स्वेच्छा - ओल्गा Swechchha - Hindi book by - Olga
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स्वेच्छा

ओल्गा

प्रकाशक : नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :138
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5798
आईएसबीएन :81-237-4114-6

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स्त्रीवादी साहित्य की श्रृंखला में एक उपन्यास। तेलुगु से हिन्दी में अनूदित।

Swechchha

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

भूमिका

हमारे देश से लगभग आठ करोड़ लोग तेलुगु भाषा बोलते हैं। पिछले एक हजार सालों से इस भाषा में साहित्य की रचना होती आ रही है। परंतु उपलब्ध रचनाएं केवल 11वीं शती से ही देखने में आती हैं। साहित्य का अध्ययन करनेवाले तेलुगु साहित्य को काल के अनुसार छह भागों में विभाजित करते हैं। नन्नया से पूर्व (100-1020 ई.), पुराणकाल (1020-1400 ई.), श्रीनाथ कवि का काल (1400-1510 ई.), प्रबंध काल (1510-1600), दक्षिण साहित्य काल (1600-1820 ई.) तथा आधुनिक काल (1820 ई. से....)

तेलुगु साहित्य का उपलब्ध पहला ग्रंथ ‘आंध्र महाभारतमु’ माना जाता है। कवि नन्नया ने ग्यारहवीं सदी में आदिपर्व, सभापर्व तथा आरण्यपर्व का कुछ भाग लिखा था। उसके बाद तेरहवीं शदी में तिक्कना ने पन्द्रह पर्वों की रचना की थी। चौदहवीं सदी में एर्राप्रेगडा ने आरण्यपर्व का शेष भाग पूरा किया था। इस तरह तेलुगु में संपूर्ण महाभारत ग्रंथ की रचना संपन्न हुई। इन तीनों कवियों को तेलुगु साहित्य में ‘कवित्रयं’ कहा जाता है।

उस समय धर्म का प्राधान्य था। उस काल के कवियों ने शैव, वीर शैव और वैष्णव धर्मों से संबंधित काव्यों की रचना की थी। संस्कृति के सभी प्रमुख काव्यों का तेलुगु भाषा में अनुवाद किया गया था। परंतु अनुवाद-मात्र नहीं थे। उनमें सृजनात्मकता थी। साहित्यिक मापदडों से निबद्ध होकर उन कवियों ने संस्कृति काव्यों को तेलुगु भाषा में एक नया रूप प्रदान किया।

पुराणकाल के बाद प्रबंध काव्यों का युग आया। इस युग में अष्टदश वर्णनों की सहायता से नवरसों और छत्तीस अलंकारों से युक्त प्रबंधों की रचना की गई थी। श्रीनाथ कवि का ‘श्रृंगार नैषधमु’, कवि पोतना का ‘श्रीमदांध्र भागवतमु’ काफी लोकप्रिय हुए। सोलहवीं शताब्दी में, विजयनगर के राजाओं के दरबार में, मुख्यतः श्रीकृष्णदेवरायलु के राजास्थान में ‘अष्ट दिग्गजालु’ नाम से विख्यात कवियों ने अनेक काव्यों की रचना की। इन सब काव्यों की विषयवस्तु पौराणिक गाथाओं पर ही आधारित थी। कृष्णदेवरायलु ने स्वयं ‘आमुक्त माल्यदा’ नामक काव्य की रचना की थी। उस काल के महान् काव्यों में उसे गिना जाता है। सत्रहवीं सदी में कवि वेमना जनता के बीच में रहते हुए सरल भाषा में तत्कालीन समाज को अपनी कविताओं में प्रतिफलित करते रहे, नीति संबंधी कविता की रचना भी उन्होंने की।

सत्रहवीं और अठारहवीं सदी में मदुरै तथा तंजाऊर में साहित्य को-राजा-महाराजाओं का आश्रय प्राप्त हुआ। अनेक राजाओं ने भी स्वयं काव्य-रचना की इस काल में स्त्रियां भी रचना करने लगीं। इससे पहले पंद्रहवीं सदी में ही ताल्लपाक* तिम्मक्का नामक स्त्री ने ‘सुभद्रार्जुनीय’ काव्य की रचना की थी। उनके पति ताल्लपाक अन्नमाचार्य बहुत बड़े भक्ति कवि थे। सोलहवीं सदी में गद्य मिश्रित ‘चंपू’ शैली में कवयित्री आटुकूरि मोल्ल ने रामायण को संक्षिप्त रूप में लिखा था। इनके पिता कुम्हार थे इसलिए इन्हें ‘कुम्मरि मोल्ल’ भी कहा जाता है।

