स्थिर चित्र - जगन्नाथ प्रसाद दास Sthir Chitra - Hindi book by - Jagannath Prasad Das
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स्थिर चित्र

जगन्नाथ प्रसाद दास

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 1993
पृष्ठ :89
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5805
आईएसबीएन :00000

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‘स्थिर चित्र’ में उड़िया कवि की यात्रा आत्मनेपदी से परस्मैपदी तक, रोमांटिक आवेग से धूसर नित्य तक, अन्तर्निहित इन्दधनुष के रंगों से हमारे समय के अघटित विघटन तक है।

Sthir Chitra

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


जगन्नाथप्रसाद दास उड़िया के समकालीन बहुचर्चित कवियों में से एक हैं जिनसे हिन्दी पाठक भी अब अपरिचित नहीं हैं। उनके अब तक सात कविता-संग्रहों के हिन्दी रूपांतर पाठकों के सम्मुख आ चुके हैं। उनमें से दो ‘लौटते-समय’ और ‘शब्द-भेद’ भारतीय ज्ञानपीठ से पहले प्रकाशित हैं। प्रस्तुत कृति ‘स्थिर चित्र’ ज्ञानपीठ द्वारा दो-तीन वर्ष पूर्व आरम्भ की गयी ‘भारतीय कवि’ श्रृंखला की एक नयी कड़ी है। श्री दास की आरम्भिक कविताओं में उनका काव्यपुरुष प्रायः आत्ममग्न है। अपने अंतरंग क्षणों का अपने चेहरे और मुखौटों का अपनी स्नेहसिक्त हताशाओं, प्रत्यय और अनुरागों का वह विलम्ब आत्मनेदी रहा है। धीरे-धीरे आत्मलीनता से मुक्त होकर वह रास्ता, रास्ते के लोग, कालाहंडी, बालियापाल कसबे में रहनेवाले छायानटें को अन्दर खींच लेता है। और फिर इन सबको लेकर शब्द का चित्र-शिल्पी स्थिर चित्र ही आँकता है, ताकि सहृदय पाठक सहज एवं निश्छल रूप से उसका साक्षात्कार कर सकें। यहाँ स्वप्न से छुटकारा पाने के लिए वह नयी राह तलाशता है, किन्तु उस यथार्थ से भी पुनः स्वप्न में लौटने को बाध्य होना पड़ता है। कौन बाध्य करता है ? क्या वह अबाध्य हृदय है—रक्तमांस का प्राण-पुतला ? स्वप्न से छुटकारा चाहता हुआ काव्पुरुष, फिर क्या इस रूक्ष यथार्थ से स्वप्न् की ओर बढ़ जाता है ?

लेकिन नहीं अब उसका काव्यपुरुष बन्द कमरे में बैठे रहने को तैयार नहीं। वह उस दिशा में आगे बढ़ जाता है जहाँ भाग्य ही प्रताड़ित है, जहाँ सारे भूचित्र सम से परे खड़े होते हैं जो हमारे वर्तमान और चिरंतन भविष्य हैं।
‘स्थिर चित्र’ उसी मार्मिक भूमि की ओर संकेत करता है।
प्रस्तुत संकलन की कविताओं में प्रवेश पाने के लिए डॉ. सीताकांत महापात्र का ‘प्राक्कथन’ पाठक की मनोभूमि के निर्माण ने पर्याप्त सहायक बनता है।
हिन्दी के काव्य-मर्मज्ञ पाठकों के लिए भारतीय ज्ञानपीठ की एक और भेंट।

प्रस्तुति


भारतीय वाङ्मय के संवर्धन में भारतीय ज्ञानपीठ के बहुमुखी प्रयास रहे हैं। एक ओर उसने भारतीय साहित्य की शिखर उपलब्धियों को रेखांकित कर ज्ञानपीठ पुरस्कार के माध्यम से साहित्य को समर्पित अग्रणी भारतीय रचनाकारों को सम्मानित किया है, जिससे उनकी श्रेष्ठ कृतियाँ अन्य रचनाकारों के लिए प्रकाशस्तम्भ बनें। दूसरी ओर वह समग्र भारतीय साहित्य में से कालजयी रचनाओं का चयन कर उन्हें हिन्दी माध्यम से अपने साहित्य श्रृंखलाओं के अन्तर्गत प्रकाशित कर बृहत्तर पाठक-समुदाय तक ले जाता है ताकि एक भाषा का सर्वोत्कृष्ट साहित्य दूसरी भाषा तक पहुँचे और परस्पर वैचारिक सम्प्रेषण सम्भव हो सके।

