धर्म और जीवन - स्वामी आत्मानन्द Dharm Aur Jivan - Hindi book by - Swami Atmanand
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धर्म और जीवन

स्वामी आत्मानन्द

प्रकाशक : विवेकानन्द विद्यापीठ प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :287
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5882
आईएसबीएन :00000

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प्रस्तुत है स्वामी आत्मानन्दजी की विविध वार्ताओं का संकलन....

Dharam Aur Jeevan

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रकाशकीय

‘धर्म और जीवन’ स्वामी आत्मानंद जी द्वारा आकाशवाणी से प्रसारित विविध वार्ताओं का संकलन है। इसके पूर्व में भी उनके द्वारा प्रसारित लघुवार्ताओं का एक और संकलन को ‘आत्मोन्नति के सोपान’ के नाम से प्रकाशित हुआ था जिसकी पाँच हजार प्रतियाँ शीघ्र बिक गयीं। पाठकों का आग्रह था कि स्वामी आत्मानन्द जी के अन्य अप्रकाशित साहित्य को भी यथाशीघ्र प्रकाशित किया जाए। प्रस्तुत पुस्तक पाठकों के उसी आग्रह का परिणाम है।

पुस्तक के प्रकाशन में अनेक लोगों का सहयोग रहा है। पुस्तक के प्रकाशन के लिए दाऊ तुंगनराम जी चन्द्रकर ने उदारपूर्वक सहयोग दिया है। प्रूफ रीडिंग में रामकृष्ण मिशन विवेकानन्द आश्रम, रायपुर के स्वामी विदेहात्मानन्द जी ने अत्यन्त श्रम किया है। श्री वीरेन्द्र वर्मा ने इसके प्रकाशन में विशेष रुचि दिखाकार कार्य को शीघ्र सम्पन्न कराने में अपना बहुमूल्य सहयोग दिया है। मुखपृष्ठ की सुन्दर आवरण सज्जा का कार्य श्री अशोक फतनानी ने किया है। श्री क्षितिजय सिंह एवं श्री रविशंकर कन्नौजे ने विषय-वस्तु को कम्प्यूटर से प्रकाशन के लिए तैयार किया है। वैभव प्रकाशन ने इसे मुद्रित किया है। विद्यापीठ-परिवार इन सबके प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करता है।
आशा है यह पुस्तक पाठकों के लिए महत्त्वपूर्ण एवं उपयोगी सिद्ध होगी।


ओमप्रकाश वर्मा


हमारी यह वर्तमान शताब्दी इस दृष्टि से अधिक भाग्यवान है कि अतीत के तीव्र धार्मिक दुराग्रह आज पूर्व के समान नहीं दिखायी देते। इसके लिए दो तत्त्व धन्यवाद के पात्र हैं। पहला तो धर्म के क्षेत्र के वे नेता है, जिन्होंने सर्व-धर्म-समभाव पर बड़ा जोर दिया है। विवेकानन्द से लेकर गाँधी और विनोबा तक इस पक्ष के प्रतीक हैं। दूसरा तत्त्व है विज्ञान की रोशनी का फैलाव। इसने धार्मिक अन्धविश्वासों और कुरूतियों को हानिकारक सिद्ध करने में सर्वाधिक प्रभावी पहल की है। यह विज्ञान की ही देन है कि हम आज बहुत-सी ऐसी धार्मिक रूढ़ियों से मुक्त हैं, जो हमें तंग दायरे में बाँधकर रखा करती थीं और आदमी-आदमी को मिलने नहीं देती थी।

हिन्दू जाति ने जब इस सत्य का अनुभव किया कि दूसरे लोगों ने ईश्वर-प्राप्ति को अपना लक्ष्य बनाकर विभिन्न रास्तों में उसकी प्राप्ति की है, तो उन सबों को उसने उदारतापूर्वक अपना लिया और कालक्रम में उनका स्थान ठीक तरह से निर्धारित कर दिया। इस जाति ने विभिन्न समुदायों के विशेष-विशेष आगमों का उनकी ही उन्नति के लिए उपयोग किया, क्योंकि उनकी रुचि और प्रतिभा के विकास के लिए, उनके जीवन और विचारों को समृद्ध बनाने के लिए, उनके भाववेगों को जाग्रत करने के लिए और उनके कार्यों को प्रेरणा देने के लिए वे ही एकमात्र साधन थे।

