लोमहर्षिणी - कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी Lomharshini - Hindi book by - Kanhaiyalal Maniklal Munshi
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लोमहर्षिणी

कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :258
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 535
आईएसबीएन :9788126700677

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लोमहर्षिणी

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

लोमहर्षिणी – कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी प्राचीन भारतीय इतिहास और संस्कृति के मर्मझ विद्वान कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी उपन्यासकार के नाते न केवल गुजरती, बल्कि समूचे भारतीय साहित्य में समादृत हैं ! कई खण्डों में प्रकाशित विशाल औपन्यासिक रचना ‘कृष्णावतार’, ‘भगवन परशुराम’, ‘लोपामुद्रा’ जैसे वैदिक और पुराणिक काल का दिग्दर्शन करनेवाले उपन्यासों के कर्म में ‘लोमहर्षिणी’ उनकी एक और महत्त्पूर्ण कथाकृति है !

लोमहर्षिणी राजा दिवोदास की पुत्री और परशुराम की बल-सखी थीं, जो युवा होने पर उनकी पत्नी बनीं ! भृगुकुलश्रेष्ठ परशुराम ने अत्याचारी सहस्रार्जुन के विरुद्ध व्यूह-रचना का जो लम्बा संघर्ष किया, उसमें लोमहर्षिणी की भूमिका भारतीय नारी के गौरवपूर्ण इतिहास का एक उज्ज्वलतर पृष्ठ है ! साथ ही इस उपन्यास की पृष्ठभूमि में ऋषि विश्वामित्र और मुनि वसिष्ठ के मतभेदों की कथा भी है !

उनके यह मतभेद त्रित्सुओ के राजा सुदास के पुरोहित-पद को लेकर तो थे ही, इनके मूल में विश्वामित्र द्वारा आर्य और दस्युओं के भेद का विवेचन तथा वसिष्ठ द्वारा आर्यों की शुद्ध सनातन परंपरा का प्रतिनिधित्व करना भी था ! वस्तुतः लोमहर्षिणी में मुशिही ने नारी की तेजस्विता तथा तत्कालीन समाज, धर्म, संस्कृति और राजनीती के जटिल अंर्तसंबंधो का प्राणवान उद्घाटन किया है !


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