प्रस्तुत कृति ‘स्थिर चित्र’ भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा दो वर्ष पूर्व आरम्भ की गयी ‘भारतीय कवि’ श्रृंखला की एक नयी कड़ी है। कृतिकार जगन्नाथ प्रसाद दास (अपने मित्रों के लिए मात्र जे.पी) उड़िया के समकालीन उन बहुचर्चित कवियों में से एक हैं जिनसे हिन्दी पाठक भी अब अपरिचित नहीं हैं। हिन्दी अनुवाद के रूप में उनके अब तक छह कविता-संग्रह—‘प्रथम पुरुष’, ‘कई तरह के दिन’, ‘अपना-अपना एकान्त’, ‘लौटते समय’, ‘शब्दभेद’ और ‘आह्निक’ पाठकों के सम्मुख पहले ही आ चुके हैं। इनमें से दो काव्य-संग्रह—‘लौटते समय’ और ‘शब्दभेद’ ज्ञानपीठ से प्रकाशित हैं।
‘लौटते समय’ की कविताएँ, हिन्दी के वरिष्ठ समीक्षक श्री केदारनाथ के शब्दों में, शब्द और मौन के बीच एक निरंतर आवाजाही के तनाव से पैदा हुई हैं। अधिकांश कविताएँ एक ध्वनि-बिम्ब या हरकत से शुरू होती हैं और अक्सर एक गहरे मौन में पर्यवसित हो जाती हैं। पर होता यह है कि हर कविता के मौन में पर्यावसान के बाद फिर एक नयी शुरुआत होती है। दूसरे शब्दों में, शब्द से मौन की ओर और पुनः मौन से शब्द की ओर लौटना—यह दोनों प्रक्रियाएँ बराबर चलती रहती हैं :


‘उत्तर दिये बिना मुक्ति नहीं
मृत्यु की चिरंतनता से ढूँढ़नी पड़ती है
जीने की क्षणिक घड़ियाँ’


‘शब्दभेद’ ‘लौटते समय’ का अगला चरण है जहाँ आत्माभिव्यक्ति में मनुष्य के असाह हो जाने का चित्रण है। इस असाह भाव या विवशता के लिए कुछ घटक तो उसके नियंत्रण के बाहर हैं, दैवीय हैं, लेकिन कुछ ऐसी भी हैं जिनका कारण हमीं में से कुछ लोग हैं। ऐसे स्थलों पर मूल्यों और संस्थाओं की विकृतियों को लेकर कवि की व्याकुलता इन कविताओं में स्पष्ट दिखाई देती है।

‘स्थिर चित्र’ में ‘उनकी यात्रा आत्मनेपदी से परस्मैपदी तक, रोमांटिक आवेग से धूसर नित्य तक, अन्तर्निहित इन्दधनुष के रंगों से हमारे समय के अघटित विघटन तक है’। यहाँ वास्तविकता स्वप्न से छुटकारा पाने के लिए एक नयी राह तलाशती है किन्तु वास्तविकता से भी पुनः स्वप्न में लौटने को बाध्य होना पड़ता है। शब्द-चित्र का यह शिल्पी द्वैत भाव की इस क्रियाशीलता को ‘स्थिर चित्र’ के रूप में आँकता है ताकि सहृदय पाठक सहज एवं निश्छल रूप से उसका साक्षात्कार कर सकें। अस्तु,

जगन्नाथ प्रसाद के प्रस्तुत संकलन की कविताओं में प्रवेश पाने के लिए डॉ. सीताकान्त महापात्र द्वारा लिखित ‘प्राक्कथन’ पाठक की मनोभूमि के निर्माण में पर्याप्त सहयोगी बनता है। इस सहयोग के लिए डॉ. महापात्र के हम हृदय से आभारी हैं। भावानुरूप हिन्दी रूपान्तर के लिए डॉ. राजेन्द्र मिश्र भी अभिनन्दन के पात्र हैं ।
सदा की भाँति हमारे सहयोगी डॉ. गुलाबचन्द्र जैन ने इसके मुद्रण-प्रकाशन आदि कार्य में अपने दायित्व का भलीभाँति निर्वाह किया है, उन्हें हमारा साधुवाद। पुस्तक के सुन्दर आवरण-शिल्प के लिए श्री सत्यसेवक मुखर्जी का धन्यवाद।

