नारद भक्तिसूत्र एवं भक्तिविवेचन - स्वामी विवेकानन्द Narad Bhaktisootra Evam Bhaktivivechan - Hindi book by - Swami Vivekanand
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नारद भक्तिसूत्र एवं भक्तिविवेचन

स्वामी विवेकानन्द

प्रकाशक : रामकृष्ण मठ प्रकाशित वर्ष : 2000
पृष्ठ :68
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5965
आईएसबीएन :00000

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प्रस्तुत है पुस्तक नारद भक्तिसूत्र एवं भक्तिविवेचन...

Narad Bhaktisootra Evam Bhakti Vivechan

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

दो शब्द

स्वामी विवेकानन्दकृत ‘नारदभक्तिसूत्र एवं भक्तिविवेचन’ का यह सप्तम संस्करण प्रकाशित हो रहा है। इस पुस्तक में स्वामीजी के व्याख्यान, कुछ प्रवचनों का सारांश तथा लेख संगृहीत किये गये है।

भक्तिशास्त्रसंबंधी ग्रंथों में ‘नारद-भक्ति-सूत्र’ का स्थान विशेष महत्त्वपूर्ण है। स्वामी विवेकानन्द द्वारा किया हुआ नारद-भक्ति-सूत्रों का मुक्त अनुवाद भक्तिमार्ग के पथिकों के लिए अत्यन्त लाभप्रद सिद्ध होगा। स्वामी विवेकानन्द के भक्तिसंबंधी प्रवचन तथा व्याख्यान हमें भक्तियोग की स्पष्ट व्याख्या प्रदान करते हैं; साथ ही उनके द्वारा भक्ति की महिमा भी प्रकट होती है। भक्तिसाधना सफल होने के लिए किन विशिष्ट गुणों की आवश्यकता है, यह विषय भी बड़े हृदयग्राही ढंग से स्वामीजी ने इस पुस्तक में स्पष्ट कर दिया है। स्वामीजी द्वारा कथित एवं लिखित बिल्वमंगल और बालक गोपाल की कथाएँ भी इस पुस्तक में सम्मिलित हैं। इन व्याख्यानों से यह स्पष्टरूपेण जाना जा सकेगा। कि ये गुण भक्त के जीवन में किस तरह प्रकट होते हैं। प्रस्तुत पुस्तक साधकों को नवीन उत्साह तथा प्रेरणा प्रदान कर भगवद्दर्शन के लक्ष्य की ओर कराने में सहायक सिद्ध होगी।

इस पुस्तक में संगृहीत सभी प्रवचन, लेख आदि अद्वैत आश्रम मायावती द्वारा प्रकाशित ‘विवेकानन्द साहित्य’ से संकलित किये गये हैं।

प्रकाशक

नारद-भक्ति-सूत्र एवं भक्तिविवेचन

नारद-भक्ति-सूत्र

(अमेरिका में स्वामीजी द्वारा लिखाया हुआ मुक्त अनुवाद)

अध्याय 1*


1.    भक्ति ईश्वर के प्रति तीव्र अनुराग है।
2.    यह प्रेम का अमृत है;

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*अथातो भक्ति व्याख्यास्याम:। सा त्वस्मिन् पर (म) प्रेमरूपा।
अमृतस्वरूपा च। यल्लब्ध्वा पुमान् सिद्धो भवति, अमृतो भवति, तृप्तो भवति। यत्सप्राप्य न किंचिद् वांछति, न शोचति, न द्वेष्टि, न रमते, नोत्साही भवति। यत् ज्ञात्वा मत्तो भवति, स्तब्धो भवति, आत्मारामो भवति। सा न कामयमाना, निरोधरूपत्वात्। निरोधस्तु लोकवेदव्यापारन्यास:। तस्मिन्ननन्यता तद्विरोधिषूदासीनता च। अन्याश्रयाणां त्यागोऽनन्यता। लोकवेदेषु तदनुकूलाचरणं तद्विरोधिषूदासीनता। भवतु निश्चयदाढ़र्यादूर्ध्य शास्त्ररक्षणम्। अन्यथा पातित्य (।) शंकया। लोकोऽपि। तावदेव; भोजनादिव्यापारस्त्वाशरीरधारणावधि। तल्लक्षणानि वाच्यन्ते नानामत-भेदात् पूजादिष्वनुराग इति पाराशर्य:। कथादिष्विति गर्ग:। आत्मरत्यविरोधेनेति शाण्डिल्यः। नारदस्तु तदर्पिताथिलाचारता तद्विस्मरणे परमव्याकुलतेति  (च)। अस्त्येवमेवम्। यथा व्रजगोपिकानाम्। तत्रापि न माहात्म्यज्ञानविस्मृत्यपवादः। तद्विहीनं जाराणामिव। नास्त्येव तस्मिन् तत्सुखसुखित्वम्।

