नेत्रदान - देवेश तांती Netradan - Hindi book by - Devesh Tanti
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नेत्रदान

देवेश तांती

प्रकाशक : पराग प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :167
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5308
आईएसबीएन :81-7468-043-x

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प्रेम-संबंध पर आधारित उपन्यास...

Netradan

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रकाश एक मुसलमान लड़की नरगिस से प्यार करता है, तथा दोनों एक-दूसरे से शादी करना चाहते हैं लेकिन धर्म दोनों के बीच दीवार बन जाता है। प्रकाश के लिए यह धर्म एक काँटे की तरह है। वह इसे मिटा देना चाहता है, लेकिन नरगिस ऐसा करना नहीं चाहती। प्रकाश का दिल टूट जाता है और वह फौज में भर्ती हो जाता है। वह बंगलादेश की आजादी के जंग में चला जाता है। जहाँ उसकी दोनों आँखें चली जाती हैं, और अंधा हो जाता है।

उधर नगरिस भी अपने ही मजहब के लड़के के साथ शादी कर लेती है।
अस्पताल में अचानक नरगिस की मुलाकात अंधे प्रकाश से होती है। उसका प्यार फिर से जाग उठता है। वह प्रकाश को उसका प्यार वापस करना चाहती है वह अपनी बाईं आँख जिसे प्रकाश बहुत चाहता था, दे देती है। प्रकाश नरगिस की आँख से ही देखने लगता है। प्रकाश को जब पता चलता है कि यह आँख नरगिस की है, तब वह उसके इस त्याग और बलिदान से भावुक हो उठता है। उसे महसूस होता है कि नरगिस ने धर्म के साथ साथ प्यार को भी जिंदा रखा है।

नेत्रदान

बंबई मेल जब छक-छक करती हुई लखनऊ जंक्शन पर रुकी तो प्रकाश की नजर प्लेटफॉर्म पर के लोगों की भीड़ को चीरती हुई एक गुलाबी रंग की साड़ी पहनी हुई लड़की पर पड़ी। वह बड़ी ही बेतुकी सी डिब्बे की ओर बढ़ रही थी। उसके हाथ में एक पर्स के सिवाय कुछ भी नहीं था फिर भी उसकी चाल में एक भार था। मानो वह कोसों दूर से चली आ रही हो और उसके नाजुक गोरे-गोरे पैर थक चुके हों और चलने में असमर्थ हों या वह पर्स ही इतना भारी था कि उसके नाजुक हाथ पर्स का वजन सँभाल नहीं पा रहे थे। या फिर ये लखनऊ की नजाकत थी। ये तो प्रकाश ने सुन ही रखा था कि लखनवी ठाठ और वहाँ की नजाकत दुनिया-भर में मशहूर है। वहाँ के नवाबों के एक से एक कारनामे, एक से एक किस्से, एक से एक नए तरीके के अंदाज उसने सुन रखे थे। जिस तरह बनारसी चीजें दुनिया में बेजोड़ हैं, किसी भी मुल्क में उसका जोड़ निकालना दूभर था, उसी तरह लखनऊ की भी चीजें एक अलग किस्म लिए हुए रहती थीं। ये और बात है कि जितना नाम बनारस का रहा उतना लखनऊ का नहीं रहा।

परंतु एक बात अवश्य थी कि वहाँ के नवाबों के ठाठ-बाट देखते ही बनते थे। उन नवाबों ने दुनिया को एक छाप छोड़ दी। आज वे नवाब तो नहीं रहे लेकिन पीढ़ी-दर पीढ़ी उनके खानदान का वारिस अब भी मौजूद हैं। पहले जैसा नवाबी ठाठ-बाट तो नहीं रहा, लेकिन वे अपने को किसी नवाब से कम नहीं मानते हैं। उनका तौर-तरीका नवाबी शानो शौकत में भले ही न हो परंतु बोलने का ढंग, चलने का ढंग अब भी वह रंग लिये हुए है। और वही झलक प्रकाश उस लड़की में देख रहा था। वह अपने बोझिल पाँव को जल्दी-जल्दी बढ़ाने की कोशिश कर रही थी। उसके साथ एक वृद्ध व्यक्ति भी था, जो चूड़ी़दार पाजामे-कुर्ते में थे। खूबसूरत लाठी के सहारे कदमों को लड़की के साथ-साथ बढ़ा रहा था। संभवतः वह वृद्ध ही उस लड़की का पिता था। उसकी चाल-ढाल बिल्कुल नवाब जैसा थी। एक कुली भी एक बड़े से सूटकेस को सिर पर तथा एक बेग को कंधे पर लटकाए हुए डिब्बे की ओर बढ़ रहा था।

