आखिरी साँस - यादवेन्द्र शर्मा Aakhiri Saans - Hindi book by - Yadvendra Sharma
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आखिरी साँस

यादवेन्द्र शर्मा

प्रकाशक : पराग प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :140
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5280
आईएसबीएन :81-8070-007-0

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दलित जनों की संघर्ष गाथा का वर्णन...

Aakhiri Saans a hindi book by Yadvendra Sharma - आखिरी साँस - यादवेन्द्र शर्मा

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

यादवेन्द्र शर्मा ‘चन्द्र’

हिन्दी व राजस्थानी के विख्यात साहित्याकार एवं हिन्दी की समस्त विधाओं के सफल लेखक।
उपन्यास : संन्यासी और सुन्दरी, दीया जला दीया बुझा, हजार घोड़ों का सवार, कुर्सी गायब हो गई, एक और मुख्यमंत्री, खम्मा अन्नदाता, पराजिता खून का टीका, ढोलन कुंजकली, गुलाबड़ी, सावित्री, मोहभंग, आखिरी साँस तक, दर्द का दायरा, तृष्णा, आदमी बैसाखी पर आदि अनेक उपन्यास।
कहानी-संग्रह : मेरी प्रिय कहानियाँ, श्रेष्ठ आँचलिक कहानियाँ, विशिष्ट कहानियाँ, चर्चित कहानियाँ, इक्वावन कहानियाँ, जमीन का टुकड़ा, गुलजी-गाथा, जंजाल तथा अन्य कहानियाँ, महापुरुष आदि अनेक कहानी-संग्रह।

नाटक: ताश का घर, महाराज शेखचिल्ली, मैं अश्वत्थामा, चुप हो जाओ पीटर, चार अजूबे, आखिरी  पड़ाव, जीमूत वाहन, महाबली बर्बरीक आदि।
विभिन्न विश्वविद्यालयों से अनेक शोध वह लघु शोधकार्य यादवेन्द्र शर्मा ‘चन्द्र’ के साहित्यकार रुप एवं उनकी रचनाओं पर किए और कराए जा रहे हैं। साहित्य अकादमी, राजस्थान साहित्य अकादमी मीरा, फणीश्वरनाथ रेणु, पत्रिका श्रेष्ठ कहानी आदि पुरस्कारों से पुरस्कृत एवं साहित्य महोपाध्याय, विद्यावाचस्पति, साहित्यश्री, साहित्यमनीषी, डॉ. राहुल सांकृत्यायन साहित्य महोपाध्याय आदि अनेक सम्मानों से सम्मानित।
विशेष :
1. हजार घोड़ों का सवार (दूरदर्शन सीरियल)
2. गुलाबड़ी चकवे चकवी की बात और विडम्बना पर (टेलीफिल्म) तथा लाज राखो रानी सती (राजस्थानी की पहली फिल्म)

‘आखिरी साँस तक’ वर्ग संघर्ष को चित्रित करने वाला एक मार्मिक और हृदयग्राही उपन्यास है जो मानवीय संवेदनशीलता को चित्रित करता हुआ दलित-जनों के हकों की संघर्ष गाथा बताता है। साहित्य अकादमी, मीरा व फणीश्वर नाथ रेणु पुरस्कारों से सम्मानित हिन्दी व राजस्थानी के प्रसिद्ध लेखक यादवेन्द्र शर्मा ‘चन्द्र’ ने सत्य घटना को लेकर इसका ताना-बाना बुना है जो भीतरी मन को भी स्पर्श करता है। हड़तालों से लड़ाई तो आगे बढ़ती है पर आदमी किन-किन संकटों से गुजर कर अपने अस्तित्व को बरकरार रखता है-इसे लेखक ने बड़ी आत्मीयता से विश्लेषित किया है। छोटे-छोटे पात्र अपनी पहचान बताते हैं। सच, यह प्रेरणादायी उपन्यास है जो आदमी  की प्रगति चाहता है।  इस उपन्यास को व ‘हज़ार घोड़ों का सवार’ को लिख कर उपन्यासकार ने यह साबित कर दिया है कि वह दलित जीवन का एक सशक्त रचनाकार है।

