अग्निगर्भ - सुभाष मुखोपाध्याय Agnigarbh - Hindi book by - Subhash Mukhopadhyay
लोगों की राय

कविता संग्रह >> अग्निगर्भ

अग्निगर्भ

सुभाष मुखोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :256
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 580
आईएसबीएन :00000

Like this Hindi book 2 पाठकों को प्रिय

161 पाठक हैं

सुभाष बाबू के समय-समय पर प्रकाशित बारह काव्य-संकलनों में से चुनी गयी साठ सशक्त कविताओं का संग्रह (बांग्ला के साथ हिन्दी काव्य रूपान्तर)

Agnigarbha a hindi book by Subhash Mukhopadhyay - अग्निगर्भ - सुभाष मुखोपाध्याय

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

अपनी लम्बी कविता-यात्रा के दौरान कवि सुभाष दा का काव्य-जीवन माँ, माटी, मानवता और संघर्ष को समर्पित रहा है। ‘पदातिक’ (1940) से लेकर ‘धर्मेर कल’ (1991) तक लिखी गयी कविताओं के सभी संकलन जो पिछले पाँच दशकों में प्रकाशित हुए हैं, इस अवधि में व्याप्त मनुष्य के शोषण और उससे उत्पन्न कवि की संघर्षपूर्ण अन्तर्बाह्य मनोदशा को रेखांकित करते हैं।

सुभाष दा की कविताओं की कसौटी आरम्भ से ही मनुष्य-केन्द्रित रही है। शोषण से अभिशप्त आदमी के जीवन को उन्होंने बहुत ही निकट से देखा है अतएव उसके भावावेश, उसकी वेदना, उसके आक्रोश और उसकी आशा-आकांक्षा का जितना सही सटीक चित्रण उनकी कविताओं में हुआ है, वह अन्यत्र कम दिखाई देता है। उनकी कविता तयशुदा राहों से नहीं गुज़रती-वह बैचेन करती है, झिंझोड़ती है, आहत करती है और अन्त में आश्वस्त भी करती है, साथ ही अपने समय, समाज और सरोकार के साथ स्वयं को संशोधित एवं समायोजित करती है। उसमें एक ओर जहाँ संघर्ष के आह्वान का चिरतरूण उत्साह है वहीं मानवीयता के मूल स्वर को सम्प्रेषित करने वाली प्रौढ़ता भी है। हिन्दी के सहृदय पाठकों को समर्पित है कवि की प्रमुख रचनाओं से चुनी हुई साठ कविताओं का संकलन-देवनागरी में मूल बांग्ला से साथ हिन्दी काव्य-रूपान्तर।

वङ्मुख

भारतीय साहित्य, संस्कृति और दर्शन के सत्त्वसार को साधारण जिज्ञासु के लिए भी बोधगम्य और हृदयंगम बनाना और लोकाहितकारी साहित्य को प्रोत्साहित एवं संप्रसारित करना ही भारतीय ज्ञानपीठ का प्रमुख उद्देश्य है। इस संकल्प को साकार बनाने का प्रयास लगभग पचास वर्ष पहले प्रारम्भ हुआ। वाग्देवी के आराधक पुण्यदम्पत्ती साहू शान्तिप्रसाद जैन और श्रीमती रमादेवी जैन की सक्रिय साधना का ही यह परिणाम है कि अनुसन्धान, प्रकाशन और पुरस्करण के क्षेत्र में आज ज्ञानपीठ कुछ स्पृहणीय और चिरस्मरणीय कार्य कर पा रहा है। इस कृतकृत्यता के पीछे उन यशस्वी कृतिकारों का कृतित्व ही बल और संबल बनकर इस संस्था का मार्ग प्रशस्त करता रहा है जिनको पुरस्कार के माध्यम से प्रणित निवेदित करने का सौभाग्य हमें मिला है और मिलता रहेगा।

