बच्चों की समस्याएँ एवं समाधान - सुरजीत Bachchon Ki Samasyaen Evam Samadhaan - Hindi book by - Surjeet
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बच्चों की समस्याएँ एवं समाधान

सुरजीत

प्रकाशक : विद्या पुस्तक सदन प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :144
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5827
आईएसबीएन :81-86503-38-2

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प्रस्तुत हैं बच्चों की समस्याएँ एवं समाधान

Bachchon Ki Samasyaen Evam Samadhaan a hindi book by Surjit - बच्चों की समस्याएँ एवं समाधान - सुरजीत

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

‘बच्चों की समस्याएँ एवं समाधान’ प्रसिद्ध लेखक सुरजीत की एक ऐसी रचना है जिसके अध्ययन से माता-पिता, विशेषतया माताएँ, ऐसे तथ्यों को जान सकेंगे जिनसे वे अपने नवजीत शिशुओं, बच्चों और किशोरों का सही तरीक़े से पालन-पोषण कर सकें। इस पुस्तक के माध्यम से शिशुओं/बच्चों की विभिन्न समस्याएँ को उठाया गया है और साथ ही उन समस्याओं के सरल, सहज, उपयुक्त समाधान भी सुझाये गये हैं जिनसे विश्व-भर के माता-पिता लाभान्वित हो सकते हैं और अपने बच्चे का अच्छी तरह से लालन-पालन कर सकते हैं।

बच्चों का प्रशिक्षण : एक कठिन प्रक्रिया


कुछ बच्चे स्वभावत: सामान्य बच्चों से भिन्न होते हैं। उनका स्वभाव जन्म से ही सामान्य बच्चों से पृथक होता है। सामान्य बच्चों को आप किसी काम को करने को कह दें या रोक दें तो वे बिना चूं-चरां मान लेते हैं, पर विशिष्ट स्वभाव के बच्चे के साथ माँ-बाप को भिन्न व्यवहार करना पड़ता है। ऐसे बच्चे यदि किसी चीज को प्राप्त करना चाहते हैं तो उसमें किसी प्रकार की रोक-टोक पसंद नहीं करते। माँ-बाँप यदि उन पर अपनी इच्छा थोपना चाहें तो वे उसके गलत प्रभाव ले सकते हैं। ऐसे बच्चों के मस्तिष्क में आरम्भ से ही विद्रोही भावनाएँ जन्म लेने लगती हैं। इसलिए इस तरह के बच्चों के प्रशिक्षण के लिए माँ-बाप को खासा सतर्क रहना चाहिए।

डॉक्टर बेंजामिन सेलोक का कहना है कि बच्चों का प्रशिक्षण उनके पालन-पोषण से अधिक कठिन समस्या है। बच्चों की खुराक, उनकी सफाई, उनके खिलौनों और पुस्तकों का चयन, उनके खेलने और सोने के समय का निश्चय-ये सभी बातें बच्चों के स्वभाव और चरित्र को बनाती हैं। माता-पिता को इन जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए अपने बहुत-से मनोविनोद छोड़ने पड़ते हैं, अपने कार्यक्रम में परिवर्तन करने पड़ते हैं। पर यह सब इसलिए आवश्यक है कि यहाँ बच्चे न केवल आपके भविष्य की पूँजी हैं, अपितु आनेवाले कल से उन्हें देश और राष्ट्र की संपदा भी बनना है, पर इसका यह अभिप्राय बिलकुल नहीं है कि आप अपनी सारी गतिविधियों को स्थगित कर दें। बात तो जब है कि आप भी जीवन के सुखदायक पलों से आनंदित हों और बच्चों को भी वही स्वास्थ्यवर्धक वातावरण मिले।

एक स्वाभाविक इच्छा, जो बच्चे के जन्म लेने के बाद माता-पिता के मन में भी जन्म लेती है, यह है कि उनका बच्चा उनके बुढ़ापे का सहारा बने। यह इच्छा स्वाभाविक है-बिलकुल उसी प्रकार की जब आप बच्चों को कोई चीज देते हैं, तो उसे सिखाते हैं कि वह उत्तर में धन्यवाद करे। इसे हम आत्मस्वार्थ नहीं कह सकते क्योंकि इसी प्रकार बच्चे में कृतज्ञता की भावना सुदृढ़ हो सकती है।

बच्चे प्राय: नाश्ते और खाने के समय माँ को परेशान करते हैं। बच्चों को पेट-भर खिलाना भी सचमुच एक समस्या है। कुछ ग्रास खाने में खासा समय लगाते हैं, इस पर बस नहीं। उदाहरणार्थ-यह खाना अच्छा नहीं है, यह चीज पसंद नहीं है। बच्चों की ये हरकतें माँ को झुँझला कर रख देती हैं। पर आप हर संभव तरीके से इस टकराव से बचिए। इस संबंध में अनुचित लाड़-प्यार की भी जरूरत नहीं। जहाँ आपको चेतावनी देनी है, वहाँ अपने रवैये में लचक न आने दें, बच्चों से वाद-विवाद न करें। किसी जटिल समस्या में विवाद उनके नन्हें मस्तिष्क को लाभ नहीं पहुँचा सकता, पर आप उन्हें नजर अंदाज भी न करें। प्रतिदिन के खानों के संबंध में बच्चे के साथ सहयोग करें। उसकी पसन्द, नापसन्द का खयाल रखें। अप्रिय खानों में रुचि पैदा करें और रुचि पैदा करने के लिए उसे उसकी प्रिय बातों में लगाएँ। उदाहरणार्थ आपका बच्चा कहानियाँ सुनना पसन्द करता है तो खाने के समय उसे प्रिय कहानी सुनाते हुए उसे कुछ ग्रास ही खिला दें, जो उसे नापसन्द है। कुछ बार यह क्रिया दुहराने से रुचि उसकी अरुचि बड़ी सीमा तक कम हो जाएगी।

