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जार्ज पंचम की नाक

कमलेश्वर

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :79
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5895
आईएसबीएन :81-7028-268-3

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प्रस्तुत है पुस्तक जार्ज पंचम की नाक कमलेश्वर की कहानियाँ

George Pancham Ki Naak

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

‘‘ये कहानियाँ मेरे लिए अत्यंन्त महत्त्वपूर्ण हैं, क्योंकि इनके सहारे ही मैंने पहली बार महानगर की उलझी हुई ज़िंदगी के छोर सुलझाए थे। इन कहानियों ने मुझे एक सक्रिय दृष्टि दी है और बेहतर कहानियों की पीठिया भी तैयार की है। इसलिए मैं इन कहानियों का शुक्रगुज़ार हूं।

 

ये कहानियाँ

इस संग्रह में संकलित कुछ कहानियों की भी कहानियाँ है। कुछेक कहानियाँ जब पत्रिकाओं में छपीं तो छोटी-बड़ी मुश्किले सामने आईं, और तब मुझे पता चला कि कोई भी सत्ता महज़ कहानियों से नहीं घबराती, वह कथ्य से घबराती है। कहानी का कथ्य ही उनका सत्य होता है। मेरे मित्र कथाकार ओमप्रकाश श्रीवास्तव ने एक जगह लिखा है कि, ‘‘यदि किसी का दिमाग खराब करना हो तो सच बात कह दो।’’ और यही हुआ जब मैंने ‘जार्ज पंचम की नाक’ कहानी लिखी।

इस संग्रह की कहानियाँ उस समय की है जब मैं इलाहाबाद छोड़कर दिल्ली आया था और दिल्ली आते ही एक रचनात्मक शून्य में फंस गया था, क्योंकि तब तक की लिखी कहानियों की भाषा, गति और फार्म आदि मेरे काम नहीं आ रहे थे। सच्चाइयाँ इतनी उलझी हुई लग रहीं थीं कि उनका छोर समझ में नहीं आ रहा था, ऐसे में विडम्बनाओं पर ही दृष्टि टिकती है। अब मुझे लगता है कि अपने समय और परिवेश को समझने में प्राथमिक दृष्टि व्यंग्य की ही हो सकती है। इस संग्रह की कहानियाँ मेरे लिए (लेखक के रूप में) अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि इनके सहारे ही मैंने पहली बार महानगर की उलझी हुई ज़िंदगी के छोर सुलझाए थे। जिन सच्चाइयों के सामने मैं खड़ा था। उनके प्रति दृष्टिकोण तय हुआ था। मुझे मालूम है कि इसमें संकलित कुछ कहानियाँ बचकानी हैं, कहानियों के रूप में भी वे समर्थ नहीं हैं, पर इन्हीं कहानियों में परिवर्तन की एक प्रक्रिया भी है, जो मेरे लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

दिल्ली आकर मेरा असंतोष और आक्रोश और बढ़ गया था, मुझे लग रहा था कि जिस आस्था और ममता से मैं ‘राजा निरबंसिया’ की दुनिया में रह रहा था, वह व्यर्थ हो गई थी। राजनीति सचमुच क्या होती है, भ्रष्ट राजतंत्र और नौकरशाही सत्ता द्वारा लगाए गए अप्रत्यक्ष प्रतिबंध और उनमें घुटते, संघर्ष करते व्यक्ति की क्या हालत है- यह सब दिल्ली में ही पहली बार बहुत गहराई से दिखाई दिया। यह भी लगा कि इस तंत्र पर कहीं से भी कोई प्रहार नहीं किया जा सकता।
इसी घुटन से गुजर रहा था कि मैंने ‘जार्ज पंचम की नाक’ कहानी लिखी। कहानी के रचनाकार में मैं टेलीविज़न में सरकारी नौकर था। इस कहानी के छपते ही बवंडर खड़ा हो गया, फाइलें दौड़ने लगीं और पुलिस इंक्वायरी शुरू हो गई। अंततः मुझे लड़ते-लड़ते नौकरी छोड़नी पड़ी। पर इस सरकारी कहानी का अंत तब हुआ जब मैंने नौकरी छोड़ने के डेढ़ बरस बाद मेरी जगह नियुक्त किये गये व्यक्ति से पूछा गया कि ‘जार्ज पंचम की नाक’ कहानी उसने क्यों लिखी ?

