स्वामी विवेकानन्दजी से वार्तालाप - स्वामी ब्रह्मस्थानन्द Swami vivekanandji Se Vartalap - Hindi book by - Swami Brahmsthanand
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स्वामी विवेकानन्दजी से वार्तालाप

स्वामी ब्रह्मस्थानन्द

प्रकाशक : रामकृष्ण मठ प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :113
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5896
आईएसबीएन :00000

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प्रस्तुत है पुस्तक स्वामी विवेकानन्दजी से वार्तालाप...

Swami vivekanand Ji Se Vartalap

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

वक्तव्य

(प्रथम संस्करण)

स्वामी विवेकानन्दजी ने अपने शिष्यों के साथ समय-समय पर अनेक महत्त्वपूर्ण विषयों पर जो वार्तालाप हुए थे, वे इस पुस्तक में लिपिबद्ध हैं। ये वार्तालाप धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक तथा शिक्षासंबंधी अनेक विषयों पर हैं। इनमें स्वामी जी ने यह दर्शाया है कि वास्तव में भारतीय संस्कृति का क्या अर्थ है, साथ ही उन्होंने वे मार्ग तथा साधन ही दर्शाये हैं, जिनसे हमारी इस संस्कृति का पुनरुत्थान हो सकता है। उनकी ओजपूर्ण तथा प्रोत्साहनयुक्त वाणी में सचमुच वह संजीवनी है, जिससे हमारा समस्त जीवन ही सम्पूर्ण रूप से परिवर्तित होकर हम एक महान उच्च आदर्श को पहुँच सकते हैं।
मूल पुस्तक का अनुवाद स्वामी ब्रह्मस्वरूपानन्दजी, उत्तरकाशी ने किया है। उनके इस बहुमूल्य कार्य के लिए हम उनके परम कृतज्ञ हैं।
डॉ. पं. विद्याभास्करजी शुक्ल, एम.एस-सी., पी-एच.डी., प्रोफेसर, कॉलेज ऑफ साइन्स, नागपुर को भी हम हार्दिक धन्यवाद देते हैं जिन्होंने इस पुस्तक के प्रूफ-संशोधन के कार्य में हमें बड़ी सहायता दी है।

हमें विश्वास है, इस पुस्तक से हिन्दी-जनता का हित होगा।

प्रकाशक

स्वामी विवेकानन्दजी से वार्तालाप

चमत्कार

(‘मेम्फिस कमर्शियल’, 15 जनवरी 1894)

संवाददाता के द्वारा यह पूछे जाने पर कि उनके ऊपर अमेरिका का कैसा प्रभाव पड़ा, उन्होंने कहा।
‘‘इस देश के संबंध में मेरे मन में अच्छा भाव उत्पन्न हुआ है, विशेषत: अमेरिका की स्त्रियों के संबंध में। मैंने अमेरिका में गरीबी के अभाव पर विशेष रूप से ध्यान दिया है।’’
इसके बाद बातें धर्म के विषय पर केन्द्रित हुईं। स्वामी विवेकानन्द ने यह मत प्रकट किया कि विश्व धर्म-महासभा इस अर्थ में उपयोगी सिद्ध हुई कि उसने लोगों के धर्मविषयक विचारों को प्रशस्त करने में बड़ा काम किया है।
संवाददाता ने प्रश्न किया, ‘‘ईसाई धर्मावलम्बियों की मृत्यु के बाद की दशा के बारे में आपके धर्मवालों की क्या धारणा है ?’’

‘‘हमारा विश्वास है कि यदि वह अच्छा आदमी है, तो उसका उद्धार होगा। हमारा विश्वास है कि यदि कोई नास्तिक भी है और अच्छा आदमी है, तो उसका अवश्य ही उद्धार होगा। हम मानते हैं कि सभी धर्म अच्छे हैं। विभिन्न धर्मावलम्बियों के लिए केवल यह आवश्यक है कि वे अन्य धर्मावलम्बियों के साथ झगड़ा न करें।’’
हम लोग सुनते हैं कि जादू के आश्चर्यजनक करिश्मे, हवा में ऊपर उठने और प्राणावरोध इत्यादि की घटनाएँ भारत में होती हैं। इन चमत्कारों की सत्यता के विषय में स्वामी विवेकानन्द से प्रश्न किया गया। विवेकानन्द ने कहा :
‘‘हम चमत्कारों में बिलकुल विश्वास नहीं करते, किन्तु प्राकृतिक नियमों की क्रिया के अन्तर्गत, आपातत: अद्भुत प्रतीत होने वाले कार्य किये जा सकते हैं। भारत में इन विषयों से संबंधित विपुल साहित्य है और वहाँ लोगों ने इन विषयों का अध्ययन किया है।

‘‘हठयोगियों ने मनोभावों को जानने और घटनाओं की भविष्यवाणी करने के अभ्यास में सफलता प्राप्त की हैं।’’
‘‘जहाँ तक हवा में ऊपर उठने की बात है, मैंने किसी को गुरुत्वाकर्षण के ऊपर विजय प्राप्त कर इच्छानुसार हवा में ऊपर उठते कभी नहीं देखा, किन्तु मैंने ऐसे बहुत से लोगों को देखा है, जो इसकी साधना कर रहे थे। वे इस विषय में प्रकाशित पुस्तक पढ़ रहे हैं और चमत्कार-सिद्धि के लिए वर्षों प्रयत्न करते हैं। अपने इस प्रयास में कुछ लोग प्राय: निराहार रहते वर्षों प्रयत्न करते हैं। अपने इस प्रयास में कुछ प्राय: निराहार रहते हैं और अपने को इतना दुबला-पतला बना देते हैं कि यदि कोई उनके पेट में अँगुलि लगाये, तो रीढ़ छू ले।’’
‘‘इन हठयोगियों में से बहुत से दीर्घजीवी होते हैं।’’