र.श.केलकर

प्राक्कथन


प्रत्येक कविता शब्दों को लेकर एक चित्र आँकती है। प्रत्येक शब्द अर्थ और आवेग का एक चित्र मिलन-स्थल है। अर्थ जो इतिहास, समाज, समूह और सम को लेकर गढ़ा गया होता है जबकि आवेग व्यक्तिगत है, व्यक्ति के एकांत क्षणों का गहनतम अनुभव। शब्द दोनों को मिलाता है, काल और इतिहास को अपने में समेट लेता है, आवेग के रसायन से नया रंग, नया स्वर प्रदान करता है। एक-एक शब्द गढ़ जाता है कविता का स्थापत्य, काव्य-चित्र।

जगन्नाथ प्रसाद दास उड़िया कविता में एक परिचित नाम हैं, जिनकी कविताओं में आवेगमय व्यक्ति-सर्वस्व अनुभव धीरे-धीरे सामूहिक भाग्य के साथ अधिक से अधिक जुड़ता चला जाता है। उनकी काव्य-रचना ‘प्रथम-पुरुष’ में काव्यसत्ता प्रायः आत्म-मग्न हैं; अपने अंतरंग क्षणों का, अपने चेहरे और मुखौटों का, अपनी स्नेहसिक्त हताशाओं, प्रत्यय और अनुरागों का विलंबित आत्मनेपदी है। धीरे-धीरे आत्मलीनता से मुक्त होकर रास्ता, रास्ते के लोग, कालाहाँडी, बालियापाल क़सबे में रहने वाले छायानटों को वे अपने अंदर खींच लाते हैं; ‘ऐतिह्य के देश के अथाह रंग और स्वर की प्रचुरता को, प्रचुरता को, पुरातत्व के सूत्र और कोणार्क को अपने अंदर समेटे रहते हैं।’ इन सबको लेकर शब्द की चित्र-शैली स्थिर चित्र ही आँकता है ताकि पाठक उसके रू-ब-रू हो सके निश्छल रूप से, सटीक रूप से। गतिशील चित्र का भुलावा, अदृश्य हो जाने का भाव उसमें नहीं है। यथार्थ को मानों बाध्य करके सामने ही रोक लेती है उनके चित्र-शिल्प की कला। उनकी कविता के पाठक जानते हैं कि कभी उन्होंने अपना परिचय एक प्रभावशाली चित्र-शिल्प के रूप में दिया था। वस्तुतः वे एक स्वयं संपूर्ण कलाकार हैं। कविता, कहानियाँ, नाटक, उपन्यास, शोधपरक लेख, चित्रकला उनकी सृजनशीलता की दिग्भूमि बहुमुखी है और प्रत्येक में दूसरी विधा की स्पष्ट छाया विदग्ध पाठकों को दिख जाती है। उनकी कविता में मुझे कहानी कहने की शैली दिखाई देती है, कहानी में कविता पढ़ता हूँ, कविता में चित्रकला की झलक पाता हूँ, नाटक में काव्य-विधा की सूचना मिलती है। मुझे लगता है कविता की अवश्यंभावी स्वयंसंपूर्ण और विच्छिन्नता में ये विश्वास नहीं करते। इसीलिए उनकी यात्रा आत्मनेपदी से परस्मैपदी तक, रोमांटिक आवेग से धूसर दैनंदिन तक, अन्तर्निहित इंद्रधनुष के रंगों से हमारे समय के अघटित विघटन तक है :

‘‘रंग-बिरंगे प्रेम काव्य-संग्रह के पन्नों में’’

(स्थिर चित्र)

और

‘‘परदे की ओट से छिटककर पड़ रही
सूर्य की नन्हीं किरण बता जाती है
किसी का कोई अपना रंग नहीं होता’’

(स्थिर चित्र)

