ढेंकी - सुशील भोले Dhenki - Hindi book by - Shushil Bhole
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ढेंकी

सुशील भोले

प्रकाशक : वैभव प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2008
पृष्ठ :64
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5964
आईएसबीएन :81-89244-36-1

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प्रस्तुत हैं छत्तीसगढ़ी कहानियाँ....

Dhenki

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

भूमिका

सुशील भोले की कहिनी मन छत्तीसगढ़ी के प्रतिनिधि कहिनी माने जा सकत हें। एक कहिनी मन म छत्तीसगढ़ अउ छत्तीसगढ़ी अस्मिता के परान समाये हें। छत्तीसगढ़ी म कतका अर्थ—संप्रेषणीयता हो सकत हे कहिनी मन एखर उदाहरण हें।

धार-धार लेखिनी के आज हमर छत्तीसगढ़ ले बर जरूरत हे। चारों कोती सोसक मन लहलहावत हें अऊ जम्मो भुंइया ल परदेसिया मन बिसावंत हें। छत्तीगसढ़ एक उपनिवेश बनत जात हे। ईस्ट इंडिया कंपनी कस कतको कंपनी गांव-गांव आवत हें। हमर भुइंया, खेत, नदिया अउ, कोयला-माटी ल कब्जावत हें। का जान को छत्तीसगढ़ ल सी.जी कहे गे हे। मय तव कहिथौं के सी.जी हा हिन्दी के चारा गाह के संक्षेपीकरण ए। तभे तव चारों कोती ल जानवर कस मनखे आवत हें, चरत हें, जावत हें।

छत्तीसगढ़ ल चारागाह बने ल बचाय बर ए कहिनी मन आगी-पानी के काम कर सकत हें। कहिनी मन म पीरा के संग-संगे सुते मनखे ल जगाय के ताकत हे। यही ताकर ल जाने के जरूरत हे अउ ढेंकी के सहारा म हमन ये ताकत ल पहिचानबो अइसे मय बिसवास करत हवं।

सुशील भोले के कहिनी के शिल्प जोरदार, तव ओखर ले जोरदार ओखर भाखा हे। ढेंकी के जम्मो कहिनी हिन्दी म अनुवाद करके परोसे के लाइक हे।। ए कहिनी मन के आत्मा म जेन घुसर पाही तेन बड़ छटपटाही। अपन माटी, अपन महतारी के सेती। आओ ढेंकी के ढांक ल सुनव अउ देखव छत्तीसगढ़ के आज ल दरपन म।

डॉ. सुधीर शर्मा

ढेंकी


अगास के छाती में मुंदरहा के सुकुवा टंगा गे राहय। सुकुवा के दिखते सुकुवारो के पांव खटिया छोड़ माटी संग मितानी बद लय। तहां ले सबले पहिली वोकर बुता होवय अपन पहाटिया ल जगाना, तेमा वो बेरा राहत बरदी लेके दइहान जा सकय। फेरु पाछु वो लिपना-बहारना, मांजना-धोना करय। आजो अपन पहाटिया ल जगाये के पाछू तिरिया धरम के बुता म भीड़गे।

सुकरो रतिहा के जूठा बर्तन मनला रखियावत रहाय, ततके बेर पहाटिया हम मुंह-कान धोके कोला-बारी तनी ले आईस अउ पंछा म मुंह पोछत कहिस—‘‘पहाटनीन थोरिक चाय बना न, आज बुजा ह थोरिक जाड़ असन लागत हे।’’
‘ले राहन दे तुंहर चोचला ल, रोजेच तो आय कुछु न कुछु के ओढ़र करके चाहे पीयई। ये रोज के ताते-तात म तुहंर पेट नई अगियावत तेमा ?’’ सुकवारो बर्तन धोवत कहसि।

सुकवारो के गोठ म पहाटिया थोक मुसकाइस, तहां ले बेलौली करे अस कहसि-‘‘अओ नेवरनीन..जबले आए हस भइगे हुदरे असन गोठियाथस..कभू तो...
पहाटिया के बात पूरा न होए पाइस, अऊ पहाटनीन बीचे म बोल परि—‘‘नहीं त...तुहंर संग लेवना लगाय सहीं गोठियावौं।’’
—‘‘त का हो जाही...पहाटिया के जात...दूध-दही, लेवना सहीं गोठिया लेबे त।’’

—‘‘ले राहन दे...ये सब काम ल कोन लगवार आय तेन कर दिही..? तुहंर का हे, सूत के उठेव तहां ले चाहे पीयई...तहां ले माखुर झर्रावत बरदी कोती रेंग देथौ। ये लोगन के बुता ल कभू देखे हौ ? कतका मरथन-खपथन तेला हमीं जनाथन, फेर तिरिया के काम, नाम के न जस के।’’ काहत सुकवारो बर्तन धोना ल छोड़ के चाय बनाय बल चल दिस।