प्रकाशक

एक

नगर पर अक्सर बादल आते हैं पर बरसने वाले नहीं, धूल के। ऐसे बरसते हैं कि भीतर के ‘ओरों’ तक को अपनी रेशमी मुलायम पराग रूपी ‘खेह’ से प्रभावित कर देते हैं। तब आदमियों के चेहरे भूत-प्रेतों की तरह लगते हैं और औरतों की अच्छी-बुरी आकृतियां सुबह यह जल्दी जाग जाती हैं।
औरतें झाड़ू व छाजले लेकर सफाई के लिए चल पड़ती हैं। बरसों से सिर्फ औरतें काम करती हैं। मर्द देर तक सोते हैं। बराबरी का हिस्सा देने वाली हमारी सरकार कागजों के सिवाय कहीं भी बराबरी का हिस्सा नहीं दे पायी है। हाँ, इधर मर्द नगर पालिकाओं में अवश्य नौकरी करने लगे हैं। सड़के झाड़ना, नालियाँ साफ करना, कचरा उठाना जैसे अनेक कामों में।

कुछ बच्चे जरूर स्कूल जाने लगे हैं ? पर अभी इस बस्ती में सांस्कृतिक व राजनैतिक जागरण का सर्वथा अभाव है। इसलिए यह बस्ती एक सोयी हुई बस्ती है। कुछ ही युवक थोड़े से पढ़-लिख गये हैं।
भोलिये ने बीड़ी सुलगा ली। उसने दो-तीन कश लिये जिससे बीड़ी अच्छी तरह से जल गयी। उसने मुँह-नाक से धुँआ छोड़ा। रामदेव के मंदिर के फटे हुए ध्वज पर नजर डाली। गरीबों का देवता भी तो गरीब ही होता है, मंदिर कच्चा-कच्चा। न रंगाई और न पुताई। पीछे बदबूदार नाला।
भोलिया सोचने लगा।

उसे अपना गाँव याद आ गया। उसकी आँखें में झाँकता हुआ दर्द उसके अतीत से लिपटने लगा। कितना तिरस्कार भरा हुआ उसका अतीत था और कितना पीड़ादायक वर्तमान। उसे याद है कि राजाओं के जमाने में गाँव में उसे घंटों पानी के लिए तरसना पड़ता था कभी-कभी दिन भर उसे पानी नहीं मिलता था। वे लोग खास रास्तों पर चल नहीं सकते थे, उनकी औरतें पाँवों में गहने नहीं पहन सकती थीं। वे लोग पक्का और ऊँचा मकान नहीं बना सकते थे। और, पंडित जीवराज तो सारे भंगियों का जन्मजात दुश्मन था। जब देखो, लाठी लेकर स्त्री पुरुष बच्चों पर टूट पड़ता था। भद्दी-भद्दी गालियाँ देता था। माँ-बहिनों की ऐसी तेसी कर देता था।
एक बार भोलिया मंदिर के आगे से निकल गया था। उसे पंडित ने देख लिया। बस फिर क्या था ? पंडित ने उसकी वह पिटायी की कि उसकी नाक से खून बहने लगा।

भोलिया उस पिटायी की मर्मान्तक वेदना को आज भी नहीं भूला है। वह आज भी नहीं भूला है कि यदि बरखा नहीं होती, तो वह नहा भी नहीं सकता था। उसे याद आया कि जब वह लहूलुहान होकर ठिकाने के वैद्य के पास गया तो उसने उसे स्पर्श नहीं किया और कुंकुम लगाने के लिए कह दिया। कुंकुम की पुड़िया ऊपर से ही दे दी थी।
एक जानवर का जीवन।
सचमुच वे लोग जानवर ही थे। सवर्णों के इन्सानी जानवर। भोलू को याद आया-जब वह चौदह बरस का था तो उसने एक बार अपनी पत्नी से आठ आने माँगे थे। उसकी पत्नी ने नहीं दिये थे। इस पर उसने उसे खूब पीटा था। आज उसका हृदय पसीज आता है। उसे आज भी अपनी पत्नी का सूखा-मुरझाया हुआ मुख याद है। उस पर करुणा का सागर ठाटें मारने लगता है।