प्रकाश को लगा कि वह लड़की अवश्य ही उसी के कंपार्टमेंट में आएगी। वह सोचने लगा कि लड़की जरूर कोई ऊँचे खानदान की ही होगी, क्योंकि लड़की का परिधान वस्त्र भूषण तथा वृद्ध के खूबसूरत रेशमी कपड़े, कंधे पर वेश कीमती काश्मीरी शाल इस बात का संकेत कर रहा था कि उनके पूर्वज कभी यहाँ के नवाब रहे होंगे।

अब वह लड़की करीब-करीब उसके डिब्बे के पास पहुँच चुकी थी, जिस कारण अब उस लड़की का सुंदर चेहरा साफ झलक रहा था। वाकई वह लड़की इतनी खूबसूरत थी कि उसकी किसी भी नवाब की रईस शाहजादी से तुलना की जा सकती थी। उसकी आँखों की खूबसूरती देखकर प्रकाश स्तब्ध रह गया। बाईं आँख के ठीक नीचे एक नीला-काला तिल था, जिस कारण उसकी नीली-नीली आँखें नीले झील की तरह अंगड़ाइयाँ ले रही थीं। उस तिल ने उसकी खूबसूरती में चार चाँद लगा दिए थे। उस नीले-काले तिल के योगदान से आसमान का रंग भी फीका पड़ रहा था। सचमुच ऐसी लड़कियाँ कम ही देखने को मिलती हैं। प्रकाश उसकी सुंदरता से सम्मोहित होकर एक अलग दुनिया में खो गया। उसे अपने बचपन का वह दिन याद आ गया, जब वह सातवें दर्जे का विद्यार्थी था और विद्यालय के वार्षिक महोत्सव में एक नाटक में अभिनय किया था। नाटक का नाम ‘राधा-कृष्ण’ था। वह उसका नायक था और एक लड़की राधा बनी हुई थी।

राधा बोली-‘‘कन्हैया रे, तुम तो माखन चोर हो, मेरा दिल क्यों चुरा लिया ?’’
‘‘राधे, मैं माखन और तुम्हारा दिल, दोनों का चोर हूँ। मैंने तुम्हें चुराया है, जानती हो क्यों ?’’
‘‘मैं क्या जानूँ तुम्हारा छल-कपट रे, श्याम ? तुम्हें तो अबला को सताने में बड़ा मजा आता है न ?’’
‘‘तुम्हें सताने में बड़ा मजा आता है राधे, सिर्फ तुम्हें। तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो। तुम्हारे इस रूप ने मुझे पागल बना दिया है।’’
‘‘कन्हैया, क्यों झूठ बोलते हो। हजारों लड़की ब्रज में पड़ी हुई हैं। मुझमें ऐसी कौन-सी खूबी है, जिस कारण मैं तुम्हें अच्छी लगती हूँ।’’
‘‘राधे, ये बातें तुम क्या जानो, कि हजारों लड़की मिलकर भी मेरी एक राधा का मुकाबला नहीं कर सकती हैं।’’
‘‘फिर भी श्याम कुछ तो बोलो, मैं क्यों इतनी सुंदर लगती हूँ ? मेरे पास ऐसी कौन-सी चीज है जो ब्रज की उन हजारों लड़कियों के पास नहीं है ?’’

‘‘राधे, तुम नहीं मानोगी तो सुनो-ये तुम्हारी नीली-नीली आँखें हैं न, ये मुझे बहुत पसंद हैं और ये बाईं आँख के नीचे का काला दाग तुम्हारी खूबसूरती को और निखार देता है। ऐसा लगता है ये नीली-नीली आँखें एक गहरी झील हो और मैं उसकी गहराई को जानने के लिए प्रयत्न कर रहा हूँ।’’
राधा हँसती हुई बोली-‘‘तुम बिल्कुल बुद्धू हो रे श्याम, ये काला दाग तो मैं बस यूँ ही लगा लेती हूँ, ताकि तुम्हारी नजर न लगे। ये देखो, ये दाग मिट गया’’, राधा चुनरी के कोने से दाग को मिटाती हुई बोली।
‘‘नहीं...।’’ अचानक प्रकाश जोर से चिहुँक उठा मानो वह कोई भयानक स्वप्न देख रहा हो। उसका बदन थर-थर काँपने लगा। उसे पल-भर तो कुछ समझ नहीं आया कि ये क्या हो गया।

