चाँद पर नाव - हेमन्त कुकरेती Chand per Naav - Hindi book by - hemant kukreti
लोगों की राय

कविता संग्रह >> चाँद पर नाव

चाँद पर नाव

हेमन्त कुकरेती

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2003
पृष्ठ :124
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 599
आईएसबीएन :81-263-0901-1

Like this Hindi book 10 पाठकों को प्रिय

66 पाठक हैं

हेमन्त कुकरेती की महत्वपूर्ण कविताओं का संग्रह...

Chand per Naav - A hindi Book by - hemant kukreti चाँद पर नाव - हेमन्त कुकरेती

प्रस्तुत है पुस्तक के कुछ अंश


‘चाँद पर नाव’ युवा कवि हेमन्त कुकरेती का महत्त्वपूर्ण कविता-संग्रह है। बिम्ब या आख्यान जैसे ढाँचों को ध्वस्त करते हेमन्त किसी भी साँचे को अपर्याप्त सिद्ध करते हैं। उनकी प्रत्येक कविता दूसरी से इसलिए अलग लगती है कि उनका कवि जोखिम उठाना जानता है और प्रयोग करने के लिए ही प्रयोग नहीं करता। हेमन्त आज के कवि हैं। उनकी ‘सिलबट्टा ’ सरीखी कविता का कैनवस क्लैसिक रचना की तरह सघन है। हिन्दी की उत्तर आधुनिक कविता की पहचान के प्रामाणिक चिन्ह भी उनकी कविताओं में नजर आते हैं। उन्होंने कई जगह अमूर्तन का रचनात्मक इस्तेमाल किया है, जिनमें शब्दार्थ को वैशिष्टय प्रदान करनेवाली अनेक आयामी अर्थगत-स्तर- सम्पन्न रचनाशीलता मिलती है।

आँख

देखने के लिए नज़र चाहिए
ठीक हो दूर और पास की तो कहना ही क्या

बाज़ार को दूर से देखने पर भी लगता है डर
मेरा घर तो बाज़ार के इतने पास है
कि उजड़ी हुई दुकान नज़र आता है

ठेठ पड़ोस का घर हो जाता है सुदूर का गृह
चीख़ता है कि उसकी कक्षा से दूर रहूँ
जब कि मेरे घर के हर कोने की है अपनी परिधि

कई बार ऐसा हुआ कि नहाने के लिए पानी लेने गया
और साबुन के भाव बिकते-बिकते बचा
यह तभी हुआ कि मैंने अपनी क़ीमत नहीं लगाय़ी
खुद को बिकने से बचाये रखना ऱोज का हादसा

दूर से दो विदेशी पैर आकर
उठाईगीरी पर उतर आते हैं अपनी नग्नता दिखाकर
उसने लड़ना मेरी मज़बूरी है या
उजागर होता है ओछापन

सोने के लिए दिनभर की नींद मुफ़्त में देनी पड़ती है मुझे
जागने के लिए सपने हैं, उनसे ही कहता हूँ
इतने हल्ले में आओगे तो कैसे सुन सकूँगा तुम्हें पहचानूँगा कैसे
वे जाने कैसे पहचान लेते हैं मुझे
किसी दिन कुचले हुए मिलेंगे मेरे सपने एक दुकान के नीचे
दूसरी पर उनका सौदा हो रहा होगा

कैसा विनिमय है चीज़ों का
गेहूँ कपास न हुआ सिन्थेटिक कपड़ा होकर बिकने लगा
बच्चे जिन बिस्कुटों के बदले राज़ी होते थे अपनी नींद तोड़ने के लिए
वे रूमाल हो गय़े
फिर भी पैण्ट इतनी ऊँची हो गयी कि भूख जितनी ढीठ
कमीज़ें इतनी महँगी कि उन्हें पहनने की ज़रूरत ही नहीं रही

आदमी भी वस्तु हो गया, देखा तो सोचा
देखने के लिए आँख चाहिए ऐसी जो पैसे के पार देख सके

