बादलों से सलाम लेता हूँ - गोपालदास नीरज Badalon Se Salaam Leta Hoon - Hindi book by - Gopaldas Neeraj
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बादलों से सलाम लेता हूँ

गोपालदास नीरज

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :175
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5488
आईएसबीएन :81-288-0847-8

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आत्मा के सौन्दर्य का शब्द रूप है काव्य, प्रस्तुत है गोपालदास नीरज की प्रिय रचनाएँ...

Badalon Se Salam Leta Hoon a hindi book by Gopaldas Neeraj - बादलों से सलाम लेता हूँ - गोपालदास नीरज

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

हिन्दी गीति-काव्य का पर्याय बन चुके कवि नीरज बीसवीं शताब्दी के सर्वाधिक लोकप्रिय और सम्मानित काव्य व्यक्तित्व हैं। अनेक प्रतिष्ठित प्रकाशन समूहों द्वारा कराये गये सर्वेक्षणों के तथ्य इस बात को प्रमाणित करते हैं।
भक्तिकालीन कवियों के बाद जन-भाषा में मानवीय संवेदनाओं को ऐसी अभिव्यक्ति देनेवाला और जनसाधारण में इतना समादूत और स्वीकृत कोई अन्य कवि दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता। निश्चित रूप से वे हिंदी जगत में एक जीवित किंवदन्ती या कहें कि ‘लिविंग लीजेण्ड’ बन चुके हैं।
प्रस्तुत काव्य-संग्रह ‘बादलों से सलाम लेता हूँ’ में जहाँ उनकी कुछ कालजयी रचनाएँ सम्मिलित हैं, वहीं हाल ही में उनके द्वारा रचित गीत, गजलें, मुक्तक, दोहे, हाइकु, आदि काव्य की विभिन्न विद्याओं की श्रेष्ठ और सशक्त रचनाओं को भी उन्होंने इस संग्रह में शामिल किया है। इस दृष्टि से उनके समग्र काव्य के विभिन्न आयामों से परिचित कराने वाली यह एक अपूर्व और संग्रहणीय कृति है।

प्राक्कथन


मेरे कुछ मित्रों का आग्रह है कि मैं अपनी कविता के सम्बन्ध में कुछ कहूँ लेकिन मैं समझता हूँ कि ये काम खतरे से खाली नहीं है, क्योंकि अपनी निन्दा तो कोई अपने मुख से कर नहीं सकता और यदि अपनी प्रशंसा करता है तो लोग उसे स्वीकार नहीं करेंगे। अतः मैं सीधे गीत और कविता से बात शुरू करता हूँ।
मेरे विचार से कविता की और विशेष रूप से गीत की व्याख्या नहीं हो सकती। वो क्षण जो कण्ठ को स्वर, अधरों को वाणी दे जाता है, वो कुछ ऐसा अचिन्त्य, अनुपम और अनमोल है कि पकड़ में ही नहीं आता। उसे पकड़ने के लिए तो स्वयं खोजाना पड़ता है और जहाँ खोकर कर पाना है वहाँ व्याख्या कैसे की जाए।

जब लिखने के लिए लिखा जाता है, तब जो कुछ लिखा जाता है, उसका नाम है गद्य। जब लिखे बिना न रहा जाए और जो खुद लिख-लिख जाए उसका नाम है कविता। मैंने गीत, कविताएँ लिखी नहीं, कहीं हैं। वे मेरे हृदय से ऐसे फूट पड़ी हैं, जैसे पहाड़ से झरने फूट पड़ते हैं।

जीवन जहाँ तक एक वहाँ तक वो काव्य है। जहाँ एक न होकर वो अनेक है, वहाँ विज्ञान है। अनेकत्व से एकत्व की ओर जाना कविता करना है और एकत्व से अनेकत्व की ओर जाना तर्क करना है। व्याख्या तर्क ही है।
तर्क का अर्थ है काटना-टुकड़े करना। किन्तु कविता काटती नहीं, तोड़ती नहीं, जोड़ती है। अभेद में भेद के ज्ञान की शर्त है तर्क भेद में अभेद की सृष्टि का भाव है काव्य। तर्क द्वारा जो सत्य प्राप्त होता है, वो सत्य तो हो सकता है, वो आनन्द तो कभी भी नहीं बन सकता। किन्तु काव्य में सौंदर्य के बिना सत्य की गति नहीं इसलिए साहित्य के क्षेत्र में जब हम सत्य शब्द का प्रयोग करते हैं, तब उसका योग शिवम् और सुन्दरम् से अवश्य करा देते हैं। हमें अकेले सत्य अभीष्ट नहीं, सत्य का गुण भी हमारा अभीष्ट है, इसलिए हम कहते हैं, सत्यम् शिवम् सुन्दरम्।