अगल-बगल बैठे हुए आदमी भी प्रकाश की चीख से चौंक उठे। एक ने कहा-
‘‘क्या बात है भाई साहब, आपकी तबीयत तो ठीक है ?’’
‘‘जी...जी....’’ उसका गला अटक गया। उसे अपनी भूल का एहसास हो गया कि वह ट्रेन में बैठे सफर कर रहा है। अपने को सँभालते हुए बोला-‘‘जी, कोई बात नहीं। मेरी तबीयत ठीक है।’’

सभी आदमी खामोश थे। गाड़ी तीव्र गति से बढ़ती जा रही थी। प्रकाश का दिल उससे भी ज्यादा गति से धड़कने लगा। प्रकाश अब भी उस लड़की को भूल नहीं पाया था। वह नीली-नीली आँखें और बाईं आँख के नीचे नीला-काला तिल, कैसे वह भूल सकता है। ये खूबसूरत आँखें उसके दिमाग का एक हिस्सा बन गईं। उसके मस्तिष्क में रह-रहकर उस लड़की की तस्वीर उभरने लगी। वह चारों ओर चोर नजर से उस लड़की को ढूँढ़ने लगा, पर लड़की उसे कहीं दिखाई नहीं पड़ी।
वह सोचने लगा-कहाँ गई वह लड़की ? हो सकता है भीड़ के कारण किसी दूसरे डिब्बे में चली गई हो, या वह संभवतः फर्स्ट क्लास में यात्रा कर रही हो। यदि वह इसी गाड़ी से जा रही है तो उससे मुलाकात अवश्य होगी। अगर वह लड़की अपने उस काले दाग को मिटा लेगी तो फिर उसे पहचान पाना भी मुश्किल होगा। नहीं-नहीं, शायद वह ऐसा नहीं करेगी। उसका वह दाग शायद जन्म से ही हो और जन्मजात दाग को मिटाना उतना आसान नहीं है। फिर भी उसके दिल को चैन नहीं मिल रहा था। उस लड़की ने प्रकाश के दिल को झंझोड़कर रख दिया था।

जब भी गाड़ी किसी स्टेशन पर रुकती, तो प्रकाश उस लड़की को ढूँढ़ने के लिए नीचे उतर जाता, दिल में एक आस लिये हुए कि वह लड़की अवश्य मिलेगी, लेकिन प्रत्येक बार उसे निराश होना पड़ता था।

आखिर वह मंजिल पर पहुँच ही गया। गाड़ी मुगलसराय जंक्शन पर रुकी। प्रकाश को पटना जाना था, और यह गाड़ी पटना नहीं जाती थी। वह गाड़ी गया होती हुई हावड़ा को जाती थी। प्रकाश अपने सामान के साथ नीचे उतर गया और उस लड़की को प्लेटफॉर्म पर खोजने लगा। उसे तो यह भी नहीं मालूम था कि वह लड़की यहाँ पर उतरी भी है या नहीं, या वह सीधे हावड़ा चली गई। जिसे वह जानता भी नहीं था उसके प्रति इतना लगाव, इतना प्यार कैसे उसके दिल में जाग उठा। कैसे वह बेचैन हो उठा है उसकी एक नजर के लिए। आखिर जब वह निराश हो गया तब यह कहकर अपने दिल को सांत्वना दी कि वह लड़की एक सपना थी जो उस गाड़ी की तरह आगे चली गई।

वहाँ से वह दूसरी गाड़ी से पटना पहुँचा। पटना स्टेशन से वह एक ऑटो से अपने घर पहुँचा। घर पर सिर्फ एक नौकर था। घर के अन्य लोग कहीं बाहर गए हुए थे। नौकर के द्वारा मालूम हुआ कि वे लोग दो-चार दिन के बाद ही वापस लौटेंगे। प्रकाश नौकर को नाश्ता तैयार करने के लिए कहकर गुसलखाने में जा घुसा और अपनी थकान मिटाने के लिए नल के नीचे बैठ गया।
अच्छी तरह से नहाने के बाद वह बाहर निकला और पतलून कमीज पहनने लगा। डटकर नाश्ता करने के बाद वह घर से अपने दोस्त से मिलने के लिए निकल पड़ा।