उसे यह भी याद है कि एक बार उसकी बीवी बन-ठन कर गाँव के थाने के आगे से निकल गयी थी, तो थानेदार दीपसिंह ने उसकी बेंत से पिटायी कर दी थी, यह कहते हुए-‘‘कुतिया कहीं की। रंडी की तरह बन-ठन कर निकलती है। साली अपनी हैसियत भूल गयी है। अपनी जाति और अपना धर्म भूल गयी है।......
मार-मार कर सारी शौकीनी भुला दूँगा।’’
जब भोलिया ने अपनी रोती हुई पत्नी के शरीर पर दाग देखे तो उसकी आत्मा कराह उठी थी। उसने गाँव के ठाकुर के कारिन्दे से विनती की, ‘‘माँई-बाप, मेरी घरवाली को थानेदार ने बिना वजह पीटा है। उसकी चमड़ी उधेड़ दी है।’’
‘‘क्या ?’’
‘‘क्योंकि वह अपने चिथड़ों को साफ करके हाथ-पाँव धोकर थाने के आगे से निकल गयी थी।’’
‘‘अरे भोलिया, खायेगा क्या गोलियाँ ? तेरी घरवाली थाने के आगे से निकली ही क्यों ? और वह साबुन कहाँ से लायी ?’’
‘‘आपकी बाई-सा ने दी थी।’’
‘‘जरूर उसने माँगी होगी ?’’
‘‘नहीं अन्नदाता, बाई-सा के हाथ छिटक कर वह कचरे में गिर गयी थी।’’
‘‘बहाने मत बना, भाग जा और हाँ अपनी रूप की रंभा को कह दे कि आगे से बने-ठने नहीं।’’
भोलिये का मन आक्रोश से भर गया था। पर वह जानता था कि इस संसार में गरीब की कोई भी सुनवायी नहीं है। उसके मन में घृणा की लहरें उठीं, पर उसने अपनी जबान को ताला लगा लिया। वह जानता था कि यहाँ जिसकी लाठी उसकी भैंस।

इसके बाद एक दुखद घटना घटी।
भोलिया की बहू बीमार पड़ गयी। उसे बुखार आने लगा। उसे बुखार में भी काम करने जाना पड़ता था। काम किये बगैर रोटी कहाँ से मिले ? कुएँ पर नम्बर न लगाये तो पानी कहाँ से मिले ? नतीजा यह निकला कि बुखार बढ़ता गया। बुखार के साथ खाँसी और खाँसी के साथ खून।
गाँव के डाक्टर कहाँ ? भोलिया वैद्य जी के पास गया। वैद्य जी अपने दवाखाने में बैठे हुए रोगी देख रहे थे।
भोलिया ने धोती का एक टुकड़ा और एक पुरानी कमीज पहन रखी थी, जिसकी बाँहें नहीं थीं। सिर पर कोई पुराना लाल रंग का साफा था।
उसने दवाखाने के बाहर खड़े होकर आवाज लगायी, ‘‘अन्नदाता, कुछ मेरी भी सुनिए।’’ जब उसने चार-पाँच बार आवाज लगायी तो वैद्य जी ने जिन्हें ‘पंडित जी’ भी कहते थे, कहा ‘मैं अभी आया।’’
लगभग आधे घंटे तक प्रतीक्षा करने के बाद पंडित जी बाहर आये और आकर पूछा, ‘‘क्या बात है भोलिया, सब ठीक तो है न ?’’

