काठ की तोप - गिरिराज किशोर Kath Ki Top - Hindi book by - Giriraj Kishore
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काठ की तोप

गिरिराज किशोर

प्रकाशक : नेशनल पब्लिशिंग हाउस प्रकाशित वर्ष : 2001
पृष्ठ :50
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5440
आईएसबीएन :81-214-0506-8

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बिचौलियों द्वारा आर्थिक शोषण कराने की अन्तर्राष्ट्रीय गोलबंदी पर आधारित नाटक....

Kath Ki Top

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रस्तुत नाटक लेखक का आठवां नाटक है। इसकी कुल मिलाकर अब तक पांच प्रस्तुतियां हो चुकी हैं।
वर्तमान सांस्कृतिक, भौगोलिक एवं राजनैतिक परिप्रेक्ष्य में केवल भारत की स्थिति ही नहीं, बल्कि संसार के विभिन्न देशों की स्थिति भी इस नाटक में दर्शायी स्थितियों पर खरी उतरती है। आज मानवीय संबंधों, संवेदनाओं, भावनाओं एवं मूल्यों का कहीं कोई अर्थ नहीं रहा। बस कुछ बचा है तो छल, कपट, प्रपंच, शक्ति प्रदर्शन और इस शक्ति प्रदर्शन में अपने आपको शक्तिशाली बनाने के लिए विभिन्न प्रकार के हथियारों के संग्रह की होड़। इस संग्रह में प्राय: विकासशील देश विकसित एवं संपन्न देशों द्वारा उनके इर्द-गिर्द तैयार किये गये वातावरण में ग्रसित होकर एक दूसरे से डरते हुए अपने मन में द्वेषपूर्ण भाव रखते हुए बदले की भावना से अपने आपको संगठित एवं शक्तिशाली बनाने के लिए विकसित देशों के झांसे में आकर हथियार पाने की होड़ में अपना सब कुछ न्यौछावर कर बैठते हैं।

श्री गिरिराज किशोर के नाटक मंच, निर्देशन और प्रकाश की दृष्टि से सुगम तो हैं ही साथ ही साथ उनमें राजनीतिक एवं सामाजिक दृष्टि की समग्रता भी है। गिरिराज किशोर संवादों और स्थितियों के  संयोजन में सिद्धहस्त होने के साथ-साथ सामाजिक, राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक विसंगतियों के सक्षम चितेरे हैं।

काठ की तोप

यह नाटक अमेरिका जैसे देशों द्वारा हथियार बेचने के लिए भारत और पाकिस्तान जैसे तीसरी दुनिया के देशों को लड़ाने और बिचौलियों द्वारा आर्थिक शोषण कराने की अंतर्राष्ट्रीय गोलबंदी के बारे में लिखा गया है। तीसरी दुनिया के देशों की आंखें खोलने की दृष्टि से यह नाटक महत्वपूर्ण है।

निर्देशक की नजर में


वर्तमान सांस्कृतिक, भौगोलिक एवं राजनैतिक परिप्रेक्ष्य में केवल भारत की स्थिति ही नहीं बल्कि संसार के विभिन्न देशों की स्थिति भी इस नाटक में दर्शाई स्थितियों पर खऱी उतरती है। आज मानवीय संबंधों, संवेदनाओं, भावनाओं एवं मूल्यों का कहीं कोई अर्थ नहीं रहा। बस कुछ बचा है तो छल, कपट, प्रपंच, शक्ति प्रदर्शन और इस शक्ति प्रदर्शन में अपने आपको शक्तिशाली बनाने के लिए विभिन्न प्रकार के हथियारों के संग्रह की होड़। इस संग्रह में प्राय: विकासशील देश विकसित एवं संपन्न देशों द्वारा उनके इर्द गिर्द तैयार किए गये वातावरण में ग्रसित होकर एक दूसरे से डरते हुए अपने मन में द्वेषपूर्ण भाव रखते हुए बदले की भावना से अपने आपको संगठित एवं शक्तिशाली बनाने के लिए विकसित देशों के झांसे में आकर हथियार पाने की होड़ में अपना सब कुछ न्यौछावर कर बैठते हैं। ना जाने वो किससे और क्यों डरते हैं। जबकि डर तो उन्हें स्वयं से होना चाहिए क्योंकि वह अपने स्वयं के कारण ही अपना सब कुछ स्वाहा करते हैं।