स्कूल से विरक्ति क्यों-

इसी प्रकार उनकी कठिनाइयों में भरपूर भाग लें। उन्हें यह अनुभव हो कि वे इस कठिनाई में अकेले नहीं हैं। उदाहरणार्थ-अधिकांश बच्चे आरंभ से ही स्कूल जाने से घबराते हैं, जी चुराते हैं, रोते हैं और कई बार हंगामा पैदा कर देते हैं। माता-पिता अधिक-से-अधिक सामान्य कार्यविधि से उन्हें समझाते-बुझाते हैं। स्कूल जाने के लाभों और न जाने की हानियाँ गिनाते हैं। पर नन्हा मस्तिष्क उनके इन तर्कों को स्वीकार करने से इंकार कर देता है। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि उसकी कक्षा में उसे जो कुछ सिखाया जाता है, वह उसे समझने और उस स्तर तक पहुँचने में असमर्थ है। दूसरे बुद्धिमान बच्चों के सामने स्वयं को हीन अनुभव करने लगता है। स्वभाव से वह लज्जालु है और यही कारण उसे स्कूल जाने से रोकते रहते हैं।

इन परिस्थितियों में आप बच्चे के साथ इस प्रकार का मानसिक सामीप्य स्थापित करें कि उसकी समस्या समझने में आपको कठिनाई अनुभव न हो। उसे कुछ समय दें और कक्षा में जो कुछ पढ़ाया गया है, वह आप उसे याद कराते रहें। फिर स्थिति कुछ दिनों में ही बदल जाएगी।
आपकी आर्थिक परिस्थितियाँ इसकी अनुमति नहीं देती कि आप बच्चों के लिए रंग-बिरंगी कहानियाँ उपलब्ध करा सकें तो इन परिस्थितियों से आप निराश न हों। बच्चों की उपयोग की पत्रिकाएँ दूकानों पर आम मिलती हैं और सस्ती मिलती हैं। आप उनमें से कुछ तस्वीरें काटकर एक कहानी का रूप दे दें। कुछ पुराने कॉमिक्स खरीद लें और उसे पढ़ने की ओर आकृष्ट करें क्योंकि बच्चे सचित्र कहानियों से अधिक बहलते हैं। इस प्रकार आपका परिश्रम और प्रयत्न व्यर्थ नहीं जाएगा।

झूठे बच्चे


‘‘मम्मी ! अभी-अभी शेर आया था। मैंने उसको अपनी बन्दूक से मार दिया।’’
‘‘मम्मी ! मुझे रास्ते में भेड़िया मिला था, लेकिन उसने मुझे काटा नहीं। वह कहता था कि तुमने साफ कपड़े पहने हुए हैं। मुँह धोया हुआ है। मैं तो तुम को प्यार करूँगा।’’ इस प्रकार की मनगढ़न्त बातें आपका बच्चा प्राय: आपको सुनाता होगा।
माएँ जब पहली बार ऐसी बातें अपने बच्चे के मुँह से सुनती हैं तो यह सोचकर तनिक चिन्तातुर हो जाती हैं कि मेरा बच्चा अभी से झूठ बोलने लगा। आगे का फिर भगवान ही रक्षक है।

बच्चे जब बोलना शुरू करते हैं तो सामान्य रूप से तीन या चार वर्ष से लेकर छ: वर्ष तक इसी प्रकार की विचित्र बातें सुनाते हैं। ये वो काल्पनिक अनुभव होते हैं जो बच्चा अपनी हीन भावना के कारण अपनी मानसिक संतुष्टि के लिए करता है। वह अपने को अपने बड़ों की तुलना में छोटा और तुच्छ समझता है और इस अनुभूति को समाप्त करके वह बड़ी-से-बड़ी चीज का मुकाबला करके अपने-आपको बड़ा सिद्ध करता है और इस प्रकार से संतुष्टि प्राप्त करता है।

ऐसी बातों को झूठ नहीं कहा जा सकता, अपितु यह एक बुद्धिमान् बच्चे की कल्पना का चमत्कार है जिसको वह गढ़कर आपके सामने इस प्रकार प्रस्तुत करता है। इसलिए बच्चों की ऐसी बातों से यह सोचकर कि यह झूठे हैं, घबराना नहीं चाहिए। सामान्य रूप से यह देखा गया है कि बच्चा खेलते-खेलते किसी डण्डे को घोड़ा, कुत्ते को भालू और गुड़िया को बच्चा बनाकर खेलता है। यह सब उसकी अपनी कल्पना होती है, जिसके सहारे वह इच्छानुसार अपना एक काल्पनिक वातावरण बनाता है। बच्चा कभी-कभी अपना कोई साथी न होने की अवस्था में एक काल्पनिक साथी भी बना लेता है और खेल के समय उससे बात भी करता है, लड़ता भी है और हँसता भी है। मतलब यह है कि वह क्रिया करता है जो किसी सचमुच के साथी की उपस्थिति में वह कर सकता है।

माता-पिता को बच्चे की ऐसी बातों को गौर से सुनना चाहिए और उसका मन बहलाना चाहिए और ऐसी अवस्था में जबकि वह किसी काल्पनिक साथी से बात कर रहा हो, उसे सचमुच का साथी उपलब्ध करा देना चाहिए ताकि उसे अधिक-से-अधिक संतोष प्राप्त हो सके।
बच्चे हर काल्पनिक या वास्तविक वस्तु की कल्पना कर सकते हैं, किन्तु यह उनकी समझ से दूर होता है कि वे सत्य को एक ऐसा गुण मान लें जो हर अच्छे मनुष्य में होना चाहिए।



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