‘‘नहीं अन्नदाता, घर में बहुत बीमार है। बुखार, खाँसी और खून...’’
‘‘खाँसी में खून आता है।’’ पंडित जी की आँखें फट गयीं। उन्हें जैसे भोलिये की बात पर विश्वास नहीं हुआ। अपने शब्दों पर जोर डाल कर उन्होंने फिर पूछा,‘‘खाँसी में खून आता है ?’’
‘‘हाँ पंडित जी, और पिछले कई दिनों से आता है।’’ उसने बड़ी दीनता से कहा।
‘‘राम-राम, यह तो बहुत ही बुरा हुआ। रोग के लक्षणों से लगता है कि तेरी बहू को टी.बी. हो गयी है। राज-रोग लग गया। अरे ! यह रोग तो राजाओं को होता है, फिर तेरी बहू को कैसे हो गया ?’’
भोलिया ने कहा, ‘‘उसे कई महीनों से बुखार आ रहा है। हम गरीबों को बुखार ऐसे ही आता रहता है। मैंने सोचा कि ठीक हो जायगा। पर वह ठीक नहीं हुआ। अब कफ के साथ खून निकलता है।’’
‘‘फिर तो तेरी बहू को टी.बी. हो गयी है।’’ पंडित जी ने पश्चाताप करते हुए कहा।
पता नहीं, यह बात किस ने सुनी कि दोहर होते-होते सारे गाँव में यह बात हवा की तरह फैल गयी कि भोलिया की बहू को टी.बी. हो गयी है।

गाँव में भयानक आतंक फैल गया कि भोलिये की बहू को टी.वी. हो गयी है।
टी.बी. माने एक ऐसा रोग जो निश्चित ही जान से मारता है, जो छूत का रोग, है ? जो एक से दूसरे को लग जाता है।
ठाकुर ने हुक्म दिया, ‘‘भोलिया, तू अपनी बहू को बस्ती से अलग रख। उससे कह दे कि वह अपने थूक पर धूल डाले। तू नहीं जानता कि यह रोग कितना खतरनाक होता है।’’
भोलिये की बुझी-बुझी आँखों में वेदना घनीभूत हो गयी। उसका चेहरा म्लान हो गया। वह टूटा-टूटा सा अपनी पत्नी के पास आया।
उसकी पत्नी बुरी तरह खाँस रही थी। तनाव के मारे उसकी नसें उभर आयीं थीं। चेहरा लाल-सुर्ख हो गया था। आँखें बाहर निकलती सी लग रही थीं।
उसने उसकी पीठ पर हाथ फेरना शुरू किया। फिर उसके मुँह से खून सना कफ बाहर निकला। भोलिया स्वयं डर गया। टी.बी. के भय से उसके मन-प्राण भयभीत हो गये। उसे लगा कि टी.बी. के कीटाणु उसमें प्रवेश कर रहे हैं।
जब उसकी बस्ती के चंद लोगों ने उसकी बहू को बता दिया कि उसे टी.बी. है, तो उसने जीने की सारी आशाएँ छोड़ दीं। शीघ्र ही उसे ठाकुर का हुक्म सुना दिया गया कि उसे बस्ती के बाहर चला जाना चाहिए जहाँ से मृत्युदायक टी.बी. के कीटाणु गाँव में न घुस पायें।

