देववाणी - स्वामी विवेकानन्द Devawani - Hindi book by - Swami Vivekanand
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देववाणी

स्वामी विवेकानन्द

प्रकाशक : रामकृष्ण मठ प्रकाशित वर्ष : 2002
पृष्ठ :219
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5902
आईएसबीएन :00000

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प्रस्तुत है पुस्तक देववाणी.....

Devavani

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

वक्तव्य

प्रस्तुत पुस्तक का यह एकादश संस्करण प्रकाशित करते हुए हमें हर्ष होता है। अमेरिका में अनेक व्याख्यान देने के पश्चात सन् 1895 में स्वामी विवेकान्नद ‘सहस्रदीपोद्यान’ नामक शान्त और एकान्त में चले गये थे। यह स्थान न्यूयार्क के सन्निककट है। उनके कुछ शिष्य इस शान्त वातावरण में स्वामीजी के सान्निध्य का लाभ उठाने की दृष्टि से उनके साथ रहे। वहाँ स्वामीजी ने कुछ सप्ताह निवास किया था। इसी समय वे अपने शिष्यों को प्रतिदिन आध्यात्मिक विष्यों पर उपदेश दिया करते थे, जो उनकी एक शिष्या कुमारी एस. ई. वाल्डो, न्यूयॉर्क, ने लिख लिये थे। बाद में वे (‘Inspired Talks’) नामक पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुए। प्रस्तुत पुस्तक उसी का हिन्दी रुपान्तर है। इन उपदेशों में स्वामीजी का दृष्टा एवं आदर्श गुरु-रूप उद्घाटित होता है। हृदय से उद्भूत होने के कारण इसमें स्वामीजी की दिव्य प्रज्ञा अनुभूति की गहनता भी प्रतीत होती है।
हमें विश्वास है, ज्ञान एवं शान्ति के पिपासुओं को इस पुस्तक से निश्चय ही तुष्टि होगी।

प्रकाशक

प्राक्कथन

1. अमेरिका में स्वामीजी

1893 ईसवी के ग्रीष्मकाल में एक तरुण हिन्दी संन्यासी ने वैन्कुवर शहर में पदार्पण किया। उन्होंने शिकागो की धर्ममहासभा में सम्मिलित होने के लिए यात्रा की थी, किन्तु वे किसी सर्वजनपरिचित धर्मसंघ द्वारा नियुक्त प्रतिनिधि के रूप में नहीं गये थे। कोई भी उन्हें पहचानता नहीं था, एवं उनका सांसारिक ज्ञान भी अधिक नहीं था; फिर भी मद्रास के अनेक उत्साही युवकों ने उन्हें ही इस महान् कार्य के लिए चुना था, क्योंकि उनका दृढ़ विश्वास था कि दूसरे किसी व्यक्ति की अपेक्षा वे ही भारत के प्राचीन धर्म के योग्यतर प्रतिनिधि हो सकते हैं। और इसी विश्वास के कारण उन लोगों ने द्वार द्वार पर भिक्षा माँगकर उनकी यात्रा के लिए धन संगृहीत किया था। दो एक देसी नरेशों ने भी इस कार्य के लिए कुछ दान किया था। केवल इसी धन के सहारे तरुण संन्यासी—उस समय के अपरिचिति स्वामी विवेकनन्द—इस लम्बी यात्रा को करने में प्रवृत्त हुए।

इस प्रकार का महान् उद्देश्य लेकर यात्रा पूरी करने में उन्हें अत्यधिक साहस का अवलम्बन करा पड़ा था। भारत की पुण्यभूमि छोड़कर विदेश–यात्रा करना हिन्दुओं के लिए कितना गुरुत्तर कार्य है, इस बात की हम पाश्चात्यवासी कल्पना नहीं कर सकते। संन्यासियों के सम्बन्ध में व्यवाहारिक जड़ प्रधान अंश के साथ उनकी समस्त शिक्षा-दीक्षा का कोई भी सम्बन्ध नहीं है। रुपया-पैसा लेकर पर्यटन करने में अथवा अपने पैरों के अतिरिक्त किसी अन्य साधन के द्वारा भ्रमण करने में अभ्यस्त न होने के कारण स्वामीजी इस लम्बे मार्ग के प्रथम स्थान में ठगे गये, एवं लोगों ने उनके रुपयों-पैसों को खूब लूटा। जब वे शिकागो पहुँचे, तब प्रायः उनके पास एक कौड़ी भी नहीं बची थी। वे साथ परिचयपत्र भी नहीं लाये थे, और इस महानगरी में वे किसी को पहचानते भी नहीं थे।* इस तरह अपना देश छोड़कर हजारों कोस दूर अपरिचित स्थान में अपरिचित लोगों के साथ रहना एक दृढ़ हृदय वाले मनुष्य के भीतर भय का संचार किये बिना नहीं रहता; किन्तु स्वामीजी सब कुछ भगवान् के हाथ में समर्पित कर चुके थे; उनका विश्वास था कि भगवान् की कृपा उनकी सर्वदा रक्षा करती रहेगी।
वे जिस होटल में ठहरे थे उस होटल के मालिक की तथा अन्य लोगों की अत्यधिक माँग की पूर्ति वे लगभग एक पक्ष तक कर सके। उनके पास जो कुछ धन था, वह इस समय इतना कम हो गया था कि उन्होंने अच्छी तरह जान लिया था कि यदि वे रास्ते में भूख से प्राणत्याग न करना चाहते हों तो उन्हें तत्क्षण एक
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* बाद में एक मद्रासी ब्राह्मण ने शिकागो-निवासी एक सद्गृहस्थ को स्वामीजी के विषय में लिखा था उन्होंने इस हिन्दू युवक को अपने परिवार में स्थान दिया था। इस तरह जिस बन्धुत्व का सूत्रपात हुआ वह स्वामीजी जब तक जीवित रहे तब तक अक्षुण्ण रहा। परिवार के सभी लोग स्वामीजी को खूब चाहते थे। उनके अपूर्व सद्गुणों के कारण वे लोग उनकी ओर आकृष्ट हुए थे, एवं उनके चरित्र की पवित्रता तथा सरलता का आदर करते थे। इन सभी बातों का वे सर्वदा प्रीति तथा हृदय से उल्लेख करते थे।