सन् 1965 में ज्ञानपीठ पुरस्कार की यह प्रक्रिया प्रारम्भ हुई और अब तक बारह भारतीय भाषाओं के उनतीस साहित्यकार पुरस्कृत हुए। दो बार यह पुरस्कार दो भाषाओं को संयुक्त रूप से समर्पित हुआ और संयोग की बात है कि दोनों बार (गुजराती और उड़िया के साथ) कन्नड़ को इस सहभागिता का अवसर मिला। सन् 1991 का यह सत्ताईसवाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार आज बंग्ला के प्रख्यात पदातिक कवि श्री सुभाष मुखोपाध्याय को समर्पित किया जा रहा है। लगभग आधी शताब्दी से निरन्तर चली आ रही उनकी सारस्वत पदयात्रा में आग भी फूल बनकर खिलती है और फूल खिले या ना खिले, जिधर कवि के चरण चलते हैं वहाँ पर वसन्त मधुमास बनकर काल को ‘कल’ बना देता है। यही ‘धर्मेर कल’ आज कलकत्ता के ‘विकल’ को सकल बना रहा है। जिस कवि को कवि कहलाने की अपेक्षा आग और पत्थर के फूल चुनते हुए आम जनता के साथ चलना और चलते रहना ही ‘शुभ’ और ‘लाभ’ का संधायक है, वही पदगायक ‘पदातिक’ के पद का सच्चा अधिकारी बन सकता है और यह अधिकार सुभाष बाबू ने अपनी प्रारम्भिक रचना ‘पदातिक’ में सहज रूप से प्राप्त किया है और उस अधिकार को आज तक पूर्ण दायित्व और देयत्व की भावना से निभाते रहे। और भारतीय ज्ञानपीठ के लिए यह परम सौभाग्य की बात है कि ऐसे पद-निरपेक्ष पदातिक को प्रणति-पत्र समर्पित करने का अवसर प्राप्त हुआ है।

पुरस्कार केवल प्रणति भावना का परिचायक है। इसके साथ-साथ प्रेणता की प्रशस्त भारती को प्रसारित करना भी एक पवित्र दायित्व होता है। इस दायित्व को निभाने के लिए प्रतिवर्ष पुरस्कृत साहित्यकार के व्यक्तित्व का परिचय कराने वाली एक रचना भी प्रकाशित की जाती है और यह ज्ञानपीठ का एक विशिष्ट प्रकाशन माना जाता है। इस परम्परा में आज का यह प्रकाशन ‘अग्निगर्भ’ सहृदय पाठकों के सामने प्रस्तुत करते हुए हमें अत्यन्त हार्दिक प्रसन्नता हो रही है। सुभाष बाबू के समय-समय पर प्रकाशित बारह काव्य-संकलनों में से चुनी गयी साठ सशक्त कविताओं का यह संग्रह है। आशा है, यह प्रयास पाठक-समाज को, विशेषकर हिन्दी पाठकों को अच्छा लगेगा। यह संकलन हिन्दी में इसलिए प्रकाशित किया जा रहा है ताकि वह अन्य भारतीय भाषाओं में भी अनूदित और प्रकाशित हो सके। अब श्री मुखोपाध्याय केवल बांग्ला के नहीं हैं, समस्त भारत के हैं, बल्कि समस्त जगत् के हैं। ‘अग्निगर्भ’ इस विश्वजनीन भावना को परिचालित करने में आलोक-स्तम्भ बन सके, तो हमारा यह विनम्र प्रयास सार्थक होगा।

सुभाष बाबू की सुभाषिता को हिन्दी-भाषियों के लिए सुबोध बनाने में हिन्दी और बांग्ला के सारस्वत संधाता डॉ. रणजीत साहा ने इस संकलन के सम्पादक-अनुवादक के रूप में हमें जो सहयोग दिया है, इसके लिए हम उनके आभारी हैं। इस प्रकाशन कार्य को निष्ठा से निभाने में भारतीय ज्ञानपीठ के सचिव डॉ. र.श. केलकर और प्रकाशन अधिकारी डॉ. गुलाबचन्द्र जैन ने बड़े मनोयोग से काम किया है। प्रकाशन का प्रमुख प्रकाश उसके मुख–पृष्ठ से प्रकट होता है। इसे सुसज्जित और सुरुचिपूर्ण रूप देने में कलाकार पुष्पकणा मुखर्जी के प्रति भी हम आभार प्रकट करते हैं।
अन्त में सहृदय पाठकों से यह निवेदन करना हम अपना कर्तव्य मानते हैं कि यह वस्तु आपकी और आप ही को समर्पित है।
6 नवम्बर, 1992