भोलिया के अन्तर्मन के कोने में भी यही बात थी कि उसकी बहू को घर छोड़ देना चाहिए, वर्ना यह रोग उसे भी निगल जायेगा।
गाँव के बाहर एक खंडहर था। उस खंडहर में एक ही कमरा था। कच्ची मिट्टी का बना खंडहर। टूटा-टूटा। भोलिये ने अपनी बहू को कचरा ढोने वाले भैंसे पर बिठा कर उस खंडहर में पहुँचा दिया, ताकि आखिरी साँस तक वह अपने रोग के कीटाणुओं को कहीं और न फैला सके जहाँ से वे कीटाणु रेंगते हुए बस्ती में न आ पायें।
इतनी उम्र पारकर लेने के बाद भी भोलिया उस दृश्य को नहीं भूला है। उस खंडहर में उसकी पत्नी अकेली रहती थी। उसके आसपास चूहे भागते रहते थे। रात को एक दो बार नंगे पेड़ का अहसास इतना भंयकर होता था कि भोलिये की बहू चीख पड़ती थी। चारों ओर चिथड़े ही चिथड़े। चिथड़े के आस-पास खून के धब्बे ! एक नरक । उस नरक में मार्मिक यंत्रणाओं से घिरी वह मानवी। एक अस्थि-पंजर। एक भुतहा कंकाल।

भोलिया रोटियाँ, वे भी बासी-सूखी रोटियाँ, माँग कर उसे डाल आता था। कभी-कभी रोटियां इतनी सूखी होती थीं कि भोलिये की बहू उन्हें पानी में भिगो कर खाती थी। तब वह कहती, ‘‘भगवान किसी को अछूत न बनाये। अछूत की ‘जूण’ किसी बैरी-दुश्मन को भी न दे। इससे तो पशु-पक्षी की जण भी चोखी है।’’
धैर्य देने के लिए भोलिया उससे कहता, ‘‘यह सब अपने-अपने कर्मों के फल हैं। इस देह को न जाने कितने जन्मों के पापों का दंड भोगना पड़ता है।’’
यह दंड ! यह सजा !
जीवन को एक सजा की तरह भोग रही थी भोलिये की बहू। भोलिये की बहू ही क्यों, चंद घरों की वह बस्ती। हरिजनों की वह बस्ती। तब सारे देश की हरिजन बस्तियाँ नरक थीं। उनके इन्सान कीड़े-मकोड़ें की मानिंद।

आखिर एक दिन भोलिये की बहू ने दम तोड़ दिया। भोलिये को मालूम नहीं कि उसकी बहू ने रात के किस पहर के किस पल में अपना दम तोड़ा था पर उसने अपना दम जरूर तोड़ दिया था। वह मर गयी थी। उसकी मृत्यु पर किसी को दुख नहीं। किसी ने आँसू नहीं बहाये। किसी ने सोग-संताप नहीं रखा। एक व्यर्थ की जिन्दगी ने एक व्यर्थ मौत ले ली।
बीड़ी बुझ गयी थी।
भोलिये का अतीत भी एक पल के लिए बुझ गया था। उसने देखा कि सामने बस्ती में दो बच्चे लड़ रहे हैं। माँ...बहन...की गालियाँ निकाल रहे हैं।
एक प्रश्न उठा और उसके सामने फैल गया।
उसने बीड़ी फिर जला ली।
उसका अतीत जल गया। ज्वाला की तरह उसका अतीत प्रकाशमान हो गया।
बीवी के मरने के बाद भोलिये ने एक विधवा से ‘नाता’ कर लिया था। उसे पीला ओढ़ना ओढ़ा कर घर में डाल लिया था। उसकी जिन्दगी ने तब एक नयी करवट ले ली थी। उसके एक लड़का भी हुआ।
देश स्वतंत्र हो गया।
उसने सुना कि राजाओं के राज्य चले गये हैं। इस देश का हर आदमी अब राजा है। गाँधी बाबा नाम के एक महात्मा हैं। पंडित नेहरू नये राजा बन गये हैं।

तो उसने भी अन्तःप्रेरणा से अपने बेटे का नाम गोरिये से बदलकर आजादमल रख दिया, जो बाद में ‘आजादिया’ हो गया। आजादिया से अजदिया।
अजदिया आजादी के पहले जैसे ही वातावरण में पलने लगा।
उसके लिए कोई शिक्षा नहीं, कोई स्कूल नहीं, जीने की कोई अन्य सुविधाएँ नहीं। अजदिया तब तेरह बरस का था।
एक दिन पहली बार भोलिया व उसकी सारी बस्ती को यह मालूम हुआ कि उनका जीवन-स्तर एकाएक बदल गया है। वे जरूर बड़े आदमी बन गये हैं।
वह अपनी बस्ती का पंच था। उसकी जाति में उसकी ही पंचायत चलती थी। उसके पीछे उसकी बस्ती के सारे लोग थे। उसके हुक्म को वे परमेश्वर की तरह मानते थे।