मदुरै और तंजाऊर के राजाओं के राज्य काल में रचनाएं केवल गद्य में ही लिखी जाने लगीं थीं। कालुव वीरराजू ने महाभारत की रचना गद्य में की। अठारहवीं सदीं में ही पाश्चात्य पंडितों ने भारतीय साहित्य के प्रति रुचि दिखाई। विलियम ब्राउन तथा चार्ल्स फिलिप ब्राउन जैसे अंग्रेज विद्वानों ने तेलुगु भाषा तथा साहित्य की बड़ी सेवा की। अनेक शोध-कार्य तथा अध्ययन करके अमूल्य साहित्यक कृतियों को विलुप्त होने से इन दोनों ने बचाया। पहली बार तेलुगु शब्द-कोष प्रकाशित किया गया। वेमना की कविताओं का अंग्रेजी में अनुवाद किया गया। परंतु कुछ स्थानीय पंडित इन अंग्रेजों के काम से प्रसन्न नहीं हुए।

उन्नीसवीं सदी से तेलुगु साहित्य का आधुनिक युग आरंभ होता है। इस युग के युगकर्ता, कंदुकूरि वीरेशलिंम् माना जाता है। इन्होंने पाश्चात्य उपन्यास शैली का अनुकरण करते हुए तेलुगु में सबसे पहला उपन्यास ‘राजशेखर चरित्रमु’ (1880) लिखा। कंदुकूरि वीरेशलिंगम् समाज-सुधारक थे। अतः उन्होंने अपनी रचनाओं और पत्रिकाओं में उसी को प्राथमिकता दी थी। ‘तेलुगु’ कवुलु’ (तेलगु के कवि) नामक ग्रंथ में पहली बार तेलुगु साहित्य का इतिहास लिखने का श्रेय भी इन्हीं को जाता है। ‘स्वीय चरित्रमु’ के नाम से तेलुगु में आत्मकथा लिखने की प्रथा का भी इन्होंने श्रीगणेश किया। गिडुगु राममूर्ति ने व्यावहारिक भाषा का प्रयोग करके रचनाओं को सामान्य पाठक तक पहुँचाया। इससे साहित्य में एक क्रांति-सी आ गई। इस परिवर्तन से बहुत लोग खुश नहीं थे। पर शुरूआत तो हो गई थी। लोगों की स्वीकृति मिल गई। वीरेशलिंगम् के काल (1847-1919) में कविता को काफी बढ़ावा मिला। अष्टवधान, शतावधान जैसी प्रक्रियाएं काफी लोकप्रिय हुईं। दिवाकर्ल तिरुपति शास्त्री, चेल्लपिल्ल वेंकटशास्त्री ‘तिरुपति वेंकटकवि’ नाम से प्रसिद्ध हुए। ‘देवी भागवतं’, ‘बुद्धचरित्रा’ इनके प्रमुख काव्य हैं।

बींसवी सदी में रूप, शैली तथा विषयवस्तु के क्षेत्र में साहित्य ने नई दिशा पकड़ी। परंपरागत काव्य शैली छोड़कर कविगण छोटी और सरल कविताएं लिखने लगे। पश्चात्य साहित्य के प्रभाव ने भाषा और भाव में काफी परिवर्तन ला दिए। गुरजाड अप्पाराव तथा रायप्रोलु सुब्बाराव ने कविता को नई शैली प्रदान की और अनेक कवियों पर इनकी शैली का प्रभाव पड़ा। गुरजाड अप्पाराव रचित ‘कन्याशुल्कम्’ नाटक एक अद्वितीय कृति है। समाज पर टिप्पणी करनेवाला यह नाटक आज भी, चरित्र-चित्रण और विषयवस्तु की दृष्टि से, उतना ही प्रभावशाली है जितना उस समय था।

इसी काल में कविता की एक और शाखा, ‘भाव कविता’ का आविर्भाव हुआ। इसके अंतर्गत देशभक्ति, नीति, प्रकृति के प्रति प्रेम आदि विषयों पर कविताएं लिखी जाने लगीं। परंपरागत छंदों को छोड़कर कवि छंदों का प्रयोग करने लगे। गुरजाड अप्पाराव, नंडूरि सुब्बाराव, बसवराजु अप्पाराव, अडिवि बापिराजु, देवुलपल्लि कृष्णशास्त्री आदि की कविताओं ने पाठकों को सम्मोहित कर दिया था।

बीसवीं सदी के दूसरे-तीसरे दशक में कविता ने फिर नया मोड़ लिया। पाश्चात्य साहित्य की प्रक्रियाओं का अनुकरण करते हुए, वास्तविकता, अधिवास्तविकता की पद्धति के अंतर्गत कविताएं लिखी जाने लगीं। कुछ कवि उस समय के सोवियत यूनियन से स्फूर्ति प्राप्त कर कविताएं लिखते रहे। ‘अभ्युदय कविता’ का प्रादुर्भाव हुआ। इसमें कई कवियों ने योगदान दिया। इनमें प्रमुख थे श्रीनिवासराव (श्री श्री)।