इसी तरह जब ‘ब्रांच लाइन का सफर’ कहानी छपकर मेरे कस्बे में पहुँची तो चांडाल साधुओं का एक गिरोह मेरी अक्ल ठीक करने के लिए तैयार हो गया। कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि घटनाएं कोई बड़ी बात नहीं है। और न ये कहानियाँ किसी को महिमा-मंडित करती हैं। पर इतना ज़रूर है कि इन कहानियों ने मुझे लेखक की संलग्नता का एक पाठ जरूर पढ़ाया है.... यानी इन्होंने मुझे एक सक्रिय दृष्टि दी है और बेहतर कहानियों की पीठिका भी तैयार की है। इसलिए मैं इन कहानियों का शुक्रगुज़ार हूँ।


-कमलेश्वर


जार्ज पंचम की नाक


यह बात उस समय की है जब इंग्लैंण्ड की रानी ऐलिज़ाबेथ द्वितीय मय अपने पति के हिन्दुस्तान पधारने वाली थीं। अखबारों में उनके चर्चे हो रहे थे। रोज़ लन्दन के अखबारों में ख़बरें आ रही थीं कि शाही दौरे के लिए कैसी-कैसी तैयारियाँ हो रही हैं.... रानी ऐलिजाबेथ का दर्ज़ी परेशान था कि हिन्दुस्तान, पाकिस्तान और नेपाल के दौरे पर रानी क्या पहनेगी ? उनका सेक्रेटरी और जासूस भी उनके पहले ही इस महाद्वीप का तूफान दौरा करने वाला था.. आखिर कोई मजाक तो था नहीं, ज़माना चूंकी नया था, फौज-फाटे के साथ निकलने के दिन बीत चुके थे इसलिए फोटोग्राफरों की फौज तैयार हो रही थी....

इंग्लैंड के अखबारों की कतरनें हिन्दुस्तान अखबारों में दूसरे दिन चिपकी नज़र आती थी.... कि रानी ने एक ऐसा हल्के नीले रंग का सूट बनवाया है, जिसका रेशमी कपड़ा हिन्दुस्तान से मंगवाया गया है... कि करीब 400 पौंड खर्चा उस सूट पर आया है।

रानी ऐलिज़ाबेथ की जन्मपत्री भी छपी। प्रिन्स फिलिप के कारनामे छपे, और तो और उनके नौकरो, बावर्चियों खानसामों, अंगरक्षकों की पूरी-की-पूरी जीवनियां देखने में आई ! शाही महल में रहने और पलनेवाले कुत्तों तक की जीवनियाँ देखने में आईं ! शाही महल में रहने और पलने वाले कुत्तों तक की तस्वीरें अखबारों में छप गईं ....
बड़ी धूम थी। बड़ा शोर-शराबा था। शंख इंग्लैंड में बज रहा था, गूँज हिन्दुस्तान में आ रही थी।

इन अख़बारों से हिन्दुस्थान में सनसनी फैल रही थी.,....राजधानी में तहलका मचा हुआ था। जो रानी 5000 रुपये का रेशमी सूट पहनकर पालम के हवाई अड्डे पर उतरेगी उसके लिए कुछ तो होना ही चाहिए। कुछ क्या, बहुत कुछ होना चाहिए। जिसके बावर्ची पहले महायुद्ध में जान हथेली पर लेकर लड़ चुके हैं, उसकी शान-शौकत से क्या कहने और वही रानी दिल्ली आ रही है....

