पंजाबी की प्रतिनिधि कहानियाँ - महीप सिंह Panjabi Ki Pratinidhi Kahaniyan - Hindi book by - Mahip Singh
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पंजाबी की प्रतिनिधि कहानियाँ

महीप सिंह

प्रकाशक : विद्या पुस्तक सदन प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :168
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5844
आईएसबीएन :81-86503-29-3

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हिन्दी और पंजाबी भाषा के आधुनिक कथाकार डॉ. महीप सिंह द्वारा सम्पादित पंजाबी कहानियों का संग्रह।

Panjabi Ki Pratinidhi Kahaniyan

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


पंजाब के जन-जीवन में लोककथा या कहानी का हमेशा विशिष्ट स्थान रहा है। यही कारण है कि पंजाब में केवल पंजाबी भाषा में ही नहीं अपितु अन्य भाषाओं में लिखनेवालों का भी हमेशा बोल-बाला रहा है। हिन्दी और पंजाबी भाषा के आधुनिक कथाकारों में डॉ. महीप सिंह का साहित्य में एक विशिष्ट स्थान है। मौलिक लेखन के साथ-साथ उनका सम्पादन-कार्य भी खूब चर्चित रहा है। उनके द्वारा सम्पादित पंजाबी कहानियों के इस संग्रह में इस बात पर विशेष बल दिया गया है कि पंजाबी कहानी की सभी पीढ़ियों के कहानीकारों को प्रतिनिधित्व प्राप्त हो सके। इसलिए इस संग्रह में जहाँ अत्यन्त विख्यात और स्थापित लेखकों को शामिल किया गया है, वहीं नवोदित कथाकारों को भी उपयुक्त स्थान दिया गया है। विश्वास है, ये कहानियाँ सम्पूर्ण पंजाबी कथा-साहित्य को और पंजाब के जन-जीवन को समझने में सम्पादक का एक विनम्र प्रयास सिद्ध होंगी।

पंजाबी कहानी : विकास की मंज़िलें

पंजाब की धरती कहानी के लिए शायद इस देश में सर्वाधिक उर्वरा रही है। तभी तो आज पंजाबी के अतिरिक्त हिन्दी, उर्दू और अंग्रेज़ी भाषाओं में लिखनेवाले कथाकारों में पंजाब-निवासी लेखकों का खासा बोलबाला है। यशपाल, उपेन्द्रनाथ अश्क, चन्द्रगुप्त विद्यालंकार, सुदर्शन, कृष्णचन्द्र, राजेन्द्र सिंह बेदी, सआदत हसन मंटो, बल वन्त सिंह, मुल्काज आनन्द और खुशवन्त सिंह जैसे बहुत-से लेखकों ने भारतीय कहानी को समृद्ध बनाने में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। वस्तुतः पंजाब-जनजीवन में लोककथाओं का अपना विशिष्ट स्थान है। हीर-रांझा, सोहनी-महीवाल, ससी-पुन्नू, मिर्जा-साहिबां आदि प्रेमकथाओं और उनपर लिखे गए किस्सा-काव्यों की पंजाब और पंजाबी में एक ऐसी परम्परा है जो अन्य प्रदेशों में दुर्लभ-सी है।

शताब्दियों तक पंजाब युद्धों की भूमि रहा है। जिस भूमि के निवासियों को रात की बची हुई रोटियों का आनेवाली सुबह तक के लिए भरोसा नहीं था, वहाँ के साहित्य में शास्त्र-पक्ष की अपेक्षा लोक-पक्ष का अधिक विकसित होना स्वाभाविक ही था। आधुनिक साहित्य की विभिन्न विधाओं की समुन्नत स्थिति में इस ऐतिहासिक सत्य की छाया आज भी दिखाई देती है।
कहानी की साहित्यिक विधा को जिस रूप में हम आज पहचानते हैं, उसका विकास आधुनिक युग के नवोत्थान के साथ भारतीय भाषाओं में लगभग एकसाथ ही हुआ। सुविधा की दृष्टि से पंजाबी कहानी के इतिहास को तीन काल-खंडों में बाँटा जा सकता है—

सन् 1901 से 1930 तक—पहला दौर
सन् 1930 से 1950 तक-दूसरा दौर
सन् 1950 से आज तक-तीसरा दौर

भाई वीर सिंह (सन् 1872-1957) को आधुनिक पंजाबी साहित्य का जन्मदाता माना जाता है। उन्होंने सिख-इतिहास के आधार पर कुछ उपन्यासों एवं कहानियों की रचना की। यद्यपि ऐतिहासिक प्रसंगों पर आधारित वे कहानियाँ आज की कहानी की परिकल्पना में पूरी नहीं उतरती तथापि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि उन्होंने अपनी निबन्ध-शैली की उन कहानियों द्वारा पंजाबी साहित्य को अपने समय में एक नवीन और अलौकिक शैली प्रदान की थी।

