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अरुणा आसफ अली एक संवेदनशील क्रांतिकारी

जी. एन. एस. राघवन

प्रकाशक : नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :172
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5893
आईएसबीएन :978-81-237-4646

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प्रस्तुत है एक नारी क्रांतिकारी की जीवनी....

प्रथम पृष्ठ

Aruna Aasaf Ali Ek Samvedansheel Krantikari - अरुणा आसफ अली एक संवेदनशील क्रांतिकारी - जी. एन. एस. राघवन

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

भूमिका

अरुणा आसफ़ अली की यह जीवनी, जिसके लेखक श्री जी.एन.एस. राघवन हैं, एक विरल व्यक्तित्व का निष्पक्ष एवं मूल्यांकन ही नहीं वरन उनके घटना प्रधान जीवन के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तथ्यों का सत्यपरक एवं प्रामाणिक विवरण भी है। यह अरुणा जी के द्वारा गांधी जी, पंडित नेहरु तथा अपने प्रति आसफ़ अली को लिखे गए तथा उनसे प्राप्त पत्रों एवं 1996 में अरुणा जी के निधन से पूर्व लगभग एक दशक की अवधि में उसके साथ हुए रचनाकार के वर्तालाप तथा चर्चाओं- दोनों पर आधारित है भले ही रचनाकार द्वारा किए गए विश्लेषण के प्रत्येक-ब्यौरे के साथ सहमत हुए जाए या न हुआ जाए तथापि एक अत्यंत नाजुक, दृढ़ निश्चयी-कभी-कभी दुर्गम्य-तथा संवेदनाशील व्यक्तित्व के प्रति जीवनी-लेखक की सामान्य दृष्टि की सराहना किए बिना नहीं रहा जा सकता।

उनके दर्शन का सबसे पहला अवसर मुझे तब मिला जब 1930 के दशक के प्रारम्भ में मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय का छात्र था, तत्पश्चात वाशिंगटन डी.सी में उस समय जब वे हमारे प्रथम राजपूत की पत्नी के रूप में बहुत कम समय के लिए वहां रही थीं। दोनों अवसरों पर मुझे उनका व्यक्तित्व मोहक तथापि गंभीर प्रतीक हुआ। उनकी आँखों में एक प्रकार की तेजस्विता थी। खादी की स्वच्छ धवल साड़ी और ब्लाउज के अपने परिधान और लापरवाही के साथ संवरे-बिखरे बालों में एक अमेरिका प्रथम भारतीय राजदूत की गरिमाशाली एवं मोहक धर्मपत्नी की अपेक्षा स्वतंत्र भारत की सामाजिक-राजनीतिक एवं मानवीय समस्याओं में अधिक रुचि लेती प्रतीत होती थीं। वे वाशिंगटन डी.सी. में अधिक समय नहीं ठहरी, परंतु उन्होंने मैक्सिको में आयोजित यूरेस्को सम्मेलन में सक्रिय भाग लिया जिसमें सम्मिलित समस्त प्रतिनिधियों पर उनका गहरा प्रवाह पड़ा, जिसके विषय में भारतीय प्रतिनिधिमंडल के नेता डॉ. राधाकृष्णन ने जवाहरलाल नेहरू को लिखा था। मुझे उनके निकट संपर्क में आने का अवसर साठ के दशक के प्रारंभ में उस समय मिला था जब मैं सोवियत संघ में भारत का राजदूत था तथा मुझे अनेक बार उनका स्वागत करने का सम्मान प्राप्त हुआ था। मेरे सेवानिवृत्त होने के पश्चात हम एक-दूसरे के संपर्क में तब आए जब मैं प्रायः ‘लिंक’ तथा ‘पैट्रियट’ के लिए लिखा करता था। ये दोनों उनकी सर्वाधिक प्रिय संतानें थीं। पी.एन. हक्सर और अकबाल सिंह के साथ मिलकर मैंने उन्हें इस बात के लिए तैयार करने का प्रयास किया था कि वे इन दोनों स्वतंत्र प्रकाशकों का संचालन करने में समर्थ पुरुषों और महिलाओं का एक ट्रस्ट गठित कर दें। उन्होंने हमारी एक न सुनी क्योंकि उन्हें अपने पुराने सहयोगियों पर विश्वास था। जिनमें कुछ ने एदत्त नारायणन तथा विश्वनाथन के निधन के पश्चात उनका साथ नहीं दिया।