पाण्डुरंग राव
निदेशक, भारतीय ज्ञानपीठ

सुभाष मुखोपाध्यायः माँ, माटी, मानवता और आग के कवि


डॉ. रणजीत साहा

कविता का संसार संस्कार या अनुभव से ही नहीं, कवि के समग्र जीवन-दान से समृद्ध और यशस्वी होता है। कविता उस अमृतबेल के समान है, जो कवि के हृदय-कोष में संचित समग्र रक्त से ऊर्जा लेकर जीवित रहती है। बांग्ला के वरिष्ठ कवि सुभाष मुखोपाध्याय पर यह बात अक्षरशः लागू होती है।
सुभाष मुखोपाध्याय का जन्म 12 फरवरी 1919 में बंगाल के नदिया नामक स्थान पर हुआ। यह कृष्णनगर ज़िले का वह कस्बा है जहाँ विश्वप्रसिद्ध मूर्तिकार माटी की मूरत में प्राण फूँक देते हैं। जीवन की माटी को और माटी के जीवन को-एक शिल्पी की तरह एक नये रूप और रंग से रचनेवाले चितेरे कवि सुभाष ने कविता की इस माटी को माँ समझा और उसी से स्वयं को रचा और अपने कवि रूप को गढ़ा।

सुभाष दा का आरम्भिक जीवन परिवार के साथ इधर-उधर भटकता रहा। वे अविभक्त बंगाल में कई-कई स्थानों पर रहे और राजशाही (अब बांग्लादेश) में भी इनका काफ़ी समय बीता। सन् 1941 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक हो जाने के बाद, वे कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इण्डिया के कार्यकर्ता और फिर एण्टी-फ़ासिस्ट राइटर्स एण्ड आर्टिस्ट एशोसिएशन के सक्रिय सदस्य हो गये। इसके पूर्व उन्होंने लेबर पार्टी में सक्रिय भागेदारी के साथ-साथ डॉक कर्कस यूनियन के आन्दोलनों के लिए काम किया था। कारा-यातना भी भुगती। ट्रेड यूनियन और अन्य श्रमिक आन्दोलनों के लिए भी कार्य किया।

इसके साथ ही, पार्टी के लिए दूर-दराज की यात्रा करते रहे। वे आल इण्डिया प्रोग्रेसिव राइटर्स यूनियन तथा विश्वभारती की कार्य समित से भी सम्बद्ध रहे लेकिन कभी कहीं नौकरी नहीं की। इस बीच ‘पदातिक’ (1940) का प्रकाशन उनके काव्य-जीवन की सबसे महत्त्वपूर्ण साहित्यिक घटना थी। स्वयं रवीन्द्रनाथ ने इस युवा कवि की प्रशंसा की और अस्वस्थ होने के कारण अपने सचिव (प्रसिद्ध कवि अमिय चक्रवर्ती) से पत्र लिखवाया। और अपने तरुण भावबोध के साथ गैर-रोमानी अनुरोध को-एक नये स्वर, तेवर और न्यास के साथ-जिस तरह से प्रस्तुत किया था, वह पाठकों के लिए सचमुच ‘नया’ था और वे कवि को अपना भावी प्रवक्ता मानने लगे। युवा प्रतिभाओं को सामने लानेवाले सहृदय कवि-समीक्षक बुद्धदेव बसु ने कवि जीवनानन्द दास के साथ मुखोपाध्याय की न केवल आरम्भित कृतियों को प्रकाशित करने में सहायता की बल्कि उनकी कविताओं पर समीक्षात्मक लेख भी लिखा। उससे काव्य-समीक्षकों और पाठकों का ध्यान सुभाष की कविताओं की ओर गया और उन्होंने प्रेम और कृति में डूबे दूसरे कवियों के मुक़ाबिले ‘पदातिक’ की कविताएँ कैसे और किन अर्थों में अलग भावभूमि पर लिखी गयी हैं और प्रचलित कविताओं से विशिष्ट और स्वागत योग्य हैं। तेईस कविताओं के इस संकलन की पहली ही कविता में बीस साल के तरुण सुभाष ने अपनी प्रेयसी को इन पंक्तियों में कुछ इस तरह सम्बोधित किया थाः