क्या कभी ऐसा समय आयेगा जब हम स्वयं को पहचान सकेंगे....दूसरे पर दोषारोपण के स्थान पर अपनी स्वयं की अविवेकपूर्ण गतिविधियों का आकलन पर पायेंगे। अगर नहीं तो पिछले पचास वर्षों में अपने तीन टुकड़े तो कर चुके हैं और आने वाले समय में न जाने और कितने टुकड़े करके अपना अस्तित्व ही समाप्त कर लेंगे।

-लईक हुसैन
निर्देशक,
पश्चिम नाट्य केंद्र, उदयपुर

नाटक के पहले मंचन के पात्रों का परिचय


बड़े नवाब : डॉ.सुभाष भार्गव
छोटे नवाब : डॉ.परमेन्द्र दशोरा
एक : राहुल कन्जारी
दो: गिरिराज (लेखक नहीं)
तीन : ललेश मेजवाल
चार : रशीद खान
सूत्रधार : भुनभुन राया/प्रतिभा भण्डारी
मटरुमल : मनोज सुखवानी
कर्राश एक : मौहम्मद शकील
कर्राश दो : आदिल इमरान
व्यापारी एक : आरिफ
व्यापारी दो : अज़गर अली
सदर : श्रीमती अनुकम्पा लईक

नेपथ्य :


वेष-भूषा : श्रीमती अनुकम्पा
सामग्री : प्रतिभा भण्डारी, मनोज सुखवानी
प्रकाश : मुरताक
मंच सज्जा : डॉ.सुभाष भागेव, ललेश मेजवाल
रूप सज्जा : लईक हुसैन, श्रीमती अनुकम्पा लईक
मंच व्यवस्था : राहुल कन्जारी
निर्देशक : लईक हुसैन

पहला अंक
दृश्य : एक


[एक मंच पर अकेला उद्घोषक खड़ा है चारों तरफ अर्ध-गांव का एक सेट है। वह मशीन चलाने की तरह हाथों को घुमाता-फिराता है। फिर माथे से पसीना पोंछता है। हाथ जोड़ता है। जनता की तरफ़ देखता है।]

उद्घोषक : उफ़, अब यहां कुछ नहीं चलता। आप यह मत समझिए कि पहले भी यह ऐसा ही था। ऐसा तो अब हो गया। सारा वक्त दो भाइयों के झगड़े में निकल जाता है। चलेगा क्या खाक़। देखिए मैं भी कैसा आदमी हूं। बिना जगह का परिचय दिये चालू हो गया। दरअसल, मैंने न ढिंढोरची की ट्रेनिंग ली, न खबर बांची और न कभी किसी ड्रामा कंपनी में सूत्रधार रहा। बस कहीं से भी चालू हो जाता हूं। इस गांव का नाम सिंधावली है। न यह कोई तिजारती मरकज़ है और न फ़िलहाल होने की उम्मीद है। बाहर से कुछ आ जाता है तो काम चल जाता है। वैसे सिंधावली को शिकारपुर न समझें। यह मुहावरा ही बन गया है, ऐसे-शिकारपुर में बसते हैं। बहुत नाज़ुक चीज़ है। दिल से भी ज्यादा। दिल तो फिर भी धक-धक करता है। अभिजात्य वर्ग तो अजगर की तरह पड़ा रहता है। छेड़ों तो जीभ लपलपाता है। वैसे जिनका संबंध शिकारपुर से जोड़ा जाता है। वे कहां नहीं होते। यहां भी हैं। हम लोग सिंधावली को ही सारे जहां से अच्छा मानते हैं। माने क्यों ना। आख़िर हमारा रिश्ता ही ऐसा है। जब सिंधावली सालिमों-साबुत था तो यहां दो लख़्ते जिगर थे-बड़े नवाब और छोटे नवाब। यह नवाबी ऐसी चीज़ है कि ख़ून में एक बार मिल जाये तो एड्स की तरह काम करती है। भले ही आप अरगजा मलमलकर अपना वर्ग चरित्र बदल डालें। ख़ैर, अब आप देखिए सिंधावली के उन नूर-ए-चश्मों ने क्या-क्या नहीं किया।

[अंधेरा होता है। फिर रोशनी होती है। मंच पर ढम-ढम-ढम ढोल या नक्कारा बजने की आवाज आती है। फिर जोकरनुमा लोग आते हैं। उद्घोषक भी जोकर के लिबास में उनके साथ होता है। वे गाते हैं। ]

सब: (गाते हैं) आम वाले आम दे
आम हैं सरकार के हम भी हैं दरबार के
ढम-ढम-ढम

[उनमें से एक आगे बढ़कर गाता है ]