इस दौर का दूसरा महत्त्वपूर्ण नाम भाई मोहन सिंह वैद (सन् 1881-1936) का है। भाई मोहन सिंह ने पंजाबी पाठकों का परिचय अन्य भाषाओं में लिखी जा रही कहानियों से करवाया। उन्होंने हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी से बहुत-सी कहानियों का पंजाबी में अनुवाद किया और समाजसुधार की प्रवृत्ति को साहित्य-सृजन की प्रमुख प्रवृत्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया।
पंजाबी में कहानी-संग्रहों के प्रकाशन का भी भाई मोहन सिंह से ही प्रारम्भ हुआ। उनकी अनूदित और मौलिक कहानियों के तीन संग्रह ‘रंग-बिरंगे फूल’ (1927), ‘हीरे दिआं कणिआं’ (1927) और किस्मत दा चक्कर’ (1934) प्रकाशित हुए।
चरन सिंह शहीद का नाम इस दौर के लेखकों में अपना विशिष्ठ स्थान रखता है। पंजाबी हास्य और व्यंग्य की कहानियों के वे जन्मदाता थे और उन्होंने इस माध्यम से सामाजिक बुराइयों पर बड़ी गहरी चोट की थी। चरन सिंह शहीद ने यूरोपीय भाषाओं की कहानियों का अध्ययन किया था, अतः वह प्रभाव उनकी रचनाओंगत दृष्टिगत होता है। उनकी बहुत-सी कहानियों का कल्पित हास्य पात्र ‘बाबा वरयामा’ उस युग के पंजाबी पाठकों की गहरी जान पहचान का पात्र बन गया था। उनकी कहानियों का एक संग्रह ‘हस्सदे इंजू’ (हँसते आँसू) प्रकाशित हुआ था जिसकी भूमिका में चरन सिंह शहीद ने बड़े विश्वास से लिखा था कि ये कहानियाँ आनेवाली पीढ़ी का मार्ग-दर्शन करेंगी।

इसी समय पंजाबी में अनेक मासिक पत्रों का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। ‘प्रीतम’ (1923), ‘फुलवाड़ी’ (1924) और किरती ‘हंस’ आदि पत्रों के प्रकाशन से पंजाबी में एक नई चेतना का विकास हुआ। इन पत्रों के लिए बहुत-सी कहानियाँ लिखी गईं। इन कहानियों के लिखनेवालों में लाल सिंह कमला अकाली, ज्ञानी हीरा सिंह दर्द सोहन सिंह जोश, ज्ञानी गुरमुख सिंह मुसाफ़िर, बलवन्त सिंह चतरथ अमर सिंह और केसर सिंह ‘कंवल’ आदि के नाम विशेष रूप से लिये जा सकते हैं।
कला और विषय की दृष्टि से उपर्युक्त लेखकों की कहानियाँ पूर्ववर्ती लेखकों से आगे बढ़ चुकी थीं। सामाजिक और धार्मिक सुधार की ओर इंगित करने के साथ ही ये कहानियाँ उभरती हुई राजनीति चेतना का सन्देश भी दे रही थीं। इस दृष्टि से उस दौर के तीन प्रख्यात लेखकों—ज्ञानी हीरा सिंह दर्द, ज्ञानी गुरुमुख सिंह मुसाफिर और सोहन सिंह जोश के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

सन् 1928 में उर्दू लिपि में प्रकाशित पंजाबी पत्र ‘पंजाबी दरबार’ के प्रकाशन से कहानी लेखकों का एक और वर्ग सामने आया। उनमें सर्वाधिक महत्त्व का स्थान जोगवा फ़जलदीन का है। उनकी कहानियों के संग्रह ‘अदबी अफ़साने’ और ‘इखलाकी कहानियाँ’, अपने समय में बड़े लोकप्रिय हुए थे।

उसी समय रूसी, हिन्दी, बंगला और मराठी की भी बहुत-सी कहानियों का पंजाबी में अनुवाद हुआ। अभय सिंह ने ‘चंबे दोआं कलिआं’ शीर्षक से ‘टालस्टाय’ की कुछ कहानियों का एक संग्रह प्रकाशित कराया। मुल्कराज आनन्द ने प्रेमचन्द की और सोहन सिंह जोश ने बंगला और मराठी की कहानियों के पंजाबी अनुवाद किए।