काव्य की व्याख्या तो नहीं हो सकती, पर हाँ जिस प्रकार कुसुम के सुवास की व्याख्या न होकर उसकी पंखुरियों के रूप-रंग के विषय में कुछ बताया जा सकता है, उसी प्रकार काव्य के भाव की मीमांसा सम्भव न होकर भी उसके साधनों और उसके कारणों के विषय में कुछ संकेत दिये जा सकते हैं।
मैं जन्म, मृत्यु, सौंदर्य प्रेम और भूख को ही जीवन का शाश्वत सत्य मानता हूँ। भूख पेट की भी होती है और हृदय की भी होती है। पेट की भूख जब आदमी सहन नहीं कर पाता है, तो वह क्रान्तिकारी और विद्रोही बन जाता है और जब हृदय की भूख मनुष्य को पीड़ित करती है तो वो मनुष्य को कवि, प्रेमी या दार्शनिक बना देती है। मैंने इन दोनों प्रकार की भूखों का खूब अनुभव किया है, इसलिए मेरा एक रूप विद्रोही का भी है और दूसरा रूप कवि और दार्शनिक का भी है। मेरे पाठक जब मेरी रचनाओं से गुजरेंगे तब उन्हें इनका एहसास भली प्रकार हो सकेगा।

सौंदर्य


सौंदर्य का अर्थ मेरी दृष्टि में सन्तुलन (Harmony), क्रम (Order), आकर्षण (Gravitation or Attraction), स्थिति कारण (Force of existence), और सब मिलाकर चिति शक्ति है। उदाहरण के रूप में मान लीजिये, आपके सम्मुख चार व्यक्ति खड़े हैं। आप उन चार व्यक्तियों में से केवल एक को सुन्दर बतलाते हैं और शेष तीनों को नहीं। अब प्रश्न उठता है कि आपके पास वो कौन सा पैमाना है, जिससे नाप जोख करके आपने चार व्यक्तियों में से केवल एक को ही सुन्दर ठहराया आप कहते हैं-पहले व्यक्ति की न तो मुखाकृति ही सुन्दर है और न उसका शरीर ही सुडौल है, फिर उसे सुन्दर कैसे कह सकते हैं ? दूसरे व्यक्ति को आप यह कहकर असुन्दर ठहरा देते हैं कि उसकी मुखाकृति (नाक, कान, आँख होंठ आदि) तो सुन्दर हैं, पर उसका शरीर सुडौल नहीं। तीसरे व्यक्ति के लिए आप कहते हैं-उसका शरीर तो सुडौल है, पर उसकी मुखाकृति असुन्दर है-इसलिए उसे भी सुन्दर नहीं कहा जा सकता।

चौथा व्यक्ति जिसे आपने सुन्दर बतलाया है, आप कहते हैं कि नख से शिख तक का उसका प्रत्येक शरीरावयव निर्दोष है। उसके सम्पूर्ण अंगों में एक समुचित अनुपात (Proportion), है। न उसकी नाक मोटी है न आँख छोटी। न उसके हाथ मोटे हैं न पाँव पतले अर्थात् उसका सम्पूर्ण शरीर सन्तुलित है और इसलिए वह सुन्दर है। इसी दृष्टि से यदि आप अपनी ओर भी दृष्टिपात करें, तो आपको पता चलेगा कि स्वयं आपके शरीर में भी पंचतत्त्वों का एक (Prpportion) है, जिसके कारण आपकी स्थिति है यानी आप जीवित हैं। जिस दिन यह अनुपात क्षीण हो जाता है, उसी दिन मृत्यु हो जाती है। उर्दू के महाकवि चकबस्त ने इसी सत्य को इसप्रकार कहा है:


ज़िंदगी क्या है अनासिर में ज़हूरे तरतीब,
मौत क्या है इन्हीं अजज़ा का परीशाँ होना


जहाँ सन्तुलन है, अनुपात है वहाँ क्रम (Order) है। यूँ कहें तो अधिक उपयुक्त होगा कि क्रम ही सन्तुलन है-(Order is proportion) सृष्टि में भी एक क्रम है। प्रत्येक गतिशील वस्तु में एक क्रम होता है। चलती हुई रेलगाड़ी में भी एक लय होती है। सम्पूर्ण विश्व ही एक लय है। हज़ारों लाखों वर्ष हो गये, सूरज सदा से सुबह ही निकला और चन्द्रमा रात को ही उदय होता है। न तो किसी ने (केवल कवि को छोड़कर) रात में सूरज देखा और किसी ने दिन में चाँद-शताब्दियों की माँग का सिन्दूर झर गया, पर सृष्टि के इस क्रम में रंचमात्र भी अन्तर नहीं आया और इस सृष्टि के सम्राट विष्णु की ओर जरा देखिये। इस संसार के पालन का भार उसे मिला है, पर वह आदिकाल से कमल के पत्ते पर शेष की शय्या बनाये हुए क्षीरसागर में शयन कर रहा है। आश्चर्य की बात है कि वह राजा जिस पर इतने विशाल साम्राज्य के पालन और संरक्षण का भार है इस प्रकार निश्चेष्ट होकर लेटा है। पर इसमें अचरज की बात कुछ भी नहीं। जिसके राज्य में सब कुछ अपने आम क्रम से संचालित होता रहता है, उस राज्य के राजा को दौड़ धूप की क्या आवश्वकता-वह तो ऐसे निश्चिन्त होकर सोता है जैसे क्षीरसागर में विष्णु। तो इस सृष्टि में एक क्रम है, सन्तुलन है, जिसका नाम है सौंदर्य और जो सम्पूर्ण विश्व की स्थिति का कारण है।

दूसरी तरह से सोचिये। सुन्दर वस्तु की ओर आप देखते हैं तो वह आपको अपनी ओर आकर्षित करती है। आकर्षण चेतन का गुण है यानी जहाँ सौंदर्य है वहाँ चेतना है, जीवन है। तो सौंदर्य एक चेतन आकर्षण शक्ति है। वैज्ञानिक दृष्टि से देखिये तो पता चलेगा कि सम्पूर्ण विश्व की स्थिति का कारण भी आकर्षण है। ये धरती, आकाश, सूरज, चाँद सितारे, ग्रह, उपग्रह सब एक आकर्षण डोर में बँधे घूम रहे हैं-


एक ही कील पर घूमती है धरा,
एक ही डोर से बस बँधा है गगन,
एक ही साँस में ज़िंदगी कैद है,
एक ही तार से बुन गया है कफ़न।


आकर्षण में जिस दिन विकर्षण होता है, उसी दिन प्रलय हो जाती है। अर्थात् आकर्षण (सौंदर्य) ही स्थिति है।
हाँ, तो मैं सौंदर्य को सृष्टि की स्थिति का कारण चित शक्ति मानता हूँ। जिस दिन सौंदर्य इस मिट्टी को स्पर्श करता है उसी दिन चेतना (प्राण अथवा ताप) का जन्म होता है। यह एक विज्ञान सम्मत सत्य है कि दो वस्तुओं के स्पर्श या संघर्ष से ताप (Heat) की उत्पत्ति होती है। मेरी गीतों में कई स्थानों पर इसकी प्रतिध्वनि मिलेगी, जैसे इन पंक्तियों में-


एक ऐसी हँसी हँस पड़ी धूप यह
लाश इन्सान की मुस्काने लगी
तान ऐसी किसी ने कहीं छेड़ दी
आँख रोती हुई गीत गाने लगी।


अथवा


एक नाजुक किरन छू गई इस तरह
खुद बखुद प्राण का दीप जलने लगा
एक आवाज़ आई किसी ओर से
हर मुसाफ़िर बिना पाँव चलने लगा।


अथवा


कहाँ दीप है जो किसी उर्वशी की
किरन उँगलियों को छुये बिन जला हो।


अथवा


परस तुम्हारा प्राण बन गया,
दरस तुम्हारा श्वास बन गया।


तीसरे उद्धरण में उर्वशी सौंदर्य का प्रतीक है। दीपक के रूपक से चेतना के जन्म की ओर संकेत है। चौथे उद्धरण में सौंदर्य और प्रेम से किस प्रकार प्राण (ताप-चेतना) और श्वास (गीत) का जन्म हुआ इसकी कहानी है। सौंदर्य और प्रेम द्वारा सृष्टि के उद्भव और विकास का रूपक यह गीत है।