‘‘हाँ प्रिय अभी फूल के साथ खेलने की घड़ी नहीं
जबकि हम सब खड़े हैं अपनी तबाही के बिल्कुल सामने
हमारी आँखों में किसी सपने का नीला नशा नहीं
हम सेंकते हैं खाल अपनी चिलचिलाती धूप में।
चिमनी के मुँह से सुनो साइरन का शंख
हथौड़ी और निहाई गाते है गीत
तिल-तिल कर मरनेवाले अनगिनत जीवन
जीवन को करना चाह रहे हैं प्यार।’’

‘पदातिक’ में सुभाष मुखोपाध्याय की कवि-सत्ता दलीय राजनीति से ही प्रेरित रही, यह स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। उनकी कविता के आशय को राजनीतिक वक्तव्य के पर्याय के रूप में भी देखने की कोशिश की गई। आलोचकों ने यह भी आरोप लगाया कि प्रगतिशील और समाजवादी खेमे के वे कवि-जो आदर्शवाद के मान पर यथास्थिति का विरोध कर रहे थे, उनके अभिप्रायों (यथा-संघर्ष और शोषण के खिलाफ़ तीव्र मुखर विद्रोह, ज़मींदार और सरमायादारी का विरोध, गाँधीवादी विचारधारा के प्रति उदासीनता आदि) को ही बार-बार दोहरा रहे थे।
इसमें कोई संदेह नहीं कि इन आरोपों में कुछ-न-कुछ सच्चाई अवश्य है और सुभाष इसके खिलाफ़ कोई सफ़ाई नहीं देते। लेकिन उनकी कविताएँ एक निश्चित राजनीतिक पृष्ठभूमि और मुहावरे में लिखी जाकर भी व्यापक मानवीय चेतना को किसी तरह झकझोरती हैं-यही यहाँ अधिक महत्त्वपूर्ण और ज़रूरी था।

और तब किसी जुलूस या श्रमिक आन्दोलन को सम्बोधित कविता अपनी काव्य-वस्तु में प्रत्यक्षतः साधारण प्रतीत होती हुई भी अपने उद्देश्य में असाधारण या विशिष्ट प्रतीत होती है। मार्क्सवादी विचारधारा के पक्षधर और पार्टी विशेष के प्रवक्ता होने और स्थान-स्थान पर लेनिन और खुश्चेव का साभिप्राय नामोउल्लेख करने के बावजूद मनुष्य के निर्यातन और नियति के बीच में एक मजबूत सेतु के रूप में उनकी इन कविताओं को हम देख सकते हैं। कवि सुभाष अपने तई इसे बहुत छोटी-सी कोशिश मानते हैं। लेकिन उनकी यह छोटी-सी कोशिश बहुत सार्थक थी और आज जब हम उन कविताओं को तत्कालीन परिदृश्य में देखते हैं तो वे और भी महत्त्वपूर्ण और ऐतिहासिक प्रतीत होती हैं।

वस्तुतः सुभाष की कविताओं की कसौटियाँ आरम्भ से ही मानवीय और मनुष्य केन्द्रित रही हैं- साहित्यि या कविताओं में एक तरह की समसामयिकता और समाज सापेक्ष हैं इसलिए उनकी कविताओं में एक तरह की समसामायिकता और तत्कालिकता भी है और सामाजिक सोद्देश्यता भी। वे व्यक्ति के साथ-साथ कविता को भी ‘निरपेक्ष’ होने देना नहीं चाहते। लेकिन ऐसा कहते या करते हुए वे काव्य-मंच प्रतिष्ठित कवि की तरह कोई राजनीतिक फ़तवा या नारा नहीं देते-वह जो कुछ कहते हैं। इसलिए पार्टी के दिशा-निर्देश के अनुपालन के साथ-साथ आम आदमी के भावावेश, उसकी मनोदशा, उसके आक्रोश, उसकी आशा-आकांक्षा का जैसा सही, सटीक और प्रामाणिक चित्रण उनकी कविता में हुआ है-वह अन्यत्र बहुत कम दीखता है।