नई दिल्ली ने अपनी तरफ देखा और बेसाख़्ता मुंह से निकल गया –वह आएं हमारे घर, खुदा की रहमत... कभी हम उनकों कभी अपने घर को देखते हैं। और देखते-देखते नई दिल्ली का कायापलट होने लगा।
और करिश्मा तो यह था कि किसी ने किसी से नहीं कहा, किसी ने किसी को नहीं देखा- पर सड़कें जवान हो गई, बुढ़ापे की धूल साफ हो गई। इमारतों ने नाज़नीनों की तरह श्रृंगार किया....
लेकिन एक बड़ी मुश्किल पेश थी.... वह थी जार्ज पंचम की नाक ! नई दिल्ली में सब कुछ था, सब कुछ होता जा रहा था, सब कुछ हो जाने की उम्मीद थी, पर पंचम की नाक की बड़ी मुसीबत थी ! दिल्ली में सब कुछ था...सिर्फ नाक नहीं थी।
इस नाक की भी एक लम्बी दास्तान है। इस नाक के लिए बड़े तहलके मचे थे किसी वक्त ! आन्दोलन हुए थे। राजनीतिक पार्टियों ने प्रस्ताव भी दिये थे। गर्मागर्म बहसें भी हुई थीं। अखबारों के पन्ने रंग गए थे। बहस इस बात पर थी कि जार्ज पंचम की नाक रहने दी जाए या हटा दी जाए ! और जैसा कि हर राजनीतिक आन्दोलन में होता है, कुछ पक्ष में थे कुछ विपक्ष में और ज्यादातर लोग खामोश थे। ख़ामोश रहनेवालों की ताकत दोनों तरफ थी...

यह आन्दोलन चल रहा था। जार्ज पंचम की नाक के लिए हथियारबंद पहरेदार तैनात कर दिए गए थे.... क्या मजाल कि कोई उनकी नाक तक पहुँच जाए। हिन्दुस्तान में जगह-जगह ऐसी नाकें खड़ी थीं और जिन तक लोगों के हाथ पहुँच गये उन्हें शानों –शौकत के साथ उतारकर अजायबघरों में पहुँचा दिया गया। शाही लाटों की नाकों के लिए गुरिल्ला युद्घ होता रहा।.....

उसी ज़माने में यह हादसा हुआ-इंडिया गेट के सामने वाली जार्ज पंचम की लाट की नाक एकाएक गायब हो गयी ! हथियारबंद पहरेदार अपनी जगह तैनात रहे। गश्त लगाते रहे...और लाट चली गई।
रानी आए और नाक न हो ! ...एकाएक यह परेशानी बढ़ी। बढ़ी सरगर्मी शुरू हुई। देश के ख़ैरख़्वाहों की एक मीटिंग बुलाई गई और मसला पेश किया गया कि क्या किया जाए ?’’ वहां सभी एकमत से इस बात पर सहमत थे कि अगर यह नाक नहीं है, तो हमारी भी नाक नहीं रह जाएंगी....

उच्च स्तर पर मशवरे हुए। दिमाग खरोंचे गए और यह तय किया गया कि हर हालत में इस नाक का होना बहुत जरूरी है। यह तय होते ही एक मूर्तिकार को हुक्म दिया गया कि फौरन दिल्ली में हाजिर हो। मूर्तिकार यों तो कलाकार था, पर ज़रा पैसे से लाचार था। आते ही उसने हुक्कामों के चेहरे देखे ... अजीब परेशानी थी उन चेहरों पर; कुछ लटके हुए थे, कुछ उदास थे और कुछ बदहवास थे। उनकी हालत देखकर लाचार कलाकार की आँखों में आँसू आ गए ....तभी एक आवाज सुनाई दी ‘‘मूर्तिकार ! जार्ज पंचम की नाक लगनी है।’’

मूर्तिकार ने सुना और जवाब दिया नाक लग जाएगी पर मुझे पता होना चाहिए कि यह लाट कब और कहां बनी थी ? इस लाट के लिए पत्थर कहाँ से लाया गया था ?’’

सब हुक्कामों ने एक -दूसरे की तरफ ताका...एक की नज़र ने दूसरे से कहा कि यह बताना ज़िम्मेदारी तुम्हारी है ! खैर मामला हल हुआ। एक क्लर्क को फोन किया गया और इस बात की पूरी छानबीन करने का काम सुपुर्द कर दिया गया !.... पुरातत्त्व विभाग की फाइलों के पेट चीरे गये, पर कुछ भी पता नहीं चला। क्लर्क ने लौटकर कमेटी के सामने कांपते हुए बयान किया- ‘‘सर ! मेरी खता माफ हो फाइलें सब कुछ हज़म कर चुकी हैं !’’

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