हुकूमत है आला
पड़ा पेट में जाला
सब : (दोहराते हैं) जाला-जाला-जाला
दूसरा : किस-किस को रोयें
किस-किस को गायें
पड़ा अक्ल पर पाला
सब : पाला-पाला-पाला
तीसरा : आया अफसर
सब : आला-आला-आला-
चौथा : न लाल, न सफेद, न पीला
अंदर से एकदम काला
सब : काला-काला-काला
पांचवा : सावधान
आता है नवाब
खाता है ख़्वाब
सोता है तखत पर
पादता है बखत पर
सब : लो आ गया नवाब

[बड़ा नवाब दाखिल होता है]

छठा : आइए हुज़ूर
खाइए खजूर
बैठिए तखत पर
पादिए बखत पर
सब : (कांपती आवाज में) खाइए खजूर
खाइए खजूर
पादिए बखत पर

[बड़ा नवाब चारों तरफ देखता है। जैसे चारों तरफ रियाया खड़ी हो]

बड़ा नवाब : हमारी रियाया कहां गयी ?
सब : हुज़ूर आधी मर गयी, आधी बिक गयी-
एक : (हंसकर) आधी बट गयी।
बड़ा नवाब : (पुकारता है) छोटे नवाब !

[छोटा नवाब आता है]

छोटा नवाब : हम छोटे नवाब
ये बड़े नवाब
नवाबी है आला
सब :गड़बड़झाला, गड़बड़झाला
एक : पेट है खाली
सिर पर जाली
दूसरा : विदेश में बालम
तीसरा : बात है जालम
बड़ा नवाब : क्या बकते हो ?
छोटा नवाब : आपके सदके हो !

[ बड़ा नवाब ख़ुश हो जाता है]

बड़ा नवाब : हम गायेंगे
सब नाचेंगे।
छोटा नवाब : (जिद में) नहीं, हम नाचेंगे
बड़ा नवाब : हम बड़े या तुम

[छोटा नवाब चुप रहता है]

दूसरा : (पीछे घूमकर) बात नदारद
जवाब गुम।
बड़ा नवाब : (भूल जाता है पहले क्या कहा था) तो फिर हम गायेंगे नाचेंगे।

[सब गाते हैं और बड़ा और छोटा नवाब नाचते हैं।]

कोरस : आम वाले आम दे-
सब : बात है कड़वी
आम हैं मीठे
तीसरा : कड़वे-कड़वे हम सबके
मीठे-मीठे राजा के
चौथा : राजा खायेगा
विदेश जायेगा
पांचवा : राजा खायेगा
सरकार बनायेगा
छठा : राजा खायेगा
भूख बढ़ायेगा
सातवां : बाजा बजायेगा
बाजार लगायेगा
सब : हर चीज़ मिलेगी एक आना
सोना हो या इलाची-दाना।
कोरस : आम वाले आम दे
आम हैं सरकार के
मीठे-मीठे हमको दे
खट्टे-खट्टे राजा के,
हम खायें बाग लगायें
राजा खाये हगने जाये
आम वाले आम दे
हम भी हैं सरकार के
छोटा नवाब : हम भी हैं सरकार के
बड़ा नवाब : एक आम ले जाओ।
एक : मीठा राजा
मीठा आम
मीठी बातें
कड़ुवे दाम,
दूसरा : खट्टा राजा
खट्टे आम
कच्ची बातें
झूठे काम

[दोनों नवाब उनके पीछे दौड़ते हैं। अंधेरा हो जाता है।]

आम वाले आम दे
आम हैं सरकार के
हम भी हैं दरबार के
एक आम ले जाओ
मीठा आम-खट्टा आम
काला, आम, पीला आम
एक : सब आम आम आम....
सबसे बड़े आम।

दृश्य : दो


[बड़े नवाब की कचहरी और छोटे नवाब का दरबार स्टेज को बांटकर बराबर-बराबर बने हैं। बारी-बारी से दोनों कचहरियों पर रोशनी पड़ती है। दोनों तरफ दो-दो फर्राश सफाई कर रहे हैं। बात करते जा रहे हैं। पहले बड़े नवाब की कचहरी।]