यह रंगहीन सामूहिक-व्यक्तिगत आवेग का भू-चित्र ही ‘स्थिर-चित्र’ काव्य-संग्रह की आत्मा है। रंगहीन प्रात्यहिकता को कविता का एकमात्र भाग्य समझकर स्वीकार लेने के बाद, इंद्रधनुषी आवेग का क्षण-स्थायित्व उपलब्ध होने के बाद, वास्तविकता ‘स्वप्न से छुटकारा’ तलाशने का विभिन्न चरण बन जाती है। किंतु वास्तविकता से पुनः स्वप्न में लौटना पड़ता है। कौन बाध्य करता है ? क्या यह अबाध्य हृदय है...रक्त-मांस का प्राण-पुतला ? ‘स्वप्न से छुटकारा’ चाहता हुआ काव्यपुरुष फिर क्यों रूक्ष वास्तविकता से स्वप्न की ओर बढ़ता जाता है ? यही द्वैत विरोधाभासी चेतना ‘स्थिर चित्र’ संग्रह में देखी जा सकती है। ‘अंतिम अंक’ कविता में जिस तरह पृथ्वी से बचने के लिए प्रेक्षागृह में आना पड़ता है, उसी तत्परता से स्वप्न से छुटकारा पाने के लिए वास्तविकता में लौट आना ही पड़ता है।

यही है मनुष्य का भाग्य। प्रात्यहिकता, रंगहीन धूसर प्रात्यहिकता ही नियति है। प्रज्ञा और प्रत्यय से परे टिमटिमाते सांध्य-दीप का हतोत्साह भाव ही नियति है। असंतुष्ट आत्मा का अन्वेषण करते हुए प्रार्थना के अंतस्तल में लौट आना ही नियति है। यह कठोर दंड शिल्पशास्त्र की प्रामाणिकता की तरह है। उसमें आवेग कतई निर्णायक नहीं—


‘‘अब निर्वासन की घड़ी है
अपने में स्वयं आत्मकेंद्रित हो
बंद कमरे में बैठे रहने का समय है’’


(अप्रैल)


लेकिन नहीं, अब उनका काव्य-पुरुष बंद कमरे में रहने को तैयार नहीं। रास्ता पसरा होता है ‘गली के मुहाने पर निश्चिंत खेलते अभी-अभी अनाथ हुए बच्चे’ की ओर जो ‘एक आकर्षक विषाद की आर्दता’ लिये अंतस्तल की बालू को भिगो देता है। धूसर निर्जीव इतिहास में एक हरित क्रांति प्रतिश्रुति अत्यंत सजीव है। पर व्यक्तिगत आवेग का भाग्य क्या है ? ‘अबाध्य स्वप्नों को बंद कर दो टिफिन के डिब्बे में।’
इसके अलावा ‘वह आदमी’ जो इस पृथ्वी और प्रात्यहिकता की क्रूरता के साथ समझौता करने को कतई तैयार नहीं’, अंततः समझ जाता है कि निष्क्रियता एक ऐसा पाप है जिसका प्रायश्चित नहीं।

‘स्थिर चित्र’ क्रियाशील की सूचना देता है, काव्यपुरुष की तन्मयता को झकझोरकर भाग्य की प्रमाणिकता को प्रकट कर देता है, किन्तु कर्म द्वारा मुक्ति की सीढ़ी फिर भी दूर ही रह जाती है। शायद वह आदमी पृथ्वी से और खुद से खुद का पहला कठोर मुकाबला करने से पहले चुक गया होता है। यह आवेगपूर्ण असहायता और उसका अनुभव ‘स्थिर चित्र’ की दूसरी सीढ़ी है। प्रात्यहिकता का अनुभव ही हमारा भाग्य है, जो इस स्तर से असहायता की ओर खींच लेता है समूह के लिए अनकही सहानुभूतियाँ। काव्पुरुष फिर भी आस लगाये रहता है—


‘‘समय से बाजी लगाकर
अपनी गणना से
खदेड़ दो भाग्य को’’

वह भी साहस करता है :

‘‘समय से परे खड़े होंगे तो देखेंगे
किसी से किसी का विरोध नहीं
जो नित्य वर्तमान है
वही है चिरंतन भविष्य’’


(जून अनुचिंता)


‘स्थिर चित्र’ दोनों सीढ़ियाँ लाँघता उस दिशा में आगे बढ़ता जाता है जहाँ भाग्य ही प्रताड़ित है, जहाँ समस्त भू-चित्र समय से परे खड़े होते हैं, जो हैं हमारे वर्तमान चिरंतन भविष्य। ‘स्थिर चित्र’ उसी मार्मिक भूमि की ओर संकेत करता है, उसे पुकारता है।

सीताकांत महापात्र



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