अरुणा दी, मैं स्नेहवश उन्हें इसी संबोधन से पुकारता था एक अनूठी, निस्वार्थ, मानवीय दयालु तथा स्नेहिल महिला थीं। वे जहाँ अपनी भावनाओं पर दृढ़ रहती थीं वहीं दूसरों की भावनाओं के प्रति अत्यंत संवेदनशील थीं। वे सचमुच एक साधारण महिला थीं। व्यक्तिगत संबंधों एवं मित्रों पर दृढ़ता से लागू करती थीं। उनमें इतना साहस था कि उन्होंने गाँधी जी तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सक्रिय नेताओं-जवाहरलाल नेहरू, मौलाना आजाद तथा अपने पति आसफ़ अली के साथ अपने मतभेद खुलकर प्रकट किए। उन्होंने अपनी निजी धारणाओं का साहस तथा आत्मविश्वासपूर्वक अनुसरण किया, विशेषतः ‘भूमिगत’ जीवन के चार वर्षों में। विशेषतः युवा पीढ़ियों की दृष्टि में वे एक गाथा-वीरांगना बन गई थीं। जिस समय उनके पति तथा कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य आसफ़ अली अहमदनगर कारागार में नजरबंद थे उस समय उन्होंने जिस साहस के साथ अपने मार्ग का अनुसरण किया उसकी प्रशंसा गांधी जी और पंडित नेहरू ने भी की। वे दोनों अरुणा जी के प्रति स्नेहिल थे। इस अवधि में गांधी जी, पंडित नेहरू और मौलाना आजाद तथा अपने पति आसफ़ अली के साथ हुआ अरुणा जी का पत्र व्यवहार अनुशीलन के योग्य है। जीवनी-लेखक ने इन पत्रों के मुख्य बिंदुओं को उजागर किया है। यह अरुणा जी का एक सम्मोहक पक्ष है जो हमारे सम्मुख उनके मस्तिष्क और भावनाओं तथा दृढ़ आस्थाओं की झलक प्रस्तुत करता है

मुझे खेद है कि उनकी आयु के अंतिम वर्ष उनके महान जीवन का एक दुखदायी खंड बन गए थे। अंतिम दो वर्षों में जब वे बिस्तर से लग गई थीं और बोल तक नहीं पाती थीं तब मैं उनसे मिलने के लिए प्रायः हर तीसरे दिन विठ्टलभाई पटेल हाउस में उनके निवास पर जाया करता था। वे मेरा हाथ अपने हाथ में दृढ़ता से थाम लेतीं, धीमें से दबाती और अपनी उज्जवल सुंदर आंखों से मुझ पर स्नेहिल दृष्टि उंडेलती थीं मानों कर रही हों ‘‘भले ही कमजोर हो गई हूँ फिर भी मैं अभी तक जीवित हूँ। तुम मुझे देखने आए इसके लिए धन्यवाद।’’ हम दोनों के मित्र इकबाल सिंह विट्ठलभाई पटेल हाउस के एक अपार्टमेंट में रहते थे तथा उनसे (अरुणा जी से) प्रतिदिन मिलने और उन्हें अपने साथ कार में घुमाने ले जाते अथवा पहियेदार कुर्सी पर बैठाकर ‘हाउस’ के गलियारे में घुमाते। मुझे खेद है कि वे भी अब उसी शारीरिक स्थिति में हैं जिसमें अरुणा जी अपने जीवन के अंतिम वर्ष में थीं। अरुणा जी के प्रति उनके कतिपय पूर्व सहकर्मियों की कृतघ्नता और उदासीनता तथा सत्ताधीशों द्वारा की गई अवहेलना के बारे में मै अधिक नहीं लिखना चाहता, तथापि इकबाल सिंह, उनके एक पुराने मित्र तथा सर्वोंच्य न्यायालय के अधिवक्ता के. डी. प्रसाद, डा. राजीव भल्ला, उनके ड्राइवर बलवंत सिंह तथा उनकी परिचारिका फूल बानू की उस समर्पण-वृत्ति तथा निष्ठा का उल्लेख अवश्य करना चाहता हूँ जिसके साथ उन लोगों ने दिन रात उनकी देखभाल की तथा उनके जीवन के अंतिम एक या दो वर्षों को कम पीड़ादायी एवं अधिक सहनीय बनाया। मैं इस विषय में रचनाकार से सहमत हूँ कि भारत रत्न की उपाधि उन्हें उनके जीवन काल में दी जा सकती थी और दी जानी चाहिए थी, शायद वह उस समय उन्हें तनिक-सा उल्लास दे पाती।

यह पुस्तक बहुत बहुत अच्छे ढंग से लिखी गई है तथा समस्त आयु-वर्गों के स्त्री-पुरुषों और विशेषतः युवा पीढ़ी के लिए पठनीय है। लेखक ने जो कुछ कहा है उसके साथ पूर्णताः सहमत होना आवश्य नहीं है तथापि हाल के कुछ वर्षों में लिखे गए जीवनी साहित्य में इस अत्यंत दिलचस्प पठनीय जीवनी की रचना में लेखक ने जो कठोर परिश्रम तथा शोधकार्य किया है उसकी सराहना किए बिना नही रहा जा सकता।