पाछू पहाटिया ल बिदा करके फेर बर्तन-भांड़ा म भीड़गे। घर के जम्मो बुता जब झरगे, तब काठा भर धान लेके वोला ढेंकी म कुटे लागसि। ढेंकी के पूछी ल पांव म चपके के बाद वोकर मुंह के उठई अउ फेर बाहना म गिरई के साथ जेन सुघ्घर सुर अउ ताल निकलय तेकर संग सुकवारो गुनगुनाय लागिस


रोपा लगाये कस हमूं लग जाथन
मइके ले खना के ससुरार म बोवाथन
फर-फूल धरथे फेर हमरो परान
कइसे तिरिया जनम तैं दिए भगवान


-सुकवारो...ये सुकवारो...अई भैरी होगे हस का ? बाहिर ले मनभरहा भाखा सुनाइस। लागिस के वोला कोनों हुंत करावत हे। सुकवारो ढेंकी कूटे ल छोड़ के बेंस हेरे बर चल दिस, फरिका ल तिरियाइस त आगू म भागा ल खड़े पाइस।

‘‘आ भागा आ...भीतर आ’’ कहात पाछू लहुटगे।
भागा भीतर आवत कथे-भारी बिधुन होके ढेंकी कूटथस दई तहूं ह। तोर फरिका के संकरी ल हला-लहा के मोर हाथ घलो पिरागे..फेर कोन जनी....कान म काय जिनिस के ठेठा बोजे रहिथस ते ?

भागा डहार देख के सुकवारो मुसका दिस, फेर कहसि कुछु नहीं। अंगना नहाक के दूनों फेर ढेंकी कुरिया म आगें अउ आते सुकवारो भागा ल बइठे बर कहिके फेर ढेंकी कूटे बर भीड़गे।

बाहना तीर धान खोए बर बइठत भागा फेर कथेतोला ये रोज-रोज के भुकरुस-भुकरुस ढेंकी कुटई ह बने लागथे वो सुकवारो ? हम तो दई एकर भाखा ल सुनथन ततके म हाथ-पांव म फोरा परगे तइसे कस जनाए लागथे।
-एमा बने अउ गिनहा के का बात हे भागा ?
-तभो ले दई....गांव म धनकुट्टी आगे है तभो ले हंकरस-हंकरस करत रहिथस ?
-काय करबो बहिनी...हमर पहाटिया ल धनकुट्टी म कूटे चांउर के भात ह नई मिठावय त !
-अई भारी रंगरेला हे दई तोरो पहाटिया ह। हमर पहाटिया के आगू म जइसन परोस दे, तइसन खा लेथे। भागा अपन पहाटिया के सिधई ल बताइस।

सुकवारो अउ भागा के जोड़ी एके पहाट म लगे राहयं, तेकर सेती भागा अउ सुकवारो अपन मालिक मन घर संगे म पानी भरयं, तेही पाय के भागा रोज बिहन्चे सुकवारो घर आवय, तहां ले दूनो कुआं कोती चले जायं।

—‘‘छत वाले मन आज काय जिनिस पाले हें ओ तेमा भारी खुलखुलावत हैं ?’’
पहाटिया भात खात सुकवारो मेर पूछिस, त सुकवारो कहसि—‘‘वोकर बेटी-दमांद मन सहरक ले आए हे न तेकर सेती थोरक भाखा सुनावत हे।
-हूं कब आइन हें ?
-आजे संझा तो आइन हें। लेवौ न तुमन जल्दी-जल्दी खावौ...नींद लागत हे, हमूं बोर-सकेल से सूतबोन..वोती मुंदरहा ले उठे बर लागथे, अउ एती रात ल अधिया देथौ, बने गतर के नींद घलो नइ परय। सुकवारो जम्हावत-जम्हावत कहिस।

-‘‘खात तो हौं।’’ कहिके पटाहिया जल्दी-जल्दी खाए लागसि। रात जादा गहराय नइ रिहिसे, फेर गांव म कोलिहा नरियावत सांय-सांय करे बर धर लेथे। छत वाले घर ले अभो हांसे-बकबकाए के भाखा कान म सुनावत रहाय। सुकरो ये सबले अनचेत खटिया म पांव पसार डरे राहय। बपरील बिहाने उठके जम्मो बुता कर बर जेन लागथे। पहाटिया घलो चोंगी चुहकत खटिया म धंस गे। चोंगी ल आखिरी चुक्का तिरिस तहां ले भुइंया म रगड़ के बुता दिस, फेर कथरी ओढ़ के सुकवारो के सपना म समागे।


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