भारत का यह जीवन-दर्शन जीवन को निष्प्रयोजन या लक्ष्यहीन नहीं मानता। वह घोषणा करता है कि मनुष्य में पशुत्व और देवत्व दोनों हैं, पर आज उसका यह देवत्व सोया हुआ है। यह देवत्व जितनी मात्रा में जाग्रत है, उतनी ही मात्रा में मनुष्य पशुत्व से ऊपर उठता है। जीवन का लक्ष्य है-इस देवत्व को पूरी तरह से जगा देना। पशुत्व के दमन से ही मानव का देवत्व जागता है। इसके लिए अपनी अशुभ प्रवृत्तियों से उसे सतत संघर्ष करना पड़ता है। जिन उपायों से वह इस संघर्ष में विजयी हो सकता है, उन्हें ‘योग’ के नाम से पुकारा जाता है। इस योग पर मानव-मात्र का अधिकार है।

‘‘यदि हम चाहते हैं कि हमारा देश अपनी बहुविध समस्याओं का समाधान करते हुए विश्व के मंच पर यशस्वी बनकर उभरे, तो हमें चरित्र निर्माण पर सबसे अधिक जोर देना पड़ेगा। उसके बिना सब थोथा है, विकास और उन्नति की सारी बातें बकवास है और धर्म महज दिखावा पाखण्ड है। चरित्र-निर्माण की पहली शर्त है अनुशासन। कठोर अनुशासन की चरित्र रत्न को खरीदकर निखारता है। अनुशासन के दो पक्ष हैं- एक है भीतरी, जो हमारी इच्छा से पैदा होता है और यही सही अनुशासन है; और दूसरा है बाहरी, जो समाज या राष्ट्र हम पर बाहर से लादता है। अनुशासन के इन दोनों पक्षों को साथ मिलकर काम करना होगा, शास्त्र और शस्त्र-दोनों को मिलकर जीवन में प्रभावी बनाना होगा, तब कहीं चरित्र-निर्माण की आशा की जा सकती है। कुछ लोग होते हैं, जो अपने संयम और ज्ञान के बल पर अपना अनुशासन करते हैं और इस प्रकार अपना चरित्र बल प्रकट करते हैं। पर बहुत-से ऐसे होते हैं, जिनको अनुशासन में रखने के लिए डण्डे की आवश्यकता होती है। चरित्र-निर्माण का पाठ इन दोनों को मिलाकर पूरा होता है।

फिर, यह चरित्र-निर्माण ऊपर से नीचे की ओर बहता है। ऊपर यदि सब ठीक हैं, तो नीचे के लोग भी अपने आप ठीक होने लगते हैं। समाज में आचरण-भ्रष्टता का फैलाव ऊपर के तबकों के लोगों से होता है। वहां सुधार की तत्क्षण और प्राथमिक आवश्यकता है। समाज के ऊपर अंगों का हम इलाज करें, तो नीचे के अंग अपने आप रोगमुक्त हो जाएँगे।’’

इसी पुस्तक से

धर्म का स्वरूप
धर्म क्या है ?


हम साधारणतया धर्म से क्या समझते हैं ? यही कि मन्दिर, मस्जिद गिरजा या किसी धार्मिक स्थानों में जाना तथा पवित्र नदियों में स्नान करना। पर यदि हम विचार करें तो मालूम होगा कि वह धर्म नहीं, बल्कि मात्र एक शुभ कर्म है। धर्म का अर्थ है- आध्यात्मिक विकास। धर्म वह है, जिससे हमारा आध्यात्मिक विकास हो सके। यदि हम अपने को धार्मिक कहते हैं, तो हमें स्वयं से पूछना पड़ेगा क्या हमारा आध्यात्मिक विकास हो रहा है ? बिना इस विकास के, ऐसा शुभ कार्य हमारा कुछ भी भला नहीं कर सकता। हमारा इतिहास दर्शाता है कि हमने कितने पुण्य कार्य किये थे, कितने मन्दिर बनवाये थे, कितनी-पूजा उपासना की थी, फिर भी हम शताब्दियों तक लड़ते रहे। गरीबी आयी, बाहर से आक्रमण हुए, हम एक-दूसरे को सतत् दबाते रहे और हमारा देश पीढ़ी-दर-पीढ़ी पतन के गर्त में गिरता रहा। यदि हमारे पास सच्चा धर्म होता, तो यह सब हमारे साथ घटना संभव नहीं था। अत: हमें सच्चे धर्म की साधना करनी चाहिए। सच्चा धर्म क्या है ?