‘पदातिक’ की कविताओं का जैसा स्वागत हुआ और जितनी इसकी चर्चा हुई उससे कवि सुभाष सचमुच हैरान थे। बल्कि इस संकलन की लोकप्रियता से उन्हें स्वयं ईष्या होने लगी। आम पाठकों से अपने मित्रों जैसा संवाद और अपनी सीमाओं में रहकर सीमित साधनों के बावजूद कुछ कर गुजरने का संकल्प ही इन कविताओं से मुखरित हुआ। पाठकों को उनकी कविता के साथ गुज़रना एक बड़ी नदी में छोटी-सी नाव पर यात्रा करने के समान ही दिलचस्प और ज़ोख़िम भरा लगता। क्योंकि उनकी कविता तयशुदा राहों या घाटी से नहीं गुज़रती। वे बेचैन करती हैं, झिंझोणती हैं, आहत करती हैं और अंततः आश्वस्त करती हैं और अपने समय, समाज और सरोकार के साथ स्वयं को संशोधित एवं समायोजित करती हैं।

‘अग्निकोण’ (1948) के प्रकाशन से साहित्य-जगत् में उनकी चर्चा को गम्भीरता से लिया जाने लगा। इसके बाद जब ‘चिरकुट’ (1950) प्रकाशित हुआ तो सुभाष कारादण्ड भुगत रहे थे। 1951 में उनका विवाह श्रीमती गीता बंद्योपाध्याय से हुआ ‘सन्देश’ का सम्पादन भी किया। कलकत्ते से दूर चौबीस परगना में जूट श्रमिकों के साथ ढाई साल तक का काम करने के दौरान श्रमिक जीवन की अनिश्चितता और उनके अभिशप्त जीवन को ध्यान से देखा। मार्क्सवादी सिद्धान्तों के आलोक में उनकी एक छोटी-सी पुस्तक ‘भूतेर बेगार’ प्रकाशित हुई-जो श्रम, पूँजी और वेतन की परस्परता को भारतीय सन्दर्भ में बड़ी प्रामाणिकता से अंकित करती है। यह कृति श्रमिक आन्दोलन के देसी संस्करण को समझने के लिए बहुत उपयोगी है।
अपनी प्रतिबद्घता-चाहे वह पार्टी के प्रति हो या अपने समय और समाज के प्रति-सुभाष अपने पाठकों और सर्वहारा के सुख-दुख से निरन्तर जुड़े रहे। इसका विवरण उनकी यात्रा पुस्तक ‘आमार बांग्ला’ से मिल सकता है जो कि 1951 में ही प्रकाशित हुई थी। कुछ दिनों के लिए सिगनेट प्रेस से जुड़ने के दौरान सत्यजित राय ने ‘सन्देश’ पत्रिका का दोबारा प्रकाशन 1956 में इन्हीं की प्रेरणा से किया। राय की कुछ फ़िल्मों के लिए सहयोगी रूप से भी जुड़े रहे।
‘लोटस’ पत्रिका के सम्पादक मण्डल में रहे और एफ्रो-एशियन राइटर्स कान्फ्रेस के तत्त्वावधान में आयोजित देश-विदेश में विभिन्न अधिवेशनों में भाग लिया।