3.    इसे पाकर मनुष्य पूर्ण, अमर, और सदा के लिए सन्तुष्ट हो जाता है;
4.    इसे पाकर मनुष्य में इच्छाएँ नहीं रह जातीं, वह किसी से ईर्ष्या नहीं करता, उसे दिखावे में आनन्द नहीं आता।
5.    इसे जानकर मनुष्य आध्यात्मिकता से भर जाता है, शान्त हो जाता है और केवल ईश्वर में आनन्द पाता है।
6.    इसका किसी की इच्छा की पूर्ति के लिए उपयोग नहीं किया जा सकता, स्वयं सब इच्छाओं का निरोध करती है।
7.    संन्यास उपासना के लौकिक और शास्त्रीय रूपों का परित्याग है।
8.    भक्त-संन्यासी वह है, जिसकी सम्पूर्ण आत्मा ईश्वर को अर्पित हो जाती है, और जो ईश्वर-प्रेम में बाधक होता है, उसे वह त्याग देता है।
9.    सब अन्य शरणों को छोड़कर, वह ईश्वर में शरण लेता है।
10.    शास्त्रों का अनुसरण उसी समय तक विहित है, जब तक जीवन में दृढ़ता न आयी हो।
11.    नहीं तो मुक्ति के नाम पर अशुभ किये जाने की आंशका रहती है।
12.    जब प्रेम दृढ़ हो जाता है, तो जीवन धारण करने के लिए आवश्यक सामाजिक व्यवस्था बन्धनों के अतिरिक्त, शेष सब सामाजिक रूप भी त्याग दिये जाते हैं।
13.    प्रेम की बहुत-सी परिभाषाएँ दी गयी हैं, पर नारद जिन्हें प्रेम का चिह्न बताते हैं, वे हैं: जब मन, वचन और कर्म सब ईश्वरार्पित कर दिये जाते हैं और जब तनिक देर के लिए ईश्वर का बिसरना भी मनुष्य को अत्यन्त दु:खी कर देता है, तो प्रेम आरम्भ हो गया है।
14.    जैसा कि गोपियों को हुआ था-
15.    इसलिए कि यद्यपि वे ईश्वर को अपने प्रेमी की भाँति पूजती थीं, वे कभी उसके ईश्वर-रूप को नहीं भूलीं।
16.    ऐसा करतीं, तो वे व्यभिचार की दोषी होतीं।
17.    यह प्रेम का उच्चतम रूप है, क्योंकि इसमें प्रतिदिन प्राप्ति की इच्छा नहीं होती, जो समस्त मानवीय प्रेम में पायी जाती है।


अध्याय 2*


1.    भक्ति कर्म से ऊँची है, ज्ञान से ऊँची है, योग (राजयोग) से ऊँची है, क्योंकि भक्ति स्वयं अपना फल है, भक्ति साधन और साध्य (फल), दोनों है।
2.    जिस प्रकार मनुष्य अपनी भूख केवल भोजन के ज्ञान अथवा दर्शन मात्र से नहीं बुझा सकता, उसी प्रकार जब तक प्रेम नहीं होता, मनुष्य ईश्वर के ज्ञान से अथवा उसकी अनुभूति से भी, सन्तुष्ट नहीं हो सकता, इसलिए प्रेम सर्वोपरि है।
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3.    *सा तु कर्मज्ञानयोगेभ्योऽप्यधिकतरा। फलस्वरूपत्वात्। ईश्वरस्या-प्यभिमान- (नि) द्वेषित्वात् दैन्यप्रियत्वात् च। तस्या ज्ञानमेव साधन-मित्येके। अन्योन्याश्रयत्वमित्यन्ये। स्वयं फलरूपतेति ब्रह्मकुमार (।):। राजगृहभोजनादिषु तथैव दृष्टत्वात्। न तेन राजा परितष: क्षु (धाशा)-च्छान्तिर्वा। तस्मात् सैव ग्राह्या मुमुक्षुभि:।

अध्याय 3*


1.    आचार्यों ने, फिर भी, भक्ति के विषय में ये बातें कही हैं।
2.    जो इस भक्ति को चाहता है, उसे इन्द्रिय-भोग और लोगों का संसर्ग भी त्याग देना चाहिए।
3.    दिन-रात उसे भक्ति के विषय में सोचना चाहिए, अन्य किसी विषय में नहीं।
4.    जहाँ लोग ईश्वर का कीर्तन करते या उसकी चर्चा करते हैं, उसे वहाँ (जानना चाहिए।)
5.    भक्ति का मुख्य कारण किसी महान (अथवा मुक्त) आत्मा की कृपा होती है।
6.    महात्मा की संगति पाना कठिन है, और उससे सदा आत्मा का उद्धार होता है।

*तस्या: साधनानि गायन्त्याचार्या:। तत्तु विषयत्यागात् संगत्यागात् च। अव्यावृत्त (त) भजनात्। लोकेऽपि भगवद्गुणश्रवणकीर्तनात्। मुख्यतस्तु महत्कृपयैव भगवत्कृपालेशाद् वा। महत्संगस्तु दुर्लभोऽगम्योऽमोघश्च। लभ्यतेऽपि तत्कृपयैव। तस्मिस्तज्जने भेदाभावात्। तदेव साध्यतां तदेव साध्यताम्। दुस्संग सर्वथैव त्याज्य:। कामक्रोधमोहस्मृतिभ्रंश-बुद्धिनाश (सर्वनाश) कारणत्वात्। तरंगायिता अपीमे संगात् समुद्रायन्ते (न्ति)। कस्तरति कस्तरति मायाम् ? य: संगं (गान्) त्यजति, यो महानुभावं सेवते, निर्ममों भवति। यो विविक्तस्थानं सेवते, यो लोकबन्ध-मुन्मूलयति, (यो) निस्त्रैगुण्यो भवति, (यो) योगक्षेमं त्यजति। य: कर्मफलं त्यजति, कर्माणि संन्यस्यति, ततो निर्द्वन्द्वो भवति। (यो) वेदानपि सन्यस्यति; केवलमविच्छिन्नानुरागं लभते। स तरति स तरति, स लोकांस्तारयति।



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