मिट्टी की कविता

मिट्टी को पानी ही पत्थर बनाता है
पानी में भीगकर ही वह होता है कोमल
सम्भव है आग के भीतर बूँद की उपस्थिति
आकाश में पृथ्वी का जीवन

तितलियाँ कितने युगों से रंगों की काँपती हुई
चुप्पी को ढो रही हैं अपनी काया पर
फूल किसके प्रेम की यातना में सुगलते हैं
और जाने किसकी स्मृति में हो जाते हैं मिट्टी

जीवित रहने के लिए प्राण आत्मा के साथ चाहिए
निरा शरीर अन्न की गन्ध से रहित है
बचे रहने का अर्थ बीज बनने में नहीं है
तो कोई भी कवच नहीं है काम का

इस नाकाम दुनिया में बड़ा लाभ है
बेकार के धन्धों में
बाक़ी तो ऐसा व्यापार है कि
ख़ुद को ख़रीदकर
बचे रहें बिकने से
और ईश्वर का महत्त्व दैनिक भविष्यफल के अलावा
नहीं है कुछ भी

ऱोका गया भरसक प्रेम करने से
वक़्त काटने के लिए नहीं किया प्रेम
वह जीवन का नमक था पाने के लिए उसे
अपनी मिट्टी को फिर से गूँथकर देनी पड़ी शक्ल

बादलों में होती है बिजली
प्रेम के चमकते मुख पर कहीं गहरे धँसे होते हैं दुख
उनसे होकर हम पहुँचते हैं और नज़दीक एक-दूसरे के....
अन्त हमें तोड़कर फिर बनने की देता है चुनौती
हम हो जाते हैं मिट्टी

मिट्टी कभी नहीं मरती बढ़ जाती है थोड़ी-सी

जिसके पास सिर्फ़ अपनी जान है

जो झाड़ियों में छिपा था
वह भालू ही रहा होगा
इसलिए कि जो आलू खाते थे उसके किस्से से ही डर गये
जो आलू उगाते थे उन्होंने ही भालू को हड़काया

गर्म होने के लिए वे दूध पीने चले गये
जो मवेशी चराकर लौटे उनका तो पसीना ही
इतना तेजाब है कि बंजर जला दे

बसाने के नाम पर जो बस्तियाँ जलाते हैं
वे हिमालय को गलाकर
उसका पानी सात समन्दर पार भेजते हैं
और गंगा के किनारे शराब की बोतलों में बेचते हैं

बचाने के लिए जिनके पास सिर्फ़ अपनी जान है
वह क्यों इन्हें चुनता है
और अपने उगाये आलू की क़ीमत से डरकर
झाड़ियों में शरण लेता है

वह किस्सों से बाहर आकर उन्हें अन्दर क्यों नहीं करता
जो इनके घरों पर कब्ज़ा करने के बाद
खेतों में अन्तरिक्ष नरक बनाना चाहते हैं

ईश्वर का वेतन

ईश्वर को कितना वेतन मिलता होगा
और उतने में ऐसे कौन-से काम होंगे जिन्हें
ईश्वर नहीं चाहता होगा करना ?

ज़रूर होंगे ऐसे काम
क्योंकि ऐसे हैं कई कामी चरित्र हमारी सामाजिक
जान-पहचान में
जो अपने खल-कर्मों को ईश्वर के जिम्मे डालकर
भगवती जागरण में मोटा पैसा देते हैं

जिस मशीन पर वह पैसा छापते हैं
उसे सीधे-सीधे कहने पर ईश्वर को शर्म आएगी
हम मानते हैं कि ईश्वर को
अच्छा नहीं लगता उनका व्यापार
इसीलिए हमारी नज़र में ईश्वर के लिए
कुछ अच्छे विचार अभी बचे हैं
और हम उससे डरते नहीं हैं

हम काम करते हैं
न करें तो क्या मुम्बई भाग जाएँ
हमारे साथी शेयर बाज़ार जाते हैं
या घरों में करते हैं राजनीति
हम जाते हैं दफ़्तर घिसे जूतों में घिसटते
और सिर्फ़ ईश्व का नाम याद रखते हैं

क्या ईश्वर सीकरी में नौकर हो गया
उसके नाम से लोग सचिवालय में पहुँच गये हैं
ईश्वर भी वहीं है तो इतने ढेर पैसे को बचाता कैसे होगा ?