पंजाबी कहानी के दूसरे दौर का प्रारम्भ नानक सिंह और गुरबख्श सिंह के प्रवेश से होता है। पंजाबी कथा-साहित्य में नानक सिंह का आगमन एक युगान्तकारी घटना थी। नानक सिंह अपने प्रारम्भिक लेखन-कार्य में प्रेमचन्द से प्रभावित हुए थे, परन्तु उनकी कल्पना-शक्ति ने उपन्यास को कहानी की अपेक्षा अधिक गहराई और अपनत्व से अपनाया। नानक सिंह उपन्यासकार के रूप में जितने सफल और लोकप्रिय हुए उतने कहानीकार के रूप में नहीं।

नानक सिंह की पहली कहानी ‘रखड़ी’ सन् 1927 में प्रकाशित हुई। वह भारतीय पुनर्जागरण का युग था। सामाजिक कुरीतियों से मुक्त होने का प्रयास हमारी सामाजिक गतिविधियों का प्रेरणा-स्रोत बना हुआ था और साहित्य की रचना इस विशिष्ट उद्देश्य की पूर्ति के लिए हो रही थी। नानक सिंह की कहानियों में सुधारवादी स्वर बहुत प्रबल रहा है। साम्प्रदायिक एकता, छुआ-छूत, विधवाओं और वेश्याओं की समस्या, अनमेल विवाह, ज़मींदारों के अत्याचार आदि विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक प्रश्नो को उन्होंने अपनी कहानियों में छुआ।

पंजाबी के गद्य-लेखन को गुरूबख्श सिंह ने सबसे अधिक गति दी और उसके स्वरूप को खूब सजाया-सँवारा। युद्धों से आक्रांत रहने पर भी पंजाब की धरती से प्रीति का पौधा कभी नहीं कुम्हलाया। शौर्य और प्रणय के गीत पंजाबी जीवन में साथ-साथ उभरते रहे हैं। परन्तु वीर-गीत जहाँ पंजाब के विभिन्न सम्प्रदायों के वीर-पुरुषों की प्रशस्ति में लिखे होने के कारण उस विशिष्ट वर्ग तक ही सीमित रहे, वहाँ प्रणय-गीत इन विभेदों से ऊपर उठकर पंजाब मात्र के जनजीवन में लोकप्रिय हुए।
भाई वीर सिंह से लेकर नानक सिंह तक पंजाबी जीवन के उस शौर्य-पक्ष का ही एक प्रकार से पुनर्जागरण हुआ था, परन्तु प्रीतपक्ष के पुनरुद्धाटन का श्रेय गुरुबख्श सिंह को है। सन् 1933 में उन्होंने ‘प्रीतलड़ी’ का प्रकाशन प्रारम्भ किया। ‘प्रतिलड़ी’ का प्रकाशन आधुनिक पंजाबी साहित्य के लिए एक बड़ी महत्त्वपूर्ण घटना थी।
गुरुबख्श सिंह के कथानानुसार उन्होंने अपनी पहली कहानी ‘प्रीतमा’ सन् 1913 में लिखी थी, परन्तु उनकी कहानियों का प्रथम संग्रह ‘प्रति कहानियाँ’ सन् 1937 में प्रकाशित हुआ था।

गुरुबख्श सिंह पंजाबी के ऐसे प्रथम लेखक थे जिनकी रचनाओं पर विदेशी प्रभाव सबसे पहले स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर हुआ। अपने जीवन के प्रारम्भिक वर्ष उन्होंने अमेरिका में व्यतीत किए थे। वहाँ के जीवन का गहरा प्रभाव सेकर वे भारत आए। स्त्री-स्वातन्त्र्य और स्त्री-पुरुष के शाश्वत प्रेम-सम्बन्धों पर सामाजिक बन्धनों का विरोध उनकी प्रारम्भिक रचनाओं के मुख्य स्वर बने।
गुरबख्श सिंह और नानक सिंह ने पंजाबी कहानी को आधुनिक आवश्यकताओं के अनुकूल बनाने में बड़ा महत्त्वपूर्ण कार्य किया था। समय की बदलती हुई मान्यताओं की ओर से इन्होंने कभी अपने-आपको विमुख नहीं किया। सुधारवाद से प्रगतिवाद से मानवतावादी दृष्टिकोण की ओर उनकी लेखनी सदैव सजग रूप से अग्रसर होती रही।