इस पुस्तक के प्रकाशक बधाई के पात्र हैं जिन्होंने एक ऐसी साहसी और सुंदर वीरांगना की इस जीवनी का प्रकाशन करके एक श्रेष्ठ कार्य किया है, जिसमें न तो कोई राजनीतिक पद प्राप्त किया न उसकी कामना की, वरन् अपना समूचा जीवन मानवता-विशेषतः दरिद्र, उत्पीड़न तथा ‘अबला’ वर्गों की सेवा में समर्पित कर दिया। मुझे आशा है कि यह पुस्तक सबकों, विशेषतः युवा वर्ग को भारतमाता की इस महान बेटी के चरण चिन्हों के अनुसरण की प्रेरणा देगी।


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ब्राह्म वंश-परंपरा, ईसाई विद्यालयों में शिक्षा



अरुणा आसफ़ अली के माता-पिता, अंबालिका और उपेन्द्रनाथ गांगुली बंगाली मूल के थे परंतु बंगाल से बाहर जा बसने के कारण प्रवासी कहलाते थे।
अंबालिका के पिता त्रैलोक्यनाथ सान्याल पूर्वी बंगाल में बारीसाल के एक जमींदार के पुत्र थे। उनके मन में अपने जमाने की अंधविश्वास पर आधारित मान्यताओं और संगठन ब्राह्म समाज में सम्मिलित हो गए थे। इस पर उनके माता-पिता ने उन्हें घर से निकाल दिया जिसके फलस्वरूप उन्हें तथा उनकी पत्नी को भयंकर दरिद्रता का सामना करना पड़ा। एक ऐसा समय भी आया अब अंबालिका की माताजी के पास केवल एक साड़ी बची थी जिसका आधा टुकड़ा लपेटकर व शेष आधे को धोती और सुखाती थीं।

‘‘सब दिन होते न एक समान।’’ त्रेलोक्यनाथ भक्तिगीत लिखते थे। कुछ समय बाद उनके गीत लोकप्रिय हुए तो अच्छे दिनों का फेरा हुआ। वे गीत ब्राह्म समाज के संगीत का अभिन्न अंग बन गए उन्हें आज तक गाया जाता है।
1942 से 45 तक अहमदनगर किले में अपनी नंजरबंदी के समय आसफ़ अली ने आत्मकथा की रचना की जिसमें उन्होंने इस बारे में लिखाः ‘‘वीर गायन ने अपने क्षेष्ठ धर्म की महिमा से अनुप्राणित हृदय की गहराई से फूटकर आनेवाली उन्नयनकारी स्वरों को गीतो में ढाल दिया और उनके वे गीत हुए प्रगतिशील समाज के भजनों का रूप लेते चले गए। उनकी कविताएं और उनके वे गीत दुर्लभ और लोकप्रिय फलों और फूलों की भाँति हाथों-हाथ बिकने लगे तथा उस दंपति को वृद्धावस्था में सुविधापूर्ण जीवन का यह उपहार प्राप्त हुआ जिसके वे सचमुच अधिकारी थे। वे अपने पीछे बंगाल के मनोहारी स्वास्थ्यवर्धक नगर गिरिडीह (यह नगर उस समय बंगाल प्रेसीडेंसी में पड़ता था किंतु अब बिहार में है) में अपनी पत्नी के लिए एक सुंदर छोटा-सा घर छोड़ गए।’’

अरुणा के दादा ब्रह्मचन्द्र गंगोपध्याय (गांगुली) भी ब्राह्म समाज की धार्मिक मान्यताओं के अनुयायी थे उनके बच्चों में उपेन्द्रनाथ सबसे बड़े थे।
दसवीं कक्षा तक औपचारिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्नीस वर्षीय उपेन्द्रनाथ गांगुली लीक से हटकर अमेरिका और इंग्लैंड के लिए पड़े जहां उन्होंने होटल व्यवसाय की शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने इस बात की तनिक परवाह नहीं की कि उनके ब्राह्मण जाति-बंधुओं की दृष्टि में यह व्यवसाय हेय माना जाता था। आसफ़ अली लिखते हैं, ‘‘उपेन्द्रनाथ होटल व्यवसाय का भरपूर प्राप्त करके नौ वर्ष पश्चात जब भारत लौटे तब उनमें बावर्ची से लेकर प्रबंधक के पद तक होटल-व्यवसाय का समस्त भार उठाने की क्षमता थी।

इसी समय उनके माता-पिता ने उनसे आग्रह किया कि वे उनकी पसंद की लड़की के साथ विवाह करें। उस युग की सामाजिक स्थिति तथा प्रथाएं-परंपराएं इतनी सशक्त थीं कि उपेन्द्रनाथ सरीखे सामाजिक विद्रोही के सामने भी माता-पिता को अप्रसन्न किए बिना इस बारे में स्वतंत्र रूप में निर्णय करने की कोई गुंजाइश न थी।
उपेन्द्रनात ने आत्मसमर्पण कर दिया। अंबालिका के साथ उपेन्द्रनाथ का विवाह पहले एक दीवानी अदालत (सिविल कोर्ट) के रजिस्ट्रार के समक्ष तथा बाद में ब्रह्म समाज मंदिर में संपन्न हुआ।

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