उसका सन्देश है-आध्यात्मिक बनो। केवल पुण्य-कर्मी बनने से नहीं चलेगा। पुण्य करना सहज है। वह बाहर की बात है। हम चाहते हैं आध्यात्मिक विकास। हम मन्दिर में जाएँ, पाँच मिनट वहाँ बैठे और जब वहाँ से निकलें, तो हमें अनुभव होना चाहिए कि हम ईश्वर के उस अनन्त सत्ता के एक कदम नजदीक पहुँच गये हैं। इसे आध्यात्मिक विकास कहते हैं। धर्म का प्रत्येक क्रिया-कलाप, प्रत्येक शुभ या पुण्य कर्म हमें आध्यात्मिक विकास की ओर उन्मुख करे। यही धर्म की खरी कसौटी है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- अहमात्या गुडाकेश सर्वभूताशयस्थित:- ‘‘हे अर्जुन, सब जीवों के हृदय में विद्यमान आत्मा मैं हूँ।’’ (10/20) यदि ईश्वर ही सबके हृदय में विद्यमान हो, तो क्या हमें उसे दूसरों के भीतर देखने की कोशिश नहीं करनी चाहिए ? और यदि हम अपने भीतर अव्यवस्थित ईश्वर को दूसरों के भीतर भी देख पाता हूँ, तो मैं उनसे कैसे लड़ सकता हूँ ? तब तो मैं सबसे प्यार करूँगा, सबकी सेवा करूँगा। यही धर्म का आध्यात्मिक संदेश है। पारस्परिक प्रेम और सौहार्द, सेवा-भाव और चरित्र का उन्नयन-यही असल धर्म की कसौटी है।

एकता के सार्थक प्रयोग : धर्म


‘‘मानव-जाति भाग्य-निर्माण में जितनी शक्तियों ने योगदान दिया है और दे रही हैं, उन सबमें धर्म के रूप में प्रकट होने वाली शक्ति से अधिक महत्त्वपूर्ण कोई नहीं है। सभी सामाजिक संगठनों के मूल में कहीं-न-कहीं यही अद्भुत शक्ति काम करती आ रही है तथा अब तक मानवता की विविध इकाइयों को संगठित करने वाली सर्वश्रेष्ठ प्रेरणा इसी शक्ति से प्राप्त हुई है। हम सभी जानते हैं कि धार्मिक एकता का संबंध प्राय: जातिगत, जलवायुगत तथा वंशानुगत एकता के संबंधों से भी दृढ़तर सिद्ध होता है। यह एक सर्वविदित तथ्य है कि ईश्वर को पूजने वाले तथा एक धर्म में विश्वास करने वाले लोग जिस दृढ़ता और शक्ति से एक दूसरे का साथ देते हैं, वह एक ही वंश के लोगों की बात ही क्या, भाई-भाई में भी देखने को नहीं मिलता।’’

पर, जैसा कि स्वामी विवेकानन्द कहते हैं-‘‘यद्यपि मानव-जीवन में धर्म ही सर्वाधिक शान्तिदायी है, तथापि धर्म ने ऐसी भयंकरता की सृष्टि की है, जैसा कि किसी दूसरे ने नहीं की थी। धर्म ने ही सर्वापेक्षा शान्ति और प्रेम का विस्तार किया है और साथ ही धर्म ने सर्वापेक्षा भीषण घृणा और विद्वेष की भी सृष्टि की है। धर्म ने ही मनुष्य के हृदय में भ्रातृभाव की प्रतिष्ठा की है, साथ ही धर्म ने मनुष्यों में सर्वापेक्षा कठोर शत्रुता और विद्वेष का भाव भी उदीप्त किया है। धर्म ने ही मनुष्यों और पशुओं तक के लिए सबसे अधिक दातव्य चिकित्सालयों की स्थापना की है और साथ ही धर्म ने ही पृथ्वी में सबसे अधिक रक्त की नदियाँ प्रवाहित की हैं।’’



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