फर्राश-1: अमां, इस कचहरी की शान तो मरहूम नवाब के वक्त में थी। क्या इत्र की खुशबू बसी रहती थी। अब तो (इशारे से) पीछे की सीवन ही उधड़ गयी।
फर्राश-2 : (सफ़ायी करता-करता रुक जाता है।) छोटे नवाब ने नयी कचहरी बनायी है।
फर्राश-1: कचहरी नहीं दरबार।
फर्राश-2: पता नहीं उनकी सीवन का क्या हाल है ?
[दोनों हँसते हैं। छोटे नवाब के दरबार पर रोशनी पड़ती है। छोटे नवाब के फर्राश हरी वर्दी पहने हैं।]
हरा फर्राश-1: एक वो कचहरी है-
हरा फर्राश-2: जब मैं बड़े नवाब की कचहरी साफ़ किया करता था तो जुकाम हो जाता था-
हरा फर्राश-1: अमां, नये और पुराने में कुछ तो फर्क होता ही है।
हरा फर्राश-2: पुराना रोवे एक दिन, नया रोवे सौ दिन।
हरा फर्राश-1: अमां, कहीं का मुहावरा कहीं फिट-
हरा फर्राश-2: तो क्या हुआ-फिट तो फिट है।
हरा फर्राश-1: कुछ भी कहो वह दरख्त तो उन्हीं के पास है-जिसकी शाखों पर बहिश्त है, फूलों में केसर है।
हरा फर्राश-2: अजी दरख़्त के लिए तो चार लकड़हारे काफी हैं।

[प्रकाश दूसरी तरफ चला जाता है।]

फर्राश-1: अमां, सफायी करना कितना मुश्किल काम है।
फर्राश-2: खासतौर से जब सब-कुछ भिनक गया हो।
फर्राश-1: भिनकने का मतलब ?
फर्राश-2: चीजों का फैल जाना और अंदर की रतूबत का बाहर निकल आना।
फर्राश-1: तुम्हारा मतलब सफायी करने का कोई अर्थ नहीं।
फर्राश-2: (हंसता है) करना तो है ही-हो या नहीं-आख़िर उसी की तनख़्वाह मिलती है।
फर्राश-1: तुम लोगों को तो भिनकाने की भी मिलती है।
फर्राश-2: (सोचता है-फिर हंसता है) उनको ज़्यादा मिलती है-
फर्राश-1: कैसे ?
फर्राश-2: अरे कचहरी का वक्त हो गया...मुसाहिब आने वाले होंगे। सुनेंगे तो नाराज़ हो जायेंगे...

[रोशनी मद्धम पड़ती है। दोनों तरफ मुसाहिब और दरबारी आना शुरू कर देते हैं। फर्राश पीछे जाकर हाथ बांधकर खड़े हो जाते हैं। एक, एक कोने में दूसरा दूसरे में। उन्हीं जोकरनुमा लोगों में से कुछ बड़े नवाब के मुसाहिब हैं-कुछ छोटे नवाब के दरबारी। दोनों हलकी रोशनी में दिखलायी पड़ते रहते हैं। सब दुआ-सलाम कर-करके अपनी-अपनी जगह बैठ जाते हैं। बड़े नवाब की कचहरी पर रोशनी पड़ती है।]

मुसाहिब-1: बड़े नवाब अभी नहीं आये ?
मुसाहिब-2: जायेंगे कहां ?
मुसाहिब-3: वो दिन हवा हुए जब खलील खां फ़ाख्ता उड़ाते थे।
मुसाहिब-1: अब तो जनाब उड़ाने के नाम पर चमगादड़ भी नसीब नहीं।
मुसाहिब-2:अमां, चलाने के लिए तोप तो है।
मुसाहिब-1: गोले की जगह क्या खुद बैठेंगे।

[सब हंसते हैं। नवाब साहब के आने की सूचना दी जाती है-होशियार-नवाब तशरीफ ला रहे हैं। सब लोग बाअदब दस्तबस्ता खड़े हो जाते हैं। बड़े नवाब प्रवेश करते हैं।]

बड़े नवाब : अमनो चैन का क्या हाल है ?
मुसाहिब-1 : दुश्मन तो पूरी कोशिश कर रहे हैं...
मुसाहिब-3: अमनो चैन की शक्ल ही बदल गयी....लेकिन हुज़ूर  के इकबाल से कुछ बचा है।
बड़े नवाब : हमारी रियाया।
मुसाहिब : अब वो रियाया कहां....

