशी बैठी हैं, लेकिन अमृता की पकड़ ढीली नहीं हुई। अमृता की इस स्थिति को देख मिसेज जोशी को ही अपनी कुर्सी से खड़ा होना पड़ा। और मिसेज जोशी का कुर्सी छोड़ना ही गलत हुआ। एक बड़ा पैग वह भी पी चुकी थीं और संभवत: भावुक हो आई थीं। वह कुर्सी से लहराती हुई उठीं, अमृता के पास तक आईं और किसी दार्शनिक के से अंदाज में बोलीं, ‘अपने को सँभाल अमृता ! अपने भीतर की औरत को मत जागने दे। यह सर्वनाश को निमंत्रण देना है।’
मिसेज जोशी के शब्दों के पीछे पता नहीं कौन से बारीक अर्थ छिपे थे कि अमृता बिखर गई और मिसेज जोशी का कमरा उसके हाहाकार में डूब गया। उसके रुदन को सुन मिसेज जोशी ने टेप-रिकॉर्ड पर बजते कुमार गंधर्व के गायन को तेज कर दिया और अपने लिए दूसरा पैग बनाने लगीं।

आखिर, अमृता का रुदन हलकी-हलकी सिसकियों में, और फिर एक गहरे मौन में तब्दील हो गया। शायद वह भीतर से पूरी तरह रीत गई थी। सिद्धार्थ ने उसे आहिस्ता से पलंग पर लिटा दिया और अपने लिए नया पैग बनाने लगा। उसके मस्तिष्क की तमाम नसें कसकने लगी थीं। इस बीच मिसेज जोशी अपना दूसरा पैग खत्म करके किचन में चली गई थीं। उनके जाते ही सिद्धार्थ ने टेप-रिकॉर्ड ऑफ कर दिया और सिगरेट सुलगाने लगा।
वह छठा पैग पी रहा था, जब अमृता झटके से उठ बैठी और आश्चर्य से चारों तरफ ताकने लगी। कुछ देर इसी तरह आँखे फाँडकर इधर-उधर देखने के बाद आहिस्ता से बोली, ‘मुझे क्या हुआ था ?’
‘कुछ नहीं।’ सिद्धार्थ ने कहा, ‘हलका-सा चक्कर आ गया था।’
‘समथिंग रोंग ?’ अमृता ने फिर पूछा। उसकी जुबान हलकी- सी लड़खड़ा रही थी।
‘नहीं।’ सिद्धार्थ ने जवाब दिया और मुस्करा दिया।

‘क्या बजा है ?’
‘बारह।’
‘मिसेज जोशी ?’
‘किचन में।’
‘मुझे उनकी मदद करनी चाहिए।’ अमृता ने कहा और अपनी साड़ी की सिलवटें ठीक करते हुए किचन की तरफ चली गई। वह तनाव रहित और प्रफुल्ल लग रही थी।
सिद्धार्थ को आश्चर्य हुआ। क्या सचमुच अमृता को याद नहीं है कि कुछ ही देर पहले वह एक कमजोर और अकेली स्त्री में बदल गई थी। उसे याद आया, जब वह बेचारगी-भरी नजरों में मिसेज जोशी को ताक रहा था, तब मुस्कराती हुई मिसेज जोशी ने कहा था, ‘उसे रोने दो। इससे उसके भीतर का सारा नरक जल जाएगा और वह अगले पाँच साल तक ऐसे ही जीते रह सकेगी।’