प्रकाश पटना हाईकोर्ट के सुप्रसिद्ध जज श्री देवकीप्रसाद सिन्हा का दूसरा बेटा था। उनका बड़ा बेटा शारदाप्रसाद सिन्हा भी उसी कोर्ट में वकालत करता था। जज साहब की एक बेटी भी थी जिसका नाम अंजु था।

जज साहब की पत्नी श्रीमती भानुमती हृदय रोग से पीड़ित थीं। वह अक्सर बीमार रहा करती थीं। कुछ तो उम्र का भी तकाजा था और कुछ बीमारी भी असर दिखा रही थी। पटना के बड़े-बड़े डॉक्टरों का कहना था कि उन्हें हवा पानी बदलने के लिए किसी पहाड़ी स्थान पर ले जाना होगा। लंबी यात्रा भी उनके अनुकूल नहीं थी। जिस कारण जज साहब ने उन्हें शिमला या मंसूरी न ले जाकर राँची से दूर नेतरहाट ले जाने का प्रस्ताव अपने बड़े बेटे और बहू के सामने रखा। सबने इस प्रस्ताव को मान लिया और स्वयं भी उनके साथ नेतरहाट जाने की इच्छा जाहिर करने लगे। जज साहब प्रकाश को छोड़ सपरिवार नेतरहाट पहुँचे। प्रकाश पहले ही बंबई निकल चुका था।

नेतरहाट पहाड़ियों से घिरा नेतरहाट, समुद्र-तल से तीन हजार फुट ऊँचे स्थान पर बसा हुआ था। चारों ओर लंबे-लंबे साल के दरख्त, किसी भी हिल स्टेशन से कम नहीं थे। यहाँ की जलवायु बहुत ही लाभप्रद और स्वास्थ्य के लिए अनुकूल थी। आसपास के जल प्रपात, चश्में मन को लुभाने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे। इस वातावरण में प्रत्येक व्यक्ति अपने को नीरोग महसूस करता था। नेतरहाट चारों ओर से जंगलों से घिरा हुआ है। उसके आसपास के गाँवों में सिर्फ जन-जाति के लोगों का ही निवास था, अन्य जाति के लोग नगण्य मात्र ही रहते थे। जन-जाति जो आदिवासी के रूप में उनकी पहचान थी, बहुत ही सरल और सीधे-सादे होते थे। उनका मुख्य पेशा आखेट करना था। उनके पूर्वजों का मुख्य पेशा आखेट के साथ-साथ थोड़ी-बहुत खेती-बाड़ी भी थी। मुख्यतः वे धान, महुआ, कोदो और गोंदली फसल की ही खेती करते थे। उनका रहन-सहन बिल्कुल ही साधारण होता था। देखने में वे काले अवश्य होते थे लेकिन हृदय उनका उतना ही निर्मल होता था।

प्रकाश का कॉलेज खुल चुका था, लेकिन वह अकेला होने के कारण सारा दिन घर में ही पड़ा़ रहता था। आज तीसरा दिन था। जब वह दोस्त के घर से अपने घर पहुँचा तो बच्चों की चीख-पुकार से वह समझ गया कि उसका पूरा परिवार वापस लौट आया है।

वह अपने कमरे में पहुँचा, वहाँ पर अंजु एक मैगजीन के पन्ने उलट रही थी। उसे प्रकाश के आने का आभास नहीं मिला। प्रकाश धीरे-धीरे कदमों को बढ़ाते हुए उसके पास पहुँचा और पीछे से दोनों हथेलियों से अंजु की आँखों को ढक लिया।
अंजु इस हरकत के लिए तैयार नहीं थी, अतः वह डर गई और चिल्ला उठी। उसके चिल्लाते ही प्रकाश उसके सामने हो गया।
सामने प्रकाश को देखकर बोली-