प्राणावरोध का प्रश्न फिर उठाये जाने पर हिन्दु संन्यासी ने ‘कमर्शियल’ के संवाददाता को बताया कि वे स्वयं ऐसे एक मनुष्य को जानते हैं, जो एक बन्द गुफा में प्रविष्ट हो जाता था और उस गुफा को एक गुप्त द्वार से बन्द कर दिया जाता था। वह वहाँ अनेक वर्षों तक निराहार रहता था। जिन उपस्थित लोगों ने इस कथन को सुना, उनमें निश्चित रूप से उत्सुकता की एक लहर दौड़ गयी। विवेकानन्द को इसकी सत्यता में किंचित् सन्देह नहीं है। वे कहते हैं प्राणावरोध की दशा में उस अवधि में वृद्धि स्थगित रहती है। भारत में एक आदमी जीवित दफना दिया गया था, उसकी समाधि के ऊपर जौ के पौधे उगा दिये गये तथा अन्त में वह जीवित निकाला गया था- यह बात स्वामी विवेकानन्द के कथनानुसार पूर्ण रूप से सही है। उनका विचार है कि जिस अध्ययन ने व्यक्तियों को यह असाधारण कार्य करने में समर्थ बनाया, वह हिमशायी प्राणियों से सूझा होगा।

जिसके बारे में कुछ लेखकों का दावा है कि भारत में यह सिद्ध किया गया है कि हवा में रस्सी फेंककर और उस पर चढ़कर सुदूर ऊँचाई में मनुष्य अदृश्य हो सकता है, इसके बारे में पूछे जाने पर विवेकानन्द ने कहा कि उन्होंने उस करिश्मे को कभी नहीं देखा।

जिस समय संवाददाता विवेकानन्द से वार्तालाप कर रहा था, उस समय एक उपस्थित महिला ने कहा कि किसी ने उससे पूछा था कि क्या विवेकानन्द आश्चर्यजनक करिश्में कर लेते हैं और क्या वे अपने सम्प्रदाय में दीक्षित होने के एक अंग के रूप में जीवित, पृथ्वी के भीतर समाधि में रह चुके थे। इन दोनों प्रश्नों का उत्तर पूर्ण नकारात्मक था। उन्होंने कहा, ‘‘इन बातों का धर्म से क्या प्रयोजन ? क्या वे मनुष्य को पवित्रतर बनाती हैं ? आपके बाइबिल का ‘शैतान’ भी तो शक्तिशाली है, परन्तु वह पवित्र न होने के कारण ईश्वर से भिन्न है।’’

हठयोग सम्प्रदाय की बात करते हुए विवेकानन्द ने कहा कि उनमें अपने शिष्यों की दीक्षा से संबंधित एक प्रथा है, जो ईसा के जीवन की एक रस्म की ओर संकेत करती है, चाहे यह एक संयोग हो अथवा न हो। वे भी अपने शिष्यों को ठीक चालीस दिन तक एकाकी रहने के लिए बाध्य करते हैं।

लंदन में भारतीय योगी

(वेस्ट मिन्स्टर गजट, 23 अक्टूबर, 1895 ई.)

कुछ वर्षों से यहाँ अर्थात् इंग्लैण्ड के बहुत से लोगों के हृदय में भारतीय दर्शन गंभीर तथा दिनोंदिन बढ़नेवाले प्रभाव का विस्तार कर रहा है। परन्तु आज तक जिन लोगों ने इस देश में उस दर्शन की व्याख्या की, उनकी चिन्तन-प्रणाली और शिक्षा-दीक्षा पूरी तरह पाश्चात्य भावों में रँगी रहने के कारण वेदान्त-तत्त्व के गंभीर रहस्यों के संबंध में वास्तव में लोगों को बहुत ही थोड़ी जानकारी प्राप्त हुई है; और जो कुछ हुई भी, वह भी इने-गिने व्यक्तियों तक ही सीमित है। प्राच्य भाव से शिक्षित-दीक्षित एवं प्राच्य भावों में पले हुए योग्य आचार्यगण वेदान्त-शास्त्र से जिस गंभीर तत्त्वज्ञान की प्राप्ति कर लेते हैं, उस ज्ञान-भण्डार को उन शास्त्रों के अनुवाद से प्राप्त करने की अन्तर्दृष्टि और साहस बहुतों में नहीं होता, क्योंकि वे अनुवाद-ग्रन्थ प्रधानत: शब्द-शास्त्रज्ञों के लिए उपयुक्त होने के कारण सर्वमान्य के लिए कठिन होते है।

एक संवाददाता हमको लिखते हैं-
उपर्युक्त कारणों से-कुछ तो वास्तविक जिज्ञासा के साथ और कुछ कौतूहल के वश हो-मैं स्वामी विवेकानन्द से भेंट करने गया था; क्योंकि पाश्चात्यों के लिए तो वे एक प्रकार से नितान्त नवीन ही प्रतीत होनेवाले वेदान्त-धर्म के प्रचारक हैं। वे सचमुच एक महान् भारतीय योगी हैं। युग-युगान्तर से संन्यासी और योगीगण शिष्य-परम्परा से जिस विद्या का प्रचार करते आ रहे हैं, उसी की व्याख्या करने के लिए वे निर्भीक और नि:संकोच हो इस पाश्चात्य भूखण्ड में आये हुए हैं, एवं उसी उद्देश्य से उन्होंने कल रात को प्रिन्सेज हॉल में एक भाषण भी दिया था।



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