[बड़े नवाब सवालिया नजर से देखते हैं।]

मुसाहिब-2 :हुज़ूर  बंट गयी।
बड़े नवाब : अमां, कभी रियाया भी बंटती है...रियाया एक होती है...बादशाह भले ही अलग हों।
मुसाहिब-3: रियाया भी तो ज़मीन-जायदाद ही होती है, हुज़ूर  !
मुसाहिब-2: जी, आधी तो छोटे नवाब ले गये।
बडे़ नवाब: आधी कैसे ले जा सकते हैं-हम बड़े हैं-बड़ा महल हमारे पास, तोपखाना हमारे पास, भले ही तोपखाना बंट गया हो, असली तोप तो हमारे ही कब्जे में -रियाया भी हमारी ही ज़्यादा होनी चाहिए।

[रोशनी बड़े नवाब की कचहरी से हटकर छोटे नवाब दरबार पर चली जाती है। एकदम आधुनिक और लकदक।]

दरबारी-1: (सलाम करते हुए) लगता है दुश्मनों की तबियत कुछ नासाज़ है ?
दरबारी-2: लगता तो है-हो सकता है रात को नींद न आयी हो।
दरबारी-1: अमां, पलंग भी नया, रजाई भी नयी और बिस्तर भी नया।
दरबारी-3: अब रजाइयाँ भी तो छोटी होने लगीं।
दरबारी-2:पहले लोगों की रजाई में निवाच भी ज़्यादा होती थी और गुंजायश...भी अब तो रजाइयां भी तलवार की मयान हो गयीं...

[छोटे नवाब का पदार्पण होता है।]

छोटे नवाब: क्या गुफ़्तगू हो रही है।
दरबारी-1: हुज़ूर , जिक्र यह था कि पहले भी रजाइयों में निवाच भी होती थी और गुंजायश भी हुज़ूर ,, ने मुल्क के हालात देखकर रजाई का अर्ज भी कम कर दिया और बिस्तर का फैलाव भी....
छोटे नवाब: अमां, पुरानी बात पुराने लोगों के साथ चली गयी। हम पुरानेपन और दकियानूसीपऩ के का़यल नहीं...हमें नया इतिहास बनाना है...
दरबारी-1: जी हुज़ूर पुराना तो सब वे ले गये।
दरबारी-2:एकदम बजा फरमाया।
दरबारी-3: इतिहास वो जो अपनी कार-गुजारियों का हवाला दे।
दरबारी-1: दूसरों का इतिहास हमारा कैसे हो सकता है ?

[दोनों फर्राश एक-दूसरे की तरफ देखकर मुस्कराते हैं।]

छोटे नवाब: सवाल है कि इतिहास बने कैसे ?

[सब गहराई से सोचते हैं।]

दरबारी-1: तोपखाना तो बड़े नवाब के हिस्से में चला गया।
दरबारी-2: हम तो कंधों पर रियाया और ज़मीन का वज़न ढोकर लाये हैं।
दरबारी-3: बिना जद्दोजहद के इतिहास नहीं बनता।
छोटे नवाब: क्यों न हम नया तोपख़ाना खरीद लें...?
दरबारी-2: (तपाक से) क्या बात पैदा की है हुज़ूर  ने। आख़िर वही तो ख़ून है, जिसने फ़तह पर फ़तह हासिल की और दस हज़ार मसंबदारी तक जा पहुंचे।
दरबारी-3: एक तोप तो बंटवारे में भी अपने हिस्से में आयी थी।
दरबारी-1: वह तोप तो लकड़ी की है...
दरबारी-2: क़दीमी चीज़ है ना..विरासत में मिली है..पर तोप तो तोप ही है।
छोटे नवाब: उस पर तो लोहे का मुलम्मा चढ़वा लिया गया...अब वह पूरी तोप है।
दरबारी-2: वाह, क्या बात पैदा की है। तोप लकड़ी की हो या लोहे की जब गरजती है तो अच्छे-अच्छों के दिल दहल जाते हैं....
छोटे नवाब: हमें लड़ाई भी तो बड़े नवाब से लड़नी होगी।
दरबारी-1: वो क्या लड़ाई लड़ेंगे....एक गाल पर मारो तो दूसरा गाल आगे कर देंगे।
दरबारी-2: तो फिर बड़े नवाब ने अपने महल पर तोप क्यों चढ़वा ली है।
दरबारी-3: उन्हें तो उसकी ज़रूरत ही नहीं....
दरबारी-2:हुज़ूर को है।
दरबारी-3: सच पूछिए तो तोप उसकी जो उसका धमाका बर्दाश्त कर सके
छोटे नवाब: यानी  ?
दरबारी-2: ख़ता माफ़ हो, बड़े नवाब का दिल और पेट दोनों कमजोर हैं।
छोटे नवाब: लाहौल विला कूवत-दरबार में ऐसी गैरमोजू बात...

[पहले छोटे नवाब मुस्कराते हैं, फिर बाकी दरबारी भी गर्दन हिला-हिलाकर हंसने लगते हैं।]















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