‘लेकिन.......’ उसने कहना चाहा था, पर तभी मिसेज जोशी संजीदा स्वर में बोल उठी थीं, ‘यह रोना एक साधारण और घरेलू स्त्री का विलाप है, जो ताउम्र अपने भीतर की स्त्री को शिकस्त देने के लिए अभिप्राय है। उसे पूरी तरह बह जाने दो ताकि वह छोटी तमन्नाओं से मुक्त हो सके।’
‘छोटी तमन्नाएँ ?’ वह बुदबुदाया और आश्चर्य से अपने सामने बैठी उस स्त्री को ताकने लगा था, जो न सिर्फ अनुभवसंपन्न और जहीन थी बल्कि रूपवान भी थी और जिसके बारे में अमृता ने कहा था कि हमारे छोटे शहर के छोटे लोग मिसेज जोशी को एक दुर्घटना की तरह लेते हैं, क्योंकि उनकी बोल्डनेस से लोगों की खिड़कियों के काँच चटख जाते हैं। यह भी मिसेज जोशी ही थीं, जो उसके और अमृता के प्रेम को संभव बनाए हुए थीं और बिना किसी भय के उसे अपने घर में न सिर्फ टिकाए हुए थीं बल्कि पीने में उसका साथ भी दे रही थीं। अमृता के साथ उसके पत्र-व्यवहार के लिए मिसेज जोशी के घर का पता ही आधार बना हुआ था। वह अपलक उन्हें देखता रहा था और सुनता रहा था। उन्होंने उसे भी एक हिदायत दी थी, ‘तुम भी ध्यान रखना सिद्धार्थ ! इसके भीतर की औरत को तभी जगाना, जब उस जागी हुई औरत को अपना सको, प्यार कर सको। क्योंकि जागी हुई औरत का अस्वीकार सबसे बड़ा जुर्म है।’

मिसेज जोशी को सुनते-सुनते सिद्धार्थ को सहसा ही वह दृश्य याद आ गया, जब अपने अखबार के दफ्तर में वह रविवारीय परिशिष्ट के पेज बनवा रहा था। रात का एक बजा था। चौथा पन्ना बन रहा था। तभी उसकी नजर आर्टिस्ट की मेज से हटकर, यूँ ही अपनी मेज की तरफ चली गई। यह क्या ? सिद्धार्थ चौक उठा। उसकी मेज के ठीक सामने एक औरत खड़ी थी। उस औरत के दोनों हाथ आकाश की तरफ उठे हुए थे और वह प्रार्थना कर रही थी, ‘जो मुझसे प्रेम नहीं कर सका, उस सिद्धार्थ को दण्ड दो प्रभु ! इसे एक ऐसा प्रेम दो, जिसका कोई प्रतिदान न हो। ताकि यह जान सके कि नरक की पीड़ा इस पृथ्वी पर भोगनी पड़ती है।’
‘सुनो !’ सिद्धार्थ ने आर्टिस्ट से कहा, ‘मेरी मेज के सामने यह कौन औरत खड़ी है ?’
पेज बनाते आर्टिस्ट ने पूरे हॉल में नजर दौड़ाई फिर हँसते हिए बोला, ‘आपने तो डरा दिया था अचानक। यहाँ तो कोई नहीं है। कोई सपना तो नहीं देखा आपने।’

सिद्धार्थ ने चाहा कि वह आर्टिस्ट की बात को सच मान ले, लेकिन औरत अभी भी वहीं खड़ी थी, उसी मुद्रा में। दोनों हाथ उपर उठाए, उनके लिए नरक की पीड़ा का वरदान माँगते हुए। धीरे-धीरे औरत ने अपना चेहरा सिद्धार्थ की तरफ घुमाया और सिद्धार्थ के मुँह से चीख निकल गई। वह सुषमा थी। उसकी पत्नी। वह आतंकित हो गया।
उसने आर्टिस्ट से कहा कि अब वह और नहीं रुक सकता। वह घर जा रहा है। सुबह जो मीमो मिलेगा, उससे सुबह ही निपटा जाएगा।
और रात के दो बजे जब प्रेस की गाड़ी से वह घर पहुँचा, तो उसने पाया कि सुषमा हमेशा की तरह, उसके इंतजार में भूखी बैठी जाग रही है। उसने सुषमा को दफ्तर में घटी औरत वाली घटना सुनाई, तो सुषमा धीरे से हँस दी और धीरे से बोली, ‘ज्यादा टेंशन मत किया करो।’

 


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