परन्तु कहानीकारों की जिस पीढ़ी ने पंजाबी कहानी को पश्चिमी कला—शिल्प के स्तर तक लाने का कार्य किया, उनमें सन्त सिंह सेखों, सुजान सिंह और करतार सिंह दुग्गल उल्लेखनीय हैं। सेखों ने अपना लेखन-कार्य अंग्रेज़ी से आरम्भ किया और फिर वे पंजाबी में लिखने लगे। पश्चिमी देशों में लिखी जानेवाली कहानी का उन्होंने सूक्ष्मता से अध्ययन किया। यह वह समय था जब भारत की सभी भाषाओं का साहित्य प्रगतिशील आन्दोलन से प्रभावित हो रहा था। बौद्धिक चेतना, यथार्थवादी चित्रण, पीड़ित और दलित वर्ग के प्रति सहानुभूति तथा धार्मिक एवं नैतिक रूढ़ियों के प्रति विद्रोह-भाव सेखों की कहानियों में बड़े प्रभावशाली ढंग से व्यक्त हुआ। सेखों की कहानियों में जहाँ एक ओर मार्क्सवादी विचारों से प्रभावित वर्ग-संघर्ष का चित्रण हुआ, वहाँ दूसरी ओर फ्रायड के विचारों का प्रभाव भी दृष्टिगत हुआ। सेखों की अनेक कहानियों में दमित यौन-भावना का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण हुआ है।

सेखों का पहला कहानी-संग्रह ‘समाचार’ सन् 1943 में प्रकाशित हुआ था। उसके पश्चात् उनके तीन-चार संग्रह और प्रकाशित हुए।
प्रगतिशील खेमे के दूसरे प्रमुख लेखक सुजान सिंह हैं। अपने लेखन-जीवन के प्रारम्भ में वे नानक सिंह से प्रभावित लगे थे और सामाजिक जीवन की बुराइयों की ओर उनका वैसा ही सुधारवादी दृष्टिकोण था, परन्तु धीरे-धीरे वे द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी सिद्धान्त से प्रभावित हुए और पूँजीवादी समाज-व्यवस्था के विरुद्ध उन्होंने प्रगतिशील दृष्टिकोण अपनाया।
निम्न-मध्यवर्ग एवं निम्नवर्ग के पात्रों के चित्रण में सुजान सिंह को अद्भूत सफलता मिली। किसानों, मज़दूरों तथा विशिष्ट प्रकार की समाज-व्यवस्था में पिसते हुए आर्थिक दृष्टि से विपन्न और धार्मिक दृष्टि से त्याज्य लोगों की समस्याओं का कलात्मक चित्रण सुजान सिंह की कहानियों में मिलता है। सुजानसिंह का पहला कहानी संग्रह ‘दुःख-सुख’ सन् 1942 में प्रकाशित हुआ था। उसके पश्चात् उनके अनेक संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं।

पंजाबी कहानीकारों में करतार सिंह दुग्गल का नाम पंजाबी भाषा की सीमाओं से बाहर सर्वाधिक लोकप्रिय है। दुग्गल ने पंजाबी कहानीकारों में सबसे अधिक कहानियाँ लिखी हैं, शिल्प और कथ्य की दृष्टि से सबसे अधिक प्रयोग किए हैं, अपने लेखन को सतत गतिशील रखा है और सबसे अधिक ख्याति अर्जित की है, परन्तु मनोविज्ञान की सूक्ष्मतम गहराइयों में प्रविष्ट होकर वहाँ से निकले हुए मोती के प्रकाश से कहानी को जगमगा देना दुग्गल को बहुत अच्छी तरह आता है।
दुग्गल का पहला कहानी-संग्रह ‘सवेर सार’ सन् 1941 में प्रकाशित हुआ था। अब तक उनके लगभग एक दर्जन कहानी-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। इसी दौर के लेखकों में प्रो. मोहन सिंह, देवेन्द्र सत्यार्थी, नौरंग सिंह आदि के नाम भी उल्लेखनीय हैं। प्रो. मोहन सिंह पंजाबी के प्रतिष्ठित कवि थे, परन्तु उन्होंने कुछ बहुत ही अच्छी कहानियाँ लिखी हैं। उनकी कहानियों में पात्रों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण बड़ी सूक्ष्मता से हुआ है। प्रो. मोहन सिंह की कहानियों का झुकाव मुख्यतः सूक्ष्म प्रणयानुभूति और उभरती हुई या दमित काम-भावना की ओर रहा है। उनकी कहानियों का एक संग्रह सन् 1942 में ‘निक्की-निक्की वाशना’ के नाम से प्रकाशित हुआ था। अन्य संग्रह हैं—कुब्बा, पीरबख्श, माँ आदि।
विभाजन के पश्चात् पंजाबी कहानी बहुत तेज़ी से आगे बड़ी है।


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