प्रेम


किन्तु केवल स्थिति या चिति ही जीवन नहीं है। वहाँ गति भी है और जीवन को गति देने वाली शक्ति का ही नाम है प्रेम। तात्विक दृष्टि से प्रेम का अर्थ है-एक से दो होना दो से अनेक होना और अनेक से फिर एक हो जाना। सृष्टि के विकास का भी यही रहस्य है ‘एकोऽहम् बहुस्याम’। जहाँ अद्वैत है, वहाँ प्रेम नहीं हो सकता। प्रेम के लिए द्वैत की आवश्यकता है। द्वैत अनेकत्व को जन्म देता है, किन्तु प्रेम इस द्वैत (व्यक्ति) और अनेकत्व (समष्टि) से होता हुआ अद्वैत की ओर ही जाता है। सम्पूर्ण सृष्टि एक तत्त्व से बनी है और इसी में समा जायेगी।

व्यावहारिक दृष्टि से प्रेम का अर्थ है किसी को प्राप्त करने की और प्राप्त करके स्वयं वही बन जाने की इच्छा-लालसा या आकांक्षा। प्राप्त करने का अर्थ है किसी स्वप्न को, किसी प्यास को या किसी आदर्श को साकार करने की कामना।


जब तक जीवित आस एक भी
तभी तलक साँसों में भी गति
(बादर बरस गयो)


अथवा


हँस कहा उसने चलाती चाह है
आदमी चलता नहीं संसार में


जब हम अपनी दृष्टि भीतर से बाहर की ओर करते हैं, तब हम प्रेम (कामना इच्छा) करते हैं और तभी हम किसी आदर्श को जन्म देते हैं। जो वस्तु भीतर है उसके लिए हमें भाग-दौड़ करनी पड़ती किन्तु जो बाहर है उसके लिए प्रयत्न अनिवार्य है। यद्यपि प्रेम भी एक भावना का नाम है जो भीतर है, किन्तु उसका आकार बाहर होता है।
वह किसी व्यक्ति, वस्तु या आदर्श का रूप धारण कर ही साकार हो सकता है वह निराकार साकार है। यदि तनिक सूक्ष्म दष्टि से देखिये तो पता चलेगा कि प्रेम के लिए हम स्वयं (एक) का ही भावना के माध्यम से एक और रूप रचते हैं। जो हमारा इष्ट है वस्तुतः वह ‘पर’ नहीं बल्कि हमारा ‘स्व’ ही भीतर से बाहर आकर ‘पर’ बन गया है यानी हम स्वयं भीतर से बाहर आकर स्वयं को प्रेम करते हैं : निराकार ! जब तुम्हें दिया आकार, स्वयं साकार हो गया।’ इसलिए मैं कहता हूँ कि प्रेम भावना का सूक्ष्म बाह्य प्रयत्न है-व्यष्टि और समष्टि से होकर इष्ट तक आने का मार्ग। तो प्रेम प्रयत्न है और प्रयत्न ही गति है। जीवन में गति है तो वह प्रेम है।

यहाँ एक प्रश्न पूछा जा सकता है-क्या प्रेम जीवन के लिए अनिवार्य है ? मेरा उत्तर है ‘हाँ’। किन्तु क्यों ? इसलिए कि वह हृदय की अनिवार्य भूख है। पर इस भूख को समझने के लिए हमें सृष्टि के जन्म तक दृष्टि फैलानी होगी। सारे धर्मग्रन्थों ने स्वीकार किया है कि इस विश्व का उद्भव एक तत्त्व से हुआ है। लेकिन यह किस प्रकार संभव है। प्रकृति और पुरुष के संयोग का नाम सृष्टि है। दो के बिना जन्म कहाँ ? तो मानना पड़ता है कि वह आदि तत्त्व जिससे विश्व की रचना हुई है, अवश्य ही एक होकर दो था। हमारे यहाँ उसे अर्धनारीश्वर कहा गया है, आधा अंग स्त्री का और आधा अंग पुरुष का-एक साथ स्त्री-पुरुष हाँ। (अभी पपीते की भी कुछ ऐसी नस्लें मिली हैं जो एक साथ नर मादा होती हैं) उस अर्धनारीश्वर (एक तत्त्व) ने प्रेम के लिए या कहिये सृष्टि के प्रसारण के लिए, क्रीड़ा के लिए अपने को दो में विभाजित किया (अद्वैत को जन्म दिया) दो के बाद चार, चार के बाद आठ और फिर इस तरह सृष्टि बन गई। किन्तु आदि तत्त्व के विभाजन (Division) से संसार में एक बहुत बड़ी ट्रेजडी हो गई कि प्रत्येक चेतन तत्त्व एक अपूर्ण आत्मा-विभाजित आत्मा हो गयी। फलस्वरूप उसके हृदय में प्यास है, भूख है, अपने उस आत्मा के साथी (Soul-mate) के लिए जो सृष्टि के आदिकाल से उससे अलग है और जिसको खोजने के लिए, जिसको प्राप्त करने के लिए बार-बार उसे मिट्टी के ये कपड़े बदलने पड़ते हैं-