सुभाष मुखोपाध्याय के अग्निकोण’ (1948) काव्य-संकलन में इसी शीर्षक से लिखी गयी कविता में तत्कालीन भारत की ही नहीं, एशिया महाद्वीप की, विशेषकर दक्षिण-पूर्व एशिया की हताशापूर्ण मनोदशा का अंकन देखा जा सकता है, जिन्होंने ब्रिटिश राज्य के खिलाफ़ फाँसी के फ़न्दे पर राष्ट्रगीत गाते-गाते जान दे दी थी। तब यह सारा क्षेत्र खूनी साम्राज्य या इसके दलालों के चंगुल में फँसा था। यहाँ के लिए तमाम शोषितों, किसानों और कामगारों की बेहतरी और न्याय तथा सम्मान के लिए उनकी लेखनी बेचैन हो उठी थी। इस महाद्वीप के भूखे-प्यासे लोगों का अन्न-जल छीनने वाली ताकतों के खिलाफ़ लिखी गयी यह कविता किसी पार्टी प्रस्ताव या प्रायोजन के अन्तर्गत नहीं लिखी गयी। यह एशिया के स्खलित गौरव को फिर से पाने, सत्य के प्रति उनकी निष्ठा को दोहराने तथा इसके बहाने मानव मात्र की प्रतिष्ठा को अर्जित करने के क्रम में लिखी गयी और इसी में अपनी सार्थकता साबित करती रहीः


‘‘पेराक और पेनांग में, जस्ते की खान में
रबर के जंगलात में
मसालों की खड़ी में
इरावती के दोनों ओर सेना उपजाती घाटी में
नीलकान्त मणि के झिलमिलाते देश जावाद्वीप में
श्याम में, काम्बोज में और आनामी पहाड़ों में
नदी के ज्वार जल में-
नींद से जगे अग्निकोण के लोग।
खून की कीच में दुश्मनों को गाड़कर
और अँधेरे के सीने पर घुटने गड़ाकर
दोनों हाथों में फाड़ डालेंगे दुःशासन का वक्ष।’’


सुभाष बाबू की कविताओं में महाभारत की अन्तःकथाओं के बहुत-से बीज-संकेत मिलते हैं जिन्हें उन्होंने समय-समय पर अपनी कविताओं में अभिशप्त वर्तमान की व्याख्या के लिए प्रयुक्त किया है। महाभारत के बहुत-से पात्र और स्थितियाँ आज भी उन विडम्बनाओं के साथ उनकी कविताओं में विद्यमान हैं। न चाहते हुए भी जैसे महाभारत को पूरी मानवता पर थोपनेवाली ताकतें कभी निष्क्रिय नहीं रहतीं। और लगभग महाभारतकालीन स्थिति का सामना करते हुए सुभाष की उक्त कविता भी एक रणनीति तैयार करती है-जिसमें जन-जन का मनोबल की कवि की सबसे बड़ी ताकत है यह जमीन युद्धोचित अधिकार या आतंक से या कि उन्माद या आनन्द से प्रेरित नहीं-बल्कि करोड़ों लोगों के असन्तोष और विद्रोह को एक सकारात्मक पथ और प्रस्थान दिखाने के लिए तैयार की गई थी। यह कविता कवि को ही नहीं, उसके संकल्प में साक्षी की तरह उपस्थित हर व्यक्ति को आश्वस्त करती हैः


‘‘खून की कीमत चुराकर खून का क़र्ज़ मिटाने के दिन, हाँ भाई, आ गया है वह दिन
विदेशी राज्य के प्राण-कीट को
अपने नाखूनों से मसलकर मार डालने का दिन
हल की नोक से खर-पतवार उखाड़ फेंकने का दिन
हँसिये की धार पर नयी फ़सल काट लाने का दिन।’’


इस सदी के सातवें दशक में जब नक्सलवादी आन्दोलन ने अपना खूनी रंग दिखाना शुरु कर दिया और बंगाल एवं तराई क्षेत्र के हज़ारों युवक इस दिशाहीन आन्दोलन में मरने-खपने लगे तो स्वाभाविक ही था कि सुभाष दा पीढ़ियों और पार्टियों के टकराव और भटकाव को कोई दिशा देते। इस दौरान लिखी गयी उनकी कविताओं का संकलन ‘गेछे बने’ (1972) प्रकाशित हुआ-जिसमें एक अग्रज कवि के नाते उन्होंने अपने पथहारा भाइयों के प्रति उन्हें सतर्क भी किया।
लेकिन बात जब कविता या साहित्य की होती है तो सुभाष दा सिर्फ़ कवि होते हैं। एक साधारण ग्रहस्त कवि।