कुछ बच्चे और कई बच्चे

बिस्कुट जैसी होती है बच्चों की हँसी
और गुस्सा चाकलेट की तरह

उन्हें हम उनकी नहीं अपनी दुनिया में देखते हैं
और उनके बारे में फैसले करते हैं
कितना बड़ा अपराध है यह
सज़ा के नाम पर बच्चे हम से रूठ जाते हैं तो
हम माफ़ी नहीं माँगते वादे करते हैं
और अगले दिन पर टाल देते हैं अपनी हार

हमें पता है कि उनका गुस्सा घुल जाएगा थोड़ी देर में
तब तक उन्हें हँसता देखकर हम इत्मीनान से चाय पीएँगे
और बिल्कुल भूल जाएँगे कि
कई बच्चों के लिए रोटी पहेली की तरह है
और जीवित बच जाना आश्चर्य जैसा

सिर्फ़ शर्मिन्दा ही हुआ जा सकता है इस सच पर कि
सभी बच्चों की हँसी बिस्कुट जैसी नहीं होती
और गुस्सा चाकलेट की तरह....

दूसरे बच्चे

जब वे अपने बच्चे के लिए
खिलौने ख़रीद रहे होते हैं
उन्हें एक बच्चा
उम्मीद से देखता है
वह भी बच्चा है

वे फुरसत में
उस पर बहस करते हैं
कोई शब्द
उस बच्चे के ख़ाली पेट
और रीती आँखों को नहीं देखता

वे हँसते हैं
अपने बच्चे को हँसता देखकर
इतने जोर से कि
दुनिया के दूसरे बच्चे
अपनी भूखी नींद से उठकर
रोने लगते हैं

अपने बच्चे को वे
हँसने का सलीका सिखाते हैं कि
अगर वह हँसे उनकी तरह
तो उसे मिलेंगे
और भी अच्छे खिलौने

न जाने कहाँ से सुनकर
उनकी आवाज़
कुछ बच्चे अपनी फटी कमीज़ों के नीचे
छुपा लेते हैं रात की रोटी

खेलने की उम्र

कितने युगों बाद मिला
यह बक्सा
जिसमें सोये रहते थे
बचपन के खिलौने

दुनिया भर की बातें करते
दुनिया भर के खिलौने

वह अभी भी बड़ा है
मेरे हाथों के लिए
मेरे मन के लिए
वह एक तितली है
छटपटाती मेरी उँगलियों के बीच

जाने किन काले दिनों से गुज़रकर
वह मुझे देखने को ही
बैठ गया है मेरे सामने

वह मैला हो गया है
टूटने लगे हैं खिलौने
फीके हो चले हैं उनके रंग

मैं भाग नहीं रहा उनसे
मेरा डर यही है कि
उनसे खेलने की उम्र
मेरे जीवन के बक्से से निकलकर
खो गयी है कहीं
किसी दिन वह भी
मुझे मिल ही जाएगी
ठीक खिलौनों के इस बक्से की तरह.....

नाखून

ये मेरे साथ जन्म से हैं
अँधेरे में चमकते
उजाले में पीले पड़ते
ये न जाने कब बढ़ जाते हैं ?