तो उसकी बस्ती में प्रभुलाल आया था। प्रभुलाल मोची था और वह चुनाव में खड़ा हुआ था। उसने आकर भोलिये के यहां चाय पी। उस दिन भोलिये को लगा कि छुआ-छूत टूट रही है। एक मोची ने एक भंगी के यहाँ चाय पी। वह खुशी में पागल हो गया। उसके पाँव जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। जब प्रभुलाल ने दो नंग-धड़ंग धूलभरे बच्चों को अपने सीने से लगाकर कहा, ‘‘हम सब हरिजन हैं; अब न कोई भंगी है और न कोई चमार, न कोई राजा है और न कोई रंक’’ तो उसे लगा था कि वह वास्तव में बड़ा आदमी हो गया है।
प्रभूलाल ने उससे कहा, ‘‘भोलूराम !’’ वाह ! भोलिये से सीधा भोलू राम ! कितना सम्मान ? कितना मान ?
‘‘भोलूराम ! चुनाव आ गये हैं, मैं तुम लोगों से वोट माँगने आया हूँ। मुझे उम्मीद है कि तुम सब मुझे वोट दोगे। तुम लोग अपने देवता रामदेव की कसम खाओ कि वोट मुझे ही दोगे। मैं गाँधी बाबा की कांग्रेस पार्टी से खड़ा हुआ हूँ।’’ उसने नजर जमा कर प्यार से कहा : ‘‘हमारी पार्टी का चुनाव-चिह्न दो बैलों की जोड़ी है।’’ उसने ही पहली बार जानकारी दी कि नगर में एक स्कूल खुल गया है, जिसमें हमारे बच्चे भी पढ़-लिख सकते हैं।
भोलिया प्रभुलाल की मधुर वाणी से ही प्रभावित हुआ। उसने पूछा, ‘‘वोट देने से क्या होगा ? तुम क्या बन जाओगे ? तुम्हें क्या मिल जायेगा ?’’

प्रभुलाल हँसा। बोला, ‘‘देश आजाद हो गया है। हम वोट से एम.एल.ए. बनेंगे, फिर राज्य चलायेंगे। सारा राज्य-काज हमारी ही आज्ञा से चलेगा।’’
भोलिये ने उसे सावल भरी नजर से देखा। उसे जैसे विश्वास नहीं हुआ कि प्रभुड़ा भी राज-काज की बातें कर सकता है। वह राज्य चला सकता है ? राजा जैसा काम कर सकता है ? एक मोची राज-काज चलायेगा ? उसे विश्वास नहीं हो रहा था। वह टुकुर-टुकुर प्रभु को देखने लगा।
प्रभु ने उठते हुए भोलिये को एकांत में ले जाकर कहा, ‘‘वैसे, भोलूराम, वोट बेटी की तरह होता है। हरिजन की बेटी हरिजन को और हरिजन का वोट हरिजन को।...समझे ?’’
भोलिये ने यंत्रवत सिर हिला दिया।
पर उसके चौथे दिन गाँव के ठाकुर ने भोलिये को बुलाया। उसका कारिन्दा स्वयं आया था। उसने मुलायम स्वर में कहा, ‘‘तुम्हें ठाकुर-सा बुला रहे हैं।’’

इसके पहले कारिन्दे ने कभी भी मुलायम स्वर का प्रयोग नहीं किया था। पहली बार वह उसके मुलायम स्वर को सुन रहा था।
पहली बार उसकी साँप जैसी हृदय वेधक गोल आँखों में आदर की भावना थी।



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