‘‘भैया, तुम ? मैं तो डर गई थी। सुना है, तुम तीन दिन पहले ही यहाँ पहुँच चुके हो।’’
‘‘हाँ अंजु, मैं तीन दिन से अकेले बोर हो रहा था। कौन-सी जगह गए थे तुम लोग ?’’
‘‘नेतरहाट गए थे भैया।’’
‘‘नेतरहाट ? राँची वाला !
‘‘हाँ भैया, बड़ा मजा आया। तुम साथ होते तो और भी मजा आता।’’
‘‘क्यों ? मेरे रहने या न रहने से कौन-सा फर्क पड़ने वाला था ?’’
‘‘बहुत फर्क पड़ने वाला था।’’

‘‘आखिर कुछ बताओ भी तो, या पहेलियां ही बुझाती रहोगी ?’’
‘‘बताती हूँ भैया। वहाँ एक ऐसी लड़की से भेंट हुई जो मेरी भाभी बनने योग्य थी और तुम्हारी पत्नी।’’
‘‘चुप रह, शैतान कहीं की।’’ प्रकाश उसे डाँटते हुए बोला।
वह हँसती हुई बोली-‘‘मैं सच कह रही हूँ भैया। अगर विश्वास न हो तो भाभी से पूछ लेना। वह बहुत ही सुंदर थी। देखने में थोड़ी-सी काली अवश्य थी, आदिवासी थी न। मुझसे बहुत हिल-मिल गई थी। कहने लगी-‘तुम्हारा और कोई भाई नहीं क्या ?’ मैंने जब तुम्हारे बारे में बताया तब बोली-‘कहाँ हैं वह ? उन्हें क्यों नहीं लाई ?’’मैं तो निरुत्तर हो गई, उसके प्रश्नों से।’’

प्रकाश आँखें दिखाते हुए बोला-‘‘चुप रहती है या तेरी चोटी खींचूँ।’’ और चोटी को पकड़कर खींचने लगा।
उसी समय उसकी भाभी ने आवाज दी-‘‘अंजु, ओ अंजु, अरी सुन तो, न जाने आते ही कहाँ चली गई ?’’
‘‘भैया चोटी छोड़ो, भाभी बुला रही हैं।’’ चोटी छुड़ाती हुई वह भाग खड़ी हुई। भाभी के पास पहुँचकर बोली-‘‘क्या है भाभी ?’’
‘‘कहाँ चली गई थी ?’’
‘‘यहीं तो थी।’’
‘‘यहीं थी। मैं कब से बुला रही थी। लो चाय पीयो, ठंडी हो रही है।’’ चाय बढ़ाती हुई भाभी बोली।
‘‘भाभी, और एक कप। प्रकाश भैया को भी दे आऊँ।’’
‘‘प्रकाश ! आ गया, तुम चलो वहीं, मैं चाय गरम करके लाती हूँ।’’
भाभी चाय गरम करने के लिए चली गईं तो अंजु दौड़ती हुई प्रकाश के पास गई और बोली-‘‘भैया मेरे लिए बंबई से क्या लाए हो ?’’

‘‘कुछ नहीं लाया हूँ अंजू। बस, यूँ ही खाली हाथ वापस चला आया।’’
‘‘ऐसा तो हो ही नहीं सकता है भैया कि तुम खाली हाथ वापस आओ। आज तक तो ऐसा कभी नहीं हुआ है।’’
‘‘क्या कभी नहीं हुआ ?’’ भाभी अंदर आती हुई बोली।
उन्हें देखकर प्रकाश बोला-‘‘ओह, कुछ नहीं भाभी। मैं तो तुम्हारा ही इंतजार कर रहा था। कहो, कैसी रही यात्रा ?’’
‘‘पहले तुम बताओ कि बंबई से हमारे लिए क्या क्या लाए हो ?’’
‘‘कुछ भी तो नहीं भाभी। क्या लाता मैं ?’’
‘‘क्यों, बंबई में तुम्हें कुछ नहीं मिला ? कोई बात नहीं। मैं तुम्हारे लिए क्या लाई हूँ, जानते हो ?’’
‘‘मैं क्या जानूँ भाभी कि तुम मेरे लिए क्या लाई हो। बताओ न भाभी ?’’
‘‘बताती हूँ। पहले चाय तो पीयो, ठंडी हो रही है’’ और उसने प्रकाश की ओर चाय का प्याला बढ़ा दिया तथा एक प्याला अंजु को देकर अपने लिए एक प्याला चाय बनाने लगी। चाय बनाती हुई बोली-‘‘प्रकाश, मैं तुम्हारे शादी का पैगाम लेकर आई हूँ। तुम्हारी शादी मेरी मौसेरी बहन सुरेखा से तय होने वाली है।’’