बीसवीं सदी के इन परिवर्तनों के बावजूद एक साहित्यकार ऐसे थे जो परंपरागत, विचारधारा, आचरण, भाषा-शैली तथा आचार व्यवहार के समर्थक रहे। सांप्रदायिक कवियों की बराबरी करनेवाले इस कवि का नाम विश्वनाथ सत्यनारायण हैं। साहित्य का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है, जिसे इन्होंने छुआ न हो, सभी प्रक्रियाओं में समान स्तर से विद्वत्ता दिखानेवाले इस कवि की सर्वोत्तम कृति, ‘रामायण कल्पवृक्षं’ मानी जाती है। भारत का सर्वश्रेष्ठ साहित्यिक पुरस्कार ज्ञानपीठ पुरस्कार सन् 1970 में इस कृति को प्रदान किया गया। इनका एक और उपन्यास, ‘वेयि पडगलु’ विषयवस्तु और रूपकल्पना के आधार पर ‘क्लासिक’ माना जाता है। तेलुगु साहित्य में यह कृति चिरस्थायी मानी जाती है। पूर्व प्रधान मंत्री श्री.पी.वी नरसिंह राव ने इस उपन्यास का हिन्दी में अनुवाद किया था। (हिन्दी में इसका नाम है,‘सहस्र फण’)।

बीसवीं सदी के छठे और सातवें दशकों में साहित्य के क्षेत्र में कुछ नए परिवर्तन हुए। अभ्युदयवादी, क्रांतिकारी कवि तथा रचनाकार काफी नाम पा चुके थे। एक नई धारा शुरू हुई जो समाज में प्रचलित गंदगी का यथार्थवादी चित्रण करके अपना क्रोध, आवेग तथा जुगुसा को प्रकट करना चाहती थी। इनकी भाषा भी विषय और भाव के अनुकूल परिवर्तित की गई। इन कवियों को ‘दिगंबर कवि’ तथा इनकी कविता को ‘दिगंम्बर कविता’ का नाम दिया गया था। इन कवियों की कविताओं ने लोगों में हलचल मचा दी और उन्हें झकझोरकर रख दिया।

कविता के क्षेत्र में जितनी प्रक्रियाएं परिवर्तन, भाव-प्रयोग आए थे उतने उतने उपन्यास या कहानी के क्षेत्र में नहीं आए। पर उनमें भी विषयवस्तु तथा शिल्प की दृष्टि से काफी परिवर्तन हुए। पात्रों के चित्रण में मनोविज्ञान तथा भवनाओं के विश्लेषण को विशेष स्थान दिया जाने लगा। कोडवटिगंटि कुटुंबरराव, बुच्चिबाबू, गोपीचंद्र, जी.वी. कृष्णाराव, राजकोंड विश्वनाथ शास्त्री जैसे लेखक भाषा, भाव-प्रकटन, पात्र-चित्रण आदि क्षेत्रों में, नए प्रयोग करने लगे। अपनी भावाभिव्यक्ति से उपन्यास में चार-चांद लगाने लगे।

इन सब से भिन्न थे गुडिपाटि वेंकटचलम्। उन्होंने समाज में स्त्रियों के स्तर के बारे में, उनके प्रति किए जानेवाले अन्याय के बारे में मौलिक विचार प्रकट किए। प्यार और विवाह में स्त्री को स्वेच्छा मिलने की आवश्यकता के प्रति सजगता प्रकट की। इनके विलक्षण उपन्यास तथा उपन्यास में चित्रित पात्रों ने खलबली मचा दी। व्यक्ति और परिवार से संबंधित इन समस्याओं पर खुलेआम बहस करने के लिए उन दिनों का समाज तैयार नहीं था। कुछ लोगों ने चलम् की रचनाओं को ‘अश्लील’ भी कहा।

इन्हीं दिनों उपन्यास के साथ-साथ कहानी भी उन्नत होने लगी। अंतर्भाषा साहित्य में पहचान पाने लगी। अनेक उपन्यासकारों ने नई दृष्टि से, नई पद्धति में कहानियों की रचना, सामाजिक-प्रयोजन के लिए की।