वे बुद्धजीवी या तर्कजीवी नहीं हैं। कविता को नंपुसक नारों या किताबी फ़तवों की हद तक ले जाने की न तो उन्होंने कभी कोशिश की और न कभी इस तरह के आयोजनों में सम्मिलित हुए। उनकी हिस्सेदारी कविता लिखने और जीने की इस शर्त के साथ जुड़ी हुई है कि कविता–जीवन का अनुषंग नहीं, बल्कि जीवन कविता का अनिवार्य अंग बने। इसलिए सुभाष अपने स्वर में ही नहीं, स्वरूप और स्वभाव में भी, कविता के मूर्तिमान पर्याय हैं। उन्होंने कविता को कभी जटिल या आसमानी नहीं बताया और न बनाया। यही कारण है कि वे पुस्तकालय या विश्वविद्यालय के नहीं-अपने लाखों चहेते पाठक के कवि हैं- जनसाधारण के असाधारण कवि-‘सुभाष दा’। उनकी प्रमुख काव्य-कृतियों में ‘पदातिक’ (1940), ‘चिरकुट’ (1950), ‘एइ’ भाई’ (1971), ‘छेने गेले बने’ (1972), ‘फुल फुटुक ना फुटुक’ (1961), ‘काल मधुमास’ (1969), ‘एकटु पा चालिये भाई’ (1979) ‘जल सइते’ (1981), ‘चईचई-चर्रचई’ (1983), ‘जा रे कागजेर नौको’ (1989) और ‘धर्मेर कल’ (1991) प्रमुख हैं।

उनकी चुनी हुई कविताओं के संकलन भी बांग्ला में ही नहीं, भारतीय साहित्य में भी, महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इसके अलावा 1963 में प्रकाशित ‘जत दुरेई जाय’ काव्य-संकलन के लिए उन्हें 1964 का साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ जो बांग्ला का श्रेष्ठ कृति के नाते पुरस्कृत की गयी थी। इस संकलन में उनकी 1959 से 1960 तक की कुल 28 छोटी-बड़ी कविताएँ संकलित हैं। कवि ने अपनी शीर्षक कविता में यही स्वीकार किया है कि मैं चाहे जितनी दूर भी क्यों न चला जाऊँ-मेरे साथ लहरों की माला गुँथी एक नदी का नाम हमेशा चलता रहता है। कवि ने यहाँ किसी नदी का नामोल्लेख नहीं किया है और संकेत में बता भी दिया है। अपने मानवीय अनुरोध और प्रौढ़ भावबोध नहीं किया है और संकेत में बता भी दिया है। अपने मानवीय अनुरोध और प्रौढ़ भावबोध के लिए इस संकलन की कुछ कविताएँ बांग्ला साहित्य में एक नये प्रस्ताव और संकल्प को रेखांकित करनेवाली थीं। ‘कौन जाग रहा है’ शीर्षक कविता में कवि ने अपनी पीढ़ी का नेतृत्व इन शब्दों में किया था-

‘‘अभी इसी क्षण
खून की एक-एक बूँद में सुन पड़ेगी
महाकाल की घनगरज हाँकः कौन जाग रहा है ?
बड़े जतन से जुगाये
इस देह की धूल झाड़ते-झाड़ते
गर्व से कहेंगेः ‘हम’।’


सुभाष दा ने बंगाल में अन्य प्रतिष्ठित कवियों या समकालीन कवियों की देखादेखी कभी किसी प्रिय पद्धति का अनुसरण नहीं किया। हाँ, अपने छोटे-छोटे छन्दों में अनुप्रास की योजना को अवश्य ही विनियोजित किया है ताकि पाठक उन्हें अपनी परिचित छन्द-परम्परा में स्वीकार कर सकें। विचारों की तीव्रता के साथ लय की सुकरता और छन्द की अन्विति सुभाष दा की रचनाओं को अतिरिक्त स्वीकृति प्रदान करती है जो कि बांग्ला के दूसरे कवियों में अनुपस्थित है।


अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book