‘‘ये क्या मजाक कर रही हो भाभी तुम भी ? तुम तो जानती ही हो कि मैं अभी शादी करने के पक्ष में नहीं हूँ। जब तक ग्रेजुएट की डिग्री नहीं मिलती है, तब तक मैं इस संबंध में सोच भी नहीं सकता हूँ।’’
‘‘ये सब तो मैं कुछ नहीं जानती। माँ बोल रही थीं, कि मेरा तो हृदय-रोग न जाने कब क्या कर बैठे, प्रकाश की बहू आ जाए तो दिल को तसल्ली मिल जाएगी मेरा अरमान पूरा हो जाएगा कि बहू का मुँह देखकर जा रही हूँ। मेरी बचने की कोई उम्मीद नहीं है।’’
‘‘माँ कहाँ हैं भाभी ? दिखाई नहीं पड़ रही हैं ?’’
‘‘रास्ते में उनकी तबीयत अचानक ज्यादा बिगड़ गई, बाबूजी उनको लेकर अस्पताल गए हैं। बस, आते ही होंगे।’’
‘‘भाभी, तुम तो मेरा साथ दो। एक तुम्हीं हो जो मेरी सुनती हो। तुमसे कुछ छिपा नहीं है। माँ को तुम समझा देना कि मैं अभी शादी नहीं करूँगा।’’

‘‘ये सब मेरे बस की बात नहीं है प्रकाश ! माँ और बाबूजी की बातों का विरोध मैं नहीं कर सकती। हाँ, यदि तुम्हारे भैया कुछ कहते तो मैं विरोध कर सकती थी। फिर तुम जो चाहते, वही होता।’’
‘‘ठीक है भाभी, तुम माँ से नहीं कह सकती हो, तो भैया से ही कहो। वे माँ को इस बात के लिए राजी कर लेंगे। भैया की बात माँ कभी नहीं टालेंगी। भैया कहाँ हैं भाभी ?’’
‘‘वे आते ही अपनी किताबों की दुनिया में खो गए हैं। उन्हें तो कभी फुर्सत ही नहीं मिलती कि पत्नी के साथ बैठकर कुछ बातें करें, बच्चों के साथ कुछ देर तक खेलें। बस, किताब और किताब, यही उनकी दुनिया है। मैं तो तंग आ चुकी हूँ।’’
‘‘बस करो भाभी। मैं अभी भैया को लेकर आता हूँ। ये रही सूटकेस की चाभी, इसमें तुम्हारे, अंजु और माँ के लिए साड़ी है, तथा बच्चों के लिए खिलौना।’’ चाभी भाभी की तरफ फेंकते हुए प्रकाश भैया के कमरे की ओर चल दिया। कमरे में पहुँचकर प्रकाश ने भैया को आवाज दी जो कानून की किताब को पढ़ने में पूर्ण रूप से मशगूल थे।

‘‘भैया !’’
‘‘भैया !’’
लेकिन ये आवाज कानून की उस किताब को भेद नहीं सकी और टकराकर वापस प्रकाश के कानों तक ही सीमित रह गई।
‘‘मिल गया, मिल गया, मिल गया।’’
‘‘क्या मिल गया भैया ?’’
‘‘वो डकैतपुर वाली डकैतों का केस। डाकू बहादुर सिंह ने मकान मालिक श्री गंगाधर का खून किया था। पुलिस ने डाकू बहादुर सिंह को पकड़ तो लिया, लेकिन वे कोई ठोस प्रमाण नहीं दे पाए कि डाकू बहादुर सिंह ने ही गंगाधर का खून किया है।’’
‘‘ऐसा क्यों भैया ?’’