बीसवीं सदी के छठे और सातवें दशकों में स्त्रियों की रचनाएं काफी मात्रा में प्रकाशित होने लगीं। स्त्रियां उन्नत विद्या प्राप्त करने लगीं, प्रकाशन का क्षेत्र भी विकसित हुआ और दैनिक तथा अन्य पत्र-पत्रिकाओं में उपन्यासों तथा कहानियों का खूब प्रकाशन हुआ। पढ़ी-लिखी स्त्रियां भी साहित्य-रचना में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने लगीं। विशेषकर उपन्यास के क्षेत्र में ये पुरुषों से आगे निकल गईं। स्त्री-सुलभ कोमल भावों से युक्त स्त्री की दृष्टि को दर्शानेवाली रचनाएं की जाने लगीं। इन कहानियों की कथावस्तु प्रायः पारिवारिक ही रही। अपने इर्द-गिर्द की दुनिया से संबंधित विषयों पर ही उन्होंने लिखा। प्रेम-संबंध, विवाह-संबंध, दहेज-प्रथा, घर के बाहर जाकर स्त्रियों का काम करना आदि विषयों पर उन्होंने लिखा। इन समस्याओं को स्त्रियों के नजरिए से देखा गया। नई विचारधारा से युक्त इन रचनाओं में आधुनिक जीवन में स्त्रियों की समस्याओं को प्रतिबिंबित किया जाने लगा।

केवल लोकप्रियता प्राप्त करने के उद्देश्य से, मन-बहलाव और व्यापार की दृष्टि से श्रृंगार, अपराध, अंध-विश्वास, भूत-प्रेम आदि को केंद्र बनाकर कहानियां लिखी गईं और काफी मात्रा में प्रकाशित भी हुईं। पर साहित्यिक दृष्टि से ऐसी रचानाओं का विश्लेषण कोई नहीं करता।

आधुनिक तेलुगु साहित्य की धारा में ‘वादों’ का प्रभाव एक तरह सदा से रहा है। कभी-कभी वाद साहित्य पर हावी भी हो गए। बीसवीं सदी के अंतिम दो दशकों में स्त्रीवाद और दलित वाद का प्राबल्य रहा है। इन वादों से प्रभावित होकर लिखनेवाले परिवर्तनों के कारण ही ऐसे साहित्य की दृष्टि होने लगी। समस्याओं को अच्छी तरह समझकर, उन पर चर्चा कर लोगों के सामने पेश किया जाने लगा। इन समस्याओं के खिलाफ आवाज उठाकर, सच्चाई का सहारा लेकर समाज से न्याय मांगना, न्याय न मिलने पर विद्रोह की आवाज उठाना इन रचनाओं का मुख्य प्रतिपाद्य रहा।

अपने लक्ष्य की सिद्धि के लिए ये रचनाकार न केवल समकालीन समाज से संघर्ष करते हैं, बल्कि पीछे मुड़कर इतिहास पुराण प्राचीन गाथाओं आदि को पुरातत्त्व शास्त्र के अध्ययन करनेवालों से भी अधिक गंभीरता से परखकर अपने वादों की पुष्टि करते नजर आते हैं। वर्गों का स्वरूप तो बदल गया, पर संघर्ष ज्यों का त्यों बना रहा। अल्लं राजय्या, रघोत्तमरेड्डी, कालुव मल्लय्या, कत्ति पह्माराव, एंड्लूरि सुधारक जैसे अनेक दलित-साहित्य के सारथी बने हुए हैं।

इसी प्रकार स्त्रीवाद को लेकर लिखनेवाली लेखिकाओं में ओल्गा, पी. सत्यवती, जयप्रभा, कोंडेपुडि निर्मल, वसंता कन्नाबिरान जैसी स्त्रियां बड़ी सच्ची लगन से कविताओं, कहानियों तथा उपन्यासों की रचना कर रही हैं। यहीं नहीं, स्त्रीवाद के समर्थन में लेख, भाषण तथा बहस प्रस्तुत कर लोगों की विचारधारा को बदलकर समर्थन पाने की कोशिश भी कर रही हैं। पुरुषों के इस समाज में स्त्री को तभी आदर मिल सकता है। जब वह उनके निर्देशानुसार चले। यह बात कहां तक उचित है- यही सवाल ये लेखिकाएं उठा रही हैं। नर्म-नर्म बातों से, कल्पनाओं से तथा सपने दिखाकर स्त्रियों को बांधकर रखने का जो षडयन्त्र किया जा रहा है उनका ये खुलासा करती हैं। स्त्रीवादी साहित्य का विश्लेषण करनेवालों में कात्यायनी तथा ओल्गा के नाम प्रसिद्ध हैं। पर मार्क्सवाद को अच्छी तरह समझकर स्त्रियों की आर्थिक समस्याओं तथा शोषण का चित्रण करते हुए रंगनायकम्मा नामक लेखिका ने सन् 1978 में ‘जानकी विमुक्त’ की रचना की थी। साहित्य में स्त्रीवाद का श्रीगणेश इसी रचना से हुआ था।


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