नाश के इस नगर में तुम्हीं एक थे
खोजता मैं जिसे आ गया था यहाँ,
तुम न होते अगर तो मुझे क्या पता
तन भटकता कहाँ, मन भटकता कहाँ,
वह तुम्हीं हो कि जिसके लिए आज तक
मैं सिसकता रहा शब्द में, गान में,
वह तुम्हीं हो कि जिसके बिना शव बना
मैं भटकता रहा रोज श्मशान में


बस, आत्मा के साथी के लिए जो प्रत्येक चेतन तत्त्व में प्यास और चाह है, उसी का नाम प्रेम है और यह प्यास तब तक तृप्त नहीं बनेगी, जब तक उस मन के मीत से आत्म-सम्बन्ध स्थापित नहीं हो जाता। यह आवागमन का चक्र भी तब तक चलता रहेगा, जब तक वह नहीं मिलेगा। जिस दिन वह मिल जाएगा, उसी दिन मुक्ति हो जाएगी। मैं ही क्या, मैं जिधर दृष्टि डालता हूँ, देखता हूँ-


‘दीप को अपना बनाने को पतंगा जल रहा है
बूँद बनने को समुन्दर की, हिमालय गल रहा है,
प्यार पाने को धरा का मेघ है व्याकुल गगन में
चूमने को मृत्यु निशि दिन श्वास पन्थी चल रहा है।’

(बादर बरस गयो)


तो हम बार-बार अपने बिछुड़े हुए साथी की खोज करने आते हैं, पर बार-बार हम भटक जाते हैं-या तो हम अपना लक्ष्य पूजन-अर्चन (मंदिर-मस्जिद) को बना लेते हैं, या प्रकृति को या योग-समाधि को। हम मनुष्य हैं, हमारी आत्मा का साथी तो कहीं मनुष्यों में ही मिलेगा। किन्तु हम वहाँ न खोजकर इधर-उधर भटकते फिरते हैं। फिर मुक्ति कैसे हो ? मुझे भी भरमाया गया था-


खोजने जब चला मैं तुम्हें विश्व में
मन्दिरों ने बहुत कुछ भुलावा दिया,
ख़ैर पर यह हुई उम्र की दौड़ में
ख़्याल मैंने न कुछ पत्थरों का किया,
पर्वतों ने झुका शीश चूमे चरण
एक तस्वीर तेरी लिये किन्तु मैं
साफ़ दामन बचाकर गया ही निकल।


पर इस बार मेरे पास उसकी तस्वीर थी, इसलिए मैं भूला नहीं। पर अभी गन्तव्य मिला नहीं है-अगर यूँ कहूँ कि मिलकर छूट गया है तो अधिक सही होगा। जीवन का यह बहुत बड़ा अभिशाप और साथ-साथ वरदान भी है कि जो हमारी मंज़िल होती है, जब वह समीप आती है तब या तो हम उसको पीछे छोड़कर आगे बढ़ जाते हैं या वह स्वयं और आगे बढ़ जाती है-


पागल हो तलाश में जिसकी
हम खुद बन जाते रज मग की
किन्तु प्राप्ति की व्याकुलता में
कभी-कभी हम मंजिल से भी आगे बढ़ जाते।


अथवा


मैं समझता था कि मंजिल पर पहुँच
आना-जाना ख़त्म यह हो जायेगा
पर हज़ारों बार ही ऐसा हुआ
पास आकर दूर जाना पड़ गया।


इसी प्रकार जब हम भावना (प्रेम) के माध्यम से अपने उस आत्मा के साथी के निकट पहुँचते हैं, तो वह पीछे खिसकता है और खिसकते-खिसकते विश्वात्मा में मिल जाता है। अन्त में हम भी उसकी खोज करते-करते विश्वात्मा तक पहुँच जाते हैं-


मैं तो तेरे पूजन को आया था तेरे द्वार
तू ही मिला न मुझे वहाँ मिल गया खड़ा संसार !


और लगता है फिर मनुष्य स्वयं ही कहने लगता है-


दूर कितने भी रहो तुम, पास प्रतिपल,
क्योंकि मेरी साधना ने पल निमिष चल,
कर दिए केन्द्रिय सदा को ताप बल से
विश्व में तुम और तुम में विश्व भर का प्यार !
हर जगह ही अब तुम्हारा द्वार।





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