ऐसा स्थान खोज लेना होगा, जहाँ पर रहने का खर्च अपेक्षाकृत कम हो। जिस महत्कार्य के भार को उन्होंने इस प्रकार साहस के साथ ग्रहण किया था, उसे छोड़कर जाना उनके लिए अत्यन्त कष्टकर था। क्षण भर के लिए नैराश्य और सन्देह की बाढ़ उनके ऊपर से बह गयी और वे सोचकर विस्मित होने लगे कि उन्होंने गरम दिमागवाले उन मद्रासी स्कूली लड़कों की बातें एक निर्बोध व्यक्ति के समान कैसे मान लीं ? किन्तु कोई दूसरा उपाय न देखकर वे अत्यन्त दुःखित चित्त से रुपयों के लिए तार करने एवं प्रयोजन पड़ने पर भारत लौट जाने का संकल्प करके बोस्टन की ओर रवाना हुए।
किन्तु जिनके ऊपर वे दृढ़ विश्वास रखते थे, उन ईश्वर की इच्छा कुछ दूसरी ही थी। रेलगाड़ी में एक प्रौढ़ महिला के साथ उनका परिचय हुआ, और स्वामीजी के सम्भाषण से वे इतनी प्रभावित हुईं कि उन्होंने अपने घर में आतिथ्य ग्रहण करने के लिए आमन्त्रित किया। यहाँ हार्वर्ड विश्वविद्यालय के एक प्राध्यापक के साथ उनकी मित्रता हुई। उन्होंने एक दिन एकान्त में स्वामीजी के साथ चार घण्टे तक वार्तालाप किया। उनका असाधारण क्षमता देखकर वे इतने मुग्ध हुए कि वे स्वयं उनसे कहने लगे—‘‘आप शिकागो धर्ममहासभा में हिन्दू धर्म के प्रति निधि के रूप में क्यों नहीं जा रहे हैं ?’’

स्वामीजी ने अपनी सभी असुविधाएँ उन्हें समझा दीं। उन्होंने कहा—‘‘मेरे पास धन भी नहीं है और उक्त महासभा से सम्बन्ध रखने वाले किसी व्यक्ति विशेष के नाम मेरे पास परिचयपत्र भी नहीं है।’’ प्राध्यापक ने उत्तर दिया—‘‘श्री बानि मेरे मित्र हैं, मैं आपको उनके नाम एक पत्र दूँगा।’’ यह कहकर उन्होंने उसी क्षण एक पत्र लिख दिया। उस पत्र में उन्होंने यह भी लिखा, ‘‘मैंने यह देखा है कि हमारे पण्डितों का जितना पाण्डित्य है, उससे कहीं अधिक पाण्डित्य इस अज्ञात हिन्दू का है।’’ इस पत्र को तथा उन प्राध्यापक द्वारा दिये हुए एक टिकट को लेकर स्वामीजी शिकागो की ओर लौटे और बिना किसी कठिनाई के वे प्रतिनिधि के रूप में परिगृहीत हो गये।

अन्त में एक महासभा के प्रारम्भ का दिन आया, और स्वामी विवेकानन्द ने प्राच्य प्रतिनिधियों की क्षेणी में स्थान ग्रहण कर प्रथम दिन के अधिवेशन में सभामंच पर पदार्पण किया। उनका उद्देश्य सफल हुआ, किन्तु उस विराट् श्रोतृमण्डली की ओर दृष्टिपात करते ही एक आकस्मिक उद्वेग से वे अभिभूत हो गये। अन्य सभी लोग अपने -अपने भाषण तैयार करके लाये थे; परन्तु स्वामीजी के पास कुछ भी नहीं था। प्रश्न था कि उन छः सात हजार नर-नारियों के विशाल समुदाय के सम्मुख वे क्या बोलेंगे ! प्रातः काल की बैठक में अपनी बारी आने पर भी वे प्रत्येक बार सभापति महोदय के कान में कह देते थे, ‘‘और किसी को पहले बोलने दीजिये।’’ अपराह्ण में भी इसी प्रकार हुआ।

अन्त में लगभग पाँच बजे डाक्टर बैरोज महोदय ने खड़े होकर घोषणा की कि अब स्वामी विवेकानन्दजी का भाषण होगा। यह घोषणा सुनते ही स्वामी विवेकानन्द स्थिर और शान्त होकर उसी क्षण साहस के साथ भाषण देने के लिए खड़े हुए। वक्तृता देने के लिए खड़े होने का और विशेषतः बहुसंख्यक श्रोताओं के सम्मुख, उनके जीवन में यह प्रथम अवसर था, किन्तु इस वक्तृता का फल विद्युतशक्ति के समान हुआ। उन उत्सुक सहस्र नर-नारियों की ओर देखकर उनकी शक्ति और वाग्मिता पूर्ण भाव से जागृत हो उठी और उन्होंने अपने मधुनिःस्यन्दी कण्ठ से श्रोतृवर्ग को ‘‘अमेरिकानिवासी भगिनी तथा भ्रातृगण’’ शब्द से सम्बोधित किया।



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