पूरे शरीर में
तय है इनकी एक जगह
मैं इन्हें मोड़कर
कहीं भी ले जा सकता हूँ
कभी-कभी इन्हें टूटते
देखता हूँ नींद में
खुशी होती है कि बोझ
कम हो रहा है शरीर का

मेरी तरफ़ बढ़ते
ये कई बार मुझे डरा जाते हैं
मेरे एकाएक सहमने पर
हँसते हैं ठठाकर

मैं इन्हें दुश्मनों के नाम से
याद करता हूँ
हालाँकि ये उनकी तरह
अपने भीतर नहीं छुपे रहते

इतिहास से मिली नफ़रत
मेरी अपनी है
उसे झेलते-झेलते
मैं लड़ाकू हो चला हूँ

ये इतना नहीं सोच सकते
बस, हँसते हैं
ज़रा-सा दबाने पर
शायद इन्हें पता नहीं कि
इनका भी इतिहास है
इनकी भी नफ़रत है

फ़िलहाल

दिन मुझे बाँधकर चल रहे हैं
रात मेरी नींद छीनकर सपने में बीत रही है

घर से भागना एक खेल है
इस तमाशे में अपनी कनपटी पर
धमाका करता हूँ
तो ज़िन्दगी मज़ाक हो जाती है
नहीं तो इतना बोझ कि
हर मिनट मरना भी नाक़ाफ़ी

कहता हूँ कि ख़ुद से कि
अपने को मैं बहुत कम जानता हूँ
फिर क्यों इतना भय ?

साँस लेने के लिए मैंने मास्क चढ़ा रखा है
यह जो कमीज मैंने पहनी हुई है कवच है दरअसल
सुरक्षा के लिए अपने पते पर मैं धमकी भरे
गुमनाम पत्र भेजता हूँ
छाती पर साइनाइड और कमर में बारूद भरकर
भीड़-भरे तहखाने में सुरंग की तरह बिछा रहता हूँ

रोज़ मेरे लिए प्रयोग होते हैं
रोज़ नयी बीमारियाँ घेर लेती हैं मुझे
रोज़ मैं बड़ा होता हूँ
रोज़ मैं कम होता हुआ बीत रहा हूँ

इतने पर भी मैं
अपने पक्ष में खड़ा होने की सोचता हूँ
कि अनन्तकाल के लिए
भंग हो जाती हैं संसद

नशे में आदमी

ख़ूब पीने के बाद
वह ख़ुद पर दया करता है
तब उसके देवता
उसे अकेला छोड़ देते हैं

लड़खड़ाता वह देखता है
अपना बीत चुका कल
जहाँ भी होता है वह
उसके साथ होते हैं उसके
अनेक अन्त

धुएँ में डूबने से पहले
वह डूब रहता है धुँधलके में
वहाँ होती है एक तीखी गन्ध
उसका दिमाग सुन्न करती
छा जाती है उस पर

उसके हाथ पर
उसके पैर
वह ख़ुद अपना साथ नहीं देता
रात तब चमकती है
उसकी बगल में

रोशनदान पर बसी
चिड़ियों की खुल जाती है नींद
वे तय नहीं कर पातीं कि भागें
या साथ दें उसके कोहराम में

सन्नाटा बढ़ता रहता है
उसके गिलास में
ज़रा-सी जो बची रहती है
वह चाहता है
बची रहे हमेशा के लिए
जब कि उसे पता नहीं चलता
कल कितना दूर है कल से

वह निढाल होने को होता है
और एक स्मृति
ढुलक आती है पसीने की तरह
उसके कपाल पर

वह काटकर फेंक देना चाहता है
अपनी उँगलियाँ
नसों से बहता ख़ून
अच्छा लगता है उसे
ऐसा करके वह
केवल जतलाना चाहता है
अपना डर
जिसे बाँटनेवाला कोई नहीं होता

शीशों को तोड़ता
वह फाड़ देता है कपड़े
कुछ आदिम शब्द गूँजते हैं
उसके कण्ठ में
खो जाते हैं कुछ अन्तरिक्ष में

वह रोने लगता है
ज़ोर से
कोई उस पर रोए या
हँसकर टाल दे
कठिन होता है फैसला करना

याद करने के लिए
उसके पास अगली सुबह
कुछ नहीं होता
सिवा इसके कि वह
भूलना चाहता था रात को कुछ
जो न जाने कहाँ गुम गया
उसकी नींद में


अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book