‘‘ऐसा इसलिए कि गंगाधर की मृत्यु डाकुओं को देखते ही ‘हार्टफेल’ के कारण हुई थी। अब मैं यह केस जीत जाऊँगा। तुम देखना प्रकाश, कल पिताजी मेरे ही पक्ष में फैसला सुनाएँगे। मेरी यह बहुत बड़ी समस्या थी, जो आज हल हो गई।’’
‘‘ये केस तो हल हो गया भैया, कभी अपना भी तो केस हल कीजिए।’’
‘‘अपना केस। अरे प्रकाश, मैं कुछ समझा नहीं। सुप्रसिद्ध जज श्री देवकीप्रसाद सिन्हा के घर का केस ? किसी से झगड़ा हुआ है क्या ?’’
‘‘हाँ भैया, कुछ ऐसा ही समझिए।’’
‘‘जल्दी कहो प्रकाश, किसके साथ झगड़ा हुआ है ?’’

‘‘वकील शारदाप्रसाद सिन्हा किसी भी केस का फैसला चुटकी में अपने पक्ष में करवा लेता है।’’
‘‘लेकिन भैया, आप इस केस में मात खा जाएँगे। अतः इस केस में उलझने की कोशिश मत कीजिए।’’
‘‘क्या कहा ? मात खा जाऊँगा। तुम वकील शारदाप्रसाद सिन्हा को चुनौती दे रहे हो ? अरे, तुम्हें शायद नहीं मालूम कि पटना में मेरे साथ जिरह करने की किसी वकील में हिम्मत नहीं है। जब उन्हें मालूम हो जाता है कि इस केस को वकील शारदाप्रसाद सिन्हा को सुपुर्द किया गया है तब वे भाग खड़े होते हैं और फैसला मेरे पक्ष में खुद-ब-खुद हो जाता है। तुम्हें तो कोई दिलचस्पी नहीं है कोर्ट-कचहरी से। खैर, बताओ किसके साथ झगड़ा हुआ है ? मैं मिनटों में ही...’’
‘‘भाभी से भैया। चलिए भाभी के पास।’’
‘‘ओह, ये मामला है। तब तो यह केस बहुत ही जटिल है। जानते हो प्रकाश, वकील शारदाप्रसाद सिन्हा के पास यही एक जटिल केस है, जिसका समाधान आज तक नहीं हो पाया। तुम चलो, मैं अभी आता हूँ।’’
उसी समय टेलीफोन की घंटी बज उठी।

प्रकाश ने रिसीवर उठाया।
‘‘हैलो...कौन पिताजी ? क्या कहा...माँ की तबीयत बहुत खराब है...जी, मैं अभी भाभी को लेकर आता हूँ।’’ रिसीवर को रखकर वह भाभी के पास दौड़ा।
भाभी और अंजु साड़ी देख रही थीं।
‘‘ये साड़ी किसके लिए है प्रकाश ?’’

‘‘ये माँ के लिए लाया हूँ भाभी। तुम दोनों जल्दी तैयार हो जाओ, अस्पताल चलना है, माँ की तबीयत बहुत ही खराब है।’’
थोड़ी देर बाद वे अस्पताल पहुँचे।
उसकी माँ की अवस्था गिरती जा रही थी।
प्रकाश ने माँ के पास जाकर उसका हाथ पकड़ लिया।
उसकी माँ जिसे अब दिखाई भी नहीं पड़ रहा था, आभास से ही बोली-‘‘कौन हो ?’’
‘‘मैं प्रकाश हूँ, माँ।’’

‘‘प्रकाश बेटा, तू आ गया बंबई से। क्या लाया है वहाँ से ?’’
प्रकाश के बोलने के पहले ही भाभी बोली-‘‘माँजी, प्रकाश आपके लिए एक बहुत ही अच्छी साड़ी खरीद लाया है।’’
‘‘साड़ी ? बहू अब साड़ी का क्या करूँगी ? उसे तुम प्रकाश की बहू को दे देना। बहू को देखने का अरमान अधूरा रह गया। अब मैं जा रही हूँ...।’’ और उनकी आँखें उलट गईं। शायद वह प्रकाश को देखने के लिए ही जीवित थीं।
प्रकाश के मुँह से एक दर्दनाक चीख निकल पड़ी-‘‘मां...? नहीं माँ, तुम नहीं जा सकतीं।’’
लेकिन होनी को आज तक कौन टाल पाया है। मृत्यु आज तक किसी के वश में नहीं रही। मृत्यु एक सत्य है, इसे कोई झूठा साबित नहीं कर सकता।
प्रकाश जो साड़ी़ माँ के लिए लाया था, उसने कफन बनाकर माँ के मृत शरीर पर ढक दिया।

 


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